अमेरिका-तालिबान समझौते ने तय कर दिया था अफ़ग़ानिस्तान का भविष्य?

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न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन पर 2001 में 9/11 के हमलों के बाद नेटो ने तालिबान को काबुल से बाहर कर दिया था.
लेकिन इसके क़रीब दो दशक बाद, तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में फिर से कब्ज़ा हो गया है. लगभग पूरे देश को अपने नियंत्रण में ले लेने के साथ इसके लड़ाकों ने राष्ट्रपति भवन में खुशी-खुशी सेल्फ़ी ली.
ये सबसे आश्चर्य की बात है कि यह उलटफेर अमेरिका और उसके नेटो सहयोगियों की हार की वजह से नहीं हुआ, बल्कि यह सावधानीपूर्वक बातचीत के बाद हुए समझौते का परिणाम है.
लेकिन सवाल उठता है कि एक राष्ट्रपति के शासनकाल में दस्तख़त हुए और उनके उत्तराधिकारी के आदेश पर लागू की गई इस डील के साथ क्या हुआ, जिससे इतनी भयावह ग़लती होती दिख रही है?

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अमेरिका तालिबान के साथ समझौता क्यों चाहता था?
न्यूयॉर्क में ट्विन टावर्स गिरने के एक दिन बाद, उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने वादा किया था कि "इस लड़ाई में वक़्त लगेगा और समाधान मिलेगा, लेकिन इस बारे में कोई शक़ की गुंजाइश नहीं कि हम जीतेंगे."
लेकिन, अमेरिका तालिबान पर जीत हासिल करने के क़रीब कभी पहुंचा ही नहीं.
हालांकि नेटो के हस्तक्षेप के बाद, 9/11 के हमलों के लिए ज़िम्मेदार आतंकी संगठन अल-क़ायदा के आतंकवादियों को शरण देने वाले तालिबान को तेज़ी से शहरों से बाहर धकेल दिया गया था. इसके बाद तालिबान को फिर से संगठित होने में कुछ साल लगे.
साल 2004 तक यह संगठन पश्चिमी बलों और नई अफ़ग़ान सरकार के ख़िलाफ़ फिर से विद्रोह करने की स्थिति में आ गया था.
बढ़ते हमलों के जवाब में, नए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने 2009 में फ़ौजों की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोतरी की. इसके बाद, अफ़ग़ानिस्तान में नेटो सैनिकों की संख्या में भारी वृद्धि हुई. एक समय, फ़ौज की संख्या अपने चरम पर 1,40,000 तक पहुंच गई.
इस क़दम ने तालिबान को एक बार फिर पीछे धकेलने में मदद की. हालांकि इसका दीर्घकालिक प्रभाव कुछ ख़ास नहीं पड़ा
फिर जब बातचीत शुरू हुई...
एक समय था जब यह संघर्ष अमेरिका का सबसे लंबा युद्ध बन गया. इसमें अमेरिका के क़रीब 978 अरब डॉलर और 2,300 से अधिक लोगों की जान बेकार चली गई. इससे यह युद्ध अमेरिकी नागरिकों के बीच तेज़ी से अलोकप्रिय होने लगा.
अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी अभियान ख़त्म करने की मांग तेज़ी से बढ़ने लगी.
वर्ष 2014 से अमेरिका ने अपने आप को अफ़ग़ान बलों के प्रशिक्षण और सामान मुहैया कराने की भूमिका तक सीमित कर लिया. तब से हर साल मरने वाले अमेरिकी सैनिकों की संख्या अपेक्षाकृत कम हो गई.
वहीं अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने 2019 में बताया था कि पिछले पांच सालों के दौरान "45 हज़ार से अधिक अफ़ग़ान सुरक्षा कर्मियों को बलिदान देना पड़ा."
इस स्थिति को देखकर, ओबामा के उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रंप ने फ़रवरी 2020 में एक समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए तालिबान के साथ गहन बातचीत शुरू की.
यह वो मसला था, जिस पर पिछले साल के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप को बात करके खुशी हो रही थी.
उन्होंने एक्सियोस न्यूज़ को बताया था, "वैसे आप शायद जानते हों कि हम अफ़ग़ानिस्तान से काफ़ी हद तक बाहर हैं. हम वहां 19 साल से हैं. हम बाहर निकल जाएंगे."

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समझौते में क्या कहा गया?
इस समझौते के तहत, अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान से अपने बचे हुए सैनिकों को वापस लेने को सहमत हो गया. वहीं तालिबान ने वादा किया कि वह अल-क़ायदा या किसी अन्य चरमपंथी समूह को अपने नियंत्रण वाले इलाकों में काम करने की अनुमति नहीं देगा.
यह भी कहा गया कि 1,000 अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के बदले 5,000 तालिबान क़ैदियों की जेल से रिहाई की जाएगी. साथ ही तालिबान के ख़िलाफ़ लगे प्रतिबंधों को हटा दिया जाएगा.
इस समझौते में केवल अमेरिका और तालिबान शामिल हुए. योजना यह थी कि बाद में तालिबान और अफ़ग़ान सरकार की आपस में बातचीत होगी ताकि तय हो सके कि भविष्य में देश कैसे और किसके द्वारा चलाया जाएगा.
क़रीब 88.32 अरब डॉलर के ख़र्च से प्रशिक्षण पाने और तीन लाख से अधिक की संख्या वाले अफ़ग़ान सुरक्षा बलों को बातचीत होने तक अपने जगह पर रहना था.
राष्ट्रपति ट्रंप ने तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन के अनुसार इसे "अद्भुत समझौता" क़रार दिया था और सार्वजनिक तौर पर कहा था कि इस समझौते में 'बहुत बढ़िया होने की गुंजाइश' थी.

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क्या दोनों पक्ष समझौते पर कायम रहे?
अमेरिका ने ट्रंप के शासनकाल में सबसे पहले अपने सैनिकों की वापसी करनी शुरू की. उधर, तालिबान और अफ़ग़ान सरकार के बीच आमने-सामने की बातचीत सितंबर में शुरू हुई. लेकिन कभी समझौता होता हुआ नहीं दिखा.
बातचीत में प्रगति न होने के बावज़ूद, तालिबान के विरोधी लगातार यह कहते रहे कि इस समझौते से कोई आपदा नहीं आने वाली.
अफ़ग़ानिकस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ने फ़रवरी में बीबीसी को कहा कि "यह वियतनाम नहीं है.'' और ''यह गिरने वाली सरकार नहीं है."
इस जुलाई में, तालिबान के एक प्रवक्ता ने दावा किया: "हालांकि लड़ाई में हमारी स्थिति बहुत मज़बूत है. पर हम बातचीत को लेकर बहुत गंभीर हैं."
इसे ऐसे समझा जाए कि उस वक़्त केवल सप्ताह भर के भीतर तालिबान ने 10 प्रांतीय राजधानियों पर क़ब्ज़ा कर लिया था.
अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडन, जिन्होंने ट्रंप की लगभग आधी नीतियों पर असहमत होने के बावजूद, उनके कार्यकाल में हुए समझौते को बनाए रखा. उन्होंने पिछले माह प्रेस को बताया कि वे अमेरिका की एक और पीढ़ी को अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध के लिए नहीं भेजेंगे.
उन्होंने कहा था, "इस बात की संभावना बहुत कम है कि तालिबान हर चीज़ पर हावी हो जाएगा और पूरे देश पर अपना अधिकार कर लेगा."

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और बीते कुछ दिनों की घटनाओं के बावजूद, ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति जो बाइडन अपने फ़ैसले पर अड़े हुए हैं.
उन्होंने सोमवार को देश को संबोधित करते हुए कहा, "पिछले सप्ताह की घटनाओं ने यदि कुछ साबित किया है तो यही कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका की सैन्य भागीदारी अब ख़त्म करने का निर्णय सही था."
पिछले सितंबर में दुनिया की सबसे शक्तिशाली अमेरिकी सेना के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद दोहा के एक लक्ज़री होटल के बॉलरूम में तालिबान नेता मोहम्मद अब्बास स्टानिकज़ई ने एक बात कही थी. कइयों को उनकी वह बात अब कहीं सच लग रही होगी.
उस समय उन्होंने कहा था, "इसमें कोई संदेह नहीं कि हमने यह युद्ध जीत लिया है." उन्होंने फिर कहा, "इसमें कोई शक नहीं है."
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