सऊदी अरब आख़िर पाकिस्तान से तेल समझौता करने को क्यों तैयार हुआ?

इमरान ख़ान और मोहम्मद बिन सलमान

इमेज स्रोत, BANDAR ALGALOUD/SAUDIKINGDOMCOUNCIL/ANADOLU AGENCY

    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए एक अहम समझौते के तहत सऊदी अरब हर साल पाकिस्तान को 1.5 अरब डॉलर के कच्चे तेल की मदद फिर से शुरू करने के लिए तैयार हो गया है. इसके आलावा सऊदी अरब पाकिस्तान में निवेश की योजना पर भी फिर काम शुरू करेगा.

ये समझौता इसी साल जुलाई से लागू होगा.

नवंबर 2018 में सऊदी अरब पाकिस्तान को कुल 6.2 अरब डॉलर का कर्ज़ और ऑयल क्रेडिट (3.2 अरब डॉलर) देने को तैयार हुआ था. लेकिन कश्मीर के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच बात बिगड़ गई.

भारत ने अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 370 को हटा दिया. पाकिस्तान चाहता था कि कश्मीर के मुद्दे पर उसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिले और इसके लिए उसने सऊदी पर दवाब बनाया.

दोनों मुल्कों के बीच बात यहीं से बिगड़नी शुरू हुई. अगस्त 2020 में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को क़र्ज़ की एक तय रकम लौटाने को ही नहीं कहा, बल्कि उसे दिया जाने वाले ऑयल क्रेडिट भी रद्द कर दिया.

अब इसके क़रीब देढ़ साल बाद दोनों देश एक बार फिर हाथ मिलाने को राज़ी हुए हैं.

वीडियो कैप्शन, सऊदी ने पाकिस्तान से पैसा लौटाने को क्यों कहा?

क्या है वजह?

कुछ हलकों में ये चर्चा है कि पाकिस्तान के साथ फिर से हाथ मिला कर सऊदी अरब ईरान के प्रभुत्व को चुनौती देना चाहता है.

लेकिन जानकार मानते हैं कि एक बार फिर पास आने के दोनों देशों के फ़ैसले को मौजूदा वक्त के बदलते भू-राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनज़र देखा जाना चाहिए.

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक तौर पर रिश्ते अच्छे रहे हैं. दोनों का रिश्ता दशकों पुराना है, दोनों के बीच सुरक्षा मामलों के समझौते हैं और शीत युद्ध के दौरान दोनों साथ रहे हैं.

सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं कि 1950 के दशक से दोनों के बीच रक्षा संबंध रहे हैं, जो कमज़ोर नहीं हुए हैं. पुराने रिश्ते होने के कारण दोनों में कभी-कभी थोड़ा-बहुत फ़र्क आना स्वाभाविक है, लेकिन उनका बुनियादी रिश्ता कभी टूटता नहीं हैं.

वो कहते हैं पाकिस्तान की तुलना में सऊदी अरब के साथ भारत के रणनीतिक तौर पर अहम संबंध हैं लेकिन ये रिश्ते अधिक पुराने नहीं हैं. दोनों के रिश्तों में प्राथमिकता निवेश और सुरक्षा है और सऊदी इस पर भी समझौता नहीं करेगा.

यही कारण है कि एक तरफ़ जब वो पाकिस्तान के साथ भी रिश्ते बेहतर कर रहा है, तो दूसरी तरफ़ भारत के साथ भी वो संबंध बेहतर करने की कोशिश में है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में पश्चिम एशिया और मध्यपूर्व मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं कि इसके पीछे बड़ी वजह हाल के वक़्त में आए बदलाव हैं.

वो बताते हैं, "जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या और डोनाल्ड ट्रंप के जाने के बाद सऊदी अरब की घरेलू राजनीति में काफ़ी बदलाव आए हैं. ट्रंप के शासनकाल में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को अमेरिका से मदद मिलती रही थी, लेकिन बाइडन के आने के बाद सऊदी अरब और ईरान के लिए अमेरिका की विदेश नीति में 180 डिग्री का बदलाव आया है."

"दूसरी तरफ सऊदी अरब को उम्मीद थी कि रक्षा मामलों में इसराइल के साथ उसके रिश्ते बेहतर होंगे, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ. ऐसे में प्राकृतिक तौर पर पाकिस्तान उसके लिए अहम हो गया. वैसे भी पाकिस्तान ज़रूरत पड़ने पर फौजें भेज कर सऊदी की मदद करता रहा है और वो पहले से पाकिस्तान को एक बड़े मददग़ार के रूप में देखता रहा है."

वीडियो कैप्शन, सऊदी अरब से दुश्मनी क्यों मोल ले रहा है पाकिस्तान?

सऊदी-अमेरिका रिश्तों में आया तनाव

डोनाल्ड ट्रंप के दौर में सऊदी अरब के साथ अमेरिका के दोस्ताना रिश्ते थे, जबकि ईरान के साथ रिश्ते तल्ख़ थे. लेकिन बाइडन के राष्ट्रपति बनने से चीज़ें बदली हैं.

बाइडन ईरान के साथ किसी समझौते पर आना चाहते हैं, लेकिन सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद सऊदी अरब के मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को लेकर वो सख़्त लहजे में बोलते रहे हैं. ऐसे में सऊदी अरब को अमेरिका से उम्मीद कम है.

माना जा रहा है कि अफ़गानिस्तान से अमेरिकी सेना के वापस जाने के बाद वहाँ की राजनीति में तालिबान का दख़ल बढ़ सकता है और यहाँ पाकिस्तान की भी अहम भूमिका होगी. इस स्थिति के मुक़ाबले के लिए अमेरिका को पाकिस्तान की मदद चाहिए होगी.

लेकिन फ़िलहाल पाकिस्तान ने अमेरिका को अपने यहाँ सैन्य अड्डे बनाने की मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया है. ऐसे में पाकिस्तान से सऊदी अरब की उम्मीदें बढ़ी हैं.

तलमीज़ अहमद कहते हैं कि पाकिस्तान-सऊदी की दोस्ती का ईरान के बढ़ते प्रभाव से निपटने की कोशिश जैसा कुछ नहीं लगता.

वो कहते हैं, "पाकिस्तान की सीमा ईरान से जुड़ती है और उसके यहाँ बड़ी शिया आबादी है. ईरान के साथ उसका रिश्ता कमज़ोर नहीं होगा, वहीं सऊदी अरब के साथ भी पाकिस्तान अपने रिश्ते को कमज़ोर नहीं होने देगा."

वो बताते हैं कि जहाँ तक अमेरिका और मध्यपूर्व की बात है तो "बाइडन ने ईरान को लेकर पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि वो 2015 के परमाणु समझौते पर लौटना चाहते हैं. हालाँकि मामला केवल इतना नहीं है, अमेरिका ईरान के साथ कई और मसलों पर बात करना चाहता है, जिनमें बैलिस्टिक मिसाइल, हिज़्बुल्लाह, आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं."

वीडियो कैप्शन, सऊदी और यूएई से पाकिस्तान की बात क्यों बिगड़ी?

प्रोफ़ेसर एक के पाशा कहते हैं कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ये भी समझ रहे थे कि चीन उनके लिए व्यापारिक तौर पर और सुरक्षा के लिहाज़ से बेदह अहम हैं.

वो कहते हैं, "पाकिस्तान-चीन और सऊदी के बीच ये एक त्रिकोणीय साझेदारी का रिश्ता उभर रहा है. सऊदी को भी अब यक़ीन होने लगा है कि पश्चिम के मुक़ाबले उसे पूर्व की तरफ अपने रिश्ते बढ़ाने की ज़रूरत है. इधर वो ईरान के साथ भी अपने रिश्ते बेहतर करने की दिशा में क़दम उठाने लगा है. अमेरिकी दवाब में भारत ने ईरान से तेल ख़रीदने से मना किया जिसके बाद इस बात की उम्मीद कम बची है कि भारत इस मामले में उसकी मदद कर सकता है."

वो कहते हैं कि ये एक नई तस्वीर उभर रही है, जिसमें पाकिस्तान की सेना और उसकी स्ट्रेटैजिक लोकेशन और चीन-ईरान-सऊदी अरब साझेदार के रूप में सामने आ रहे हैं, जहाँ भारत की कूटनीति अब इसराइल, यूएई और अमेरिका के बीच में है.

तलमीज़ अहमद कहते हैं कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के रिश्तों में एक बार फिर मिठास घुलने का एक कारण अमेरिका से मिले सीधे संकेत भी हैं.

सऊदी अरब और अमेरिका के रिश्तों को लेकर वो कहते हैं, "बाइडन ने सत्ता में आते ही सऊदी अरब के ख़िलाफ़ कई क़दम उठाए, जैसे जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया, उन्होंने कहा कि वो सऊदी शाह सलमान से चर्चा करेंगे, यमन में जंग के लिए अमेरिका हथियार नहीं देगा और सऊदी के मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर उसके साथ रिश्तों की अमेरिका समीक्षा करेगा. ऐसे में सऊदी अरब के लिए संकेत स्पष्ट थे कि वो अमेरिका पर निर्भर नहीं कर सकता. उसके लिए रूस या चीन की तरफ़ जाना स्वाभाविक ही था. लेकिन इससे भारत को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वो रणनीतिक तौर पर सऊदी के लिए अहम बना रहेगा."

प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं, "अमेरिका कई बातों को लेकर सऊदी से नाराज़ था. सऊदी ने मिस्र के साथ संबंध बेहतर करने की कोशिश की लेकिन वहाँ कोई बात बनी नहीं, ऐसे में पाकिस्तान अकेला मुल्क था, जिसके साथ वो फिर से रिश्ते बेहतर कर सकता था. ऐसे में सऊदी अरब के लिए इमरान ख़ान का दौरा कारगर साबित हुआ और वहीं से रिश्ते बेहतर करने से जुड़े मुद्दों को आगे बढ़ाया गया."

वीडियो कैप्शन, सऊदी अरब की नाराज़गी दूर करने की कोशिश में पाकिस्तान

संभल कर क़दम रखने की कोशिश

द इंटरप्रेटर में अदनान आमिर लिखते हैं कि पाकिस्तान को यह समझ आ गया था कि सऊदी अरब के साथ कूटनीतिक तौर पर तल्ख़ रिश्तों से कुछ हासिल नहीं होगा और वो बेहतरी के लिए कोशिशें कर रहा था.

वहीं द इंटरप्रेटर में ही छपे एक और लेख में सैय्यद फ़ज़ल अल-हैदर कहते हैं कि अमेरिका के साथ सऊदी के तल्ख़ रिश्ते से, उसके चीन के साथ रिश्ते बेहतर करने की संभावना बन रही थी जिसका रास्ता पाकिस्तान से हो कर गुज़रता है. ऐसे में सऊदी ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश की.

हालाँकि सऊदी अरब ने इस बार अरबों डॉलर की बजाय केवल 50 करोड़ के निवेश का ही ऐलान किया. 2018 में किए गए ऐलान की तुलना में ये काफ़ी कम है.

इसका कारण क्या है, इस बारे में प्रोफ़ेसर एक के पाशा कहते हैं, "चूँकि पाकिस्तान सऊदी के लिए अहम है, तो ऐसे में वो थोड़ा झुकने को तैयार हुआ, वहीं पाकिस्तान भी थोड़ा झुका."

वो कहते हैं, "सऊदी, भारत और पाकिस्तान दोनों के बीच अच्छे रिश्ते बना कर रखना चाहता है. पाकिस्तान गारंटी चाहता है कि भारत उस पर हमला नहीं करे और इसके लिए पाकिस्तान को चाहिए कि सऊदी के साथ भारत के रिश्ते बेहतर रहें."

साथ ही वो कहते हैं, "सऊदी अरब एक बड़े पैकेज की घोषणा इसलिए भी नहीं करना चाहता क्योंकि वो नहीं चाहता कि सऊदी और पाकिस्तान की फिर से बढ़ती दोस्ती को देख कर भारत चिंतित हो."

वहीं तलमीज़ अहमद मानते हैं कि वो इसे देशों के बीच बनते-बिगड़ते रिश्तों को खेमों में बँटने जैसा नहीं देखते, बल्कि इसे एकध्रुवीय दुनिया के मानचित्र में आ रहे बदलाव के तौर पर देखते हैं.

वो कहते हैं, "दुनिया के देशों को अब ये महसूस होने लगा है कि हमारी आँखों के सामने दुनिया बदल रही है. अमेरिका के प्रभुत्व वाला वर्ल्ड ऑर्डर अब बदल रहा है जिसकी रफ़्तार को कोरोना महमारी ने और बढ़ा दिया है. रूस और चीन जैसे बड़े देशों के अलावा जापान, ईरान, इंडोनेशिया, तुर्की, भारत और कोरिया जैसे देश अब इस बदलती परिस्थिति के साथ क़दम मिलाने की कोशिशें कर रहे हैं. सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बेहतर होते संबंधों को भी इसी के मद्देनज़र देखा जाना चाहिए. ये लगता है कि आने वाले वक़्त में दुनिया बहुध्रुवीय होगी जिसमें छोटे खिलाड़ी भी अहम होंगे."

वीडियो कैप्शन, क्या पाकिस्तान ने सऊदी को मना लिया है?

रिश्तों में बेहतरी की कोशिशें

प्रोफ़ेसर एके पाशा के अनुसार, "पाकिस्तान की सरकार में सेना का दख़ल है. ऐसे में दोनों देशों के बीच रिश्तों को बेहतर करने के लिए सबसे पहले अगस्त 2020 में पाकिस्तानी सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा ने सऊदी अरब का दौरा किया. इस दौरे पर कई मुद्दों को लेकर चर्चा हुई थी."

पाकिस्तान और सऊदी अरब में ये भी चर्चा का मुद्दा है कि "अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना के जाने के बाद इस फ्रंट में पाकिस्तान की चिंता कम होगी लेकिन उसकी बड़ी चिंता का विषय भारत है जिसके साथ उसकी सीमा जुड़ती है. पाकिस्तान का कहना था कि सऊदी के रिश्ते भारत के साथ बेहतर हैं और वो ये सुनिश्चित कर सकता है कि दोनों पड़ोसियों के बीच तनाव और न बढ़े."

इस मुलाक़ात का असर तब दिखा, जब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता की पेशकश की थी जिसका पाकिस्तान ने तुरंत स्वागत किया था.

उसके बाद इसी साल मई में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के निमंत्रण पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने तीन दिनों का सऊदी दौरा किया, जिसके बाद दोनों देशों के बीच रिश्तों में नरमी आनी शुरू हुई है.

छोड़िए X पोस्ट, 1
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 1

इन दौरों के बाद एक अरब डॉलर जो पाकिस्तान को इसी साल सऊदी को वापस देने थे, उसकी मियाद को आगे बढ़ा दिया गया है.

यूएई, जिसने 2021 जनवरी में क़र्ज़ की मियाद ख़त्म होने पर पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर के क़र्ज़ में से अब तक दिए 2 अरब डॉलर वापस करने को कहा, उसने भी अपना फ़ैसला वापस ले लिया है.

छोड़िए X पोस्ट, 2
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त, 2

कश्मीर मुद्दे ने बिगाड़े थे रिश्ते

फरवरी 2019 सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पाकिस्तान का दौरा किया था और इस दौरान पाकिस्तान में 20 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी.

लेकिन बीते सालों में दोनों के बीच रिश्ते बिगड़ना शुरू हो गए थे. पाकिस्तान चाहता था कि कश्मीर पर चर्चा के लिए सऊदी अरब ओआईसी (ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन) के विदेश मंत्रियों की काउंसिल की बैठक बुलाए, लेकिन कश्मीर के मुद्दे पर ओआईसी ने कोई बयान नहीं दिया.

तलमीज़ अहमद कहते हैं, "इसके बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कह दिया कि सऊदी अरब मदद न करे तो वो बाक़ी मुस्लिम देशों से मदद लेंगे. ये ग़लत वक्त पर दिया गया बयान था, क्योंकि उस वक्त तुर्की इस्लामिक दुनिया में सऊदी का प्रतिद्वंदी बन कर उभरने की कोशिश रहा था."

इसी दौरान पाकिस्तान ने मलेशिया के साथ नज़दीकी बढ़ाई, जो दिसंबर 2019 में कुछ मुस्लिम देशों के साथ कुआलालंपुर सम्मेलन करने वाला था. इस सम्मेलन को मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने "महान मुस्लिम सभ्यता के पुनर्निर्माण की दिशा में पहला क़दम" बताया था.

इस सम्मेलन में ईरान, तुर्की, क़तर, इंडोनेशिया और पाकिस्तान को आमंत्रित किया गया लेकिन मलेशिया ने सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों को आमंत्रित करने से इनकार कर दिया. उस वक्त इमरान ख़ान ने इस समिट को समर्थन दिया था, लेकिन बाद में सऊदी अरब के दवाब में उन्हें अपना फ़ैसला बदलना पड़ा.

इस बढ़ती दरार के बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने पाकिस्तान को साल 2018 में दिया क़र्ज़ वापस करने को कहा. सऊदी ने भी पाकिस्तान को दिए 3 अरब डॉलर का क़र्ज़ लौटाने को कहा और 3.4 अरब डॉलर के ऑयल क्रेडिट को भी ख़त्म करने का फ़ैसला किया.

लेकिन अब दोनों देश नए सिरे से रिश्तों को पटरी पर वापस लाने में जुट गए हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)