सऊदी अरब को पाकिस्तान की मदद के बदले क्या मिलता है

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अगस्त 2018 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद इमरान ख़ान अगले ही महीने अपने पहली विदेश यात्रा पर सबसे पहले सऊदी अरब गए.
इमरान ख़ान ने अपने पौने चार साल के कार्यकाल में कुल 32 विदेश यात्राएं कीं, इनमें से वो आठ बार सऊदी अरब गए. कभी वो सऊदी राजशाही को सम्मान प्रकट करने तो कभी आर्थिक मदद मांगने पहुँचे.
इमरान की सरकार गिरने के बाद प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने भी अपना पहला विदेशी दौरा सऊदी अरब का ही किया. वहाँ पाकिस्तानी मूल के लोगों ने शरीफ़ का विरोध करते हुए चोर-चोर के नारे लगाए और इसे लेकर इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ मुक़दमा भी दर्ज हो गया है.
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पाकिस्तान की स्थापना के समय से ही मज़बूत संबंध हैं. 1970 के दशक के बाद से ये संबंध और भी मज़बूत हुए हैं. पाकिस्तान के नेता अपने पहले दौरे पर सऊदी जाते रहे हैं.
विश्लेषक मानते हैं कि ऐसा करने की सबसे अहम वजह है सऊदी से पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद.
हालिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सऊदी अरब गए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने सऊदी से आठ अरब डॉलर का राहत पैकेज लेने में कामयाबी हासिल की है.
पाकिस्तानी मीडिया (द न्यूज़) की रिपोर्ट के मुताबिक़ सऊदी अरब पाकिस्तान के लिए तेल के लिए दी जानी वित्तीय राहत को दोगुना करेगा. इसके अलावा 4.2 अरब डॉलर के चल रहे लोन को आगे बढ़ाएगा. हालांकि इसे लेकर अभी अंतिम समझौता नहीं हुआ.
सऊदी अरब ने पिछले क़र्ज़ समझौते के तहत दिसंबर 2021 में पाकिस्तान स्टेट बैंक में तीन अरब डॉलर जमा कराए थे.

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कराची की आईबीए यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हुमा बक़ाई कहती हैं, "इमरान ख़ान और शहबाज़ शरीफ़ प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले सऊदी अरब गए क्योंकि दोनों को ही तुरंत आर्थिक मदद की ज़रूरत थी. स्थिति चाहें जो भी हो, सऊदी अरब पाकिस्तान को सांस लेते रहने लायक मदद तो करता ही है."
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था जब-जब संकट में आती है, सऊदी अरब उसकी मदद के लिए आगे आता है.
पिछले साल जब पाकिस्तान मुश्किल आर्थिक संकट में फंसा था, डॉलर के मुक़ाबले उसका रुपया टूट रहा था और विदेशी मुद्रा भंडार ख़त्म हो रहा था तब सऊदी अरब ने ही आगे बढ़कर उसकी मदद की थी.
पिछले साल अक्टूबर में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 4.2 अरब डॉलर की आर्थिक मदद दी थी. पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के सऊदी दौरे के दौरान इस मदद की घोषणा की गई थी. ये मदद सस्ते क़र्ज़ और उधार तेल के रूप में थी.
तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने सऊदी का शुक्रिया अदा करते हुए कहा था, ''पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक को तीन अरब डॉलर देने और तेल के लिए 1.2 अरब डॉलर की मदद के लिए हम क्राउन प्रिंस के प्रति आभार व्यक्त करते हैं. सऊदी अरब हर मुश्किल वक़्त में पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा है.''
पाकिस्तान को सऊदी अरब से ये क़र्ज दिसंबर 2021 में मिल गया था.
सऊदी के लिए क्यों जरूरी है पाकिस्तान?

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सुन्नी बहुल देश सऊदी अरब और शिया बहुल ईरान के बीच अरब दुनिया में वर्चस्व को लेकर प्रतिद्वंदिता रही है. ईरान और सऊदी अरब के बीच अभी भी रिश्ते बहुत अच्छे नहीं हैं. दोनों ही देश यमन में एक प्रॉक्सी युद्ध भी लड़ रहे हैं.
विश्लेषक ये मानते हैं कि सऊदी अरब ज़रूरत पड़ने पर पाकिस्तान से सैन्य सहयोग की उम्मीद रखता है.
फ़्रांस में रह रहे पाकिस्तान के निर्वासित अवॉर्ड विनिंग पत्रकार ताहा सिद्दीक़ी ने अल-जज़ीरा में 16 फ़रवरी 2019 को प्रकाशित एक लेख में कहा था कि सऊदी आर्थिक पैकेज और निवेश के वादों के ज़रिए आर्थिक रूप से तंगहाल पाकिस्तानी सरकार की वफ़ादारी ख़रीदने की कोशिश करता है और अपने हिसाब से पाकिस्तानी सीमाओं पर नीतियां बनवाता है. ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी मुल्क है.
ताहा सिद्दीक़ी ने लिखा था, ''दोनों देशों के संबंधों में सऊदी का क़र्ज़ देना कोई नई बात नहीं है. इस्लामाबाद सऊदी के पैसे और अमेरिकी नीति के कारण रियाद के हमेशा क़रीब रहा है. जब ज़िआ-उल-हक़ ने लेफ़्ट विचारधारा की तरफ़ झुकाव रखने वाले ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को 1977 में सत्ता से बेदख़ल किया तब यह रिश्ता उभरकर सामने आया. ऐसा अमेरिका के क़रीब आने के लिए भी किया गया.''
सऊदी का तेल पावर

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1970 के दशक में जब तेल की क़ीमतों में उछाल आया तो सऊदी अरब की जेबें भरने लगीं. उसके पास ज़रूरत से कहीं अधिक पैसा आ गया. विश्लेषक मानते हैं कि इसी पैसे के दम पर सऊदी अरब ने अरब और मुस्लिम वर्ल्ड में चैकबुक डिप्लोमेसी को आगे बढ़ाया. देशों क समर्थन हासिल करने के लिए सऊदी अरब ने अपने पैसों का ख़ूब इस्तेमाल किया.
सऊदी अरब ने पाकिस्तान को सिर्फ़ क़र्ज़ ही नहीं दिया बल्कि धार्मिक आधार पर भी मदद दी. पाकिस्तान की मस्जिदों और मदरसों को सऊदी अरब से चैरिटी भी मिली.
ताहा सिद्दीक़ी लिखते हैं, "ताहा सिद्दीक़ी ने लिखा है, ''सऊदी की मदद पाकिस्तान में कई तरह से आई. इनमें सैन्य और नागरिक मदद के रूप में तो थी ही लेकिन धार्मिक चीज़ों के लिए भी थीं. ज़िया-उल-हक़ की सरकार ने मस्जिदों और मदरसों में भी सऊदी चैरिटी की इजाज़त दी. यह मदद शिया विरोधी और रूढ़िवादी इस्लाम के बढ़ावे के तौर पर आई. रियाद पर पाकिस्तान में सुन्नी अतिवाद को बढ़ावा देने के भी आरोप लगते हैं. इससे शिया मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा भी बढ़ी. ईरान में इसी तरह के हमले कराने के आरोप लगे.''
अमेरिका की भूमिका

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अमेरिका सऊदी अरब का मित्र देश है. पाकिस्तान अमेरिका के लिए भी अहम रहा है. फ़रवरी 1979 में हुई ईरान क्रांति और सोवियत यूनियन का अफ़ग़ानिस्तान पर हमला ऐसी दो घटनाएं थीं जिन्होंने अमेरिकी विदेश नीति के लिए पाकिस्तान को अहम बना दिया.
अमेरिका पश्चिमी एशिया में सोवियत संघ और ईरान के प्रभाव को कम करने के लिए वहां एक मोर्चा बनाना चाहता था. इन्हीं परिस्थितियों ने पाकिस्तान को अमेरिका के लिए ख़ास बना दिया और उसे सऊदी अरब को भी और क़रीब पहुँचा दिया.
हालांकि इमरान ख़ान की सरकार के दौरान अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में स्पष्ट कड़वाहट दिखाई दी. विश्लेषक मानते हैं कि पाकिस्तान की नई सरकार अमेरिका से रिश्तों को पटरी पर लाने में कोई परहेज़ नहीं करेगी.
वहीं हाल के सालों में सऊदी अरब और अमेरिका के बीच दूरियां भी नज़र आई हैं. यमन युद्ध भी सऊदी और अमेरिका के बीच रिश्तों में कड़वाहट की एक वजह है. सऊदी अरब को लगता है कि अमेरिका ने उसकी मदद नहीं की है. जानकार मानते हैं कि मध्य पूर्व के मौजूदा हालात को देखते हुए सऊदी अरब सामरिक रूप से और भी ज़्यादा मज़बूत बनना चाहता है और वो भी अमेरिका से बनती जा रही दूरी के बावजूद.
परमाणु फ़ैक्टर

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पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है और सऊदी अरब के पास यह ताक़त नहीं है.
पाकिस्तान प्रधानमंत्री के रूप में अक्तूबर 2021 में सऊदी यात्रा के दौरान इमरान ख़ान ने कहा था कि अगर सऊदी की सुरक्षा पर कभी आंच आई तो पाकिस्तान उसकी मदद के लिए आगे आएगा.
इमरान ख़ान ने कहा था कि दुनिया का रुख़ भले ही जो भी हो पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ खड़ा रहेगा. पाकिस्तान सऊदी अरब की सेना को भी प्रशिक्षण देता है.
भारत से बढ़ती सऊदी अरब की नज़दीकी का पाकिस्तान संबंधों पर असर

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पाकिस्तान के दोस्त सऊदी अरब ने हाल के सालों में भारत से रिश्ते मज़बूत करने में कोई परहेज़ नहीं किया है. सऊदी अरब के सेना प्रमुख ने इसी साल फ़रवरी में भारत का दौरा किया. ये किसी भी सऊदी सेना प्रमुख का पहला भारत दौरा था.
इससे तीन साल पहले जब सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भारत आए थे तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए एयरपोर्ट पहुंचकर उनका स्वागत किया था.
इसके कुछ ही महीने बाद जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्तबर 2019 में सऊदी अरब गए तो दोनों देशों ने सामरिक सहयोग परिषद की स्थापना की थी.
इसके बाद दिसंबर 2020 में भारत के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने सऊदी की यात्रा की. ये भी किसी भारतीय सेना प्रमुख की पहली सऊदी यात्रा थी.
सऊदी अरब की भारत के साथ बढ़ती नज़दीकी से पाकिस्तान असहज रहा है. बावजूद इसके सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच संबंध मज़बूत बनें हुए हैं.

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प्रोफ़ेसर हुमा बक़ाई कहती हैं, "सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच संबंध अभी भी मज़बूत हैं लेकिन अब इनमें शर्ते हैं. सऊदी अरब और भारत के बीच रिश्तों में जो नई गर्मज़ोशी आई है उसने सऊदी और पाकिस्तान के रिश्तों को सूक्ष्म लेकिन मूर्त रूप से प्रभावित किया है."
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रही है. पाकिस्तान के नेता संकट के ऐसे समय में सऊदी अरब की तरफ़ देखते रहे हैं.
लेकिन क्या सऊदी पहले की तरह पाकिस्तान की मदद कर पाएगा प्रोफ़ेसर बक़ाई को लगता है कि पाकिस्तान के लिए सऊदी मदद वास्तविक रूप से कम हुई है.
प्रोफ़ेसर बक़ाई कहती हैं, "पाकिस्तान की आर्थिक संप्रभुता सिकुड़ रही है, ऐसे में पाकिस्तान सऊदी के साथ रिश्तों में बहुत मुखर नहीं हो सकता है. सऊदी अरब से पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद वास्तव में कम हुई है. इसकी वजह सऊदी की अपनी आर्थिक सीमाएं हैं. युद्ध में भी सऊदी के संसाधन लग रहे हैं."
विश्लेषक मानते हैं कि कमज़ोर आर्थिक स्थिति की वजह से ही पाकिस्तान सऊदी का खुलकर विरोध नहीं कर पा रहा है. भारत सरकार ने जब 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त किया था तब पाकिस्तान को उम्मीद थी कि सऊदी इसका खुलकर विरोध करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पाकिस्तान खुलकर सऊदी से अपनी नाराज़गी भी ज़ाहिर नहीं कर पाया.
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