शहबाज़ शरीफ़ ने फिर बढ़ाया दोस्ती का हाथ, क्या मिलेगा भारत का साथ?

शहबाज़ शरीफ़

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    • Author, शुमाइला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने एक बार फिर भारत के साथ शांति का हाथ बढ़ाने का संकेत दिया है.

लेकिन इस बार ये बात उन्होंने सेना के आर्मी चीफ़ सैयद असीम मुनीर की मौजूदगी में बात कही.

वो पाकिस्तान के पहले मिनरल समिट में ग्लोबल और लोकल निवेशकों को संबोधित कर रहे थे.

ऐसे समय जब पाकिस्तान की मौजूदा सरकार का कार्यकाल ख़त्म होने जा रहा है, पिछले हफ़्ते मुल्क में निवेशकों, वैश्विक नेताओं और प्रतिनिधिमंडलों की भारी भीड़ जुटी थी.

अभी हाल तक डिफ़ॉल्ट होने की कगार पर पहुंचे पाकिस्तान ने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए स्पेशल इनवेस्टमेंट फ़ैसिलिटेशन काउंसिल की स्थापना की है.

इसे भी फौज समर्थित एक और क़दम के तौर पर देखा जा रहा है.

नई योजना के अनुसार, खनन, कृषि, सूचना टेक्नोलॉजी और रक्षा उत्पादन को विदेशी निवेश के लिए उपयुक्त क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया गया है.

इसी कड़ी में निवेशकों के साथ सम्मेलन था और पीएम शहबाज़ शरीफ़ ने पाकिस्तान आर्मी चीफ़ की मौजूदगी में पड़ोसी मुल्कों के साथ अमन कायम करने की बात कही.

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि देश गंभीर मुद्दों पर अपने पड़ोसी से बातचीत के लिए तैयार है.

पिछले युद्धों से दोनों देशों के लोगों को कितनी तकलीफ झेलनी पड़ी, इसका ज़िक्र करते हुए उन्होंने पूछा कि क्या आगे का रास्ता सैन्य टकराव हो सकता है, या दोनों मुल्कों को आर्थिक क्षेत्र में होड़ करनी चाहिए?

पीएम शहबाज़ शरीफ़ ने कहा, “अगर पड़ोसी गंभीर मुद्दों पर बात के लिए तैयार है तो हम भी उनसे बात करने को तैयार हैं...क्योंकि युद्ध अब विकल्प नहीं है.”

कश्मीर या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 की बहाली का बिना ज़िक्र किए शहबाज़ शरीफ़ ने कहा, “पड़ोसी को समझना होगा कि जब तक बाधाओं को हटाया नहीं जाता, गंभीर मुद्दों को समझा नहीं जाता और उनपर शांतिपूर्ण और अर्थपूर्ण बातचीत नहीं होती, हम सामान्य पड़ोसी नहीं बन सकते.”

हालांकि उन्होंने पाकिस्तान के परमाणु हथियार संपन्न देश होने की याद भी दिलाई और कहा कि मुल्क ने आक्रमण नहीं बल्कि रक्षा के मकसद से परमाणु शक्ति हासिल की.

उन्होंने कहा कि अगर दक्षिण एशिया में परमाणु युद्ध का ख़तरा पैदा हुआ तो क्या हुआ इसे बताने के लिए कौन बचेगा, इसलिए परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसियों, भारत और पाकिस्तान के लिए युद्ध कोई विकल्प नहीं है.

शहबाज़ शरीफ़ का बयान

क्षेत्रीय ज़रूरतें

इस्लामाबाद में इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्ट्रेटेजिक स्टडीज़ में रिसर्चर माहीन शफ़ीक़ भारत, पाकिस्तान और चीन के रिश्तों पर बारीक़ नज़र रखती हैं.

उनका मानना है कि हालांकि पीएम के बयान में कुछ नया नहीं है. ये लगभग पहले से तय दिशा वाला बयान है और इसे इस्लामाबाद की भारत संबंधी नीति में निरंतरता के रूप में देखा जा सकता है, जो पिछले कुछ समय से नई दिल्ली को सकारात्मक बातचीत के लिए तैयार करने की कोशिश में है.

माहीन कहती हैं कि इस बयान में जो अहम बात है वो है इसकी टाइमिंग और जगह, जहां पर ये बात कही गई.

पाकिस्तान ने अभी हाल ही में चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर के दूसरे चरण की शुरुआत की है.

वो अपने यहां कृषि और खनन क्षेत्र में निवेश करने के लिए कई देशों को निमंत्रित कर रहा है और उसका मानना है कि किसी भी आर्थिक गतिविधि के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी और पड़ोसी भारत के साथ तनाव को कम करना ज़रूरी है.

पाकिस्तान इस समय आर्थिक रूप से परेशान है और अपने अंदरूनी मुश्किलों से निपटने में इतना ध्यान केंद्रित किए हुए है कि वो नहीं चाहता कि भारत के साथ तनाव बढ़े.

माहीन का ये भी मानना है कि अगर दोनो देशों के बीच रिश्ते ठीक होते हैं, तो इलाकाई कनेक्टिविटी से दोनों को कहीं अधिक फायदा हो सकता है.

हालांकि उन्हें लगता है कि मौजूदा हालात को देखते हुए पाकिस्तान से होकर मध्य एशिया की इलाक़ाई कनेक्टिविटी भारत के लिए संभव नहीं दिखाई देती.

माहीन के विचार से पाकिस्तान को ये उम्मीद नहीं है कि प्रधानमंत्री के नरम रुख पर दिल्ली से भी कोई जवाब आएगा.

उनके मुताबिक भारत अगले आम चुनाव की तैयारी में है और वहां मौजूदा बीजेपी सरकार को पिछले चुनाव प्रचार में भी पाकिस्तान विरोधी बयानबाज़ियों से फ़ायदा मिल चुका है और पाकिस्तान का हौवा खड़ा करना उनकी राजनीतिक मजबूरी है, ये एक ऐसी रणनीति है जो काम करती है.

बिलावल भुट्टो

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पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो शंघाई कोआपरेशन आर्गेनाइजेशन के विदेश मंत्रियों की बैठक में गोवा आए थे और यहां आपसी तनाव को कम करने का एक मौका था लेकिन भारत की ओर से बहुत साफ़ संदेश था.

भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर और बिलावल भुट्टो की मुलाक़ात में जो हाव भाव दिखे वो बहुत कुछ बयान करने के लिए पर्याप्त था.

माहीन कहती हैं, “इस बैठक ने दिखाया कि मोदी सरकार फिलहाल इस्लामाबाद की और दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाना चाहती.”

पाकिस्तान की ओर से कश्मीर और अनुच्छेद 370 की बहाली का मुद्दा न उठाया जाना, क्या ये दिखाता है कि भारत की ओर उसका रुख लचीला और नरम हुआ है?

माहीन इससे असहमत हैं.

वो कहती हैं, “शहबाज़ शरीफ़ शांति का हाथ बढ़ाते हुए सावधान थे. उन्होंने गंभीर मुद्दों का ज़िक्र किया और दोनों प्रतिद्वंद्वी मुल्कों के बीच सबसे गंभीर मुद्दा है कश्मीर, ये जगजाहिर बात है. इसलिए उनके शब्दों के चुनाव में सावधानी थी. इस संकेत को नीति में बदलाव समझ कर भ्रमित नहीं होना चाहिए.”

हालांकि अगर दोनों देश 2019 से ही चले आ रहे गतिरोध को तोड़ने का संकल्प लेते हैं तो वे सकारात्मक तरीक़े से आगे जाने का रास्ता ढूंढ सकते हैं.

वो कहती हैं कि ये सच होना मुश्किल लगता है लेकिन ये संभव है.

पाकिस्तान

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आर्थिक ख़तरे का मुकाबला

दूसरी तरफ रक्षा विश्लेषक मारिया सुल्तान शहबाज़ शरीफ़ के बयान को अलग तरीके से देखती हैं.

उनके मुताबिक सीपेक की ये दसवीं सालगिरह और दूसरे चरण की शुरुआत है और पीएम के बयान को इसी संदर्भ में देखना चाहिए.

जिस दिन शहबाज़ शरीफ़ ने ये बयान दिया उसके एक दिन पहले ही चीन के उप प्रधानमंत्री इस्लामाबाद में मौजूद थे.

पहले ये धारणा बन रही थी कि सीपेक को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है लेकिन चीन के उप प्रधानमंत्री ही लाइफेंग की हालिया यात्रा से लगता है कि चीन और पाकिस्तान इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प हैं.

मारिया कहती हैं कि पीएम के बयान से तीन चीजें पता चलती हैं. पहला, दोस्ती का हाथ, पाकिस्तान सकारात्मक वार्ता करना चाहता है और वो सभी अहम मुद्दों पर चर्चा करना चाहता है, इसका मतलब है कि कश्मीर के मुद्दे को छोड़ा नहीं जाएगा लेकिन उसी तक सीमित भी नहीं रहा जाएगा. उसके अलावा भी मुद्दे हैं जैसे पानी, बलोचिस्तान और उग्रवाद.

मारिया के नज़र में, इस बयान का दूसरा पहलू है, ये कहना कि अतीत में दोनों पड़ोसी मुल्कों के बीच युद्ध के चलते ये क्षेत्र आर्थिक रूप से बहुत पिछड़ गया. एक मौके को गंवा दिया गया. ये बयान बताता है कि पाकिस्तान अब घरेलू स्तर पर अपने आर्थिक एजेंडे पर फ़ोकस करना चाहता है और उसे लगता है कि आम पाकिस्तानियों को ग़रीबी से ऊपर उठाने लिए सीपेक आख़िरी मौका है.

अब सीपेक की जब बात आती है, इस्लामाबाद हमेशा दावा करता है कि भारत, पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिम प्रांत बलोचिस्तान में अलगाववाद और उत्तरपूर्वी ख़ैबर पख़्तूनख्वा प्रांत में उग्रवाद को हवा देकर इस पहल को बर्बाद करने की कोशिश कर रहा है.

मारिया सुल्तान के अनुसार, इस बयान का तीसरा हिस्सा इसके बाद आता है, जब वो दोनों पड़ोसियों को परमाणु हथियार सम्पन्न देश होने का ज़िक्र करते हैं और कहते हैं कि ये आत्मरक्षा के लिए है न कि आक्रमण के लिए.

मारिया कहती हैं कि उनके बयान में से साफ़ संदेश है कि पाकिस्तान अपने आर्थिक सुरक्षा को लेकर समझौता नहीं करेगा और आर्थिक हित के ख़िलाफ़ किसी भी ख़तरे को विफल कर देगा.

इसलिए पहले परमाणु स्टेटस का ज़िक्र करने और फिर इसकी गणित समझा कर शहबाज़ ने ये बताने की कोशिश की कि दोनों परमाणु संपन्न राष्ट्रों में किसी भी टकराव का नतीज़ा शून्य ही होगा और आगे किसी भी सैन्य टकराव में जनता, उसकी संपन्नता और उसकी भलाई ही दांव पर होगी.

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