अर्दोआन या मोहम्मद बिन सलमान: सऊदी अरब को छोड़कर तुर्की के पास आ रहा है पाकिस्तान?

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- Author, फ़रहत जावेद
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
कई महीनों से राजनयिक हलकों में यह बात चल रही है कि पाकिस्तान के विदेश संबंधों में "नीतिगत बदलाव" हुआ है और अब इस्लामाबाद का झुकाव तुर्की की ओर हो रहा है.
यह बात भी चल रही है कि पाकिस्तान अब सऊदी अरब के मुक़ाबले तुर्की को प्राथमिकता दे रहा है.
इस धारणा को उन समाचारों और ट्रेंड्स ने हवा दी है जो पिछले कुछ हफ़्तों से सोशल मीडिया पर चल रहे हैं. उनमें से कुछ तो फ़र्ज़ी ख़बरों पर आधारित थे. जिनका खंडन करने के लिए ख़ुद पाकिस्तान विदेश मंत्रालय को आगे आना पड़ा था.
हाल ही में हुई एफ़एटीएफ़ की बैठक के दिन ऐसी ही एक ख़बर आई थी कि सऊदी अरब ने मतदान प्रक्रिया में पाकिस्तान का विरोध किया था. जब यह ट्रेंड तेज़ हुआ और बहस शुरू हुई, तो विदेश विभाग को बयान देकर इसे स्पष्ट करना पड़ा.
इसके बाद, कश्मीर दिवस के अवसर पर जब यह ख़बर सामने आई कि रियाद में पाकिस्तानी दूतावास पर कश्मीर दिवस समारोह आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है तो एक बार फिर सोशल मीडिया पर सऊदी अरब ट्रेंड करने लगा. और अब ताज़ा स्थिति यह है कि सऊदी मुद्रा का मुद्दा उठ गया है.

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सऊदी अरब ने पिछले दिनों 20 रियाल का एक नया करेंसी नोट जारी किया, जिसमें देश की जी-20 की अध्यक्षता को हाई लाइट किया गया है.
उसी नोट के दूसरी तरफ़ दुनिया का नक्शा छापा गया है, जिसमें कश्मीर और गिलगित-बाल्तिस्तान को भारत का हिस्सा नहीं दिखाया गया, जिस पर पाकिस्तानी खुश थे.
लेकिन जल्द ही कई भारतीय समाचार चैनलों और सोशल मीडिया यूज़र्स ने कहा कि इन क्षेत्रों को नक्शे पर पाकिस्तान का हिस्सा भी नहीं दिखाया गया है.
यह क़दम दोनों ही देशों में कश्मीर और गिलगित-बाल्तिस्तान के मुद्दे पर भारत के आधिकारिक पक्ष को दर्शाता है. भारतीय मीडिया में तो इसकी प्रशंसा की गई लेकिन पाकिस्तान में इसे बहुत गर्मजोशी से नहीं लिया गया.
तुर्की और सऊदी अरब के पाकिस्तान के साथ संबंध कैसे हैं? हो सकता है कि यह तुर्की या सऊदी अरब के लिए कोई बहुत बड़ी बात न हो लेकिन पाकिस्तान के लिए ये संबंध बहुत ही महत्वपूर्ण हैं.

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क्या है दूरियों की वजह
सऊदी अरब पाकिस्तान की आर्थिक सहायता के लिए कई बार आगे बढ़ा है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बदले में पाकिस्तान को अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं में सऊदी अरब को सबसे आगे रखना पड़ा है. बल्कि कई अवसरों पर इस विदेश नीति के 'माइक्रो मैनेजमेंट' में सऊदी हस्तक्षेप भी दिखना शुरू हुआ, जो स्पष्ट रूप से अब पाकिस्तान के लिए स्वीकार्य नहीं है.
हालांकि, पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि ज़ाहिरी तौर पर, पाकिस्तान और सऊदी अरब संबंधों में उदासीनता की वजह, पाकिस्तान के तुर्की, ईरान या किसी अन्य देश के साथ संबंध होना नहीं है. बल्कि वो "मुद्दे" हैं जिन पर पाकिस्तान को सऊदी समर्थन की उम्मीद थी लेकिन समर्थन नहीं मिला.
बीबीसी ने इस बारे में पूर्व राजदूत और विदेश मामलों के विशेषज्ञों से बात की और यह समझने की कोशिश की, कि तुर्की के प्रति झुकाव एक अनोखी बात थी या विदेश नीति में एक विकासवादी बदलाव.
पूर्व विदेश सचिव शमशाद अहमद के अनुसार, पाकिस्तानी लोग पहले से ही सऊदी अरब के कुछ फ़ैसलों के विरोध में हैं. जैसे कि कश्मीर मुद्दे पर सऊदी अरब का भारत को समर्थन या उम्मीद के मुताबिक पाकिस्तान के पक्ष का समर्थन न करना.
दूसरी ओर, उनका मानना है कि इसरायल के समर्थन के संकेतों से भी पाकिस्तानी अवाम का सऊदी अरब पर विश्वास कम हो रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक नसीम ज़हरा के अनुसार, ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान ने एक झटके के साथ संबंधों में बदलाव किया हो. बल्कि देश यह सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश करेगा कि जो बुनियादी संबंध हैं वो बिल्कुल भी प्रभावित न हों. जहां तक सैन्य संबंधों का सवाल है, तो उनमें अभी तक कोई बदलाव नहीं हुआ है और न ही निकट भविष्य में होगा.
उनका मानना है कि तुर्की के साथ संबंध स्वाभाविक तरीके से आगे बढ़ रहे हैं. इनका सऊदी अरब के साथ मौजूदा संबंधों के साथ न तो कोई लेना-देना है और न ही होना चाहिए.
नसीम ज़हरा का कहना है, "तुर्की के साथ पाकिस्तान के संबंधों में सुधार के शायद धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पर्यटन और कई अन्य कारण हो सकते हैं. इसलिए यह केवल एक स्वाभाविक बात है कि इन सभी कारकों की उपस्थिति में, तुर्की के साथ संबंध और मजबूत हों. यह कहना ग़लत है कि तुर्की के साथ मजबूत संबंध के कारण सऊदी अरब के साथ रिश्ते बिगड़ रहे हैं.''
नसीम ज़हरा ने कहा कि सऊदी अरब के साथ संबंधों में बदलाव का कारण कुछ और है. उन्होंने कहा, "हर देश के हित अलग होते हैं. सऊदी अरब को भारत या क्षेत्र के किसी भी देश को वरीयता देने का अधिकार है. यही अधिकार पाकिस्तान का भी है.

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उनके अनुसार, "पहली बार ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है कि पाकिस्तान अपनी भौगोलिक स्थिति का उपयोग करते हुए अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित करने की कोशिश कर रहा है और यह एक साल की बात नहीं है. यह पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान का यही तरीक़ा रहा है. इससे अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति में सुधार हुआ है और क्षेत्र में समग्र रूप से बदलाव इसकी वजह बना है."
अचानक नहीं हुआ बदलाव
इससे पहले, बीबीसी के साथ बात करते हुए सऊदी अरब के मामलों पर गहरी नज़र रखने वाले विश्लेषक राशिद हुसैन ने कहा था कि संबंधों में बदलाव अचानक नहीं हुआ है बल्कि "दबाव पिछले कई वर्षों से बढ़ रहा था."
वह इस दबाव की कड़ियां साल 2002 से जोड़ते है, जब तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने सऊदी अरब का दौरा किया था.
उस समय, "आर्थिक कूटनीति का उपयोग करते हुए वो सऊदी अरब और पाकिस्तान के संबंधों में दरार डालने में कामयाब हो गए थे."
राशिद हुसैन का कहना है कि सऊदी अरब ने इस क्षेत्र के मामलों को पाकिस्तानी दृष्टिकोण से देखने के बजाय एक नए दृष्टिकोण से देखना शुरू कर दिया. इस प्रकार सऊदी अरब और भारत के संबंधों का एक नया दौर शुरु हुआ. जिसमें पाकिस्तान के हित और संबंध का ज़िक्र तक नहीं था.
इसके बाद पिछले साल, संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान के विरोध को नज़रअंदाज़ करते हुए, भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को, इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में आमंत्रित किया था. इसी वजह से पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी इस बैठक में शामिल नहीं हुए थे.
बात यहीं ख़त्म नहीं हुई! संयुक्त अरब अमीरात ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया. इसके बाद सऊदी अरब ने भी नरेंद्र मोदी को अपने देश का दौरा करने के लिए आमंत्रित किया और भारत-सऊदी अरब के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए सर्वोच्च सम्मान दिया.
इसके बाद संबंधों में तनाव बढ़ने की वजह बना इस्लामिक देशों के संगठन (ओआईसी) का रवैया. जब संगठन ने पाकिस्तान की मांगों के ख़िलाफ़ विदेश मंत्रियों की बैठक बुलाने के लिए अनिच्छा व्यक्त की.

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ये तनाव उस समय और अधिक उभर कर सामने आया जब कश्मीर मामले पर ओआईसी की बैठक न बुलाने को लेकर शाह महमूद क़ुरैशी ने सऊदी अरब को आड़े हाथो लिया था.
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इसी बयान के बाद, सऊदी अरब ने घोषणा की थी कि उसने 2018 में पाकिस्तान को जो तीन अरब डॉलर क़र्ज़ दिया था, पाकिस्तान उसे समय से पहले चुकाए.
इस प्रतिक्रिया के बाद कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा को बातचीत के लिए सऊदी अरब भेजा गया.
तब पाकिस्तान में सऊदी अरब के पूर्व राजदूत डॉक्टर अली अवाज़ असीरी ने अरब न्यूज़ में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा था, "पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ जिस तरह के आपसी प्रेम, धर्म, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों पर आधारित संबंध हैं, उनकी तुलना नहीं की जा सकती है. ये संबंध दोनों देशों में व्यक्तित्व और सरकारों के परिवर्तन से ऊपर हैं.''
हालांकि, पूर्व सऊदी राजदूत ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री के इस बयान को एक "ख़तरनाक सुझाव" कहा था कि "अगर सऊदी अरब ने कश्मीर मामले पर इस्लामिक देशों के संगठन (ओआईसी) के विदेश मंत्रियों की बैठक नहीं बुलाई तो पाकिस्तान इस संगठन के समानांतर एक और संगठन की बैठक बुला सकता है."
असीरी ने अरब न्यूज़ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि, अगर विदेश मंत्री क़ुरैशी के इस सुझाव का मतलब कुआलालंपुर की तरह एक और बैठक का आयोजन करना है तो, "यह एक ख़तरनाक विचार है. जिसकी उम्मीद एक भाई देश से नहीं की जा सकती है."
पूर्व राजदूत शमशाद अहमद का मानना है कि ख़ुद शाही परिवार के भीतर भी सऊदी नीतियों का विरोध है और पाकिस्तान इन नीतियों का समर्थन नहीं कर सकता है और हर देश की अपनी विदेश नीति है.
पाकिस्तान में मतभेद
वरिष्ठ पत्रकार अमीर ज़िया के अनुसार, हाल के दिनों में न केवल सऊदी विरोधी बयानबाज़ी सोशल मीडिया पर सामने आई है बल्कि यहां भाषाई और संप्रदाय के आधार पर भी ग़लत या भ्रामक सामग्री फैलाई जा रही है. ऐसे मुद्दों को बहुत भड़काने का प्रयास किया जा रहा है.
वो कहते हैं कि पाकिस्तान एक 'ध्रुवीकृत'(यानी बंटा हुआ) समाज है. एक तबक़ा है जो सऊदी विरोधी है और दूसरी तरफ़ एक ऐसा वर्ग है जो हमारे पड़ोसी इस्लामिक देश (यानी ईरान) के विरोधी हैं. ये वर्ग असल पाकिस्तान या पाकिस्तान की विदेश नीति का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. ये लोग साम्प्रदायिकता के नज़रिये से देखते हैं.
अमीर ज़िया ने आगे कहा कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच संबंधों में पहले भी एक या दो बार खटास आई थी. "लेकिन यह स्पष्ट है कि सऊदी अरब पाकिस्तान की विदेश नीति के मुख्य स्तंभों में से एक है."
अमीर ज़िया के अनुसार, तुर्की और सऊदी अरब दोनों ही पाकिस्तान के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं.
वह कहते हैं, "कूटनीति की विशेषता ये होनी चाहिए कि दोनों देशों से ही अच्छे संबंध हों. पाकिस्तान के साथ संबंध सऊदी अरब के लिए भी महत्वपूर्ण हैं. छोटे-छोटे मामलों को भी 'राई का पहाड़' बना दिया जाये कि किसी समारोह को आयोजित नहीं करने दिया गया वगैरह. जहां तक अवाम की बात है तो पाकिस्तान की अवाम तुर्की और सऊदी अरब दोनों की अवाम के प्रति बहुत ईमानदार रवैया रखती है.''
कश्मीर मुद्दे के बारे में बात करते हुए अमीर ज़िया ने कहा कि हर देश अपने खुद के हितों के आधार पर राजनयिक संबंधों में निकटता या दूरी को अपनाता है. इस मामले में पाकिस्तानी लोगों की सोच यथार्थवाद के बजाय भावनाओं पर आधारित है.
वह कहते हैं, "यथार्थवाद यह है कि प्रत्येक देश अपने हितों को देखता है. कश्मीर का मुद्दा पाकिस्तान के लिए बहुत महत्वपूर्ण था. इस पर भारत को सऊदी अरब का समर्थन शायद पाकिस्तान के लिए अविश्वसनीय था और कश्मीर के मुद्दे पर ओआईसी का समर्थन मिले, इस मामले में पाकिस्तान सही था. इसीलिए पाकिस्तानी लोग इस मुद्दे पर सउदी अरब से नाराज़ हैं."
उन्होंने कहा कि यह स्वीकार्य नहीं है कि पाकिस्तान की विदेश नीति का 'माइक्रो मैनेजमेंट' किया जाये क्योंकि यह हमारे देश हित के ख़िलाफ़ है.
नसीम ज़हरा के अनुसार, रिश्ते की प्रकृति को बदलने के कई फ़ैक्टर होते हैं. इसमें सऊदी अरब के भारत के साथ संबंध, यमन का मामला और फिर ख़ुद पाकिस्तान से उम्मीदें, ऐसे बहुत से फ़ैक्टर हैं.
नवाज़ शरीफ़ कभी भी सऊदी अरब को नाराज़ नहीं होने देते थे. लेकिन अब इमरान ख़ान और विशेष रूप से पाकिस्तान के सशस्त्र बलों को भी यह लगता है कि अब सब कुछ अपने ही घर के बहुत करीब आ चुका है. चाहे वह ईरान का विरोध हो या यमन का युद्ध, पाकिस्तान को एक सीमा निर्धारित करने की आवश्यकता थी.
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