अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान की क़तर में शांति वार्ता शुरू, जानिए भारत पर क्या पड़ेगा असर

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इमेज कैप्शन, कहा जाता है कि अफ़गानिस्तान में तीन पीढ़ियाँ ऐसी हैं जिन्होंने अपने देश में कभी शांति नहीं देखी

महीनों की देरी के बाद, अफ़ग़ानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच पहली औपचारिक शांति वार्ता शनिवार को शुरू हो गई है.

इसका मक़सद है दो दशक से जारी जंग पर विराम लगाना, जो हज़ारों ज़िंदगियाँ छीन चुकी है.

खाड़ी देश क़तर में यह शांति वार्ता चल रही है. अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने दोनों पक्षों के बीच हो रही इस बैठक को 'ऐतिहासिक' बताया है. वे इस वार्ता के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए क़तर की राजधानी दोहा पहुँचे हैं.

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर भी ऑनलाइन माध्यम से इस कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे. भारतीय विदेश मंत्रालय ने बताया है कि मंत्रालय के संयुक्त सचिव जेपी सिंह दोहा पहुँच चुके हैं, वे इस उद्घाटन समारोह में भारतीय प्रतिनिधि के तौर पर शामिल होंगे.

माना जाता है कि भारत भी अफ़ग़ानिस्तान-तालिबान शांति वार्ता में ख़ासी दिलचस्पी रखता है और चाहता है कि दोनों के बीच बातचीत सफल साबित हो.

इस वार्ता को पहले फ़रवरी में हुए अमरीका-तालिबान सुरक्षा समझौते के बाद मार्च में शुरू होना था. लेकिन एक विवादास्पद क़ैदी की अदला-बदली पर असहमतियों और अफ़गानिस्तान में लगातार हो रही हिंसा के कारण इस वार्ता के अगले चरणों में रुकावट आई.

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इमेज कैप्शन, तालिबान और अफ़गान सरकार के बीच बहुत बाद तक क़ैदियों की रिहाई को लेकर विवाद रहा

कुछ प्रमुख अफ़गान नेताओं और अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल शुक्रवार, 11 सितंबर को काबुल से दोहा पहुँचा.

साल 2001 में 11 सितंबर को ही अल-क़ायदा ने अमरीका पर चरमपंथी हमले किए थे, जिसके बाद अमरीका ने अफ़गानिस्तान पर हमला करके तालिबान को सत्ता से हटाया था. इसने अल-क़ायदा के नेतृत्व को शरण दी हुई थी.

अफ़गानिस्तान के नेताओं के प्रतिनिधिमंडल के मुखिया अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह का कहना है कि "वे अपने यहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ न्यायपूर्ण और गरिमापूर्ण शांति चाहते हैं."

गुरुवार को, छह क़ैदियों के एक अंतिम समूह की रिहाई के बाद तालिबान ने पुष्टि की कि वे भी इस शांति वार्ता में हिस्सा ले रहे हैं.

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वार्ता से किस तरह की उम्मीदें?

यह तालिबान और अफ़गानिस्तान सरकार के प्रतिनिधियों के बीच पहली सीधी औपचारिक बातचीत है. इससे पहले तालिबान अफ़ग़ानिस्तान सरकार को 'शक्तिहीन और अमरीका की कठपुतली' बताकर, उनसे मिलने से इनकार करते रहे थे.

अब दोनों ही पक्ष राजनीतिक सुलह और हिंसा के दशकों लंबे दौर का अंत चाहते हैं जो वर्ष 1979 में सोवियत आक्रमण के साथ शुरू हुआ था.

यह बैठक जो अब हो रही है, उसे मार्च में अमरीका और तालिबान के बीच जनवरी में हुए समझौते के बाद शुरू हो जाना था, मगर अफ़गानिस्तान में जंग अब भी जारी है.

अमरीका और तालिबान के बीच समझौता, कोई शांति समझौता नहीं था, बल्कि शांति की ओर महज़ एक क़दम था.

इस समझौते में विदेशी फ़ौजों को अफ़गानिस्तान से हटाने की एक समय सीमा तय की गई थी ताकि चरमपंथियों और अफ़गानिस्तान सरकार के बीच बातचीत की प्रक्रिया शुरू की जा सके.

क़ैदियों की अदला-बदली पर दोनों पक्षों के बीच महीनों चली रस्साकशी के बाद अब यह शांति वार्ता शुरू होने जा रही है. दरअसल, तालिबान जिन क़ैदियों की रिहाई चाहता था, उनमें से अधिकांश के बारे में अफ़गान सरकार की यह राय रही कि 'वो अपने लोगों को मारने वालों को कैसे छोड़ सकते हैं.'

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: क्या तालिबान से बनेगी बात?

कुछ बड़ी चिंताएं

वहीं तालिबान और अफ़गानिस्तान शांति वार्ता को लेकर कुछ चिंताएं भी हैं. जैसे महिलाओं के अधिकारों के लिए काम कर रहे संगठनों का मानना है कि 'कहीं इस वार्ता के बाद अफ़गानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में बात जहाँ तक बढ़ी है, वो फिर से शून्य ना हो जाए.'

उन्हें डर है कि कहीं तालिबान से समझौते के बाद महिलाओं के अधिकारों को फिर से छीन ना लिया जाए क्योंकि तालिबान ने ऐसा ही किया था.

तालिबान शरिया क़ानून के बर्बर तौर तरीक़ों से शासन चलाते थे, मगर अब इस समूह का कहना है कि वो बदल गया है. लेकिन कितना? यह कोई नहीं जानता.

यह बातचीत कई महीनों तक चल सकती है क्योंकि बहुत से मुद्दों पर वार्ता के दौरान आम सहमति की ज़रूरत होगी. जबकि कई मुद्दे ऐसे हैं जिन पर तालिबान का नज़रिया अभी बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं है. जैसे क्या तालिबान लोकतांत्रिक प्रणाली का समर्थन करेगा? तालिबान वार्ताकारों के पास इसका अभी कोई सीधा जवाब नहीं है.

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उधर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह साफ़ कर दिया है कि क़रीब 18 वर्षों तक अफ़गानिस्तान में ज़ोर लगाने के बाद अब वो जल्द से जल्द अपने सैनिकों की वतन वापसी करवाना चाहते हैं.

वर्ष 2014 तक अफ़गानिस्तान में आधिकारिक तौर पर 2,400 से ज़्यादा अमरीकी सैनिकों की मौत हुई थी और अमरीका के इतिहास में अफ़गान युद्ध को सबसे लंबा युद्ध कहा जाता है.

फ़रवरी में अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने तालिबान से अपील की थी कि "अल-क़ायदा और दूसरे चरमपंथी संगठनों से संबंध तोड़ने के अपने वादों को निभाइये, आईएसआईएस से लड़ना जारी रखिये और अपने देश में हिंसा को कम करने के लिए लगातार प्रयास करते रहिये."

मगर इस शांति वार्ता के शुरू होने पर कुछ लोग चिंतित हैं कि कहीं इस वार्ता से तालिबान को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व ना मिल जाये.

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इमेज कैप्शन, अमरीका के लिए अफ़गान युद्ध बहुत महंगा साबित हुआ. आँकड़े बताते हैं कि साल 2014 में संयुक्त मिशन रोके जाने के बाद भी तालिबान के हमलों की संख्या बढ़ी

भारत के लिए बातचीत क्यों अहम है?

भारत अफ़गानिस्तान को फिर से उठ खड़ा होने में मदद कर रहा है लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि 'अफ़गानिस्तान में तालिबान का मज़बूत होना भारत के लिए चिंता का विषय हो सकता है.'

भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक़, अफ़गानिस्तान में क़रीब 1700 भारतीय मौजूद हैं जो वहाँ स्थित बैंकिंग, सुरक्षा और आईटी सेक्टर की कंपनियों के अलावा अस्पतालों में काम करते हैं.

समझौते के तहत भारत ने अफ़गानिस्तान में बड़े पैमाने पर निवेश किया है. अफ़गानिस्तान का नया संसद भवन बनाने के अलावा भारत वहाँ बांध, सड़क, शिक्षण संस्थान और अस्पताल बनाने की योजनाओं से जुड़ा है.

भारत अफ़गानिस्तान को कृषि, विज्ञान, आईटी और शरणार्थी पुनर्वास के कार्यक्रमों में भी सहयोग दे रहा है.

2016 के समझौते के तहत ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफ़गान सीमा तक रेल चलाने की योजना है. भारत इस योजना को सफल बनाने में भी मदद करना चाहता है. ऐसे में यह शांति वार्ता विफल रहती है या उसके नतीजे भारत के अनुकूल नहीं रहते, तो भारत के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

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