तालिबान-अफ़ग़ानिस्तान वार्ता: तालिबान इस्लामिक क़ानून को लेकर अडिग, वार्ता अब भी जारी

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अफ़ग़ानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच क़तर में पहली बार शांति वार्ता हो रही है, इस बीच अफ़ग़ानिस्तान की सरकार ने तालिबान से मानवीय संघर्ष विराम लागू करने का आह्वान किया है.
सरकार के प्रतिनिधित्व मंडल का नेतृत्व कर रहे अब्दुल्ला अब्दुल्ला ने ज़ोर देकर कहा कि "युद्ध से किसी ने जीत हासिल नहीं की."
तालिबान ने युद्धविराम संधि का ज़िक्र नहीं किया, बल्कि दोहराया कि अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक क़ानून लागू होना चाहिए.
अमरीका ने दोनों पक्षों को समझौते पर पहुंचने के लिए प्रोत्साहित किया. साथ ही कहा, "पूरी दुनिया चाहती है कि आपके बीच समझौते हों."
अफ़ग़ानिस्तान में पिछले चार दशकों से संघर्ष चल रहा है, जिसमें दसियों हज़ार लोगों की जान गई है.
शनिवार को ऐतिहासिक वार्ता शुरू हुई थी. ये वार्ता न्यूयॉर्क में 9/11 को हुए अल-क़ायदा के भीषण हमले की 19वीं बरसी के एक दिन बाद हुई थी. इसी के बाद अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका ने सैन्य अभियान शुरू किया था.
अमरीका के इतिहास में अफ़ग़ानिस्तान का संघर्ष में सबसे लंबा रहा है.
ये वार्ता महत्वपूर्ण क्यों है?
तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान सरकार के प्रतिनिधियों के बीच ये पहली सीधी वार्ता है. चरमपंथी अब तक सरकार से मुलाक़ात करने से इनकार करते रहे थे और सरकार को कमज़ोर और अमरीकी "कठपुतली" बताते रहे थे.
अफ़ग़ानिस्तान में संघर्ष अब भी जारी है, और सरकार का कहना है कि फ़रवरी से 12,000 नागरिकों की जान गई है.
शनिवार को वार्ता की शुरुआत के वक़्त अफ़ग़ानिस्तान पीस काउंसिल के प्रमुख अब्दुल्ला अब्लदुल्ला ने तुरंत संघर्ष विराम लागू करने का आह्वान किया. उन्होंने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "लोगों के दिमाग़ में सबसे पहला मुद्दा ये है कि हिंसा में महत्वपूर्ण रूप से कमी आए."

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उन्होंने कहा कि उनका प्रतिनिधिमंडल एक ऐसे राजनीतिक सिस्टम का प्रतिनिधित्व कर रहा है, जिससे देश की सांस्कृतिक, सामाजिक और जातीय पृष्ठभूमि से आने वाले लाखों पुरुष और महिलाएं जुड़े हैं और "वो इस दर्द और युद्ध के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद" कर देना चाहते हैं.
इस बीच तालिबान के नेता मुल्ला बरादर अखुंद ने उम्मीद जताई कि वार्ता "धैर्य के साथ आगे बढ़ेगी."
उन्होंने कहा कि वो चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान "स्वतंत्र और एकजुट रहे और...वहां एक इस्लामी व्यवस्था हो जिसमें देश की सभी जनजातियां और जातियां बिना किसी भेदभाव के रह सकें."
अमरीका ने फ़रवरी में तालिबान के साथ समझौता किया था और वार्ता को "एक बहुत महत्वपूर्ण" अवसर बताया.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने कहा था, "मुझे लगता है कि आज यहां बैठा हर व्यक्ति जानता है कि इस क्षण तक पहुंचने के लिए कड़ी मेहनत और त्याग करना पड़ा."
"पूरी दुनिया चाहती है कि आप कामयाब हों और भरोसा कर रही है कि आप कामयाब होंगे."

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प्रतिनिधियों के लिए एक भावनात्मक दिन
यहां पहुंचे कई अफ़ग़ानियों ने इस दिन को एक भावनात्मक दिन बताया.
इस दिन को उस युद्ध के समापन की शुरुआत के तौर पर देखा गया जिसने अफ़ग़ानिस्तान के हर हिस्से और यहां के हर परिवार को छुआ.
दोनों पक्षों ने कहा कि पहले दिन की चर्चा उम्मीद से बेहतर रही ,लेकिन दूसरे अन्य सवालों पर गहरे मतभेद रहे - जिनमें संघर्ष विराम का वक़्त, राजनीतिक प्रणाली का स्वरूप और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमा शामिल है.
लेकिन किसी भी और चीज़ से ज़्यादा सबसे बड़ा मसला है कि युद्ध को कैसे ख़त्म किया जाए, जिसे दुनिया का सबसे घातक संघर्ष बताया जाता है.

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समझौता होना कितना मुश्किल है?
वार्ता में हिस्सा लेने वाले हर व्यक्ति का मानना है कि ये चुनौतीपूर्ण होगा.
कई लोगों की चिंता है कि महिलाओं के अधिकारों को लेकर जो थोड़ी प्रगति हुई है, उसे खोना पड़ सकता है. एक महिला अधिकार कार्यकर्ता ने इस ओर ध्यान दिलाया कि तालिबान के प्रतिनिधिमंडल में "एक भी महिला नहीं है."
इस वार्ता में तालिबान के सामने भी एक चुनौती है. तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान के लिए अपना एक ठोस राजनीतिक दृष्टिकोण आगे रखना होगा. अब तक जिसे लेकर वो अस्पष्ट रहे हैं. वो कहते रहे हैं कि वो एक "इस्लामिक" लेकिन "समावेशी" सरकार देखना चाहते हैं.
इस बातचीत में इस बात का भी पता चलेगा कि चरमपंथी समूह 1990 के दशक के बाद से कितना बदला है, जब वो शरिया क़ानून की कठोर व्याख्या के साथ शासन करता था.
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