अफ़ग़ानिस्तान को क्यों कहते हैं 'साम्राज्यों की कब्रगाह'?

इमेज स्रोत, Print Collector
- Author, नॉरबेर्टो परेडेस
- पदनाम, बीबीसी मुंडो सेवा
अफ़ग़ानिस्तान में ऐसा क्या है जो इसे पूरी दुनिया में 'साम्राज्यों की कब्रगाह' के रूप में जाना जाता है? आख़िर क्यों अमेरिका से लेकर ब्रिटेन, सोवियत संघ समेत दुनिया की तमाम बड़ी शक्तियां इसे जीतने की कोशिश में नाकाम रहीं.
ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास और भूगोल में मिलता है.
19वीं सदी में, तब दुनिया में सबसे ताक़तवार रहे ब्रितानी साम्राज्य ने अपनी पूरी शक्ति के साथ इसे जीतने की कोशिश की. लेकिन 1919 में आख़िरकार ब्रिटेन को अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर जाना पड़ा और उन्हें स्वतंत्रता देनी पड़ी.
इसके बाद सोवियत संघ ने 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया. मंशा ये थी कि 1978 में तख़्तापलट करके स्थापित की गयी कम्युनिस्ट सरकार को गिरने से बचाया जाए. लेकिन उन्हें ये समझने में दस साल लगे कि वे ये युद्ध जीत नहीं पाएंगे.

इमेज स्रोत, Getty Images
ब्रितानी साम्राज्य और सोवियत संघ के बीच एक बात ऐसी है जो दोनों पर लागू होती है. दोनों साम्राज्यों ने जब अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया तो वे अपनी ताक़त के चरम पर थे. लेकिन इस हमले के साथ ही धीरे- धीरे दोनों साम्राज्य बिखरने लगे.
साल 2001 में अमेरिकी नेतृत्व में हमले और उसके बाद कई सालों तक चले युद्ध में लाखों लोगों की जान गयी है. इस हमले के बीस साल बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अफ़ग़ानिस्तान से अपनी सेना को वापस बुलाने का फैसला किया है.
ये एक विवादास्पद फैसला था जिसकी दुनिया भर में कड़ी आलोचना की गयी. इस एक फैसले की वजह से अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल पर इतनी तेजी से तालिबान का कब्ज़ा हो गया है.
बाइडन ने अपने इस फ़ैसले का बचाव करते हुए कहा है कि अमेरिकी नागरिकों को "एक ऐसे युद्ध में नहीं मरना चाहिए जिसे खुद अफ़ग़ानी लोग न लड़ना चाह रहे हों"

इमेज स्रोत, Getty Images
'साम्राज्यों की कब्रगाह' के रूप में अफ़ग़ानिस्तान की ख्याति को याद करते बाइडन ने कहा, "चाहें जितनी भी सैन्य शक्ति लगा लें, एक स्थिर, एकजुट और सुरक्षित अफ़ग़ानिस्तान हासिल करना संभव नहीं है."
हालिया सदियों में अफ़ग़ानिस्तान को नियंत्रित करने की कोशिश करने वाली दुनिया की सबसे ताक़तवर सेनाओं के लिए अफ़ग़ानिस्तान एक कब्रगाह जैसा ही साबित हुआ है.
शुरुआत में इन सेनाओं को थोड़ी सफलता भले ही मिली हो लेकिन आख़िरकार इन्हें अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर भागना ही पड़ा है.
अफ़ग़ानिस्तान के इतिहास पर 'अफ़ग़ानिस्तान: साम्राज्यों की कब्रगाह' नाम की किताब लिखने वाले डिफेंस और फॉरेन पॉलिसी एनालिस्ट डेविड इस्बी बीबीसी मुंडो को बताते हैं, "ऐसा नहीं है कि अफ़ग़ान काफ़ी शक्तिशाली हैं. बल्कि अफ़ग़ानिस्तान में जो कुछ हुआ है, वो आक्रमणकारी ताक़तों की ग़लतियों की वजह से हुआ है."

इमेज स्रोत, Getty Images
क्यों पस्त हुईं बड़ी शक्तियां?
इस्बी मानते हैं कि निष्पक्षता के साथ देखा जाए तो अफ़ग़ानिस्तान एक कठिन जगह है. ये एक जटिल देश है जहां आधारभूत ढांचा काफ़ी ख़राब है, विकास काफ़ी सीमित है और चारों ओर से ज़मीन से घिरा हुआ है.
इस्बी कहते हैं, "लेकिन सोवियत संघ, ब्रिटेन या अमेरिका, किसी भी साम्राज्य ने अफ़ग़ानिस्तान को लेकर लचीलापन नहीं दिखाया है. वे अपने ढंग से चलना चाहते थे और उन्हें चलना भी पड़ा लेकिन वे कभी अफ़ग़ानिस्तान की जटिलता समझ नहीं पाए."
अक्सर कहा जाता है कि अफ़ग़ानिस्तान को जीतना असंभव है. ये एक ग़लत बयान है: ईरानियों, मंगोलों और सिकंदर ने अफ़ग़ानिस्तान को जीता है.
लेकिन ये तय है कि ये एक ऐसा दुस्साहस है जिसकी एक कीमत चुकानी पड़ती है. और इससे पहले काबुल पर हमला करने वाले पिछले तीन साम्राज्य अपने प्रयास में बुरी तरह फेल हुए हैं.
ये भी पढ़ें -
ब्रितानी साम्राज्य और तीन आक्रमण
19वीं सदी में ज़्यादातर समय के लिए अफ़ग़ानिस्तान ब्रितानी और रूसी साम्राज्यों के बीच मध्य एशिया को नियंत्रित करने की रस्साकसी में प्रमुख मंच था.
कई दशकों तक रूस और ब्रिटेन के बीच राजनयिक और राजनीतिक संघर्ष जारी रहा जिसमें आख़िरकार ब्रिटेन की जीत हुई. लेकिन ब्रिटेन को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी.
ब्रिटेन ने 1839 से 1919 के बीच तीन बार अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया और ये कहा जा सकता है कि तीनों बार ब्रिटेन फेल हुआ.
पहले एंग्लो-अफ़ग़ान युद्ध में ब्रिटेन ने 1839 में काबुल पर कब्जा कर लिया. क्योंकि ब्रिटेन को लग रहा था कि अगर उसने ये कदम नहीं उठाया तो उससे पहले रूस काबुल पर कब्ज़ा कर लेगा.
इसके चलते ब्रिटेन को ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा. कुछ जनजातियों ने बेहद सामान्य हथियारों से दुनिया के सबसे ताक़तवर मुल्क की सेना को बर्बाद कर दिया.

इमेज स्रोत, Getty Images
बड़ी हार
तीन साल के आक्रमण के बाद अफ़ग़ानिस्तान ने आख़िरकार हमलावर सेना को भागने के लिए मजबूर कर दिया.
साल 1842 की छह जनवरी को ब्रितानी कैंप से जलालाबाद के लिए निकली 16000 सैनिकों में सिर्फ एक ब्रितानी नागरिक ज़िंदा लौटा.
इस्बी बताते हैं कि इस "युद्ध ने उप महाद्वीप में ब्रितानी विस्तार को कमजोर कर दिया और इस धारणा को भी प्रभावित किया कि ब्रितानी अजेय हैं."
इसके चार दशक बाद ब्रिटेन ने एक बार फिर कोशिश की. इस बार इसे कुछ सफलता मिली.
साल 1878 से 1880 के बीच हुए दूसरे एंग्लो-अफ़ग़ान युद्ध में अफ़ग़ानिस्तान ब्रितानी संरक्षित राज्य बन गया. लेकिन ब्रिटेन को काबुल में एक रेज़िडेंट मिनिस्टर रखने की अपनी नीति को त्यागना पड़ा.
इसकी जगह ब्रितानी साम्राज्य ने एक नये अफ़ग़ान अमीर को चुनकर देश से अपनी सेनाओं को वापस बुला लिया.
लेकिन साल 1919 में जब इस नये अमीर ने खुद को ब्रिटेन से आज़ाद घोषित कर दिया तब तीसरा एंग्लो-अफ़ग़ान युद्ध शुरू हुआ.

इमेज स्रोत, DEA PICTURE LIBRARY
ये वो समय था जब एक ओर बोल्शेविक क्रांति ने रूसी ख़तरे को कम कर दिया और प्रथम विश्व युद्ध ने ब्रितानी सैन्य खर्च को बेतहाशा बढ़ा दिया. ऐसे में ब्रितानी साम्राज्य में अफ़ग़ानिस्तान के प्रति रुचि कम होती गयी.
इसी वजह से चार महीनों तक चली जंग के बाद ब्रिटेन ने आख़िरकार अफ़ग़ानिस्तान को स्वतंत्र घोषित कर दिया.
हालांकि, ब्रिटेन आधिकारिक रूप से अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद नहीं था. लेकिन ऐसा माना जाता है कि उन्होंने कई सालों तक अपना प्रभाव वहां बनाए रखा.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 1
सोवियत संघ का युद्ध
साल 1920 के दौरान अमीर अमानुल्लाह ख़ान ने देश को सुधारने की कोशिश की. इनमें महिलाओं के बुरक़ा पहनने की प्रथा को ख़त्म करना शामिल था. इन सुधारवादी प्रयासों ने कुछ जनजातियों और धार्मिक नेताओं को नाराज़ कर दिया जिससे एक गृह युद्ध की शुरुआत हुई.
इस संघर्ष की वजह से अफ़ग़ानिस्तान में कई दशकों तक हालात तनावपूर्ण रहे. और 1979 में सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण कर दिया ताकि एक बुरी तरह असंगठित कम्युनिस्ट सरकार को सत्ता में बनाए रखा जा सके.

इमेज स्रोत, Getty Images
कई मुजाहिदीन संगठनों ने सोवियत संघ का विरोध करते हुए उनके ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी. इस जंग में मुजाहिदीनों ने अमेरिका, पाकिस्तान, चीन, ईरान और सऊदी अरब से पैसा और हथियार लिए.
रूस ने ज़मीनी और हवाई हमले किए ताकि उन इलाकों के गाँवों और फसलों को नष्ट किया जा सके जिन्हें वे समस्या की वजह मानते थे. इसकी वजह से स्थानीय आबादी अपने घर छोड़ने या मरने के लिए विवश हुई.
इस आक्रमण में बेहद बड़े स्तर पर ख़ून-ख़राबा हुआ. इस युद्ध में लगभग 15 लाख लोगों की मौत हुई और पचास लाख लोग शरणार्थी बन गए.
एक समय में सोवियत संघ की फौज बड़े शहरों और कस्बों को अपने नियंत्रण में करने में सफल हो गयी. लेकिन ग्रामीण इलाकों में मुजाहिदीन अपेक्षाकृत रूप से स्वच्छंदता से घूमते थे.
सोवियत संघ की सेना ने कई तरीकों से चरमपंथ ख़त्म करने की कोशिशें की लेकिन गुरिल्ला सैनिक अक्सर ऐसे हमलों से बच जाते थे.
इस युद्ध में पूरा देश तबाह हो गया.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 2
इसी समय तत्कालीन सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव को अहसास हुआ कि रूसी अर्थव्यवस्था को बदलने की कोशिश करते हुए युद्ध जारी नहीं रख सकते और 1988 में अपने सैनिकों को वापस लेने का फैसला किया.
लेकिन इस वापसी से सोवियत संघ की छवि कभी उबर नहीं पायी. सोवियत संघ के लिए अफ़ग़ानिस्तान 'वियतनाम युद्ध' बन गया. ये एक बेहद ख़र्चीला और शर्मनाक युद्ध था जिसमें सोवियत संघ अपनी पूरी ताक़त लगाने के बावजूद स्थानीय गुरिल्ला लड़ाकों से हार गया.
इस्बी कहते हैं कि "सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में वैध सत्ता का दावा किया, ठीक ऐसे समय में जब सोवियत प्रणाली में, उसकी सरकार और उसकी सेना में गंभीर और मौलिक अंतर्विरोध थे."
"ये सोवियत संघ की सबसे बड़ी ग़लतियों में से एक थी."
इसके बाद सोवियत संघ का विघटन हो गया.
ये भी पढ़ें -
अमेरिकी अभियान और विनाशकारी वापसी
अफ़ग़ानिस्तान में ब्रिटेन और सोवियत संघ के असफल प्रयासों के बाद अमेरिका ने 9/11 हमले के बाद अफ़ग़ानिस्तान में लोकतंत्र का समर्थन करने और अल-क़ायदा ख़त्म करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया.
इससे पहले दो साम्राज्यों की तरह अमेरिका भी जल्द ही काबुल जीतने और तालिबान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने में सफल रहा.

इमेज स्रोत, Getty Images
तीन साल बाद अफ़ग़ान सरकार अस्तित्व में आई लेकिन तालिबान के हमले जारी रहे. पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2009 में सैन्य टुकड़ियों की संख्या में बढ़ोतरी की जिससे तालिबान पीछे हटा. लेकिन ऐसा ज़्यादा दिनों के लिए नहीं हुआ.
साल 2001 में युद्ध की शुरुआत के बाद साल 2014 में सबसे ज़्यादा खूनखराबा देखा गया. नेटो सेनाओं ने अपना मिशन पूरा करके ज़िम्मेदारी अफ़ग़ान सेना पर सौंप दी.
इसकी वजह से तालिबान ने ज़्यादा इलाकों पर कब्जा कर लिया. इसके अगले साल लगातार आत्मघाती बम धमाके दर्ज किए गए. इनमें काबुल की संसद और हवाई अड्डे के नज़दीक किया गया धमाका शामिल है.
इस्बी के मुताबिक़, अमेरिकी हमले में कई चीजें ग़लत ढंग से की गयीं.
वह कहते हैं, "सैन्य और राजनयिक प्रयासों के बावजूद, कई समस्याओं में से एक समस्या ये थी कि अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान को छद्म युद्ध छेड़ने से रोक नहीं पाया जिसने अपनी सफलता साबित की है.
"ये अन्य हथियारों से ज़्यादा सफल साबित हुआ है."
ये भी पढ़ें -
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 3
ज़्यादा ख़र्चीला युद्ध
हालांकि, सोवियत संघ के युद्ध में ज़्यादा ख़ून-खराबा हुआ लेकिन अमेरिकी आक्रमण ज़्यादा ख़र्चीला साबित हुआ.
सोवियत संघ ने जहां अफ़ग़ानिस्तान में प्रति वर्ष लगभग 2 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च किए, वहीं अमेरिका के लिए 2010 और 2012 के बीच, युद्ध की लागत प्रति वर्ष लगभग 100 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई थी.
लेकिन काबुल के पतन की तुलना दक्षिण वियतनाम की घटनाओं से भी की गई है.
रिपब्लिकन पार्टी की कांग्रेस सदस्या स्टेफनिक ने ट्वीट करके लिखा है, "यह जो बाइडन का साइगॉन है, "
"अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर एक विनाशकारी विफलता जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकेगा."
अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबानी कब्जे से अफ़ग़ानिस्तान में एक मानवीय संकट पैदा हुआ है जिसके चलते हज़ारों - लाखों लोग बेघर हो गए हैं.
इस्बी कहते हैं, "मध्यम अवधि में, यह देखना आवश्यक होगा कि क्या तालिबान शासन को अंतरराष्ट्रीय समुदाय में मंजूरी मिलेगी, मुझे इस मामले में काफ़ी संदेह है."
और यदि विश्व बिरादरी के लिए तालिबान से निपटना असंभव हो जाता है, तो यह देखना अहम होगा कि क्या कोई अन्य शक्ति दुनिया में साम्राज्यों की कब्रगाह माने जाने वाले अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण करने का जोख़िम उठाती है.
ये भी पढ़ें -
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















