तालिबान के हमले के बाद पाकिस्तान की कलश घाटी में ख़ौफ़ का माहौल

अपने बच्चे के साथ शायरा
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    • Author, फरहत जावेद
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दी कलश वैली, पाकिस्तान

पाकिस्तान की हिंदू कुश पहाड़ियों में बसी कलश घाटी एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है. लेकिन हाल ही में हुए तालिबान चरमपंथियों के हमले से वहां रहने वाले लोग अपने भविष्य को लेकर डरे हुए हैं.

कलशी चरवाहे, माइकल (बदला हुआ नाम) कहते हैं, "सुबह के 04:00 बजे थे, जब हमने देखा कि लोग सिर पर पगड़ी, बैकपैक, हथियार और शरीर पर गोलियों की बेल्ट पहने हुए पहाड़ से नीचे आ रहे थे."

जब तालिबान के चरमपंथियों ने उनकी घाटी पर हमला किया तो वो अपने पिता, चाचा और एक दोस्त के साथ भेड़ और बकरियों को पास के चरागाह में ले जा रहे थे.

माइकल याद करते हुए कहते हैं, "हर जगह तालिबान थे, हर चट्टान और हर पेड़ के पीछे. एक तो मुझसे बस कुछ ही कदम की दूरी पर था. उनकी संख्या 200 से अधिक रही होगी."

वो कहते हैं, "हम बड़ी चट्टानों के नीचे छिप गए और 48 घंटों तक वहीं छिपे रहे."

अधिकारियों ने पाकिस्तानी सेना भेजी. उनका कहना था कि दो दिन तक चली लड़ाई में पांच सुरक्षा अधिकारी और कम से कम 20 तालिबान आतंकवादी मारे गए.

तालिबान ने कैसे किया हमला

कलश घाटी का एक परंपरागत घर
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दो बच्चों की मां शायरा को सैकड़ों सैनिक, सैन्य वाहनों और घाटी के ऊपर मंडरा रहे ड्रोन और हेलीकॉप्टर याद हैं.

वो कहती हैं, "वहां एक असामान्य शांति थी. हर कोई चिंतित और डरा हुआ था. एक युद्ध क्षेत्र जैसा महसूस हो रहा था."

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हाल के महीनों में इस तरह के हमले अधिक हो गए हैं. हालांकि सितंबर में हुए इस हमले ने कलश घाटी के निवासियों को आश्चर्यचकित कर दिया था.

पाकिस्तानी सरकार के सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें सूचना मिली थी और कम से कम एक सप्ताह पहले एक इस तरह के हमले की ओर इशारा करते हुए एक फोन कॉल को इंटरसेप्ट किया गया था.

पड़ोसी देश अफगानिस्तान में रह रहे पाकिस्तानी तालिबान या टीटीपी ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है.

पाकिस्तान लगातार अफगानिस्तान में सत्तारूढ़ तालिबान पर पाकिस्तान के साथ उसकी सीमा से लगे प्रांतों में टीटीपी के सदस्यों को शरण देने का आरोप लगाता रहा है.

अफगानिस्तान पर तालिबान के नियंत्रण के बाद से इसे सीमा पार हमलों में से एक महत्वपूर्ण हमले के रूप में देखा जा रहा है.

पाकिस्तान के अधिकारियों का मानना ​​है कि उनका (हमलावरों) उद्देश्य रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कलश घाटी पर कब्ज़ा करना था.

जिले के डिप्टी कमिश्नर मुहम्मद अली कहते हैं, '' यहां कब्जा मिल जाने से टीटीपी को वह मिल जाता जो वे चाहते थे, इससे लोगों में डर पैदा होता और दुनिया को संदेश जाता कि वे मजबूत हैं. लेकिन हमारे सुरक्षा बलों ने ऐसा नहीं होने दिया."

कलशी समुदाय की चुनौतियां

कलश घाटी में लोगों की जीविका का मुख्य साध खेती-किसानी है
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इस हमले के बाद से पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से 400 किलोमीटर दूर स्थित कलशी घाटी में तनाव फैल गया है.

इस घाटी के लोग अपनी संस्कृति, धर्म और परंपराओं के लिए मशहूर हैं, जो मुस्लिम बहुमत से अलग हैं.

लेकिन वे अपने डांस और संगीत में जिस आनंद का प्रदर्शन करते हैं, वह भय, अनिश्चितता और निराशा की भावना से ढक गया है.

शायरा अपनी एक साल की बेटी को गोद में उठाते हुए कहती हैं कि वह अपनी विश्वविद्यालय की डिग्री पूरी करने के बाद अपनी संस्कृति और अद्वितीय धर्म को संरक्षित करने के लिए कलश में वापस आई थीं.

कलशी समुदाय एक देवकुल के देवी-देवताओं की पूजा करता है, खेती के साथ ऋतुओं के संबंधों को चिह्नित करने के लिए त्योहार आयोजित करता है.

इस समय महिलाएं अपने प्यार का इजहार कर सकती हैं, घर से भाग सकती हैं या यहां तक ​​कि अपनी शादी भी तोड़ सकती हैं.

लेकिन छोटे-छोटे घरों की भूलभुलैया में रहने वाले यहां के लोगों को मुस्लिम और ईसाई दोनों समूहों द्वारा जबरन धर्मांतरण की चुनौतियों और खतरों का भी सामना करना पड़ता है.

अब उन्हें डर है कि नया हमला खतरों की एक नई लहर लाएगा जो उनके समुदाय के अंत का कारण बन सकता है. शायरा जैसे कई लोग सोच रहे हैं कि उनके पास क्या विकल्प हैं. अगर तालिबान दोबारा हमला करे तो उन्हें कहां जाना चाहिए?

वह कहती हैं, "सभी ने कहा कि तालिबान हम कलशियों के लिए आए हैं. वे हमें मार डालेंगे या हमें अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर करेंगे. हमारे पास जाने के लिए कोई संसाधन नहीं है, इसलिए हमें जिंदा या मुर्दा कलश में ही रहना होगा."

उन्हें चिंता है कि इस तरह के हमलों से उनकी आजीविका पर भी असर पड़ सकता है. कलश घाटी हर साल पाकिस्तान और उसके बाहर से बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करती है.

कलश घाटी में पर्यटन

कलश घाटी के प्रमुख आयोजनों में नृत्य-संगीत प्रमुखता से होता है
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इस झड़प के कारण कलश घाटी में पर्यटन और चरवाहा व्यवसाय दोनों ठप हो गए, क्योंकि घाटी कई दिनों तक बंद रही.

विदेशी पर्यटकों को हटा दिया गया, स्थानीय लोगों को घाटी से दूर रहने की हिदायत दी गई.

इसके साथ ही घाटी की ओर जाने वाली सभी सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए गए. सैनिकों को तैनात किया गया और चरागाह वर्जित क्षेत्र बन गए.

BBC
पर्यटकों से हमें फ़ायदा होता है. हमले के बाद हमें ज़रूरी चीज़ों की कमी का सामना करना पड़ा. हम अपने पशुओं को चरागाहों तक ले जाने में भी असमर्थ थे. आमदनी पूरी तरह से खत्म हो गई थी.
काई मीरा
कलशी समुदाय की नेता

कलशी समुदाय की नेता काई मीरा कहती हैं, "पर्यटकों से हम सभी को फ़ायदा होता है. इस हमले के बाद हमें ज़रूरी चीज़ों की कमी का सामना करना पड़ा. हम अपने पशुओं को चरागाहों तक ले जाने में भी असमर्थ थे. आमदनी पूरी तरह से खत्म हो गई थी."

इस हमले के बाद, पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ दो मुख्य सीमा क्रॉसिंग को बंद करने की घोषणा की. इसके परिणामस्वरूप व्यापार राजस्व में काफी नुकसान हुआ. हजारों लोग कई दिनों तक सीमा पार पर फंसे रहे.

कलशी समुदाय को तालिबान से किस बात का है डर

कलशी समुदाय की नेता काई मीरा
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इस हमले के दौरान माइकल चट्टान के नीचे 48 घंटे तक छुपे रहे.

उनका शरीर इतना झुका गया था कि वह कुछ देर तक भी चल नहीं पा रहे थे. अब उनके गांव में, उनके जीवन में डर फैला हुआ है.

वो कहते हैं, "वे (चरमपंथी) पहले भी सीमा पार आते थे, लेकिन वे बंदूक की नोक पर हमारे मवेशियों को हमसे छीन लेते थे और वापस लौट जाते थे. इस बार वे हमारी घाटी छीनने आए थे. मुझे लगता है कि वे फिर आएंगे."

डिप्टी कमिश्नर ने माइकल और समुदाय के बाकी लोगों को आश्वस्त करने की कोशिश करते हुए कहा, "हालांकि डर कम होने में कुछ समय लग सकता है, हमने सीमा को मजबूत करने, चौकियों की संख्या बढ़ाने और सीमा सुरक्षा को मजबूत करने का फैसला किया है."

शायरा जुदाई का एक विचार साझा करती हैं.

वो कहती हैं, "युद्ध तो युद्ध है, चाहे वह तालिबान हो या कोई और. अंत में, यह हम हैं, निहत्थे लोग, जो कष्ट सहेंगे और मर जाएंगे.''

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