तालिबान के उठा ले जाने से बेहतर मरना है: एक हज़ारा छात्रा की आपबीती

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ये काबुल में यूनिवर्सिटी के छात्रों के नए सत्र के लिए तैयार होने का वक़्त है. लेकिन जब से तालिबान लड़ाके यहां सड़कों पर गश्त लगा रहे हैं, कई छात्र अपने अब तक के जीवन के सबूतों को नष्ट करने में लगे हैं.
ये महिला छात्र सताए गए उस हज़ारा अल्पसंख्यक समुदाय की सदस्य हैं जिसे हाल के वर्षों में तालिबान के हाथों अपहरण और हत्याओं का सामना करना पड़ा है. इन्होंने बीबीसी से बात की.
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वो बीबीसी को बताती हैं कि कैसे वो सपने बुन रही थीं लेकिन अब उनके लिए वो डर में बदल गए हैं. कुछ दिनों में उनके अस्तित्व का भविष्य तय हो जाएगा.
उन्होंने जो कुछ बीबीसी से कहा... पढ़िए उनकी ज़ुबानी.
ये कुछ ऐसा है जिसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती. वो सब कुछ जिसके मैंने सपने देखे थे, वो सब जिसके लिए मैंने कभी काम किया था. मेरी गरिमा, मेरा अभिमान, यहां तक कि एक लड़की के रूप में मेरा अस्तित्व, मेरा जीवन- सब ख़तरे में है.
किसे पता कि उन्हें घर घर जाकर तलाशी लेने और लड़कियों को ले जाने में कितना समय लगेगा- शायद उनके साथ रेप करें. जब वो मेरे घर आएं तो शायद मुझे ख़ुद को मारना पड़े. मैं अपने दोस्तों से बातें कर रही हूं, हम सब यही करने की योजना बना रहे हैं. उनके उठाकर ले जाने से बेहतर तो मरना है.
हम सभी डरे हुए हैं, बहुत ज़्यादा डरे हुए.
'कुछ भी सामान्य नहीं रहा'
दो महीने पहले मेरा ध्यान केवल अपनी डिग्री पर था. मैं फॉल सेमेस्टर के लिए अपनी पढ़ाई प्लान कर रही थी कि क्या करना है, क्या नहीं करना है, शेड्यूल बना रही थी, सब कुछ सही करने की कोशिश कर रही थी. जब तालिबान देश के कई प्रांतों पर क़ब्ज़ा कर रहे थे कई लोग डर रहे थे लेकिन मुझे लगता था कि वो काबुल पर कभी क़ब्ज़ा नहीं कर सकेंगे.
(काबुल के पश्चिमोत्तर के बड़े शहर और तालिबान विरोधी गढ़) मज़ार-ए-शरीफ़ पर उनके क़ब्ज़े से पहले तक मेरी ज़िंदगी सामान्य थी. लेकिन जब उन्होंने वहां क़ब्ज़ा कर लिया तो मुझे अहसास हुआ कि अब हम ख़त्म होने वाले हैं. फिर उन्होंने काबुल पर क़ब्ज़ा जमा लिया. शहर में कुछ गोलियां चलीं और हमने सुना कि वो तालिबान के हर गली मोहल्ले में पहुंच गए हैं.
फिर कुछ भी सामान्य नहीं रहा.

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सोशल मीडिया पोस्ट से डर
मेरा पूरा परिवार घर पर ही रहा. दुकानें बंद थीं, कीमतें हर घंटे बढ़ रही थीं और मुद्रा विनिमय दर भी तेज़ी से बदल रही थी.
मैंने यूनिवर्सिटी के अपने सारे काग़ज़ात और दस्तावेज़ जला दिए. सभी उपलब्धियां, सारे प्रमाण पत्र जला दिए. ऐसा मैंने मेरी बालकनी में किया. मेरे पास बहुत सी किताबें हैं, प्यारी किताबें, जिन्हें मैं पढ़ रही थीं. मैंने उन सभी को छिपा दिया है.
मैंने अपना सोशल मीडिया अकाउंट डीऐक्टिवेट कर दिया है. मुझे बताया गया कि सोशल मीडिया पर पोस्ट करना, यहां तक कि उस प्लेटफॉर्म पर मौजूदगी भी अब बहुत ख़तरनाक होगी. ज़ाहिर है तालिबान सोशल मीडिया चेक करते हैं और उस पर की गई पोस्ट के ज़रिए वो हमें ढूंढ लेते हैं.
मेरे लिए फ़ेसबुक बड़ी समस्या है क्योंकि वहां मैं सक्रिय थी. मेरी पुरानी पोस्ट हैं जिसमें लिखा गया है कि तालिबान कुछ नहीं कर सकते. ये भी कि मैं उनके ख़िलाफ़ डटी रहूंगी और वो मेरे पढ़ने के अधिकार को नहीं छीन सकते. वो मुझे मेरे घर में बंद नहीं कर सकते. मैंने उन्हें आतंकवादी कहा. निश्चित ही वो सभी उनके लिए आपत्तिजनक पोस्ट थीं.
उन्होंने कुछ ही दिनों में ये सब कर दिया. मैं ख़ुद को तबाह, भयभीत और उदास पाती हूं.
तालिबान ने एलान किया है कि महिलाओं को हिजाब के साथ रूढ़िवादी कपड़े पहनने चाहिए. लोग डर से बुर्का और हिजाब पहन रहे हैं.
मैंने सुना है कि कुछ यूनिवर्सिटी में क्लास के अंदर लड़के और लड़कियों के बीच पर्दे लगा दिए गए हैं. कुछ परिवार अपनी लड़कियों को पढ़ने के लिए बाहर नहीं जाने दे रहे हैं. क्योंकि सभी जानते हैं कि तालिबान अभी अपना असली चेहरा नहीं दिखा रहे हैं, लेकिन वो इसे दिखाएंगे ज़रूर, और ये परिवार तब की समस्याओं से बचने के लिए ऐसा कर रहे हैं.
मैंने तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस देखी है (मंगलवार को- जहां उन्होंने महिलाओं के अधिकारों का वादा किया था). वो झूठ बोल रहे हैं, मुझे यकीन है कि वो झूठ बोल रहे हैं.

'हमें ज़रूर मार डालेंगे, शायद रेप करेंगे'
मैं मंगलवार को अपने पिता के साथ दवा लाने बाहर गई थी.
सब कुछ बंद था. मुझे पूरा हिजाब पहनना पड़ा. लोग बुर्का भी पहने थे, यहां तक कि 13, 14 साल की लड़कियां भी. पहले जैसा कुछ नहीं रहा. वो शहर ही नहीं रहा.
चारों ओर तालिबान घूम रहे थे. वो आपकी ओर देखते हैं- तब भी, जबकि आप पूरा हिजाब पहने होती हैं- जैसे कि आप एक सामान्य इंसान नहीं हैं. जैसे वो आपकी ज़िंदगी के मालिक हैं, जैसे कि आप एक कचरा हैं, जिसे फेंक दिया जाना चाहिए. इस तरह वो आपको सड़कों पर देखते हैं.
जब मैं पढ़ाई कर रही थी तब कई सपने देखती थी, ज़िंदगी की योजनाएं और लक्ष्य बनाया करती थी.

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अब, मुझे लगता है कि देश छोड़ना होगा, क्योंकि मैं हज़ारा हूं. वो हज़ारा लड़कियों के स्कूल पर हमला कर चुके हैं, तब सैकड़ों को मार दिया था.
तो वो हमें ज़रूर मार डालेंगे, शायद रेप करेंगे, फिर मारेंगे. एक लड़की होने के नाते और एक अल्पसंख्यक होने के नाते मेरे लिए अपने ही देश में कोई जगह नहीं है.
मेरा पूरा परिवार डरा हुआ है. जब से तालिबान ने सत्ता संभाली है, हम तब से ही यहां से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं. चाहे क़ानूनी रूप से निकलें या अवैध तरीके से. हवाई अड्डे पर बहुत भीड़ है, निकासी के लिए कोई भी खाली जगह नहीं है, और कई देश हमें ख़ारिज कर चुके हैं, सभी. हर कोई केवल देख रहा है, जैसे कि कुछ भी तो नहीं हो रहा है.

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'इंसानियत सबके लिए, अफ़ग़ान को छोड़ कर'
मैं विदेश की सरकारों से सबसे ख़ास यह मांगना चाहूंगी कि वो तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान में सरकार के रूप में मान्यता नहीं दें. क्योंकि अगर उन्होंने ऐसा किया, तो हम निश्चित रूप से मर जाएंगे, शायद मौत से भी बदतर, किसे पता.
लेकिन जिस शहर को मैं दिल से प्यार करती हूं उसे क़ब्ज़ा किए जाते देखने से ज़्यादा बुरा क्या हो सकता है- मैं भावुक नहीं होना चाहती- लेकिन ये सबसे अधिक दुख देता है कि पूरी दुनिया चुप है. सब के सब बिल्कुल ख़ामोश हैं.
और जो लोग परवाह नहीं करते, वो ऐसा बर्ताव कर रहे हैं, दिखा रहे हैं जैसे अफ़ग़ान इंसान नहीं हैं. और ये देख कर मेरा दिल टूट जाता है.
कहा जाता है- सब के लिए इंसानियत. लेकिन मुझे लगता है कि शायद यह होना चाहिए कि- "इंसानियत सबके लिए, अफ़ग़ान को छोड़ कर."
सोचा नहीं था कि ज़िंदगी में कभी ऐसी जगह पर खड़ा होना पड़ेगा.
यह दिल दहला देने वाला है कि महज़ कुछ ही दिनों पहले जो कुछ भी मैंने सपने देखे थे, वो सब जो सोचा था कि मेरे पास होगा, सब ख़त्म हो चुका है.
लेखक की सुरक्षा के लिए उनका नाम नहीं बताया जा रहा है.
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