सऊदी अरब का ये फ़ैसला अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान के लिए क्यों है बुरी ख़बर

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- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अफ़ग़ानिस्तान में सऊदी अरब दूतावास के अधिकारियों और कर्मचारियों ने पिछले हफ़्ते काबुल छोड़ दिया.
तालिबान सरकार में विदेश मंत्रालय के एक सूत्र ने बीबीसी पश्तो से बातचीत में इस बात की पुष्टि की है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने भी सूत्रों के हवाले से लिखा है कि सऊदी दूतावास के अधिकारियों और कर्मचारियों को सुरक्षा कारणों से पाकिस्तान भेज दिया गया है.
रॉयटर्स ने एक राजनयिक सूत्र के हवाले से लिखा है कि सऊदी राजनयिक पिछले हफ़्ते काबुल छोड़कर पाकिस्तान चले गए हैं क्योंकि काबुल में उन पर हमले का ख़तरा था.
इससे पहले मीडिया में इस तरह की ख़बरें थीं कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) समेत कई देशों के राजनयिकों ने काबुल छोड़ दिया है.
हालाँकि तालिबान सरकार के विदेश मंत्रालय का कहना है कि यूएई के राजनयिक तो पिछले दो साल से काबुल में रह ही नहीं रहे हैं.
तालिबान का कहना है कि दूसरे किसी देश के राजनयिकों के काबुल छोड़ने की बात महज़ अफ़वाह है.
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तालिबान का क्या कहना है?
तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहउल्लाह मुजाहिद ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "सऊदी दूतावास के कुछ राजनयिक अधिकारी ट्रेनिंग के लिए अपने देश गए हैं और वो जल्द ही वापस काबुल आ जाएँगे."
उन्होंने इस बारे में और कुछ बताने से इनकार कर दिया और जब उनसे पूछा गया कि सऊदी अरब के सारे राजनयिक एक ही साथ ट्रेनिंग करने क्यों चले गए, तब भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
अफ़ग़ानिस्तान के कई लोग उमरा (मुसलमानों की एक धार्मिक यात्रा जो सऊदी अरब के मक्का में जाकर की जाती है) पर जाने के लिए सऊदी अरब दूतावास में वीज़ा के लिए आवेदन कर रहे हैं, लेकिन अब सऊदी दूतावास में उनकी मदद करने वाला कोई नहीं है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने जब पाकिस्तान से इस बारे में जानना चाहा, तो पाकिस्तानी अधिकारियों ने उन्हें इस्लामाबाद स्थित सऊदी अरब दूतावास से संपर्क करने को कहा.
लेकिन इन सब में सऊदी अरब की तरफ़ से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.

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सऊदी वाणिज्य दूतावास भी बंद
दूसरी तरफ़ तालिबान विदेश मंत्रालय के एक दूसरे सूत्र ने बीबीसी पश्तो को बताया कि काबुल स्थित सऊदी काउंसुलेट (वाणिज्य दूतावास) भी सोमवार को बंद कर दिया गया है.
इस सूत्र का कहना है कि तालिबान को दूतावास बंद किए जाने के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है.
उन्हें अनौपचारिक तौर पर सिर्फ़ यह बता दिया गया है कि सऊदी अरब समेत कई दूसरे दूतावास के राजनयिकों ने काबुल छोड़ दिया है.
बीबीसी पश्तो सेवा के संवाददाता सईद अनवर का कहना है कि भले ही तालिबान प्रवक्ता कह रहे हैं कि सऊदी राजनयिक ट्रेनिंग के लिए अपने मुल्क गए हैं, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में ज़्यादातर लोगों का यही मानना है कि सुरक्षा कारणों से उन लोगों ने काबुल छोड़ दिया है.
रूसी दूतावास ने काबुल में अपनी मौजूदगी कम ज़रूर कर दी है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के लिए रूस के विशेष दूत ज़मीर काबलोव ने हाल ही में कहा कि रूस का फ़िलहाल काबुल स्थित अपना दूतावास बंद करने का कोई इरादा नहीं है.
2021 में अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ दिया था, जिसके बाद अगस्त 2021 में तालिबान एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर क़ाबिज़ हो गए थे.
इसके बाद से कई देश पाकिस्तान और क़तर से ही अफ़ग़ानिस्तान का अपना दूतावास को चला रहे हैं. अमेरिका और पश्चिमी देशों ने अभी तक काबुल में अपने दूतावास दोबारा नहीं खोले हैं.

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काबुल में सुरक्षा का मुद्दा
दो दिसंबर, 2022- काबुल में पाकिस्तान के राजदूत ओबैदुर्रहमान निज़ामी पर हमला हुआ. इसमें उनको तो कोई नुक़सान नहीं हुआ, लेकिन उनके एक सुरक्षाकर्मी इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए.
उसी दिन हिज़्ब-ए-इस्लामी के दफ़्तर पर कुछ बूंदक़धारियों ने उस समय हमला किया था, जब हिज़्ब-ए-इस्लामी के प्रमुख गुलबुद्दीन हिकमतयार जुमे का ख़ुतबा दे रहे थे.
उनके सुरक्षाकर्मियों ने दोनों हमलावरों को मार दिया था. यह हमलावर भी आईएसआईएस-ख़ोरासान गुट के बताए गए थे.
12 दिसंबर, 2022- शहर के बीचों-बीच स्थित एक होटल में रह रहे चीनी नागरिकों पर हमला हुआ. इस हमले के बाद आईएसआईएस-ख़ोरासान गुट ने हमले की ज़िम्मेदारी लेते हुए बयान जारी किया और कहा कि उन्होंने बदले की कार्रवाई के तहत चीनी नागिरकों को निशाना बनाया है.
इस्लामिक स्टेट से जुड़े मुखपत्र अल-नबा ने 15 दिसंबर को लिखा कि चीन के शिनजियांग प्रांत में वीगर मुसलमानों पर कथित चीनी ज़ुल्म का बदला लेने के लिए काबुल में मौजूद चीनी नागरिकों पर हमला किया गया था.
05 सितंबर, 2022- काबुल स्थित रूसी दूतावास के प्रवेश द्वार पर एक आत्मघाती हमलावर ने ख़ुद को उड़ा दिया था, जिसमें दो रूसी नागरिक और चार अफ़ग़ान नागरिक मारे गए थे.
आईएसआईएस-ख़ोरासान गुट ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी.
तालिबान का कहना है कि वो इस्लामिक स्टेट और दूसरे ख़तरों से निपटने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और वो अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे विदेशियों को पूर्ण सुरक्षा देने के लिए हर संभव क़दम उठाएँगे.
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आईएसआईएस-ख़ोरासान
ख़ुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले चरमपंथी संगठन (आईएस) ने साल 2015 में घोषणा की थी कि उसने अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान में अपनी शाखा खोली है.
इस शाखा का नाम आईएसआईएस-ख़ोरासान प्रांत रखा गया था.
तालिबान के एक पूर्व कमांडर हाफ़िज़ सईद ख़ान को इस शाखा का प्रमुख बनाया गया था.
आईएस के मुताबिक़ इसमें अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और 'आस-पास' के अन्य इलाक़े आते हैं.
यह संगठन उसी समय से अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान और अल-क़ायदा को चुनौती दे रहा है.

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आईएसआईएस-ख़ोरासान पर क़ाबू पाने में नाकामी क्यों
तालिबान से पहले अफ़ग़ानिस्तान सरकार में चार प्रांतों के गवर्नर रह चुके वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हलीम फ़िदाई कहते हैं कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान के नागरिकों और विदेशी दोनों को सुरक्षा देने में नाकाम रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि इस समय अफ़ग़ानिस्तान में सिर्फ़ आईएस-ख़ोरासान ही नहीं, बल्कि दूसरे कई चरमपंथी संगठन भी सक्रिय हैं.
उनके अनुसार तालिबान की उन सब संगठनों से वैचारिक सहमित है, जिसके कारण वो उन संगठनों के ख़िलाफ़ निर्णायक कार्रवाई नहीं करते हैं.
उनका कहना है कि तालिबान के अंदर ही इसको लेकर मतभेद है. अफ़ग़ानिस्तान की सरकार के ख़िलाफ़ तालिबान के साथ मिलकर आईएस-ख़ोरासान और दूसरे संगठनों ने लड़ाई (2001-2021) की थी, इसलिए अब तालिबान सत्ता में आने के बाद उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं कर सकता है.
उनका कहना है कि तालिबान पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रहे हैं. उनका आरोप है कि पाकिस्तान की सेना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफ़ग़ानिस्तान को पूरी तरह अलग-थलग करना चाहती है, ताकि उसका अपना एजेंडा लागू हो सके.
अफ़ग़ानिस्तान में भारत के राजदूत रह चुके वरिष्ठ राजनयिक राकेश सूद भी कहते हैं कि सिर्फ़ आईएसआईएस-ख़ोरासान ही नहीं, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान में इस समय यूएन के ज़रिए चरमपंथी क़रार दिए गए क़रीब 20 संगठन सक्रिय हैं.
राकेश सूद का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय चरमपंथी संगठनों से कैसे निपटा जाए, इसको लेकर तालिबान में एक राय नहीं है.
उनके अनुसार आईएसआईएस-ख़ोरासान समेत दूसरे चरमपंथी संगठनों पर क़ाबू पाने में नाकामी का कारण तालिबान की वैचारिक समानता भी है और उन संगठनों के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई करने की उनका क्षमता भी शक के दायरे में है.

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तालिबान की मान्यता और होगी मुश्किल
तालिबान ने 90 के दशक में (1996) जब पहली बार अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता हासिल की थी, तो उस समय सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान केवल तीन मुल्कों ने उन्हें मान्यता दी थी.
2021 में उनके दोबारा सत्ता में आने के बाद से अभी तक किसी भी देश ने तालिबान को आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दी है लेकिन पाकिस्तान, रूस, चीन, तुर्की और ईरान समेत कुछ देशों ने काबुल में अपनी राजनियक मौजूदगी बनाए रखी है.
तालिबान पिछले डेढ़ साल से अंतरराष्ट्रीय दुनिया से मंज़ूरी की गुहार लगा रहा है, लेकिन अभी तक उसे इसमें नाकामी ही मिली है.
हलीम फ़िदाई के अनुसार सऊदी अरब के इस ताज़ा फ़ैसले के बाद तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलना लगभग असंभव हो गया है.
हलीम फ़िदाई का मानना है कि अगर कोई देश तालिबान को मान्यता देने के बारे में सोचेगा भी तो वो उसके ख़िलाफ़ जाएगा क्योंकि तालिबान पहले की तुलना में महिलाएँ, अल्पसंख्यक और दूसरे अफ़ग़ान नागरिकों के मानवाधिकार के मामले में और ज़्यादा कट्टर नज़र आ रहे हैं.

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तालिबान शासन के लिए संकट की घड़ी
राकेश सूद भी कहते हैं कि सऊदी अरब का यह फ़ैसला तालिबान के लिए बहुत बुरी ख़बर है.
उनके अनुसार, 2021 में तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय जगत को जो भी विश्वास दिलाया था, उनमें से एक भी उन्होंने पूरे नहीं किए हैं.
राकेश सूद के अनुसार तालिबान को अभी भले ही कोई क़ानूनी तौर पर स्वीकार नहीं करता है, लेकिन दूतावास की मौजूदगी से अंतरराष्ट्रीय दुनिया का तालिबान से संपर्क बना रहता है.
उनके अनुसार सुरक्षा कारणों से अगर दूतावास के लोग काबुल छोड़ने लगेंगे, तो तालिबान से किसी भी तरह का संपर्क टूट जाएगा और ऐसे में मान्यता मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है.

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