अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी बैन और 'सीक्रेट स्कूल' में पढ़ती ये बहादुर लड़कियां

अफ़ग़ान लड़कियां

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    • Author, सना सफ़ी
    • पदनाम, बीबीसी संंवाददाता, अफ़ग़ान सेवा

अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएं और लड़कियां तालिबान सरकार के प्रतिबंध को दरकिनार करते हुए गोपनीय तरीके से पढ़ाई कर रही हैं.

ये लड़कियां ऐसे सीक्रेट स्कूलों में पढ़ाई कर रही हैं, जिन्हें महिलाओं ने स्थापित किया है. यही महिलाएं इनमें पढ़ाती हैं और इन बहादुर लड़कियों की ऑनलाइन और ऑफ़लाइन क्लास लेती हैं.

मैंने इस तरह के कई सीक्रेट स्कूलों और इनमें पढ़ने वाली लड़कियों के दिलो-दिमाग़ में झांकने की कोशिश की, जो तमाम ख़तरे मोल लेकर शिक्षा के अपने अधिकार पर पाबंदी को मानने से इनकार कर रही हैं.

सीक्रेट स्कूल में अफ़ग़ान लड़कियां

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लड़कियों की 'गोपनीय दुनिया'

मैं लंदन में अपने फ्लैट में लैपटाप पर नज़रें गड़ाए बैठी थी. मेरे दिमाग़ में अफ़ग़ानिस्तान की उस किशोरी के शब्द गूंज रहे थे, "मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे मैं शिक्षा की चोरी कर रही हूं. मैं अपनी ही ज़िंदगी चुरा रही हूं."

अफ़ग़ानिस्तान से दूर बैठी मैं इंटरनेट के माध्यम से नक़ाब की ओट में छिपी एक गोपनीय दुनिया से जुड़ी हुई थी.

दूसरी ओर लैपटाप पकड़े लड़की से मैंने कहा, “क्या तुम थोड़ा पीछे हट सकती हो ताकि मैं पूरी क्लास को देख सकूं?”

मेरे देखने के लिए उसने लैपटॉप के कैमरे को पूरे कमरे में घुमाया. वो क्लास 30 लड़कियों से भरी हुई थी. लड़कियां क़तार में बैठी थीं. सफ़ेद या रंगीन हेड स्कार्फ़ को छोड़कर वे सभी पूरी तरह काले कपड़ों में थीं.

उनकी शिक्षिका भी काले कपड़े में थी, वो सफ़ेद बोर्ड के पास खड़ी थी. उस पर जो चित्र बना था, उससे मैंने अंदाज़ा लगाया कि शायद ये जीव विज्ञान की कक्षा है.

क्लास की बातचीत के बीच मेरी आंखों के सामने एक छुपा सच उजागर हो रहा था.

मैं सिर्फ़ अफ़ग़ानिस्तान में किसी अज्ञात जगह पर हो रही इस सीक्रेट क्लास की गवाह ही नहीं हूं, बल्कि मैं तालिबान शासकों के आदेश नामंजूर किए जाने की गवाह भी बन रही हूं.

अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना के अफ़ग़ानिस्तान से जाने के बाद से यहां तालिबान का शासन है. तालिबान सरकार ने पिछले डेढ़ साल से देश में लड़कियों की सेकेंडरी और यूनिवर्सिटी शिक्षा पर पाबंदी लगाई हुई है.

सीक्रेट स्कूल

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'अल्लाह के लिए तुम स्कूल छोड़ दो'

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अफ़ग़ानिस्तान के सीक्रेट स्कूलों की गोपनीय दुनिया में मेरी यात्रा दिल दहलाने वाले रोलरकोस्टर राइड से कम नहीं थी.

डिजिटल खिड़की से उन शिक्षकों और छात्राओं की ज़िंदगी में झांकते हुए मुझे खुद कंधार में बिताए अपने दिन याद आ गए.

मैं अफ़ग़ानिस्तान में पैदा हुई और मुझे भी सीक्रेट स्कूल में जाने पर मज़बूर होना पड़ा. शिक्षिका से बात करते हुए मैं अपनी कठिन और कड़वी यादों से उबरने में कामयाब हो पाई.

आख़िरकार मैंने उनसे ये पूछने की हिम्मत जुटाई, "वो इस स्कूल में कितने दिनों से काम कर रही हैं?"

शिक्षिका ने मुझसे कहा, "मैं यहां टीचर के तौर पर छह महीने से हूं."

हालांकि उन्होंने मुझे ये भी बताया कि वो कोई भी दिन ऐसा नहीं रहा जब वो भयमुक्त रही हों.

शिक्षिका ने बताया, "मेरा भाई अक्सर कहता है कि 'अल्लाह के लिए तुम स्कूल छोड़ दो'. इस स्कूल के बारे में कोई नहीं जानता लेकिन मेरे भाई को डर है कि एक दिन तालिबान आ धमकेंगे. लेकिन मेरे मां-पिता ने मुझे अपनी बहनों को पढ़ाने के लिए ये करते रहने को राज़ी किया."

"मैं उनका दुख समझती हूं. मेरी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई बंद हो गई है. इसलिए मैं यहां लड़कियों को पढ़ने में मदद करना चाहती हूं."

क्लासरूम में लकड़ी के फ्रेम वाली पारंपरिक खिड़कियां हैं और दीवारों पर तस्वीरें हैं जो धड़कती ज़िंदगी की गवाही देती हैं.

1990 के दशक के मध्य की मेरी यादों से ये थोड़ा अलग है.

तालिबान एक गृह युद्ध की निर्मम मारकाट से उभर कर सत्ता तक पहुंचा और उसने रातों रात सभी महिलाओं और लड़कियों से शिक्षा का अधिकार छीन लिया है.

अफ़ग़ान लड़कियां

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इमेज कैप्शन, बीते साल मार्च में जब यूनिवर्सिटी खुलीं तो लड़कियों को हिजाब पहनने की हिदायत देने वाले पोस्टर लगाए गए. हालांकि लड़कियां फिर कभी यूनिवर्सिटी कॉलेज में नहीं लौट पाईं.

स्कूलों के दरवाज़े बंद

मुझे वो दिन मरते दम तक याद रहेगा जब मैंने तालिबान शासन में पहले दिन स्कूल जाने की कोशिश की.

उस समय मेरी उम्र महज़ सात साल थी. मुझे गेट पर एक महिला मिली जिसने मुझसे कहा कि स्कूल में लड़कियों और महिलाओं के आने की मनाही है.

उस समय मैंने काली यूनीफ़ार्म पहन रखी थी जिस पर एक पीले रंग की कढ़ाई वाली बेल्ट थी, जिसे मेरी मां ने बनाया था. इसकी भी वहां इजाज़त नहीं थी.

मुझे याद है कि मैं कितनी निराश हुई थी जब महिला ने कहा कि उस यूनीफार्म की वजह से भी मैं स्कूल में प्रवेश नहीं कर सकती. हालांकि मैं उसे लेकर बहुत उत्साहित थी.

लेकिन मेरे मां-पिता इससे डरे नहीं और एक सीक्रेट स्कूल की खोज शुरू कर दी. उनकी मुलाक़त एक ऐसे जोड़े से हुई जिन्होंने अपने घर को क्लासरूम में बदल दिया था.

हर सुबह मां मुझे अपने साथ सब्जी मार्केट ले जाती और लौटते समय मैं सीक्रेट स्कूल के लिए ग़ायब हो जाती. वहां जो भी किताबें थीं उनसे हमने पढ़ना और लिखना सीखा.

लेकिन उस जोड़े की ये कोशिश भी बहुत जल्द ख़त्म हो गई. जैसे ही तालिबान को इसका पता चला उन्होंने स्कूल पर छापा मारा और उन्होंने 15 दिनों के लिए हमारे शिक्षकों को जेल में डाल दिया. रिहा होने के बाद वो दोनों अफ़ग़ानिस्तान से फरार हो गए.

पांच साल बाद, 9/11 का हमला हुआ और फिर उसके बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने तालिबान की सरकार को उखाड़ फेंका. मैं उन लाखों लड़कियों में से एक थी जिन्होंने शिक्षा के अपने अधिकार को फिर से हासिल किया.

लेकिन जब तालिबान अगस्त 2021 में एक बार फिर सत्ता में लौटा तो उसने महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा हासिल करने की कोशिश को फिर से धूल में मिला दिया.

इस बार लड़कियों को छोटी कक्षाओं में पढ़ने की इजाज़त दी गई है. हालांकि सेकेंड्री, कॉलेज और यूनिवर्सिटी उनकी पहुंच से बाहर हैं. ये क़िस्मत का धोखा ही तो है जिसने इन लड़कियों के सपनों को अधर में लटका दिया है.

अफ़ग़ानिस्तान के सीक्रेट स्कूल नेटवर्क के केंद्र में वे निडर शिक्षक हैं जो तालिबान से छिपकर काम करने के लिए मजबूर हैं.

पाशताना दुर्रानी एक एक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने ताज़ा प्रतिबंध लगाए जाने के बाद पूरे देश में अंडरग्राउंड स्कूलों की स्थापना करने की मुहिम की अगुवाई की.

उनकी संस्था का नाम है 'लर्न अफ़ग़ानिस्तान', जिसमें अभी 12 साल की उम्र से अधिक की 230 छात्राएं हैं.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: तालीम को तरसती अफ़ग़ान लड़कियां

‘मेरी क़िस्मत पर मेरा नियंत्रण’

पाशताना दुर्रानी कहती हैं कि इस नेटवर्क में जितने लोग जुड़े हैं उनके लिए बहुत बड़ा ख़तरा है. लेकिन उनका मानना है कि कुछ न करने जैसा कोई विकल्प उनसे पास नहीं है.

वो कहती हैं, “अगर मुझे शिक्षा नहीं मिली होती तो मेरी शादी कर दी गई होती. मेरी बहन की शादी कर दी गई होती. मेरे भाई को कहीं बाल मजदूरी करनी पड़ती. लेकिन मेरी शिक्षा की वजह से ही मैं अपने परिवार की मुखिया बन पाई. और इस वजह से अपनी क़िस्मत पर मेरा नियंत्रण है.”

दुर्रानी की कोशिशों को मैं अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर जीवंत होते देख रही हूं. उनकी छात्राएं मुझसे धाराप्रवाह अंग्रेज़ी में बात कर रही हैं. उन्होंने मुझे बताया कि वे जीव विज्ञान से लेकर रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान से लेकर दर्शन तक सबकुछ पढ़ती हैं और ग्राफ़िक डिज़ाइन जैसे विषय भी पढ़ती हैं.

कई लड़कियों ने राजनयिक, डॉक्टर और इंजीनियर बनने की अपनी आकांक्षा ज़ाहिर की.

जब मैं ये सुन रही थी तो मुझे रह-रह कर इससे जुड़ी चुनौतियां याद आ रही थीं. इनके सामने खोजे जाने पर छापा पड़ने और स्कूल बंद किए जाने का ख़तरा है. इसलिए इन किशोरियों का सीखने और आगे बढ़ने का जज़्बा भी उतना ही बड़ा है.

लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी को लेकर तालिबान की आधिकारिक स्थिति है कि ये स्थाई बैन नहीं है. उनका कहना है कि वो देश के भीतर एक ‘सुरक्षित माहौल’ बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इसी के मद्देनज़र ‘ज़रूरी बदलाव’ किए जा रहे हैं.

लेकिन अभी तक ये पता नहीं है कि इस बयान का क्या मतलब है या लड़कियों की शिक्षा पर बैन कब हटाया जाएगा.

मेरी इस डिजिटल यात्रा ने मेरे अंदर उम्मीद, हताशा, प्रशंसा और दुख का मिला-जुला भाव छोड़ दिया है.

लेकिन ये तय है कि अफ़ग़ानिस्तान में लड़िकयों की शिक्षा का संघर्ष अभी ख़त्म नहीं होने जा रहा, हालांकि इन लड़कियों की दृढ़ इच्छाशक्ति एक उम्मीद है.

एक लड़की ने मुझसे कहा, “हम प्रतिरोध जारी रखेंगे. हो सकता है कि एक दिन इस अंधेरी सुरंग के अंत में रोशनी दिख जाए.”

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