इमरान ख़ान के साथी बिछड़े बारी-बारी, अब पार्टी पर प्रतिबंध का ख़तरा

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- Author, अहमद एजाज़
- पदनाम, पत्रकार
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान राजनीतिक मुश्किलों में फंसे हैं. लेकिन बुधवार का दिन उनके लिए कुछ अधिक ही परेशान करने वाला रहा.
पहले मंगलवार को उनकी क़रीबी और पूर्व मानवाधिकार मंत्री शिरीन मज़ारी ने पार्टी से किनारा किया, फिर बुधवार शाम होते-होते उनके सबसे क़रीबी माने जाने वाले और पूर्व सूचना मंत्री चौधरी फ़वाद हुसैन ने इमरान ख़ान से दूरी बनाने का ऐलान कर दिया.
अभी दिन बीता भी नहीं था कि इमरान ख़ान के विश्वासपात्र असद उमर ने पीटीआई के महासचिव और कोर समिति सदस्य के पद से ख़ुद को अलग कर लिया.
हालांकि असद उमर ने पार्टी में पद ज़रूर छोड़े हैं लेकिन पार्टी से इस्तीफ़ा नहीं दिया है.
उन्होंने पार्टी के पदों से अपने आप को अलग करते हुए ये भी कहा कि नौ मई को घटनाक्रम की जांच होनी चाहिए और इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को छोड़ा नहीं जाना चाहिए.
चौधरी फ़वाद हुसैन ने भी अपने आप को पार्टी से अलग करते हुए कहा कि वो 9 मई के घटनाक्रम की निंदा करते हैं.
इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद नौ मई लाहौर स्थित पाकिस्तानी सेना कोर कमांडर के घर पर भीड़ ने हमला कर तोड़ फोड़ की थी. इसके अलावा रावलपिंडी से लेकर गुजरांवाला तक कई फौजी अड्डों में भीड़ घुस गई थी.

ये कहना ग़लत नहीं होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) 9 मई को सैनिक केंद्रों और सैनिक संपत्तियों में तोड़फोड़ की घटनाओं के बाद अपने 27 साल के इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुज़र रही है.
इस परीक्षा की कठिनाई का अंदाज़ा मंगलवार को तब हुआ जब पूर्व केंद्रीय मानवाधिकार मंत्री शिरीन मज़ारी ने 9 और 10 मई को होने वाली घटनाओं और सेना के मुख्यालय 'जीएचक्यू' पर हमलों की निंदा की और साथ ही ऐलान किया कि वह किसी भी राजनीतिक दल में नहीं रहेंगी.
उनसे पहले और उनके बाद भी कई वफ़ादार पीटीआई नेता, जैसे आमिर कियानी और फ़ैयाज़ुल हसन चौहान, पार्टी से अपनी राहें अलग करने की घोषणा कर चुके हैं.
इमरान ख़ान 9 मई को आतंकवाद से संबंधित और अलग-अलग मामलों में पेश होने के लिए लाहौर इस्लामाबाद हाई कोर्ट पहुंचे थे.
यहां से रेंजर्स ने उन्हें ज़बरदस्ती उठाकर नैब (नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो) को सौंप दिया था जो उनके ख़िलाफ़ अल क़ादिर ट्रस्ट में कथित भ्रष्टाचार की जांच कर रही है.
पार्टी के कई अहम नेता इमरान ख़ान का साथ छोड़ चुके हैं और ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि पीटीआई के दूसरे कुछ महत्वपूर्ण नेता भी पार्टी छोड़ सकते हैं.
इन सबके बीच तहरीक-ए-इंसाफ़ के अध्यक्ष इमरान ख़ान ने अपने नज़दीकी साथियों के पार्टी छोड़ने को 'थोपे हुए अलगाव' का नाम दिया है.
सवाल यह है कि 9 मई के बाद पैदा होने वाली स्थिति का अंतिम नतीजा क्या निकल सकता है और क्या सरकार की इस नीति के सामने पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ खड़ी रह पाएगी?
पार्टी छोड़ने की शर्त पर रिहाई?

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सबसे पहले तो यह जानने की कोशिश करते हैं कि क्या गिरफ़्तार पीटीआई नेताओं को इस आधार पर रिहाई मिल रही है कि वह पार्टी से अपनी राहें हमेशा के लिए अलग कर लें?
जब मंगलवार के दिन पीटीआई के उपाध्यक्ष शाह महमूद क़ुरैशी को अदालत के आदेश के बाद अडियाला जेल से रिहा किया गया तो आम तौर पर कहा जा रहा था कि शाह महमूद क़ुरैशी प्रेस कॉन्फ़्रेंस करेंगे जिसमें वह राजनीति से अलग होने की घोषणा करेंगे.
लेकिन रिहाई के तुरंत बाद पंजाब पुलिस ने उनको दोबारा गिरफ़्तार कर लिया.
शाह महमूद क़ुरैशी ने मीडिया से बात करते हुए कहा था, "मुझ पर दबाव है कि पार्टी को छोड़ दूं, लेकिन मैं पार्टी को नहीं छोडूंगा."
इसके अलावा मंगलवार ही के दिन मुसर्रत जमशेद चीमा और उनके पति जमशेद चीमा के वकील ने मीडिया को बताया कि मुसर्रत जमशेद चीमा और जमशेद चीमा पीटीआई छोड़ रहे हैं और इसकी घोषणा वह रिहाई के बाद करेंगे.
अदालत के आदेश पर दोनों पति-पत्नी को रिहा तो कर दिया गया लेकिन पंजाब पुलिस ने दोबारा उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.

इससे इस बात को बल मिलता है कि रिहाई में शर्त लागू है और यह रिहाई तब होगी जब पार्टी से अलग होने की घोषणा कर दी जाएगी.
इस पहलू को और बल शिरीन मज़ारी और फ़ैयाज़ुल हसन चौहान की रिहाई के बाद पार्टी छोड़ने की घोषणा से मिलता है क्योंकि शीरीं मज़ारी को एक के बाद एक रिहाई मिलती रही और वह दोबारा गिरफ़्तार भी होती रहीं. फिर आख़िरकार उन्हें रिहाई के बाद पार्टी से अलग होने की घोषणा करनी पड़ी.
दूसरी और जो पीटीआई नेता रिहाई पा चुके हैं, वह अब अपना पक्ष मज़बूती से नहीं रख रहे हैं. ये लोग देश के सियासी हालात पर कोई बयान नहीं दे रहे लेकिन नौ मई को हुई हिंसा की निंदा ज़रूर कर रहे हैं.
इसका एक बड़ा उदाहरण फ़व्वाद चौधरी हैं जो इमरान ख़ान की सरकार में सूचना मंत्री थे.
नेताओं पर फ़ौज का दबाव?

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कई पीटीआई नेताओं की ओर से पार्टी छोड़ने को इमरान ख़ान ने 'थोपा गया अलगाव' कह कर यह बताने की कोशिश की है कि पार्टी छोड़ने वालों पर इस्टैब्लिशमेंट का सीधा दबाव दिख रहा है.
क्या पार्टी छोड़ने वाले ऐसे लोग थे जिनको पीटीआई नज़रअंदाज़ कर रही थी और उनको टिकट नहीं दिया गया था या भविष्य में टिकट नहीं मिलने की आशंका थी जो किसी अवसर की तलाश में थे?
हमने पार्टी छोड़ने वाले कुछ लोगों से संपर्क करके यह जानने की कोशिश की है.
बीबीसी ने दक्षिणी पंजाब से जिन नौ पूर्व सदस्यों ने पार्टी छोड़ने की घोषणा की उनमें से एक क़ैसर ख़ान बगसी से बात की.
सेना के दवाब के बारे में उन्होंने बताया, "मैं तो पहले ही पार्टी से दूरी बना चुका था. इसकी वजह इमरान ख़ान की बहन का चौबारा के स्थान पर ज़मीन ख़रीदने का विवाद था."
उन्होंने कहा, "मैं, मलिक नियाज़ जक्खड़, मजीद नियाज़ी (पूर्व सदस्य, राष्ट्रीय असेंबली) और रफ़ाक़त गिलानी (पूर्व सदस्य, राष्ट्रीय असेंबली) के साथ इमरान ख़ान से मिला बल्कि मुझे बुलाया गया और कहा गया कि ज़मीन का मामला हल कराओ. मैंने कहा कि मुझसे नहीं होगा. अलबत्ता, जब दक्षिणी पंजाब के सदस्यों ने पार्टी छोड़ने की घोषणा की तो उस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में मैं भी शामिल था."
ध्यान रहे कि क़ैसर बगसी 2018 के चुनाव से पहले पंजाब प्रांत से पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ में शामिल हुए थे.
इधर राष्ट्रीय असेंबली के सदस्य महमूद बाक़ी मौलवी का कहना था, "मुझ पर कोई बाहरी दबाव नहीं था. मेरा अपना फ़ैसला था."
जलील शर्क़पूरी का कहना था, "फ़ौज हमारी रेड लाइन है. इमरान ख़ान और उनकी पार्टी ने फ़ौज के साथ पंगा ले लिया, हम इस पार्टी और लीडर के साथ कैसे चलें? मुझ पर बाहरी नहीं बल्कि भीतरी दबाव था."
यहां यह सवाल ज़रूर बनता है कि अगर फ़ौज से मोहब्बत का जज़्बा ही था तो पार्टी छोड़ने की घोषणा 9 मई के तुरंत बाद करने के बजाय कुछ दिन ठहर कर क्यों किया गया.
सेना से 'पंगा' पड़ा रहा है भारी

9 मई को 'नैब' के अल क़ादिर ट्रस्ट केस में रेंजर्स के हाथों इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान की कई जगहों पर 'घेराव' हुआ.
इस दौरान सैनिक केंद्रों और शहीदों की यादगार पर हमले किए गए जिसने स्थिति पूरी तरह बदल दी.
पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग (आईएसपीआर) ने 9 मई को काला दिवस बताते हुए संदेश दिया, "पहले संयम से काम लिया, अब तीखी प्रतिक्रिया दी जाएगी. जो काम दुश्मन 75 साल में न कर सके, वह काम राजनीतिक लबादा ओढ़े समूह ने कर दिखाया."
17 मई को सियालकोट में आर्मी चीफ़ जनरल आसिम मुनीर ने कहा, "शहीदों और उनकी यादगारों का अपमान नहीं होने देंगे. योजना बनाकर अंजाम दी जाने वाली घटनाओं की दोबारा किसी भी क़ीमत पर इजाज़त नहीं दी जाएगी. ज़िम्मेदार लोगों को कटघरे में लाएंगे."
सरकार और सेना दोनों ने ही सैनिक केंद्रों और संपत्तियों को नुक़सान पहुंचाने वालों के ख़िलाफ़ आर्मी ऐक्ट और ऑफ़िशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत कार्रवाई की घोषणा की है.
वैसे विश्लेषकों की राय में राजनीतिक और सैनिक नेतृत्व की सामूहिक प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट हो गया कि 9 मई की घटनाओं के बाद एक लकीर खिंच गई.
इसका सबूत उन घटनाओं में शामिल लोगों और तहरीक-ए-इंसाफ़ के कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारियों के रूप में भी सामने आ रहा है.
16 मई से शुरू हुआ पार्टी छोड़ने का सिलसिला

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2018 के आम चुनाव से पहले जब भी मुस्लिम लीग (नवाज़) या दूसरी किसी पार्टी का नेता अपनी पार्टी छोड़कर तहरीक-ए-इंसाफ़ में शामिल होता था तो इमरान ख़ान कहा करते थे, "हमने एक और विकेट गिरा दी."
जब इस बार 16 मई को राष्ट्रीय असेंबली के सदस्य महमूद बाक़ी मौलवी ने पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ को छोड़ने की घोषणा की तो यह 9 मई की घटनाओं के बाद गिरने वाली ये 'पहली विकेट' थी.
महमूद मौलवी ने कराची में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते हुए कहा था कि फ़ौज को नहीं छोड़ सकता, पार्टी को छोड़ सकता हूं. उनके अनुसार इसकी वजह 9 मई की घटनाएं हैं.
हमने जब महमूद मौलवी से इस बारे में बात की तो उनका कहना था, "मेरे लिए सीट छोड़ना आसान नहीं था. यह मुश्किल फ़ैसला था जो फ़ौज की मोहब्बत में किया. मैं पहला व्यक्ति था जिसने पार्टी को छोड़ा, अब यह क़ाफ़िला बन चुका है."
अपने साथ दूसरे नेताओं के पार्टी छोड़ने की वजह बताते हुए उनका कहना था, 'पार्टी में फ़ौज के विरोध के कारण लोग राहें जुदा कर रहे हैं, और, इसकी कोई दूसरी वजह नहीं."
उनका कहना है, "जब हम सेना की आलोचना करेंगे और उन पर हमले करेंगे तो यह नैतिक तौर पर कमज़ोर हो जाएगी. मुझसे यह बर्दाश्त नहीं हुआ, शायद दूसरे लोगों से भी यह बर्दाश्त नहीं हो रहा."
इमरान ख़ान और तहरीक-ए-इंसाफ़ ने साथियों के जाने पर क्या कहा?
17 मई को आमिर कियानी समेत सिंध असेंबली के सदस्य संजय गंगवानी और करीम गबोल की ओर से पार्टी से राहें जुदा करने की घोषणा की गई. उसके अगले दिन पीटीआई के पूर्व केंद्रीय मंत्री मलिक अमीन असलम ने भी पार्टी छोड़ने की घोषणा की.
उसी दिन पीटीआई के सूचना डिप्टी सेक्रेटरी डॉक्टर अमजद ने भी पार्टी छोड़ने की घोषणा की जबकि दूसरी ओर मुल्तान, ख़ानेवाल, लेह, डेरा ग़ाज़ी ख़ान और मुज़फ़्फ़रगढ़ से राज्य व राष्ट्रीय असेंबली के नौ पूर्व सदस्यों ने मुल्तान में प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान पार्टी से अलग होने का ऐलान किया.
कराची से तहरीक-ए-इंसाफ़ के राज्य असेंबली के सदस्य इमरान शाह और फ़ैसलाबाद से फ़ैज़ुल्लाह कमोका ने भी पार्टी के साथ आगे चलने से इनकार कर दिया.
यह सिलसिला तब से थम नहीं सका है और हर दिन पीटीआई को धक्का पहुंच रहा है.
ख़ैबर पख़्तूनख़्वा से हश्शाम इनामुल्लाह और अजमल वज़ीर ने भी पार्टी से राहें अलग करने की घोषणा की है.
शुरू में इमरान ख़ान और पार्टी की ओर से यह आभास दिया जा रहा है कि पार्टी छोड़कर जाने वालों में अधिकतर वह लोग हैं जिनको विभिन्न अवसरों पर टिकट नहीं दिया गया था या वे छोटे पदाधिकारी हैं.
इमरान ख़ान की ओर से यह भी कहा गया कि पार्टी छोड़कर जाने वालों पर दबाव है और "मुझे दबाव के तहत पार्टी छोड़ने वालों से हमदर्दी है."
क्या 2018 और वर्तमान परिस्थिति की तुलना उचित है?

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स्थानीय समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया पर पीटीआई के सामने जो हालात हैं, उसकी तुलना 2018 के चुनाव से पहले के मुस्लिम लीग नवाज़ से की जा रही है. तो क्या 2018 के आम चुनाव से पहले का इतिहास दोहराया जा रहा है?
विश्लेषक सोहैल वड़ैच का कहना था, "इस समय जो कुछ पीटीआई के साथ हो रहा है, ऐसा ही कुछ 1977 के चुनाव में पीपुल्स पार्टी के साथ हुआ था. जहां तक 2018 की बात है, जो इस समय पार्टी छोड़कर जा रहे हैं यह सारे लोग राजनीति करने आए हैं."
लेकिन विश्लेषक सलमान ग़नी की राय में 2013 या 2018 के चुनाव से पहले 9 मई जैसी घटनाएं नहीं हुई थीं.
उनके अनुसार 2018 में मुस्लिम लीग नवाज़ के नेताओं ने इस तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी जो इस समय इमरान की ओर से सीधे आर्मी चीफ़ की आलोचना के रूप में दी जा रही है.
अखबारों में कॉलम लिखने वाले आमिर हाशिम ख़ाकवानी का कहना है, "2018 में दक्षिणी पंजाब के कई चुने जाने योग्य उम्मीदवारों ने नवाज़ लीग छोड़कर स्वतंत्र चुनाव लड़ने को प्राथमिकता दी ताकि बाद में जिस का पलड़ा भारी हो, वहां चले जाएं. अब तहरीक-ए-इंसाफ़ की बारी है."
"यहां से लोग जाना शुरू हो गए लेकिन अभी उनमें से किसी ने दूसरी पार्टी में शामिल होने की घोषणा नहीं की है."
वर्तमान परिस्थितियों और 2018 के आम चुनाव से पहले के हालात की तुलना के बारे में पत्रकार आमिर ज़िया का कहना था, "इस समय हमारी इस्टैब्लिशमेंट दुखी है. उस समय और आज के हालात बिल्कुल अलग हैं."
पीटीआई में होंगे बड़े बदलाव?

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पाकिस्तान के आम चुनाव का इतिहास यह भी है कि चुनाव से पहले नेताओं का राजनीतिक वफ़ादारियां बदल जाती हैं.
जो पार्टी सत्ता में रह चुकी होती है वहां से महत्वपूर्ण लोग दूसरी पार्टियों का दामन थाम लेते हैं मगर इस समय जो लोग पीटीआई को छोड़ रहे हैं उसके पीछे गहरी चिंता और आशंका है.
हमने पंजाब और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के कुछ ज़िलों में पीटीआई के स्थानीय नेताओं के बारे में जानने की कोशिश की कि वो किस तरह के दबाव से गुज़र रहे हैं.
बहावल नगर से शौकत लालीका पर केस दर्ज होने की सूचना है और फ़िलहाल वह भूमिगत हैं. अटक से कुछ पीटीआई नेता परिदृश्य से ग़ायब हैं. मियांवाली में पीटीआई के सभी राज्य व राष्ट्रीय असेंबली के नेता शहर में मौजूद नहीं और ऐसा लगता है कि वे छिपे हुए हैं. उनमें से कुछ पर मुक़दमे भी दर्ज है. गुजरात से राज्य असेंबली के पूर्व सदस्य गिरफ़्तार बताए गए हैं.
ख़ुशाब राष्ट्रीय एसेंबली के सदस्य मलिक एहसानुल्लाह, राष्ट्रीय असेंबली के पूर्व सदस्य उमर असलम आवान और ननकाना से मियां आतिफ़ पर कई मुक़दमे दर्ज हैं जबकि पंजाब और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के कुछ ज़िलों से कोई ख़बर नहीं मिल रही.

सलमान ग़नी का भी यही विचार है कि दूसरी राजनीतिक पार्टियों और उनके लोग एंटी इस्टैब्लिशमेंट थे मगर उनकी तरफ़ से सैनिक केंद्रों पर हमला नहीं किया गया था.
"अतीत में इस्टैब्लिशमेंट के राजनीतिक किरदार पर सवाल उठाया जाता था मगर इस बार सैनिक किरदार पर वार किया गया है, जिसका नतीजा भी अलग निकलेगा क्योंकि इमरान ख़ान वर्तमान सेना प्रमुख की सीधे आलोचना कर रहे हैं हालांकि वह राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं हैं."
स्तंभकार आमिर हाशिम ख़ाकवानी कहते हैं, "मुझे ऐसा लग रहा है कि तहरीक-ए-इंसाफ़ को 2002 की नवाज़ लीग बनाने की योजना चल रही है. तब नवाज़ शरीफ देश से बाहर थे और मुस्लिम लीग (नवाज़) इस्टैब्लिशमेंट के निशाने पर थी."
इस बारे में विश्लेषण आमिर ज़िया का कहना था, "पीटीआई से ऐसी "ग़लतियां हुई हैं जिसने खेल का पासा पलट कर रख दिया. पीपुल्स पार्टी और नवाज़ लीग के साथ ही अतीत में ऐसा हुआ था मगर इस समय इमरान ख़ान की उम्र की भी समस्या है."
"अगर वह इस चुनाव से ग़ायब होते हैं तो फिर आगे हालात और ख़राब हो जाएंगे. हमारी ग्रामीण राजनीति का साठ प्रतिशत मामला इलेक्टेबल्स (चुने जा सकने वालों) पर निर्भर है."
टीकाकार शनीला अम्मार के अनुसार, "इस समय तहरीक-ए-इंसाफ़ खड़ी होती नज़र नहीं आ रही, सिवाय इमरान ख़ान के. वह ख़ुद भी कई यू टर्न ले चुके हैं. कभी कहते हैं कि हमारे लोग हमलों में नहीं थे, कभी कहते हैं मुझे गिरफ़्तार किया तो फिर प्रतिक्रिया हो सकती है."
उन्होंने कहा कि फ़व्वाद चौधरी की पत्नी और शीरीं मज़ारी की बेटी कह चुकी हैं कि इमरान को केवल अपना ध्यान है. "राज्य की प्रतिक्रिया के लिए राजनीतिक आधार का मज़बूत होना जरूरी है मगर पीटीआई की सियासी बुनियाद कमज़ोर है."
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ का इतिहास
- पार्टी की स्थापना 25 अप्रैल 1996 को लाहौर में हुई थी.
- पार्टी का शुरुआती मक़सद न्याय व्यवस्था को स्तवंत्र करवाना और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ना था.
- 1997 के आम चुनावों में पार्टी को कोई सीट नहीं मिली.
- पीटीआई ने साल 2002 में अपनी पहली जीत हासिल की. इमरान ख़ान मियांवाली सीट से नेशनल असेंबली के लिए चुने गए.
- पीटीआई ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर 2008 में हुए चुनावों का बहिष्कार किया.
- 30 अक्तूबर 2011 को इमरान ख़ान ने मीनार-ए-पाकिस्तान पर रैली की जिसमें भारी भीड़ जुटी.
- इसी साल दिसंबर में कराची में हुई पार्टी की रैली में और भी अधिक भीड़ जुटी.
- 2013 में पार्टी ने 75 लाख वोट हासिल किए और 35 सीटें जीती. वोट लेने के मामलें में पार्टी दूसरे नंबर पर रही.
- 2018 आम चुनावों ने पार्टी ने 114 सीटें जीतीं और इमरान ख़ान के नेतृत्व में सरकार बनाई.
- इमरान ख़ान 18 अगस्त 2018 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनें.
- अविश्वास प्रस्ताव के बाद 10 अप्रैल 2022 को इमरान ख़ान को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
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