इमरान ख़ान के बाद पाकिस्तान में उनकी पार्टी का क्या होगा?

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- Author, शुमाइला जाफरी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद से
महीनों तक क़ानूनी लड़ाई के बाद आख़िराकर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को इस्लामाबाद की एक स्थानीय कोर्ट ने संपत्ति के बारे में ग़लत जानकारी देने और भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी क़रार दिया है.
उन्हें तीन साल की सज़ा दी गई है और साथ ही चुनाव लड़ने के अयोग्य क़रार दे दिया गया है.
इस फ़ैसले के आने के चंद मिनटों बाद ही पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के चेयरमैन को लाहौर में उनके ज़मान पार्क स्थित घर से बिना किसी हंगामे के गिरफ़्तार कर लिया गया.
पार्टी में नेतृत्व का संकट
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी पर राजनीतिक रूप से तीखी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली और इसके पीछे पार्टी में नेतृत्व का संकट खड़ा होना है.
पीटीआई के अध्यक्ष परवेज़ इलाही पहले से ही हिरासत में हैं. इसलिए इमरान ख़ान की ग़ैर-मौजूदगी में पार्टी के वाइस चेयरमैन शाह महमूद क़ुरैशी अब पार्टी का नेतृत्व करने के लिए ज़िम्मेदार हैं.
इमरान ख़ान की गिरफ़्तारी के बाद एक वीडियो संदेश में शाह महमूद क़ुरैशी ने एक राष्ट्रव्यापी शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आह्वान किया. लेकिन राजनीतिक विश्लेषक सलमान ग़नी कहते हैं कि इस आह्वान में नेतृत्व की इच्छाशक्ति की कमी दिखाई दी.
ग़नी के अनुसार, “किसी को मिस्टर क़ुरैशी से पूछना चाहिए कि क्या वो कोई रैली करने जा रहे हैं? या वो बस चाहते हैं कि समर्थक सड़क पर उतरें और बाद में आलोचना झेलें.”

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सलमान ग़नी कहते हैं कि बिना इमरान ख़ान के पीटीआई नेतृत्व विहीन है. परवेज़ इलाही और शाह महमूद क़ुरैशी जैसे नेताओं से कोई आक्रामक राजनीति की उम्मीद नहीं करता. अपने लंबे करियर में ये नेता कभी भी फौजी सत्ता को चुनौती देने वाली कार्रवाईयों के पक्ष में खड़े नहीं दिखे.
इसलिए उनसे उम्मीद करना कि वे किसी बड़े प्रदर्शन की अगुवाई करेंगे और कठिन समय में पार्टी को दिशा देंगे ये एक यथार्थवादी उम्मीद नहीं है.
सलमान के मुताबिक़, “बदक़िस्मती से, पाकिस्तान में राजनीतिज्ञ पार्टी को बढ़ावा नहीं देते बल्कि वे केवल अपनी छवि को नेता के तौर पर बढ़ाते हैं. इसलिए इमरान ख़ान का विकल्प केवल इमरान ख़ान. उनकी अनुपस्थिति में पीटीआई के अंदर किसी की इतनी क्षमता नहीं है कि वो इसे नेतृत्व दे सके या ऐसा करिश्मा किसी में नहीं है कि वो पीटीआई समर्थकों को अपील कर सके और लंबे समय तक जोड़े रख सके.”
विश्लेषक ज़ैनब समनताश सलमान ग़नी से सहमत हैं कि इमरान ख़ान को राजनीति से हटाने से उनके समर्थकों को नहीं रोका जा सकेगा. कुछ समय के लिए उनका जुड़ाव कम हो सकता है, वे निष्कृय हो सकते हैं, लेकिन इमरान ख़ान का वोट बैंक बना रहेगा और अगर इमरान ख़ान को जेल में रखा जाता है तो समय के साथ जनता की सहानुभूति बढ़ेगी. हालांकि ज़ैनब के विचार से इमरान ख़ान के बिना पीटीआई का कोई महत्व नहीं है.
ज़ैनब के अनुसार, “अतीत में नवाज़ शरीफ़ के ममले में जब फौज के साथ टकराव के बाद उनकी पार्टी परेशानी में आई और उसके राजनीतिक सहयोगी इसी तरह से उत्पीड़न के शिकार हुए, उनके परिवार ने संघर्ष को जारी रखा. इमरान ख़ान के मामले में, चूंकि वो वंशवादी राजनीति के ख़िलाफ़ रहे हैं, उनके पास ये सहूलियत नहीं है. इसलिए ये देखना दिलचस्प होगा कि इमरान ख़ान के बिना उनकी पार्टी कैसे बची रह बाती है.”
दूसरी तरफ़ सलमान ग़नी का कहना है कि इमरान ख़ान की पत्नी बुशरा बीबी पर आरोप लगते रहे हैं कि उनकी ही वजह से पार्टी को ये संकट झेलना पड़ रहा है. उन पर ये भी आरोप लगते रहे हैं कि सरकार चलाने और पार्टी के मामलों में वो हस्तक्षेप करती हैं और इमरान ख़ान को प्रभावित करती रही हैं.
सलमान के विचार में अब बुशरा बीबी को आगे आना चाहिए और पार्टी की कमान संभालनी चाहिए और उसे आगे ले जाना चाहिए.

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पार्टी में बिखराव
9 मई की घटना के बाद इमरान ख़ान के दर्जनों सहयोगियों ने पीटीआई को छोड़ दिया है. कुछ जानकार इसे ‘पार्टी बिखेरने का अभियान’ मानते हैं.
पीटीआई और स्वतंत्र विश्लेषकों का मानना है कि ये अभियान इमरान ख़ान को आम चुनावों से पहले सत्ता से दूर करने के लिए सेना द्वारा चलाया जा रहा है.
इमरान ख़ान के क़रीबी रह चुके दो नेताओं जहांगीर तरीन और परवेज़ खट्टक ने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली है. इन दोनों ने ही इमरान ख़ान की चुनावी सफलता और पंजाब और ख़ैबर पख़्तूनख्वाह प्रांतों में पीटीआई की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी.
पीटीआई के दर्जनों पूर्व सांसद अब नई बनी पार्टियों इस्तेहकम-ए-पाकिस्तान पार्टी और पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ़ पार्टी (पार्लियामेंटेरियंस) में शामिल हो रहे हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि अगर इमरान ख़ान की अनुपस्थिति में अगर कोई कुछ हद तक वैकल्पिक नेतृत्व दे सकता था तो वे थे जहांगीर तरीन और परवेज़ खट्टक.
लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री के इन क़रीबी सहयोगियों को किनारे लगा दिया गया था और पार्टी में जिस तरह उनके साथ बर्ताव हुआ इससे वो नाराज़ होकर अलग रास्ते चले गए.
इमरान ख़ान ने बार बार ये कहा कि 9 मई के बाद उपजे संकट ने उन्हें उन लोगों के असली चेहरे दिखा दिए, अब वो जानते हैं कि कौन उनके प्रति वफ़ादार है.

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इमरान ख़ान के कुछ और क़रीबी जैसे यासिम राशिद, हमाद अज़हर, मिया मेहूद उर रशीद, परवेज़ इलाही, मुराद सईद, शेरयार आफ़रीदी, अली अमीन गांदापुर, या तो हिरासत में है या अंडरग्राउंड हैं.
पीटीआई ज़मीनी स्तर पर निष्क्रिय पड़ी है.
और अब पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने पीटीआई को अंतिम चेतावनी देते हुए कहा है कि पार्टी के अंदरूनी चुनाव कराने में असफल होने की वजह से वो अपना चुनाव चिह्न (क्रिकेट बल्ला) गंवा सकती है.
चुनाव आयोग ने कहा कि पार्टी के अंदरूनी चुनाव जून 2021 में हो जाने चाहिए थे और अतीत में पार्टी नेतृत्व को इस संबंध में कई नोटिस भेजी जा चुकी हैं.
सज़ा के चलते चुनाव आयोग इमरान ख़ान को पार्टी के अध्यक्ष पद से भी हटा देगा.
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. हसन अस्करी रिज़वी कहते हैं कि थोड़े समय के लिए पीटीआई संकट में रहेगी और अगर इमरान ख़ान की सज़ा या उनकी अयोग्यता जारी रहती है तो, पूरी तर प्रतिबंधित न होने के बावजूद कुछ समय के लिए ये अप्रासंगिक भी हो सकती है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि इमरान ख़ान का अंत हो जाएगा. उनका वोट बैंक उनके साथ बना रहेगा और हो सकता है कि और बढ़े.
डॉ. रिज़वी के अनुसार, “ये इतिहास के ख़ुद को दुहराने जैसा है. अतीत में हमने ऐसे हालात देखे हैं. 1985 में ज़िया के शासन में पाकिस्तान पीपल्स पार्टी का बचे रहना लगभग असंभव दिखता था. यही पीएमएल-एन के साथ हुआ जब पनामा केस में नवाज़ शरीफ़ को अयोग्य क़रार दिया गया.”
“लेकिन हमने ये भी देखा है कि जब इस देश में असली सत्ता रखने वाले लोग अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के नाम पर राजनेताओं को राजनीति से दूर करते हैं, तो हमेशा ही ये चाल उलटी पड़ जाती है.”
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