पाकिस्तानी लड़के अपना रहे यह ख़तरनाक रास्ता, माँ-बाप के नहीं थम रहे आँसू

- Author, कैरोलीन डेविस
- पदनाम, पाकिस्तान संवाददाता
यूरोप में काम की तलाश में हज़ारों पाकिस्तानी लीबिया का रास्ता अपना रहे हैं.
इस रास्ते में एक नाव की यात्रा भी शामिल है, जिसके ख़तरे तब उजागर हुए जब जून में ग्रीस के पास यात्रियों से खचाखच भरी एक नाव डूब गई और भारी जानमाल की हानि हुई थी.
इस साल लीबिया और मिस्र की ओर गए लगभग 13 हज़ार पाकिस्तानियों में से अधिकांश वापस नहीं लौटे हैं. इनमें दो ऐसे किशोर भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी माँ से अंतिम शब्द के रूप में कहा था कि चिंता मत करो.
पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के पुलिस स्टेशन में तापमान 35 डिग्री सेल्सियस है और हवा में नमी और शांति है. हमारी पीठ से पसीना बह रहा है और पसीने से पुलिस अधिकारी की कनपटी चमक उठती है.
एक छोटे से खुले गलियारे से गुजरते हुए बेतरतीब काग़ज़ों से भरे कमरों के पीछे हमें एक छोटी सी कोठरी दिखाई देती है. सोलह आदमी सीमेंट के फर्श पर अगल-बगल बैठे हैं, दीवारों से नमी रिस रही है और सलाखों के पीछे एक पंखा घूम रहा है.
इन सभी लोगों पर मानव तस्करी में शामिल होने का आरोप है और अधिकांश का संबंध उस जहाज से है जो 14 जून को ग्रीस में डूब गया था.
बताया जाता है कि जहाज पर सवार लगभग 300 पाकिस्तानी लापता हैं और आशंका है कि इनकी मौत हो चुकी है. इनमें 15 साल के किशोर फ़रहाद और 18 वर्षीय तौहीद भी शामिल हैं.

क्यों हो रही है मानव तस्करी?
हमने लोगों से पूछा कि क्या कोई कुछ बोलना चाहता है. इसके बाद ज़्यादातर लोग अपनी आँखें फेर लेते हैं लेकिन हसनैन शाह नाम का एक आदमी उछल पड़ता है.
हसनैन का कहना है कि वह एक दशक से अधिक समय से तस्कर हैं और यह उनकी तीसरी गिरफ्तारी है. हालांकि हसनैन इस बात से इनकार करते हैं कि उन्होंने ग्रीस के तट पर जहाज दुर्घटना में कोई बड़ी भूमिका निभाई थी.
हसनैन कहते हैं, ''यहाँ इतनी बेरोज़गारी है कि लोग हमारे घरों पर आते हैं और हमसे किसी ऐसे व्यक्ति से संपर्क कराने के लिए कहते हैं जो उनके भाइयों और बेटों को विदेश ले जा सके.''
"मैंने इसे शुरू किया क्योंकि कोई दूसरा रोज़गार नहीं था. मेरी इसमें कोई मुख्य भूमिका नहीं है. यह लीबिया में बैठे लोग हैं जो बहुत बड़े और अमीर हैं. हमें कमाई का दसवां हिस्सा भी नहीं मिलता है."
जब मैं पूछता हूँ कि क्या इन रास्तों में मरने वालों के साथ जो हुआ उसके लिए उन्हें अपराधबोध होता है, तो उनका लहज़ा बदल जाता है.
"मुझे बहुत दुख हुआ, हम इस पर बहुत शर्मिंदा हैं. लेकिन हम क्या कर सकते हैं? अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो कोई और कर देगा."

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, महंगाई लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गई है और रुपए का मूल्य गिर रहा है. ऐसे में यहाँ कई लोग विदेश जाने की सोच रहे हैं, जहां का कम वेतन भी पाकिस्तान में उनकी कमाई से अधिक हो सकता है.
पिछले साल के अंत में एक सर्वे में पाया गया कि 15 से 24 आयु वर्ग के 62 प्रतिशत लड़के और युवा लोग देश छोड़ना चाहते थे. इनमें से कुछ क़ानूनी रूप से विदेश जाने की कोशिश करेंगे और बाक़ी लोग वैकल्पिक रास्ते तलाशेंगे.
अवैध प्रवासन के बारे में ज़्यादा कुछ बता पाना मुश्किल है लेकिन पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि हाल ही में ग्रीस जहाज़ दुर्घटना ने पाकिस्तानियों के लिए एक नए पसंसदीदा रास्ते को उजागर किया है.
इसमें पहले दुबई से मिस्र या लीबिया तक हवाई जहाज़ से उड़ान भरते हैं और फिर पूर्वी लीबिया से यूरोप तक एक बड़ी नाव का सहारा लेते हैं.
ग्रीस नाव हादसे में पाकिस्तान की तरफ़ से जांच प्रभारी मोहम्मद आलम शिनवारी कहते हैं, ''पाकिस्तान में अब लोग अवैध तरीक़े से विदेश जाने के लिए ईरान जैसे रास्तों का सहारा कम ही ले रहे हैं क्योंकि तुर्की जैसे देशों ने अवैध आगमन पर रोक लगा दी है.''
उन्होंने बीबीसी को बताया कि साल 2023 के पहले छह महीनों में लगभग 13 हज़ार लोग लीबिया या मिस्र जाने के लिए पाकिस्तान छोड़ गए, जबकि पूरे 2022 में लगभग सात हज़ार लोग थे. उन 13 हज़ार लोगों में से दस हज़ार लोग वापस नहीं लौटे हैं.
मोहम्मद आलम शिनवारी कहते हैं, "हम नहीं जानते कि वे अभी भी लीबिया में हैं या किसी यूरोपीय देश में चले गए हैं."

पाकिस्तान सरकार क्या क़दम उठा रही है?
यह आश्चर्यजनक लगता है कि पुलिस को जहाज़ डूबने तक पता ही नहीं चला कि कितने पाकिस्तानी नागरिक इस रास्ते से जा रहे थे.
इस साल फ़रवरी में, पाकिस्तानी एक जहाज़ पर सवार थे जो तुर्की से लीबिया के रास्ते इटली के तट पर डूब गया था.
लेकिन शिनवारी का तर्क है कि इन रास्तों की जांच करना कठिन है जब तक कि परिजन पुलिस के पास आकर नहीं बताते कि क्या हुआ है.
वो कहते हैं, ''लोग शिकायत करने के लिए आगे नहीं आते हैं, इसके बजाय वे अदालत के बाहर समझौता कर लेतें हैं. हमारे लिए ऐसे मामलों को आगे बढ़ाना और जानकारी इकट्ठा करना बहुत मुश्किल हो जाता है क्योंकि यह जानकारी परिवारों से आती है और ज़्यादातर मामलों में वे हमें नहीं बताते हैं."
कुछ और समस्याओं का ज़िक्र करते हुए शिनवारी का कहना है कि कई लोगों ने दुबई या मिस्र के लिए वैध वीज़ा और असली दस्तावेज़ों के साथ उड़ान भरी है, इसलिए उन्हें रोकना मुश्किल है. इसका मतलब है कि इस रूट पर यात्रा करना बाक़ी रास्तों की तुलना में अधिक महंगा है.
अवैध प्रवास को रोकने के लिए पाकिस्तान द्वारा उठाए गए क़दमों पर शिनवारी कहते हैं कि उन्होंने पिछले साल 19 हज़ार लोगों को विदेश जाने से रोक था क्योंकि उन्हें डर था कि वे लोग मानव तस्करी का शिकार हो सकते हैं और 20 हज़ार पाकिस्तानियों को वापस डीपोर्ट किया गया था.
शिनवारी कहते हैं, ''कितने लोग जा रहे हैं. हमें कोई जानकारी नहीं है."
जिन लोगों ने इस रास्ते से यात्रा की है, उनमें से कुछ अब लीबिया में फंसे हुए हैं. पंजाब के एक गाँव में, हम एक परिवार से बात करने के लिए रुकते हैं, तो तुरंत ही पूरे इलाक़े के पुरुष वहाँ आ जाते हैं.
उन लोगों के कई युवा परिजन कुछ हफ़्ते पहले लीबिया गए थे और अब भी वहीं हैं. फँसे हुए लोग अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को वॉयस नोट्स और वीडियो भेजकर पैसे मांगते हैं.
इस दौरान एक पिता ने हमें सौ से अधिक पुरुषों के वीडियो दिखाए. वीडियो में दिख रहे पुरुषों से भीषण गर्मी से निजात पाने के लिए अपने बनियान उतार रखे हैं. इनमें से कई लोग कैमरे के सामने उन्हें वहां से निकालने की गुहार लगा रहे हैं.

यूरोप क्यों जाना चाहते हैं पाकिस्तानी नागरिक?
स्थिति इतनी उलझन भरी है कि पीड़ित परिवारों को नहीं पता कि उनके लोग अभी तस्करों, लीबियाई अधिकारियों या किसके कब्जे़ में हैं.
एक पिता ने बताया, "वे उन्हें हर दो से तीन दिन में केवल एक बार खाना देते हैं. मेरा बेटा बहुत रोता है, वह केवल 18 साल का है. वह कहता है कि हम किस मुसीबत में पड़ गए, हमने पैसे दे दिए और हम यहां मर रहे हैं."
इन परिस्थितियों को देखते हुए भी, परिवार इस बारे में एकमत नहीं हैं कि वे आगे क्या करना चाहते हैं.
शुरू में जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वे युवाओं के लिए यूरोप जाने का एक सुरक्षित रास्ता चाहते थे, लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि उनके लोग घर लौट आएं.
पुलिस का कहना है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को इसकी जानकारी है और वह इस पर अभी काम कर रहा है.
जोखिमों और पुलिस कार्रवाई के बावजूद, बीबीसी ने पूरे पाकिस्तान में कई लोगों से बात की, जिन्होंने कहा कि वे अब भी अवैध रूप से यात्रा करना चाह रहे हैं.
यूरोप में मौजूद एक तस्कर ने कहा कि इस तरह के रास्ते अब भी पाकिस्तान से संचालित हो रहे हैं. यहाँ तक कि पुलिस अधिकारियों ने भी स्वीकार किया कि वे जानते हैं कि लोग अब भी अवैध रूप से देश छोड़ रहे हैं.
हमने जिन लोगों से बात की उनमें से सभी ने बेहतर जीवन की आशा के चलते विदेश जाने या अपने बेटों को भेजने की बात कही है.
इस दौरान कुछ लोगों ने सामाजिक दबाव का ज़िक्र भी किया है. एक व्यक्ति ने कहा कि उसके अधिकांश चचेरे भाई-बहन पहले ही सीमा पार कर चुके हैं और अब कई मौक़ों पर उसे यह समझाया जाता है कि वह क्यों नहीं गया.
अन्य लोगों ने विदेश में कमाए गए पैसे से बने घरों को देखने और उनके आसपास रहने वाले तस्करों द्वारा उन पर यह दबाव डालने के बारे में बताया कि उनके बच्चों के भविष्य के लिए इससे अच्छा क्या होगा.
कुछ लोगों को यात्रा करने का व्यक्तिगत अनुभव भी था, जिनमें फ़रहाद और तौहीद के पिता भी शामिल थे.

पीड़ित परिवार की आपबीती
फ़रीद हुसैन आठ साल पहले तुर्की से ग्रीस, मैसेडोनिया, सर्बिया, क्रोएशिया और स्लोवेनिया होते हुए अवैध रूप से जर्मनी गए थे.
जब उनके पिता बीमार हो गए तो चार साल बाद वह वापस लौटे और उन्हें परिवार की देखभाल करने की ज़रूरत पड़ी. फिर उसी तस्कर ने उन्हें अपने किशोर बेटों को भेजने के लिए राज़ी किया.
फ़रीद कहते हैं, ''वह हमें विश्वास दिलाते थे कि यूरोप बिल्कुल हमारे सामने है. बच्चे वहां जाकर अपना जीवन बनाएंगे और फिर आप जो चाहें ख़रीद सकते हैं.''
"मैंने सोचा कि हम ग़रीब लोग हैं, अगर वे यहाँ पढ़ भी लेंगे तो उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी और हमारे पास ज़्यादा ज़मीन नहीं है. मैंने सोचा कि बच्चे यूरोप जाएंगे, शिक्षित होंगे और काम करेंगे."
फ़रीद ने अपनी ज़मीन बेच दी और फिर उनके लड़के फ़रहाद-तौहीद मिस्र और दुबई के रास्ते लीबिया गए. माता-पिता के पास दोनों के उत्साहपूर्वक विमान में चढ़ते हुए, लीबिया में दूसरे लड़कों के साथ घर के फर्श पर सोते हुए वीडियो भी हैं.
लड़कों की माँ नजमा कहती हैं, ''उन्होंने सुबह-सुबह किसी के मोबाइल से अपने पिता को संदेश भेजा जिसमें कहा कि हम जा रहे हैं, मां को कहना कि यह हमारा आख़िरी संदेश है.''
कुछ दिनों बाद तस्करों ने परिवार से संपर्क किया और उन्हें मिठाई बांटने के लिए कहते हुए बताया कि उनके बच्चे सुरक्षित पहुंच गए हैं. वे जश्न मनाने लगे.
अगले दिन उनके चचेरे भाइयों ने परिवार को फोन किया क्योंकि उन्होंने एक प्रवासी जहाज के डूबने के बारे में एक अंतरराष्ट्रीय ख़बर पढ़ी थी. तब तक तस्कर जा चुके थे.
इसके बाद परिवार ने फरहाद और तौहीद की आवाज़ नहीं सुनी. माना जाता है कि दोनों 14 जून को ग्रीस के पानी में डूब गए थे. उनके माता-पिता के पास दफनाने के लिए उनके शव कभी नहीं होंगे.
अब उनकी मां का कहना है कि वह उनके वॉयस मैसेज सुनती हैं और घंटों रोती हैं.
फ़रीद कहते हैं, "भले ही यहां ग़रीबी हो और भूख से मर जाएं लेकिन आपको नहीं जाना चाहिए. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई आपको यूरोप जाने के लिए कितना मनाता है."
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