तालिबान से दुनिया के नेताओं को क्या बातचीत शुरू करनी चाहिए?

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- Author, लीस डूसे
- पदनाम, मुख्य अंतरराष्ट्रीय संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत पर तालिबान को दोबारा क़ाबिज़ हुए दो साल पूरे हो चुके हैं. लेकिन, अब तक दुनिया के एक भी देश ने उनकी सरकार को मान्यता नहीं दी है.
यहां तक तालिबान की हुकूमत से किसी तरह की बातचीत करना भी विवाद का विषय बना हुआ है.
कुछ लोगों का कहना है कि तालिबान से बातचीत करने से उनकी सोच, उनका नज़रिया बदलने में मदद मिलेगी.
वहीं, कुछ और लोगों का कहना है कि तालिबान कभी नहीं बदलेगा, इसलिए उनसे बात करने का कोई मतलब नहीं बनता.
आज जब दुनिया इस उलझन में पड़ी है कि वो तालिबान के नए शासकों से किस तरह निपटे, तो महिलाओं के अधिकार इन सियासी लड़ाइयों का नया मोर्चा बन चुके हैं.
यहां तक कि महिलाओं के ब्यूटी सलून भी इस जंग की ज़द में आ गए हैं.

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महिलाओं पर बढ़ता ज़ुल्म
सकीना एक ब्यूटिशियन हैं. वो राजधानी काबुल में अपने चोरी-छुपे चलने वाले ब्यूटी पार्लर में चारों तरफ़ मोटे पर्दों से घिरे एक कम रौशनी वाले कमरे में बैठी हैं.
उनके इर्द गिर्द मेक-अप का सामान रखा है- आई शैडो, लिप पेंसिल वग़ैरह. सकीना आसान शब्दों में समझाती हैं कि आख़िर उनके जैसी महिलाएं इस खींच-तान का मोहरा क्यों बनाई जा रही हैं.
वो कहती हैं, ‘तालिबान, महिलाओं पर इसलिए ज़ुल्म बढ़ा रहे हैं, क्योंकि वो अंतरराष्ट्रीय बिरादरी पर अपनी हुकूमत को मान्यता देने का दबाव बनाना चाहते हैं.’
सकीना को अपना ब्यूटी पार्लर इस तरह चोरी-छुपे इसलिए चलाना पड़ रहा है, क्योंकि दो हफ़्ते पहले ही तालिबान की हुकूमत ने महिलाओं के सारे ब्यूटी सलून बंद करने का फरमान जारी किया था. तालिबान का ये हुक्म अफ़ग़ान महिलाओं और लड़कियों की ज़िंदगी और उनकी आज़ादी छीनने के लगातार जारी सिलसिले की ताज़ा कड़ी है.
सकीना को समझ में नहीं आता कि तालिबान को लेकर कौन सा नज़रिया कारगर साबित होगा.
वो कहती हैं, ‘अगर तालिबान को एक हुकूमत के तौर पर मंज़ूर कर लिया जाता है, तो हो सकता है कि वो हम पर लगाई गई कुछ पाबंदियां हटा लें. लेकिन, ये भी हो सकता है कि वो कुछ और पाबंदियां लगा दें.’

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तालिबान का क्या कहना है?
महिलाओं से जुड़े इस बड़े और संवेदनशील सियासी मसले पर जिस उधेड़बुन की शिकार सकीना हैं, वैसा ही हाल बहुत से और लोगों का भी है.
तालिबान तो ज़ोर देकर कहता है कि महिलाओं के अधिकार जैसे मसलों में दख़ल देने का, दुनिया को कोई हक़ नहीं है.
तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद कहते हैं, ‘सिर्फ़ इसी एक मसले पर ज़ोर देना एक बहाने के सिवा कुछ नहीं है.’
ज़बीउल्लाह, अफ़ग़ानिस्तान के कंधार शहर से बीबीसी से बात कर रहे थे. जो, तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतउल्लाह अख़ुंदज़ादा का शहर है.
ज़बीउल्लाह ने ज़ोर देकर कहा, ‘मौजूदा हुकूमत को तो बहुत पहले मान्यता दे दी जानी चाहिए थी. हमने कई मामलों में प्रगति की है और हम इस मसले को भी सुलझा लेंगे.’

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बातचीत पर लोगों की राय
तालिबान की सरकार से बात करनी चाहिए या नहीं. इस सवाल पर अफ़ग़ानिस्तान के बहुत से समुदाय बँटे हुए हैं.
इनमें विदेशों में रहने वाले अफ़ग़ान नागरिक भी शामिल हैं, जिन्हें उस वक़्त अपना वतन छोड़कर भागना पड़ा था, जब 15 अगस्त 2021 को तालिबान लड़ाके दूसरी बार, देश की सत्ता पर क़ाबिज़ हो गए थे. इन अफ़ग़ान नागरिकों के दिलों में तालिबान के प्रति कड़वाहट भरी है.
इन्हीं लोगों में से एक हैं फ़ातिमा गैलानी. 2021 में जब तालिबान की सत्ता में वापसी तय दिखने लगी थी, तो फ़ातिमा ने आख़िरी मौक़े तक तालिबान से महिलाओं के अधिकारों को लेकर बातचीत करने और उनसे कुछ वादे लेने की कोशिश की थी.
फ़ातिमा कहती हैं, ‘ये कहना आसान है कि बातचीत नहीं करनी चाहिए. लेकिन, अगर आप बात नहीं करेंगे, तो फिर क्या करेंगे?’
अफ़ग़ानिस्तान में पिछली सरकार के पतन के बाद से फ़ातिमा, पर्दे के पीछे से तालिबान से बातचीत करने की कई कोशिशों का हिस्सा रही हैं. वो ज़ोर देकर कहती हैं, ‘हमें एक और जंग नहीं चाहिए.’ फ़ातिमा का इशारा उन पुराने फ़ौजी कमांडरों और लड़ाकों की तरफ़ है, जो अभी भी ये उम्मीद पाले हुए हैं कि वो देर सवेर तालिबान की मौजूदा हुकूमत को ताक़त के दम पर हटाने में कामयाब होंगे.
वहीं, विदेशों में बसे दूसरे अफ़ग़ान नागरिक, अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से तालिबान पर और दबाव बनाने की मांग कर रहे हैं. वो चाहते हैं कि तालिबान सरकार पर और प्रतिबंध लगाए जाएं, और उनके नेताओं के दुनिया भर में सफ़र करने की आज़ादी पर शिकंजा कसा जाए.
विदेशों में बसे अफ़ग़ान नागरिकों के लिए ज़ैन टाइम्स नाम का न्यूज़रूम चलाने वाली एडिटर-इन-चीफ ज़हरा नादिर सवालिया अंदाज़ में कहती हैं, ‘उनसे संपर्क बढ़ाने का क्या मतलब है? तालिबान ने तो दिखा दिया है कि उनकी हक़ीक़त क्या है, और वो कैसा समाज बनाना चाहते हैं.’
वहीं, तालिबान के साथ बातचीत की कोशिशों से जुड़े राजनयिक इस बात पर ज़ोर देते हैं कि बात करने का मतलब तालिबान को मान्यता देना नहीं है. हालांकि, वो ये भी मानते हैं कि अब तक की उनकी कोशिशों का कोई ख़ास नतीजा नहीं निकल सका है.
लेकिन, तालिबान के बूढ़े होते और बेहद रूढ़िवादी सर्वोच्च नेता अख़ुंदज़ादा ने जिस तरह बेहद सख़्त पाबंदियां लगाने वाले फ़रमान जारी किए हैं, उनको लेकर ख़ुद तालिबान के कई नेता असंतुष्ट हैं. उनका ये असंतोष उम्मीद की बुझती हुई लौ को फिर से जला देता है.

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बातचीत में दिक़्क़त क्यों हो रही है?
एक पश्चिमी देश के राजनयिक, जो हाल के दिनों में तालिबान के मध्यम दर्जे के प्रतिनिधियों से बातचीत करते रहे हैं. उनका कहना है, ‘अगर हम चतुराई दिखाते हुए उन अफ़ग़ान नेताओं से संवाद नहीं करते, जो हमसे बात करना चाहते हैं, तो हम उन कट्टरपंथियों को खुली छूट दे देंगे, जो अपने मुल्क की आबादी के एक बड़े हिस्से को मोटा-मोटी क़ैद में रखना चाहते हैं.’
सूत्र हाल ही में हुई एक अनोखी बैठक की तरफ़ इशारा करते हैं.
ये बैठक हमेशा अलग-थलग रहने वाले तालिबान के नेता मुल्ला हैबतउल्लाह अख़ुंदज़ादा और क़तर के प्रधानमंत्री मुहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी के बीच हुई थी. तालिबान के सत्ता में आने के बाद उसके सर्वोच्च नेता की किसी विदेशी अधिकारी के साथ ये पहली मुलाक़ात थी.
इस बैठक के बारे में जिन राजनयिकों को जानकारी दी गई थी, उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं के बीच कई मुद्दों पर गहरे मतभेद दिखे थे. ख़ास तौर से शिक्षा और महिलाओं के अधिकारों के मामले में.
हालांकि, इन राजनयिकों का ये भी कहना था कि धीरे-धीरे ही सही, मगर इन मतभेदों से बीच का रास्ता निकलने का संकेत भी इस बैठक में मिला.
बातचीत में दिक़्क़त इसलिए हो रही है, क्योंकि दोनों पक्षों के लिए बीच का रास्ता निकालना मुश्किल हो रहा है.
अफ़ग़ानिस्तान एनालिस्ट्स नेटवर्क की केट क्लार्क कहती हैं, ‘बातचीत करने वाले पक्षों को एक दूसरे पर क़तई भरोसा नहीं है क्योंकि वो बरसों तक एक दूसरे से लड़ते रहे थे. वो अब भी एक दूसरे से नफ़रत करते हैं. तालिबान को लगता है कि पश्चिमी देश अभी भी उनके मुल्क को ख़राब करना चाहते हैं. उसका किरदार बिगाड़ना चाहते हैं. वहीं, पश्चिमी देशों को महिलाओं के अधिकारों को लेकर तालिबान की नीति पसंद नहीं है. वो तालिबान की तानाशाही हुकूमत को भी नहीं पसंद करते.’
केट क्लार्क, दोनों पक्षों के नज़रियों में एक बुनियादी फ़र्क़ की तरफ़ इशारा करती हैं. वो कहती हैं, ‘पश्चिमी देशों को लगता है कि तालिबान की सरकार को मान्यता, उन्हें रियायत देना है. लेकिन, तालिबान को लगता है कि ये तो उनका हक़ है. चूंकि उन्होंने अमरीका जैसी महाशक्ति को हराकर सत्ता में दूसरी बार वापसी की है, तो उन्हें तो हुकूमत करने का हक़ ऊपरवाले से मिला है. ’
बाहरी ताक़तें, आलोचना के साथ साथ कुछ मामलों में प्रगति की तारीफ़ करके संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं. उनका कहना है कि तालिबान की सरकार ने भ्रष्टाचार पर क़ाबू पाने में काफ़ी कामयाबी हासिल की है. इससे राजस्व वसूली बढ़ी है. इसके अलावा, तालिबान ने इस्लामिक स्टेट के ख़तरे पर भी कुछ हद तक क़ाबू पाया है. लेकिन, पश्चिमी ताक़तें इस्लाम को लेकर तालिबान की कट्टरपंथी व्याख्या को लेकर अपनी चिंता जाती हैं. पश्चिमी देशों की इस फ़िक्र में दूसरे इस्लामिक देश और इस्लाम के विद्वानों की चिंताएं भी शामिल हैं.
लेकिन, दोनों तरफ़ से दांव-पेंचों में सख़्ती भी आती जा रही है.
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संयुक्त राष्ट्र ने जताई चिंता
यहां तक कि अब तो संयुक्त राष्ट्र भी अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं को ‘लैंगिक नस्लवाद’ का शिकार बताने लगा है. क्योंकि, तालिबान की सरकार लगातार महिलाओं के अधिकार सीमित करती जा रही है.
उनके सार्वजनिक पार्कों, महिलाओं के जिम, ब्यूटी पार्लर जाने पर भी रोक लगा दी गई है. अब कोशिश की जा रही है कि तालिबान हुकूमत के ख़िलाफ़ ‘मानवता के प्रति अपराधों’ का क़ानूनी मामला तैयार किया जाए.
अफ़ग़ानिस्तान को लेकर पश्चिमी ताक़तों और इस इलाक़े के देशों के बीच कुछ मामलों में राय भले अलग रही हो, और उनके बीच कभी कभार टकराव भी दिखा है. लेकिन, आम तौर पर दोनों ही पक्षों के बीच तालिबान को लेकर आम राय बनी रही है. तालिबान को मान्यता देने और कुछ विवादित मसलों को लेकर बड़ी ताक़तों के बीच एक दुर्लभ आम सहमति दिखी है.
इनमें रूस और चीन जैसे देश भी शामिल हैं, जो अक्सर पश्चिमी देशों के रुख़ का विरोध करते रहे हैं.
मगर, तालिबान और बाक़ी दुनिया के बीच तनातनी का सबसे बड़ा खामियाज़ा आम अफ़ग़ान नागरिकों को उठाना पड़ा है. उनके लिए तो इसके तबाही वाले नतीजे निकले हैं.
संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट में मोटे शब्दों में कहा गया है कि जुलाई के अंत तक, इंसानियत के नाम पर जारी की गई उनकी अपील के एक चौथाई हिस्से के बराबर ही रक़म हासिल हो सकी है, क्योंकि दान देने वाले पीछे हट गए. हर गुज़रते दिन के साथ, भूखे पेट सोने वाले अफ़ग़ान नागरिकों की तादाद बढ़ती जा रही है.
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि आज अफ़ग़ानिस्तान के 84 फ़ीसद परिवार सिर्फ़ खाना जुटाने के लिए पैसे उधार ले रहे हैं.
और, चिंता इस बात की भी है कि इन हालात में इस्लामिक स्टेट जैसे इस्लामिक उग्रवादी संगठन अपना दायरा बढ़ा रहे हैं.

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मान्यता के लिए तालिबान के प्रयास
तालिबान की सरकार अपने मुल्क की बेहद ख़ूबसूरत तस्वीर पेश करती है और मान्यता के बग़ैर भी तालिबान के दूत, अपनी पारंपरिक पगड़ी और लिबास में पूरी दुनिया का सफ़र करते नज़र आते हैं.
विमानों में बैठकर मुलाक़ातें करने के लिए तमाम देशों का दौरा करते हैं.
कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्तक़ी, काबुल में लगभग हर दिन किसी न किसी विदेशी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत करते दिखाई देते हैं. इन बैठकों में वही प्रोटोकॉल नज़र आता है, जो हम आम तौर पर दो देशों के नेताओं की औपचारिक मुलाक़ात में देखते हैं.
मसलन, शानदार कमरों में कतार से सजे दोनों देशों के झंडे और आधिकारिक तस्वीरें वग़ैरह.
काबुल में पश्चिमी देशों के दूतावास बंद हैं. सिर्फ़ यूरोपीय संघ का एक छोटा सा दफ़्तर और जापान का दूतावास खुला है. तालिबान से बातचीत के लिए पश्चिमी देशों के कई राजनयिकों ने खाड़ी देश क़तर को अपना ठिकाना बना रखा है.
चर्चा तो इस बात को लेकर भी चर्चा छिड़ी हुई है कि अगर ये राजनयिक तालिबान पर थोड़ा-बहुत दबाव बनाना चाहते हैं, तो उन्हें कम से कम काबुल में तो रहना ही चाहिए.
अफ़ग़ानिस्तान पिछले चार दशकों से भी ज़्यादा वक़्त से जंग का शिकार रहा है. अब दुनिया के किसी भी देश में इतनी ताब नहीं बची है कि वो इस ख़ूनी इतिहास में एक और रक्तरंजित अध्याय जोड़े.
और, भले ही तालिबान के नेताओं के बीच असंतोष और मतभेद दिखते हों. लेकिन, सबसे बड़ा लक्ष्य तो यही है कि उनके बीच एकता बनाए रखी जाय. ये सबसे अहम बात है.
इस मसले का कोई फ़ौरी या आसान समाधान नहीं है.
काबुल की ब्यूटिशियन सकीना कहती हैं, ‘मैं अपने दिल से बस एक बात कह सकती हूं कि हम बहुत कष्ट झेल रहे हैं. हो सकता है कि जो लोग हमारे बीच नहीं हैं, वो इस बात को नहीं समझ सकते, मगर हम सब बहुत तक़लीफ़ में हैं.’
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