काराकोरम के ख़ामोश और ख़तरनाक रास्तों की पशुपालक औरतों से मिलिए

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- Author, फ़रहत जावेद
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, शिमशाल (गिलगित-बल्तिस्तान)
उस साल जाड़े के दिन जल्द ही आ गए थे. घास पीली पड़नी शुरू हुई और कुछ ही दिनों में यह इतनी सूख गई कि नंगे पैरों में चुभने लगी. देखते ही देखते बर्फ़ भी जमने लगी.
हर सुबह बर्फ़ की तह पिछले दिन की तुलना में मोटी और सख़्त हो जाती. यह अनार बेगम के लिए संदेश था कि अब घर वापस जाने का वक़्त आ गया है.
वह काराकोरम की पहाड़ी शृंखला में स्थित शिमशाल घाटी में वाख़ी समुदाय की आख़िरी पशुपालक महिलाओं में से एक हैं.
घर वापसी से कुछ महीने पहले ही उन्होंने अपनी बेटी और बेटे को ‘पामीर’ चरागाह में दफ़नाया था. वह कहती हैं कि उस साल का दुख शब्दों में बयान करना मुमकिन ही नहीं.
“मैं बिल्कुल ऐसे ख़ाली हाथ थी”, अनार बेगम ने अचानक अपनी बंद मुट्ठियां खोलीं और हाथ फैला दिए. उस घटना के बाद साठ साल बीत चुके हैं, मगर उन्हें अब भी वह सफ़र अच्छी तरह याद है.
वह पामीर चरागाह पहुंची ही थीं कि पहले उनके बेटे की मौत हुई और अगले ही दिन उनकी बेटी ने भी दम तोड़ दिया.
वह साल अनार बेगम और उनकी साथी वाख़ी महिलाओं के लिए किसी क़यामत से कम नहीं था.
उस साल पामीर की ओर तीन दिन की यात्रा के दौरान दर्जनों बच्चे बीमार पड़े थे और जब यात्रा ख़त्म हुई तो बारह बच्चे जान गंवा बैठे थे.
“उनकी मौत आज तक पहेली है. कुछ समझ में नहीं आया. हमें नहीं पता कि उस साल क्या हुआ था. वो बच्चे एक-एक कर हमें छोड़ते गए."
अनार बेगम आख़िरी बार पामीर के क़ब्रिस्तान में खड़ी अपने दो बच्चों की क़ब्रों पर फ़ातिहा (क़ुरान की दुआ) पढ़ रही थीं.

'वाख़ी पशुपालक'
उनका बूढ़ा शरीर कुछ देर खड़े रहने के बाद थक गया तो वह वहीं बैठ गईं. वहां दर्जन भर क़ब्रें और भी थीं. कुछ उन महिलाओं की जो गर्मियों में अपने घरबार से दूर जाने की बाज़ी हार गई थीं और कुछ उन बच्चों की जो रहस्यमय बीमारियों का शिकार होकर चल बसे थे.
सदियों से इन वाख़ी पशुपालक महिलाओं की बहुत सी चुनौतियां में से एक चुनौती यह थी: हर दिन ज़िंदगी और मौत के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश करना.
वाख़ी समुदाय पाकिस्तान के इलाक़े गिलगित बल्तिस्तान की घाटी में रहता है.
यह घाटी पाकिस्तान की सबसे ऊंची बसावट है जो अफ़ग़ानिस्तान और चीन की सीमा पर स्थित है. सदियों पहले इनके पूर्वज वाख़ान कॉरिडोर से चलकर शिमशाल पहुंचे थे.
मगर जो बात शिमशाल घाटी को वाख़ान और काराकोरम के पहाड़ों में बसने वाली दूसरी आबादियों से अलग बनाती हैं, वह यहां की बुज़ुर्ग महिलाएं हैं. उन्हें वाख़ी पशुपालक कहा जाता है.
कई सदियों से उन महिलाओं ने काराकोरम की ऊंची चोटियों पर स्थित हरियाली पर राज किया है और ख़ुद को कामयाब कारोबारी महिला साबित किया है.
यह हर साल गर्मियों में हज़ारों की संख्या में भेड़ें, बकरियां और याक (जंगली बैल) पामीर की चरागाह में चराने ले जाती रही हैं.
पामीर की अंतिम चढ़ाई और बीबीसी की टीम
मगर अब इस गांव में केवल सात वाख़ी पशुपालक महिलाएं हैं और वह ज़माना और परंपराएं और सबसे बढ़कर उनका पेशा जिससे वह परिचित थीं, उनकी नज़रों के सामने ख़त्म हो रहा है.
इस साल उन महिला पशुपालकों ने पामीर की हरी भरी चरागाह की ओर अंतिम यात्रा शुरू की तो बीबीसी की टीम भी उनके साथ रवाना हो गई.
हमने छह वाख़ी पशुपालक महिलाओं के साथ पामीर की ओर की यात्रा शुरू की. उनके रवाना होने के त्योहार को ‘कूच’ कहा जाता है. ‘कूच’ से पहले यात्रा के लिए पारंपरिक खाना तैयार किया जाता है.
हमारे साथ जाने वाली पशुपालक महिलाओं में बानो बेगम भी शामिल हैं. बानो बेगम, जिनकी उम्र 70 साल से अधिक है, पिछले दो दशकों से हर साल इन पहाड़ों की यात्रा करके पामीर पहुंचती हैं. वह इस रास्ते की हर मुश्किल से पूरी तरह परिचित हैं.
“यह रास्ता हमेशा ही मुश्किल रहा है. यहां जाने वाली औरतें न केवल बीस से चालीस किलो का सामान उठाकर चलती थीं बल्कि हमें अपने बच्चे भी अपनी पीठ पर उठाने होते थे.”
हमारे साथ इस यात्रा में शामिल सबसे अधिक उम्र की अनार बेगम हैं जिनकी उम्र 88 साल है और सबसे कम उम्र की सकीना बानो 56 साल की हैं लेकिन इन सभी महिलाओं की रफ़्तार हमसे कई गुना तेज़ थी.
शिमशाल की वादी 2000 के दशक की शुरुआत तक दुनिया भर से कटी हुई थी.
यही वजह है कि शिमशाल में बसने वाले उन वाख़ी परिवारों के पास गुज़र बसर के लिए केवल दो ही रास्ते थे, यानी खेतीबाड़ी और पशुपालन.

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पामीर चरागाह, समुद्र तल से 16,000 फ़ुट ऊपर
समुद्र तल से 3000 मीटर की ऊंचाई पर और ज़बर्दस्त जाड़े के मौसम के कारण यहां खेतीबाड़ी या कृषि पर पूरी तरह निर्भर नहीं किया जा सकता.
वैसे तो शिमशाल के मर्द गर्मियों के मौसम में वादी में थोड़ी खेतीबाड़ी करते हैं और यहां की महिलाएं भेड़ बकरियों के रेवड़ लिए पामीर की चरागाह की तरफ़ चल पड़ती हैं.
शिमशाल घाटी के इस गांव से निकलने के लिए नदी के ऊपर एक लंबा लकड़ी का पुल है. हवा में लहराते इस पुल के नीचे नदी का उफान मारता पानी कुछ लम्हों के लिए चकरा देता है.
पुल पार करते ही ज़मीन और रास्ता बदल जाता है और यह स्थान काराकोरम के बेहद मुश्किल ट्रैक का आरंभिक बिंदु है.
पामीर की ओर जाते इस ट्रैक को ‘शिमशाल पास ट्रैक’ कहा जाता है और पर्वतारोही इस पर एकमत हैं कि यह देश के उत्तरी क्षेत्र के सबसे मुश्किल ट्रैक्स में से एक है.
पामीर की यह चरागाह लगभग 16,000 फ़ुट की ऊंचाई पर स्थित है जो दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची चोटी ‘के 2’ के बेस कैंप के बराबर है.
यहां पहुंचने के लिए हमें पांच दिन का पैदल सफ़र करना होता है. रास्ते दुर्गम हैं और ग़लती के बाद कोई गुंजाईश नहीं.
“हमारा लिबास यह नहीं था जो आज हम पहनते हैं”, अनार बेगम ने अपनी पुरानी जैकेट की ओर इशारा करते हुए मुझे बताया.
“हम बहुत सादा से कपड़े पहनते थे. हमारे पास तो जूते तक नहीं होते थे और हम इस तरह पैर उठाकर बर्फ़ में चला करते थे.”
अनार बेगम ने यह कहते हुए पांव के पंजे यह दिखाने के लिए उठा लिए कि वह कैसे उंगलियों के बल पर बर्फ़ में चलती थीं.

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भूस्खलन के ख़तरों से भरा रास्ता
अफ़रोज़नुमा, जिनकी उम्र 70 साल है, शिमशाल की पहली पशुपालक महिला हैं जिन्होंने इस गांव में सबसे पहले जूते पहने. उन्हें याद है कि कैसे उनके जूते ने इलाक़े के लोगों को हैरान कर दिया था.
“जब मेरी शादी हुई तो मेरा एक भाई कराची में था. हम गिलगित में रहते थे और मेरी शादी शिमशाल में तय पाई. मेरे भाई ने मेरे लिए जूते के दो जोड़े तोहफ़े के तौर पर भेजे. लोग मेरे जूते देखने आया करते थे. गांव की शादियों के लिए यहां की महिलाएं मेरे जूते उधार लिया करती थीं.”
पामीर की ओर यह ट्रैक बेहद तंग पगडंडी की तरह का रास्ता है. कुछ जगहों पर इसे पत्थरों की मदद से पक्का किया गया है मगर अक्सर हिस्सा या तो कच्चा है या कुछ जगहों पर पहाड़ में गुम हो जाता है.
कई जगहों पर यह रास्ता भूस्खलन की वजह से नीचे सरकने वाले पत्थरों में छिप गया है. वह जगहें जहां लगातार लैंड स्लाइडिंग होती है उन्हें पार करना सबसे अधिक मुश्किल है.
शिमशाल पास के दरवाज़े तक लगभग सभी रास्ते में एक तरफ़ गहरी खाइयां हैं. ट्रैक आमतौर पर चोटी के पास होता है. यहां नदी के पानी का शोर भी बहुत हल्का सुनाई देता है जबकि दूसरी तरफ़ ऊंचे पहाड़ हैं जहां से पत्थरों के नीचे आने का ख़तरा हर समय रहता है. यहां पल भर में हालात बदल जाते हैं.
यह एक ऐसा रास्ता है जहां ग़लती के बाद कोई गुंजाईश नहीं है. आपका एक ग़लत क़दम ज़िंदगी का ख़ात्मा कर सकता है लेकिन यह पशुपालक महिलाएं और उनके रेवड़ ख़ामोशी से उन्हीं रास्तों पर चलते जाते हैं.
“यह रास्ता बहुत खराब था. पहले तो हम जो ट्रैक इस्तेमाल करते थे वह असल में याक के लिए बना हुआ था. वह इसकी तुलना में अधिक ख़तरनाक, मुश्किल और लंबा था.”
अनार बेगम ने पुराने रास्ते का ज़िक्र करते हुए बताया.
“अब यह वाला तो बहुत आसान है. यहां हमें कोई मुश्किल नहीं.” उनका यह जुमला सुनते हुए मैं इस लैंड स्लाइडिंग के बारे में सोच रही थी जिसमें फंसकर यह विश्वास हो चला था कि आज हम नहीं बच सकते.

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पशुओं के रेवड़ की सुरक्षा
बल खाते इस पथरीले ट्रैक पर चलते हुए उनकी बकरियां और भेड़ एक सीध में आगे बढ़ती हैं. एक भी मौक़ा ऐसा नहीं आता जब वह लड़खड़ाएं और किसी खाई में गिर जाएं.
कभी कभार जब उनमें से कुछ शरारती मेमने या भेड़ के बच्चे उछलते कूदते रास्ते से हट भी जाएं तो जल्दी यह अपनी मालकिन पशुपालकों की ओर अपना रास्ता खुद ही ढूंढ लेते हैं, बिल्कुल ऐसे जैसे यह अपनी छठी इंद्रिय इस्तेमाल कर रहे हों.
यह मवेशी चराने वाली महिलाओं की सीटियों और आवाज़ों पर भागे आते हैं. ऐसा लगता है जैसे पामीरी मवेशी पालन की कला अपने उत्कर्ष पर है.
“पहले तो हमारे पास बहुत सारे जानवर होते थे. इतने अधिक कि हम उनके छोटे-छोटे रेवड़ बनाते और आपस में बांट देते. हम औरतों की संख्या भी बहुत होती थी."
"दो या तीन औरतें एक छोटे रेवड़ की देखभाल करती थीं.” बानो ने मुझे यह समझाते हुए बताया कि इतने लंबे और मुश्किल ट्रैक के दौरान कैसे हज़ारों जानवरों की सुरक्षा की जाती थी.
हमारे इस सफ़र में बानो के बेटे वज़ीर भी अपनी मां के साथ पामीर की हरियाली तक गए. उन्हें चिंता थी कि उनकी मां उम्रदराज़ हैं और रास्ते में किसी परेशानी का शिकार हो सकती हैं.
पहले हर साल 100 के लगभग वाख़ी महिला पशुपालक शिमशाल से पामीर की यात्रा करती थीं.
हर तीन औरतों के हिस्से में जानवरों का एक समूह आता और यह उनकी ज़िम्मेदारी होती कि वह उनको सुरक्षित पामीर तक पहुंचाएंगीं.
“जानवरों की इतनी बड़ी संख्या को इन रास्तों से चरागाह तक लेकर जाना बहुत मुश्किल काम था. यह इधर-उधर छलांगें लगाते और अक्सर भाग जाते थे. कभी जानवर गुम भी हो जाते थे."
"यह घास चरने इधर-उधर निकल जाते. इनमें कुछ तो वापस आ जाते मगर कुछ ऐसे भी थे जो वापस नहीं आते थे.”

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मौसम और भूस्खलन का अंदाज़ा लगा लेती हैं
बानो बताती हैं कि यहां मौसम एक बड़ी चुनौती थी. “जब यह ख़राब हो जाता तो सफ़र मुमकिन नहीं रहता था. तब हम अपने जानवरों के लिए पत्थरों से चारदिवारी बनाते ताकि उन्हें ठहरने की जगह मिल सके. हम उस वक़्त तक वहीं उनके साथ रहते जब तक मौसम ठीक न हो जाता.”
काराकोरम के बीच गुज़रने वाले दिन बहुत ही बेरहम हो सकते हैं. तेज़, तपती धूप और न ख़त्म होने वाला रास्ता किसी भी मज़बूत इंसान को थका देने के लिए काफ़ी है.
हर दिन औसतन आठ घंटे चलने के बाद भी उन वाख़ी पशुपालक महिलाओं का हौसला बुलंद रहा और वो कभी नहीं थकीं.
जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती जाती है, ऑक्सीजन में कमी आती है और सांस लेने में मुश्किल होती है. यहां मौसम का भी अपना टाइम टेबल है जिसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता.
बारिश, बर्फ़बारी और सुलगा देने वाली गर्मी, यह सभी पक्के साथी मालूम होते हैं और उन सबके बीच लैंड स्लाइड, यह वह ख़तरा था जिसके लिए हम तैयार नहीं थे.
यह महिलाएं हर कुछ घंटे के बाद किसी न किसी चोटी के निचले सिरे पर खड़ी होतीं और चोटी की ओर ध्यान से देखतीं.
कुछ पल ध्यान देने के बाद वह फ़ैसला करतीं कि इस चोटी पर चढ़ना है या इंतज़ार करना है. यह स्थानीय वाख़ी निवासी पहाड़ों की चोटियों पर उड़ती धूल के बादलों से अंदाज़ा लगाते हैं कि लैंड स्लाइड होगी या नहीं.
जब मैं अपने ड्रोन ऑपरेटर के साथ पोर्टर्स से आगे बढ़ गई तो हमें अंदाज़ा नहीं था कि जिस पहाड़ पर अब हमें चढ़ना है वहां लैंड स्लाइड होने को है.
यहां एक बड़ा नाला पूरे ज़ोर-शोर के साथ बह रहा था. शोर इतना अधिक था कि कान पड़ी आवाज़ सुनाई न देती थी.
हमने देखा कि नीचे नाले के पुल पर पोर्टर्स चिल्ला रहे थे और हमें रुकने का इशारा कर रहे थे. अगले कुछ ही पलों में पत्थरों की आवाज़ आने लगी और मिट्टी के बादल उड़ने शुरू हो गए.

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जब लैंड स्लाइड में मरते-मरते बचे
हम लैंड स्लाइड में फंस चुके थे. मेरे साथी ने कहा, “बस अपना सर बचाना है, इस पहाड़ के पत्थर के साथ जोड़ दें.”
मुझे लगा था कि आज बचना मुमकिन नहीं क्योंकि पत्थर बड़े थे और तेज़ी के साथ नीचे आ रहे थे लेकिन मामूली चोट लगे और हम सभी बच गए. मेरे लिए यह एक चमत्कार था मगर उन महिलाओं के लिए पामीर की ओर सफ़र के दौरान यह सब आम सी बात है.
बानो बताती हैं, “रास्ता बंद होने का डर एक लगातार भय था. भूस्खलन होता था जो बहुत ख़तरनाक था. इसमें जानवर भी फंसते थे और हम भी. हम पुराना रास्ता इस्तेमाल करते थे.”
इन महिलाओं के साथ आने वाले मवेशी जब भागते हैं तो पथरीले पहाड़ों पर कंपन होता है, यहां बिखरे पत्थर गिरना शुरू होते हैं और हर ओर गर्द फैल जाती है.
यहां इन पत्थरों से बचने के लिए कोई जगह नहीं. ये पशुपालक ऐसी स्थिति में इंतज़ार करती हैं और जब उन पत्थरों का लुढ़कना रुक जाए तो यह वापस अपना सफ़र शुरू कर देती हैं जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं.
अक्सर उन पत्थरों की चोट की वजह से महिला पशुपालक घायल हो जातीं. मामूली चोट तो आम सी बात थी लेकिन कभी ऐसा भी होता कि सर पर लगने वाली चोट और गहरे ज़ख़्म उनके सफ़र को और लंबा कर देते.
गंभीर रूप से घायल होने वाली महिलाओं को वापस शिमशाल पहुंचाया जाता है.
पामीर चारागाह की ओर यात्रा के चौथे दिन वाख़ी पशुपालक महिलाएं अपने पहले स्टॉप पर पहुंची हैं. यह शिमशाल पास है. यात्रा पूरी होने वाली है और मुश्किल रास्ता वह पीछे छोड़ आई हैं.
पहाड़ की चोटी पर पत्थरों की बनी एक लंबी दीवार के बीच में एक दरवाज़ा लगाया गया है जिसके ऊपर हिमालयन आईबेक्स (जंगली बकरी) की सींग लगी हैं.
इस दरवाज़े से अंदर जाने से पहले दूसरी ओर के दृश्य की कल्पना भी संभव नहीं.
हम अपने पीछे गहरी खाइयां, पथरीली चट्टानें और ऊंची चोटियां छोड़ रहे हैं और दरवाज़े की दूसरी ओर जहां तक नज़र जाए, खुला और लंबा मैदान है जहां लाली लिए हुए काले रंग के जंगली फूलों की एक चादर बिछी है.

सफ़र का पांचवां दिन और स्वप्न देश
यहां 8 घंटे की यात्रा करके अफ़ग़ानिस्तान की ओर सीमा से तीन याक पहुंचे और हमें बताया गया कि अब आगे की यात्रा हम उन पर बैठकर करेंगे.
याक की सवारी बेहद मुश्किल है. एक घंटे की सवारी के बाद मैंने पैदल चलना ही बेहतर समझा और इस तरह बाक़ी का सफ़र एक छोटी चरागाह में पहुंच कर पूरा हुआ जहां हमें इस सफ़र की आख़िरी रात गुज़ार कर अगली सुबह पामीर की ओर रवाना होना था.
अगर पामीर में मौसम बहुत ख़राब हो जाए तो यह महिलाएं पहले अपने जानवरों के साथ इसी छोटी चरागाह में आती थीं. यहां दो बड़े पशुओं के बाड़े हैं जहां हज़ारों जानवर रात गुज़ारते हैं.
सफ़र के पांचवें दिन लगभग चार घंटे पैदल चलने के बाद महिला पशुपालक हरियाली में पहुंचीं.
पामीर के खुले मैदान उनके सामने हैं और यह वाख़ी महिलाओं के लिए जश्न मनाने का वक़्त है. वह स्थानीय लोकगीत गा रही हैं.
ऐसे में पास में ही बर्फ़ से ढंकी चोटी से बर्फ़ का बड़ा टुकड़ा गिरने की आवाज़ आती है. मगर यहां किसी को परवाह नहीं क्योंकि अभी पामीर पहुंचने का जश्न जारी है.
“हमने इस ज़मीन पर अपनी मांओं और दादियों के साथ सफ़र किया है. वह हमारी तरह पशुपालक थीं. और हम सब एक दूसरे की साथी थीं. जैसे एक चरवाहा दूसरे चरवाहे का साथी होता है.” अनार बेगम ने पामीर पहुंचकर गर्व से बताया. वह इस ज़मीन से इस हद तक प्यार करती हैं कि इसके बारे में बात करने पर उनकी आंखें भर आती हैं.
काराकोरम की बड़ी पहाड़ी शृंखला के बीच पामीर की चरागाह किसी सपने जैसे लगती है.
समुद्र की सतह से पांच हज़ार फ़ुट की ऊंचाई पर, ग्लेशियर से पिघलती बर्फ़ के पानी की झील और नदियां हर तरफ़ बह रही हैं.
इस मैदान के इर्द-गिर्द सात हज़ार मीटर की ऊंचाई तक की चोटियां अपनी पूरी शान से खड़ी हैं. यह चरागाह ख़तरनाक चट्टानों के बीच एक नख़लिस्तान है. “पामीर हमारा फूल है”, अफ़रोज़नुमा ने ख़ुशी से कहा.

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पामीर चारागाह का जीवन
पामीर की चरागाह का यह सफ़र वाख़ी महिलाएं अपने मवेशियों की ख़ुराक और उन्हें स्वस्थ रखने के लिए करती हैं मगर यह अनोखी जीवन शैली अब भविष्य में गुम हो रही है.
पामीर की चरागाह में तीन रांच (पशु फ़ॉर्म) हैं. उनमें से एक में याक रखे जाते हैं जबकि दूसरे दोनों में भेड़ बकरियां. मांओं और बच्चों को अलग किया जाता है ताकि वह सभी दूध न पी लें.
यह महिलाएं उसे समय तक उन रांचों में दाख़िल नहीं होतीं जब तक उनकी धार्मिक रस्में पूरी न हो जाएं. समूह में सबसे बड़ी उम्र की महिला की ज़िम्मेदारी है कि वह उन रस्मों की अदायगी करें.
अनार बेगम आगे बढ़ती हैं और सबसे पहले दरवाज़े की चौखट को चूमती हैं, फिर उन्होंने दुआ पढ़ी और रांच में क़दम रखे. उनके हाथ में एक गर्म प्लेट है जिसमें एक स्थानीय जड़ी बूटी ‘स्पिंदर’ को आग लगाई गई है.
अनार बेगम रांच में जानवरों के बीच चलती हैं ताकि हर जानवर तक उस प्लेट में जलते ‘स्पिंदर’ का धुआं पहुंच सके.
“यह हमारी परंपरा है. हम जब भी यहां आते हैं हम सर झुकाते हैं. यह आदर का प्रतीक है और उसके बाद हम रांच में क़दम रखते हैं और फिर रस्म के अनुसार थोड़ा सा आटा अपनी भेड़ बकरियों को देते हैं. हम ऐसा इसलिए करते हैं ताकि लोग और उनके मवेशी सुरक्षित और शांति के साथ एक दूसरे के साथ रहे.” अनार बेगम ने जानवरों को धुआं देते हुए उसके महत्व को भी बताया.
“हमारे बुज़ुर्गों ने हमें सिखाया कि कैसे यह ‘स्पिंदर’ नाम का पौधा इस्तेमाल करना है. वह कहते थे कि इसको हमेशा अपने पास रखना क्योंकि इससे तकलीफ़ और परेशानी दूर होती है.”
उन रांचों से कुछ ही मीटर की दूरी पर एक छोटा सा गांव है जो लगभग साठ कमरों का है. ये कमरे वहीं मौजूद पत्थरों से बनाए गए हैं मगर ये सभी घर और उनके बीच बल खातीं छोटी-छोटी गलियां अब वीरान हैं.
हर कमरे के बाहर लकड़ी के दरवाज़े पर एक ताला लगा है. अब ज़ंग लग चुका है. कई एक ऐसे हैं जिन पर प्लास्टिक चढ़े हैं. दरवाज़ों पर लगे ये ताले वाख़ी पशुपालकों की विशिष्ट जीवन शैली के ख़ात्मे का निशान हैं.

सख़्त सर्दी में आसमान के नीचे रात को रखवाली
कई सदियों से हर साल दर्जनों महिला पशुपालक, वह चाहे बुजज़ुर्ग हों या जवान, यहां गर्मियों के मौसम में पहुंचती थीं और फिर अक्टूबर तक यही रहतीं.
बानो बेगम कहती हैं कि कुछ साल पहले तक वह सब महिलाएं घरों के बाहर बैठतीं और ऊन बनाते हुए गपशप लगातीं. “हम हर वक़्त व्यस्त रहते थे. हमारे पास कभी फ़ुर्सत का वक़्त न होता था. कभी हम गीत भी गाते. बहुत अधिक गीत. ख़ास तौर पर काम के दौरान, चाहे दिन हो या रात.” उन्होंने हंसते हुए अपनी रूटीन शेयर की.
मवेशियों की सुरक्षा करना एक बहुत मुश्किल काम था. आबादी से दूर इतने वीरान इलाक़े में रहने का मतलब था कि जंगली जानवर किसी भी समय हमला कर सकते थे.
अनार बेगम, अफ़रोज़नुमा, बानो बेगम और दूसरी कई महिलाएं पशुपालक रात अपने कमरों की छतों पर गुज़ारतीं ताकि वह उन पहाड़ी चीतों और भेड़ियों पर नज़र रख सकें जो उनके मवेशियों पर ताक लगाए बैठे रहते थे.
सोलह हज़ार फ़ुट की ऊंचाई पर सख़्त सर्दी के मौसम में छतों पर खुले आसमान तले रात गुज़ारना आसान नहीं था. वह मवेशियों के रांच के आसपास आग लगाकर धुआं पैदा करतीं ताकि भेड़िए डर से आगे न बढ़ें. उन महिलाओं ने उन जानवरों को फंसाने के लिए ‘ट्रैप’ भी बना रखे थे, उनमें से तीन अब भी मौजूद हैं.
लेकिन हमले जारी रहते. कभी-कभी उन महिलाओं को बड़े नुक़सान का सामना करना पड़ता. अनार बेगम ने कई ऐसी घटनाएं बताईं जब उन जंगली जानवरों ने उनके मवेशियों पर हमले किए और उनके सैकड़ों जानवरों को मार दिया.
“यहां बहुत ही ख़तरनाक भेड़िए और जंगली जानवर थे. हम उन पर नज़र रखने के लिए छतों पर सोया करते थे. सुबह सूरज निकलने से पहले भेड़िए यहां हमला करते. हम ऊंची आवाज़ में चिल्लाना शुरू कर देते. हम उस वक़्त तक चीख़ते रहते जब तक कि वह भाग न जाएं."
"हमले के बाद हम सब रांच में जमा होते. तब बहुत अंधेरा होता था और हमारे पास रोशनी के लिए कुछ नहीं होता था. जब तक सुबह न होती हमें यह अंदाज़ा ही नहीं हो सकता था कि हमारा कितना नुक़सान हुआ.”

पामीर चारागाह में डेयरी कारोबार
वाख़ी समुदाय बार्टर ट्रेड (सामान के बदले सामान से लेनदेन) करता था. पेपर मनी या करंसी नोट मौजूद नहीं थे लेकिन उनके स्वामित्व में सैकड़ों भेड़ बकरियां होतीं. आज भी शिमशाल के वाख़ी समुदाय के पास बड़ी संख्या में मवेशी हैं.
यह पशुपालक महिलाएं डेयरी उत्पाद तैयार करतीं और उनका कारोबार करतीं. जो उन सामान को ख़रीदते, वह बदले में उनके लिए घर बनाते और दूसरे काम करते.
यही सामान शिमशाल की मशहूर कल्याणकारी व्यवस्था ‘नोमस’ के लिए भी इस्तेमाल होते. इस व्यवस्था के तहत स्थानीय वाख़ी समुदाय पुल, छोटी सड़कें या रास्ते बनाते और दूसरे लोक कल्याण के काम करते.
गर्मियों के मौसम में वाख़ी पशुपालक महिलाएं सख़्त जाड़े के मौसम की तैयारी करती थीं. बानो बताती हैं कि उनके दिन रात सर्दियों के लिए भोजन तैयार करते गुज़रते.
“हम मिलकर काम करते और जानवरों का दूध जमा करते. फिर हम दही और दूसरे डेयरी उत्पाद बनाते. हम गांव ले जाने के लिए विभिन्न चीज़ें बनाते थे. हम अपने जानवरों की सुरक्षा भी करते और इसके साथ दूसरे सभी काम करते थे. हमें कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हमें यहां कोई समस्या या किसी चीज़ की कमी है और वक़्त पर लगाकर उड़ता रहा.”
पामीर में पत्थरों से बने उन छोटे-छोटे कमरों में कुछ भी नए दौर जैसा नहीं. सदियों पुराने तरीक़े अब भी चल रहे हैं. यहां सभी डेयरी उत्पाद भी उन्हीं पुराने तरीक़ों से बनाए जाते हैं.
लकड़ी से बने एक लंबे ड्रम को पास की नदी पर अच्छी तरह धोया जाता है. यह इतना बड़ा और भारी है कि तीन महिलाएं मिलकर इसको उठाती हैं. जब यह सूख जाता है तो इसमें काफ़ी मात्रा में दही डाला जाता है.
इस दही से मक्खन निकाला जाता है जो वह अपने इस्तेमाल के लिए रखती हैं. बाक़ी दही से एक और स्थानीय प्रोडक्ट ‘कोरद’ तैयार किया जाता है जो वाख़ी समुदाय अपने त्योहारों पर इस्तेमाल करता है.
यह महिलाएं कुछ भी बर्बाद नहीं होने देती थीं. पशुपालन और उसके साथ डेयरी उत्पादों की तैयारी एक कामयाब कारोबार का रूप ले चुका था.
ये महिलाएं अपने परिवारों की कमाऊ सदस्य साबित हुईं. अफ़रोज़नुमा ने, जिनकी उम्र 67 साल है, पशुपालन की मदद से गिलगित में घर बनाया और शिमशाल में भी घर बनवाया.
“यहां पामीर में हमारे काम का फल मिला. हमारी इस मेहनत का मतलब है कि हम अपनी ज़िंदगियां बेहतर करने के लायक़ हुए. मैंने इस चरागाह से बहुत कुछ हासिल किया. मैंने अपने बच्चों की शादियों के ख़र्च उठाए. यहीं से अपने बच्चों की शिक्षा के ख़र्च की व्यवस्था की हालांकि उस वक़्त हालात बहुत मुश्किल थे.”
अफ़रोज़नुमा ने गर्व से बताया कि कैसे पामीर में पशुपालन ने उनकी ज़िंदगी के मुश्किल दौर में उनकी मदद की.

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पशुपालन कारोबार ने ज़िंदगी बदली
पामीर में हमारा चौथा दिन है और मौसम बदल रहा है.
तेज़ हवाएं चलना शुरू हुई और बर्फ़ के गाले इस हवा से बिखरते जाते हैं और सूइयों की तरह उन महिलाओं के चेहरों पर चुभते हैं लेकिन वह अपना काम जारी रखे हुए हैं. इस काम में सख़्त मेहनत के साथ मदद भी दरकार है जो अब महिलाओं के पास नहीं.
“आज यहां कोई नहीं आना चाहता. यह केवल इस जगह (पामीर) की बदौलत संभव हुआ कि हम अपने घर बनवा पाए और हमने अपने बच्चों को एक बेहतर ज़िंदगी दी. आज यहां हमारे अलावा कोई नहीं.” बानो पामीर में अपने कमरे के बाहर बैठकर अफ़सोस जताते हुए कहती हैं.
इन वाख़ी महिलाओं के पशुपालन ने शिमशाल में उनके समुदाय की ज़िंदगी बदल दी. उन्होंने मिलकर यहां की इकलौती सड़क की निर्माण में हिस्सा लिया जिसके निर्माण की बड़ी ज़िम्मेदारी 1985 में शिमशाल के वाख़ी लोगों ने अपने ऊपर ली.
ढाई दशक के बाद बनने वाली इस 53 किलोमीटर लंबी कच्ची सड़क ने इस समुदाय का संपर्क काराकोरम हाईवे से जोड़ दिया जो पाकिस्तान और चीन के बीच फैली हुई है.
वह सफ़र जो कई दिन में काटना था, अब कुछ घंटे में सिमट आया था. केवल एक पीढ़ी का सफ़र और शिमशाल बदल गया.
लेकिन वाख़ी पशुपालकों के लिए अब और अधिक मेहनत का समय था. सड़क अपने साथ शिक्षा के अवसर ले आई थी.
वह मांएं जो पहले ही पामीर की चरागाहों में सख़्त मेहनत कर रही थीं अब उन्हें और काम करना था ताकि उनके बच्चे शिक्षा प्राप्त कर सकें. उ
नके बच्चे शहरों में शिक्षा प्राप्त करने गए और नित नए विचारों के साथ शिमशाल वापस पहुंचे. उन्हीं में फ़ज़ीला फ़रमान और वज़ीर बेग शामिल हैं.

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नई पीढ़ी, बदलता वक़्त
पशुपालक बानो बेगम के बेटे वज़ीर जिन्होंने पामीर तक के आख़िरी सफ़र में उनका साथ दिया, एक अलग जिंदगी गुज़ार रहे हैं. वह अभी पामीर की चरागाह में जाते हैं मगर वह अपने पिता की तरह न किसान हैं, न ही अपनी मां जैसे पशुपालक.
वज़ीर पर्यटन के कारोबार से जुड़े हैं और देश-विदेश के पर्यटकों और पर्वतारोहियों के लिए ट्रैकिंग, पर्वतारोहण और सांस्कृतिक दौरों की व्यवस्था कराते हैं.
वज़ीर कहते हैं कि शिमशाल में युवाओं की प्राथमिकता उस समय बदली जब यहां सड़क का संपर्क कारोकरम हाईवे के साथ हो गया. “मैंने भी उस वक़्त अपना बिज़नेस शुरू किया. 2002 से पहले तो हमारे पास शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं बहुत सीमित थीं.”
चौबीस साल की फ़ज़ीला भी इस नई पीढ़ी का हिस्सा हैं. अपनी मां और नानी दादी के उलट उनके पास कई विकल्प मौजूद थे. वह शिमशाल में पहले गेस्ट हाउस की मालिक और प्रबंधक हैं जो उनके पिता ने अपनी मौत से पहले बनवाया था.
फ़ज़ीला के लिए उनकी मां की मदद के बिना शिक्षा संभव नहीं थी. “हमारी मांओं ने हमेशा शिक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया. उन्होंने हमें यही नसीहत की कि हम अपनी शिक्षा पर तवज्जो दें, न कि पशुपालन पर. वह अक्सर कहती थीं कि हमने वह मुश्किलें नहीं सहीं जो उनके हिस्से में आईं.”
इस घाटी के दुनिया के साथ संपर्क ने यहां नए अवसर पैदा किए. आज शिमशाल के युवा विशेष तौर पर यहां की महिलाओं की गिनती पाकिस्तान के सबसे अधिक हुनरमंद लोगों में होती है. जैसा कि फ़ज़ीला कहती हैं, “हमारे पास यह आज़ादी है कि हमें क्या करना है, हमें किस क्षेत्र में शिक्षा हासिल करनी है, कौन सा पेशा अपनाना है, हमें किन कल्याणकारी कामों में हिस्सा लेना है, यहां तक कि किन खेलों में हिस्सा लेना है. हम पर कोई क़ैद या पाबंदी नहीं है.”

‘पर्वतारोहियों की घाटी’
शिमशाल की घाटी को ‘पर्वतारोहियों की घाटी’ भी कहा जाता है. इसकी वजह यहां से संबंध रखने वाले देश के बेहतरीन पर्वतारोही हैं.
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट फ़तह करने वाली पहली महिला पाकिस्तानी पर्वतारोही समीना बेग का नाम कौन नहीं जानता.
उनका संबंध भी शिमशाल घाटी के वाख़ी समुदाय से था जहां उनके मां-बाप ने उनके लिए वैसी ही मेहनत की जैसे वहां वाख़ी पशुपालकों ने नई पीढ़ी का भविष्य बदलने की ठान ली थी.
लेकिन इस नई पीढ़ी को यह भी अंदाज़ा है कि उनकी बदलती ज़िंदगी और भविष्य में पारंपरिक पशुपालन ख़त्म हो गया है. वह जो उनकी मांएं, दादियां सदियों से करती आई हैं अब वह अतीत की बात हो रही है.
लेकिन वज़ीर, फ़ज़ीला और यहां के दूसरे युवा यह भी जानते हैं कि बानो, अफ़रोज़ और अनार जैसी महिलाओं के बिना वाख़ी समुदाय के लिए इतनी बड़ी कामयाबी नामुमकिन थी.
“हम आज शिक्षित हैं, हमारे पास डॉक्टर-इंजीनियर और दूसरे प्रोफ़ेशनल्स हैं. यह सब कुछ केवल और केवल हमारी मांओं, उनकी मेहनत और उनके पशुपालन की वजह से है. हमारी मांओं ने चरागाहों के स्वस्थ जानवर और उनके दूध से बनी चीज़ बेची ताकि हमारी शिक्षा का ख़र्च उठा सकें.” वज़ीर शिममशाल को गोजाल से जोड़ती इस ख़तरनाक सड़क पर जीप चलाते हुए यही सोचते हैं.
फ़ज़ीला को भी अपनी पशुपालक मां की जद्दोजहद का अंदाज़ा है, “अगर मैंने शिक्षा प्राप्त न की होती तो मैं भी आज वही मुश्किल ज़िंदगी गुज़ार रही होती जो मेरी मां के हिस्से में है. यह हालत इसी तरह रहती.”

पामीर से रिश्ता
दूसरी तरफ़ सर्द पामीर में पत्थरों से बने नीची छतों वाले गर्म कमरों में वाख़ी पशुपालक महिलाएं शाम होते ही बैठ जाती हैं.
वह पुरानी वाख़ी भाषा में गुज़रे दिनों को याद करती हैं जब यहां की वीरान गलियों में चहल पहल होती थी.
यह महिलाएं नई पीढ़ी की प्रगति देखकर ख़ुश हैं मगर उन्हें यह दुख भी है कि उनके पूर्वजों से सीखा गया पशुपालन का हुनर उनके साथ ख़त्म हो जाएगा.
अफ़रोज़ ने अपने कामयाब पशुपालन की कहानी ख़त्म करते हुए मुझे बताया, “पशुपालन मेरे लिए केवल काम से कहीं बढ़कर है. हमारा पामीर के साथ एक बहुत मज़बूत रिश्ता है. पामीर बहुत ख़ूबसूरत है. मेरे दिल में एक फूल की तरह. यह हमारा फूल है, यही हमारा रोज़ी-रोटी है”.
लेकिन पामीर अनार बेगम के लिए दुख का एक प्रतीक भी है. वह छोटे-छोटे क़दमों के साथ पामीर में बने छोटे से क़ब्रिस्तान की ओर बढ़ रही हैं.
उनकी आंखों में आंसू हैं, “मैं पामीर में मरना चाहती थी ताकि मैं यहां अपने बच्चों के साथ दफ़न हो सकूं.”
उन्होंने अपनी ख़्वाहिश का इज़हार किया मगर वह जानती हैं कि उन यह उनका पामीर का आख़िरी सफ़र है.
वो कहती हैं, “मैंने अपने दो बच्चों को यहां खोया. मैं जब भी यहां आती हूं उनके लिए दुआ करती हूं. वापसी हमेशा बोझिल दिल से होती है. इस चरागाह में आने का मतलब मेरे बच्चों के पास आना है.”
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