पाकिस्तान के भविष्य की दिशा समझने के लिए जानें ये छह बातें
शुमाइला जाफ़री
बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद

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पाकिस्तान के मौजूदा राजनीतिक हालत बहुत अनिश्चित हैं. नौ मई को इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी से पहले कई विश्लेषक ये मान बैठे थे कि उनकी सत्ता में वापसी लगभग निश्चित थी.
लेकिन इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद बड़े पैमाने पर फ़ौज विरोधी हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद विश्लेषकों का कहना है कि मुल्क का राजनीतिक परिदृश्य अब बिल्कुल बदल चुका है.
हालिया घटनाक्रम ये है कि इमरान ख़ान के क़रीबी रहे जहांगीर तरीन के नेतृत्व में इश्तकाम-ए-पाकिस्तान (आईपीपी) पार्टी के गठन ने अलग किस्म की हलचल मचा दी है. तरीन बड़े उद्योगपति हैं और 2018 के चुनावों में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के प्रमुख संगठनकर्ता और मुख्य फ़ाइनेंसर थे.
लेकिन इमरान ख़ान जब प्रधानमंत्री बने तो वो उनसे अलग हो गए. इमरान ख़ान से ख़फ़ा तरीन, पीटीआई की दूसरी पंक्ति के कुछ प्रमुख नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया है.
इनमें से अधिकांश नेता वे हैं जो नौ मई की घटना के बाद इमरान की पार्टी से अलग हुए, जिनमें पूर्व सांसद और चर्चित कैबिनेट मंत्री भी हैं. भविष्य में पीटीआई के और नेताओं के आईपीपी में शामिल होने की अटकलें हैं.
कुछ राजनीतिक विश्लेषक आईपीपी को नई ‘किंग्स पार्टी’ बता रहे हैं. पाकिस्तानी राजनीति में ‘किंग्स पार्टी’ शब्द का इस्तेमाल एक ख़ास संदर्भ में किया जाता है.
अतीत में ऐसी पार्टियों का गठन फ़ौज के इशारे पर राजनेताओं, ख़ासकर चुनावी नेताओं, को इकट्ठा करके किया जाता है,
ऐसी पार्टियों का रुख़ सत्ता परस्त होता है और चुनाव से पहले इनका अस्थाई उभार होता है, लेकिन जब राजनीतिक मौसम बदल जाता है तो ये भी अपनी चमक खो देती हैं.
पीटीआई का तेजी से विघटन और एक नई राजनीतिक प्रोजेक्ट का उभार कोई नई बात नहीं है. मुल्क ने अतीत में जो देखा है, वही हूबहू हो रहा है.
साल 2002 में मुशर्रफ़ के तख़्तापलट के दौरान जब नवाज़ शरीफ़ और बेनज़ीर भुट्टो को निर्वासन में जाना पड़ा तो उस समय शरीफ़ के पीएमएल-एन और भुट्टो के पीपीपी को ख़त्म करने के लिए पीएमएल-क्यू और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी पैट्रियाट को बनाया गया.
सवाल ये है कि क्या आईपीपी नई किंग पार्टी है? अगर ऐसा है तो आगे क्या होने वाला है? हमने पाकिस्तान की राजनीतिक में छह संभावनाओं पर स्पष्टता के लिए तीन अग्रणी राजनीतिक टिप्पणीकारों से बात की.
1-क्या इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान नई ‘किंग्स पार्टी’ है?

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पीटीआई के बहुत सारे दिग्गज नई बनी पार्टी इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान (आईपीपी) में शामिल हो चुके हैं. जबकि बहुत सारे नेता इस विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं.
जाने माने राजनीतिक टिप्पणीकार सुहैल वड़ैच का कहना है कि अभी किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी.
हालांकि आईपीपी ने सत्ता परस्त रुख़ दिखाया है और इसके कुछ लोगों के फ़ौज से गहरे रिश्ते हैं लेकिन इसके ‘किंग्स पार्टी’ होने का आंकलन करना जल्दबाजी होगी.
सुहैल का कहना है कि इस बार पीटीआई से निकलने वालों को एक किंग्स पार्टी खड़ी करने की बजाय अलग अलग समूह और धड़ों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.
ऐसा हो भी रहा है. कुछ ने पीएमएल-क्यू को जॉइन कर लिया है जबकि दक्षिणी पंजाब में पीटीआई का टिकट पाने वाले और सांसदों ने पीपीपी जॉइन कर लिया है.
ख़ैबर पख़्तूनख्वा में पीटीआई से अलग हुए नेता अपना अलग धड़ा बनाने पर विचार कर रहे हैं.
विश्लेषक सलमान ग़नी के अनुसार, असली लड़ाई का मैदान पंजाब प्रांत है.
अगर इमरान ख़ान की पार्टी मौजूदा हैसियत बनाए रखती है तो ऊपरी और मध्य पंजाब में पीएमएल-एन और पीटीआई के बीच कड़ी प्रतिद्वंद्विता हो सकती है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो आईपीपी कुछ महत्वपूर्ण चुनावी क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है.
2. चुनाव हुए तो क्या होगा?

पाकिस्तान में इस साल अक्टूबर में आम चुनाव होने वाले हैं.
सुहैल वड़ैच मानना है कि अगर इमरान ख़ान और पीटीआई पर इसी तरह हमले होते रहे तो ख़ान क्लीन स्वीप नहीं कर पाएंगे. पीटीआई पहले ही बिखर रही है, इसके दर्जनों नेता नौ मई की घटना की निंदा करते हुए अलग हो गए हैं.
सुहैल का सोचना है कि तबतक पीटीआई किस हालत में रहती है, उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है और उनका अनुमान है कि चुनाव बाद पीटीआई विरोधी गठबंधन सरकार बनेगी.
दूसरी तरफ़, वरिष्ठ पत्रकार उमर चीमा का मानना है कि कोई ज़रूरी नहीं कि अक्टूबर में चुनाव हों ही. उनके अनुसार, चुनाव तभी होंगे जब फौज़ी सत्ता को लगे कि उन्हें मनचाहा नतीजे मिल सकते हैं.
उमर कहते हैं, “और ऐसा लगता है कि किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा.”
विश्लेषकों को ये भी लगता है कि हालात उस तरफ़ बढ़ रहे हैं जहां इमरान के बगैर वाला विकल्प पहले से कहीं वास्तविक लगने लगा है.
अगर चुनाव से पहले इमरान ख़ान राजनीतिक फलक से हट जाते हैं तब भी उनका वोट बैंक बरक़रार रहेगा, लेकिन सांगठनिक ढांचे के बिना वोटरों को लामबंद करना और मतदान के दिन उन्हें बूथ तक लाना लगभग मुश्किल होगा.
3. अगर चुनाव नहीं हुए तो?

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हालांकि पाकिस्तान में ये धारणा प्रभावी है कि चुनाव को अनंत काल के लिए नहीं टाला जा सकता और अगर ऐसा होता है तो हालात ख़तरनाक मोड़ ले सकते हैं.
उमर चीमा कहते हैं कि एक लोकतांत्रिक सरकार चाहे वो कितनी ही कमज़ोर हो या नियंत्रित हो, उसकी वैश्विक स्तर पर कहीं अधिक वैधता होती है. फ़ौज ने अपने अनुभव से ये सीखा है.
अगर सरकार चुनाव स्थगित करने का फैसला लेती है तो क़ानून के तहत उसे ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाना होगा और वहां अपने फैसले पर मुहर लगवानी होगी ताकि भविष्य के लिए यह एक क़ानूनी बहाना बन सके.
हालांकि सरकार मानती है कि सर्वोच्च न्यायालय का रुख़ पीटीआई के प्रति नरम है, इसलिए उमर का मानना है कि वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने से पहले दो बार सोचेंगे.
हालांकि सलमान ग़नी का कहना है, “एक विकल्प तो ये हो सकता है कि आईएमएफ़ द्वारा बताए रास्ते में कड़े आर्थिक फैसले लिए जाएं. लेकिन मौजूदा सत्तारूढ़ गठबंधन ‘पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट’ कड़े फैसले लेने से अनिच्छुक है क्योंकि उसे डर है कि पहले से ही महंगाई से त्रस्त वोटरों पर उलटा असर होगा.”
आईएमएफ़ के बेलआउट प्रोग्राम में बने रहने के लिए पाकिस्तान कड़ी मशक्कत कर रहा है. अर्थशास्त्री मानते हैं कि यह उसके लिए बहुत ज़रूरी है लेकिन खर्चों में कटौती, ख़ासकर ईंधन और राशन पर सब्सिडी ख़त्म करने की उसकी शर्त को पाकिस्तान अभी भी पूरा नहीं कर पा रहा है.
4-अगर इमरान ख़ान जेल गए या अयोग्य क़रार दिए गए तो?

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इमरान ख़ान के जेल की जाने की संभावना अधिक है और उनके अयोग्य होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.
हाल ही में फ़ौज के शीर्ष कमांडरों की एक बैठक की बातचीत से पता चलता है कि स्थिति किस ओर जा रही है.
पाकिस्तानी मिलिट्री के शीर्ष कमांडर नौ मई ‘विद्रोह’ के मास्टरमाइंड और साज़िशकर्ताओं के ख़िलाफ़ क़ानून का शिकंजा कसने के हक़ में दिखे. सेना का मानना है कि फ़ौजी ठिकानों पर हमले के पिछे इमरान ख़ान ही मास्टरमाइंड हैं.
उमर चीमा का कहना है कि फ़ौज़ इमरान ख़ान पर आर्मी एक्ट के तहत मुक़दमा नहीं चलाएगी. इस मामले में पाकिस्तान अतीत बहुत अच्छा नहीं है. जुल्फ़िकार अली भुट्टो के साथ जो कुछ हुआ उसने फ़ौज के दामन पर धब्बा छोड़ा है, इसलिए वो दोबारा वैसी हालत में नहीं पड़ना चाहेंगे.
इसकी बजाय इमरान ख़ान पर तोशखाना या अल क़दीर ट्रस्ट मामले में मुकदमा चलाया जाएगा जो भ्रष्टचार और सत्ता के दुरुपयोग से जुड़ा मामला है.
उमर का मत है कि ये विकल्प इमरान ख़ान के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को लिए भी स्वीकार्य है, जो दशकों से इमरान ख़ान के ऐसे ही तीखे आरोपों का सामना करते रहे हैं.
हालांकि ख़ान की अयोग्यता और सज़ा का मामला न्यायपालिका के रुख़ पर निर्भर करता है.
विश्लेषकों का कहना है कि सितम्बर में नए चीफ़ जस्टिस की नियुक्ति के बाद, न्यायपालिका में बदलाव उनकी क़िस्मत तय करेगा.
इमरान के अराजक समर्थकों को अबतक संकेत मिल चुका है. नौ मई के बाद सत्ता संस्थान ने जिस तरह कड़ी कार्यवाही की है उसने साफ़ कर दिया है कि ज़िम्मेदारी तय करने में किसी को बख़्शा नहीं जाएगा चाहे वो औरत हो, मर्द, नौजवान या बुज़ुर्ग हो.
हालांकि सलमान ग़नी जैसे विश्लेषकों का मानना है कि इमरान की अयोग्यता से जनता में उनका समर्थन कम नहीं होगा.
उनके अनुसार, “नवाज़ शरीफ़ के मामले में भी यह सच साबित हुआ और इमरान ख़ान के मामले में भी ऐसा ही होने की संभावना है. हालांकि दोनों मामले अलग हैं. नवाज़ शरीफ़ के पास नेतृत्व के लिए उनकी बेटी और परिवार के अन्य सदस्य के रूप में विकल्प थे. चाहे वंशवादी राजनीति के बारे में हम जितना बुरा सोचें, जनता में इसकी अभी भी अपील तो है ही.”
5-अगर मार्शल लॉ लागू हो गया?

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मौजूदा हालात में इसकी संभावना बहुत कम है. लेकिन सुहैल का कहना है कि अगर ऐसा होता है तो जितना भी लोकतंत्र है वो भी ख़त्म हो जाएगा. संवैधानिक और मौलिक अधिकार निलंबित हो जाएंगे. आर्थिक दिक्कतें और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग पड़ने के ख़तरे बढ़ जाएंगे. पाकिस्तान को आर्थिक पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है. विश्लेषकों का कहना है कि आर्मी को पता है कि देश ये झेलने की हालत में नहीं है.
मार्शल लॉ लागू करने में क़ानूनी पेंच भी है. संविधान के 18वें संशोधन में कहा गया है कि ऐसा करने वाला ही सिर्फ ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा बल्कि मार्शल लॉ को जो मंजूरी देगा उस पर भी संविधान के अनुच्छेद छह के तहत देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाएगा.
उमर का कहना है कि इसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ जनरल पर ही नहीं होगी बल्कि जजों पर भी इसकी जवाबदेही तय होगी, अगर वे ऐसे किसी कदम का हिस्सा बनते हैं.

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अगर समझौता हो जाता है?
इस बात को लेकर बड़ा जनमत है कि मुल्क को बचाने के लिए मेल मिलाप सबसे बेहतर रास्ता है. लेकिन गंभीर रूप से अलग थलग पड़ने के बावजूद इमरान ख़ान ने इस ओर कोई लचीलापन नहीं दिखाया है.
सुहैल के अनुसार, “इमरान को नौ मई के हमले की निंदा करने और उसमें शामिल लोगों से खुद को अलग करने की ज़रूत है, जबतक ये नहीं होता, तबतक बातचीत सिर्फ सदिच्छा बनी रह सकती है.”
हालांकि उमर चीमा का कहना है कि इमरान को छोड़ कर सभी राजनीतिक हिस्सेदार आपस में तालमेल बिठा चुके हैं और वे सत्ता से एकमत हैं.
जहां तक इमरान ख़ान का मामला है, उनके लिए कोई भी माफ़ी नहीं है. विडंबना है कि वो अभी भी अपने राजनीतिक विरोधियों के साथ वार्ता की मेज पर बैठने को तैयार नहीं हैं.
वो ये नहीं देख पा रहे हैं कि उनके पास अब कोई बढ़त नहीं है जिससे फ़ौज मजबूर होकर उनसे बात करने आए.
अतीत में जब भी संकट का वक़्त आया फ़ौज ही राजनीतिक ताक़तों के बीच मध्यस्थता करने आगे आई. हालांकि इमरान ख़ान की हालिया राजनीति ने उन्हें इस हैसियत से बेदख़ल कर दिया है.
सलमान ग़नी कहते हैं, “इस समय एक व्यापक राष्ट्रीय संवाद, सहमति की ज़रूरत है कि चुनाव बाद कैसे आगे बढ़ा जाएगा. वरना पुरानी कहानी ही दुहराई जाएगी कि जो लोग हारेंगे वो नतीजे स्वीकार नहीं करेंगे और देश गोल गोल घूमते हुए अराजकता के और गहरे संकट में फंसता जाएगा जो अंततः अस्तित्व का संकट बन सकता है.”
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