पाकिस्तान: इस्लामाबाद तक कैसे पहुँचा चरमपंथी हमले का ख़तरा?

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- Author, इक़बाल अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान में कई दूतावास ने एक एलर्ट जारी कर अपने नागरिकों से अपील की है कि वो राजधानी इस्लामाबाद में अत्यधिक सावधान रहें और ख़ासकर मैरियट होटल बिल्कुल ना जाएं.
रविवार को अमेरिकी और ब्रितानी दूतावास ने बयान जारी किया था. सोमवार को सऊदी अरब और ऑस्टेलियाई दूतावास ने भी इसी तरह का एक बयान जारी किया.
बयान में मुख्य तौर पर यही कहा गया है कि चरमपंथी संगठन इस्लामाबाद में हमले कर सकते हैं और मैरियट होटल पर ख़ास तौर पर चरमपंथी हमले की आशंका जताई गई है.
कई और दूतावास ने बयान जारी कर अपने नागरिकों से अपील की है कि वो राजधानी में कम से कम बाहर निकलें और ख़ासकर एक जनवरी, 2023 तक बहुत ज़रूरी काम हो तभी घर से बाहर निकलें.
इस्लामाबाद पुलिस ने भी गृहमंत्रालय के निर्देश पर पूरे इलाक़े और ख़ासकर राजधानी के रेड ज़ोन में सुरक्षा के इंतज़ाम और सख़्त कर दिए हैं. रेड ज़ोन में स्थित सरकारी इमारतों के बाहर तैनात फ़्रंटियर कॉन्सटेबुलरी और रेंजर्स की संख्या में इज़ाफ़ा कर दिया गया है.
दूतावास आम तौर पर अपने नागिरकों के लिए इस तरह के एलर्ट जारी करते रहते हैं.
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इस्लामाबाद को लेकर आए इस अलर्ट के बारे में बीबीसी हिंदी ने पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ पीस स्टडीज़ के निदेशक मोहम्मद आमिर राना से बात की.
उन्होंने कहा कि इस एडवाइज़री को दूसरे आम अलर्ट की तरह नहीं देखा जाना चाहिए.
23 दिसंबर को इस्लामाबाद में एक पुलिस चेकपोस्ट पर आत्मघाती हमला हुआ था जिसमें एक पुलिसकर्मी और हमलावर समेत तीन लोगों की मौत हो गई थी और छह लोग घायल हुए थे.
चरमपंथी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने हमले की ज़िम्मेदारी ली थी.
गृहमंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार पाकिस्तान में आतंकवाद से निपटने के लिए बनाई गई संस्था नेक्टा (नेशनल काउंटर टेरोरिज़्म ऑथोरिटी) ने इस तरह की कई रिपोर्ट्स में प्रतिबंधित संगठन टीटीपी द्वारा चरमपंथी हमले की तैयारी की बात कही गई है.
कुछ दिन पहल पाकिस्तान के गृह मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति की एक बैठक में नेक्टा के अधिकारी ने बताया था कि टीटीपी बातचीत की आड़ में पाकिस्तान के अलग-अलग शहरों में ख़ुद को मज़बूत कर रही है.
मोहम्मद आमिर राना के अनुसार इन ख़ुफ़िया रिपोर्ट को दूतावास से शेयर की गईं थीं जिनके बाद ही कई दूतावासों ने इस तरह की एडवाइज़री जारी की है.
क्वेटा, वाना और बन्नू में भी इस साल चरमपंथी हुए हैं. मोहम्मद आमिर राना ने कहा कि उनकी संस्थान ने अभी एक रिपोर्ट जारी की है जिसके अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद (अगस्त, 2021) से पाकिस्तान में चरमपंथी हमलों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है.

पाकिस्तान में चरमपंथी हमले
- अगस्त, 2021 से अगस्त 2022 के बीच पाकिस्तान में 250 से ज़्यादा चरमपंथी हमले, 433 की मौत
- अगस्त 2020 से अगस्त 2021 के बीच 165 चरमपंथी हमले जिनमें 294 लोग मारे गए.
- पिछले एक साल में चरमपंथी हमलों में 51 फ़ीसद की बढ़ोतरी हुई
स्रोत - पाकिस्तान इंस्टिट्यूट ऑफ़ पीस स्टडीज

उधर अमेरिका ने ख़ास तौर पर अपने नागिरकों को कहा है कि वो मैरियट होटल में ना रुकें और वहां ना जाएं. इसका कारण बताते हुए मोहम्मद आमिर राना कहते हैं कि यह अमेरिकी होटल चेन का हिस्सा है और इस्लामाबाद में रहने वाले अमेरिकी और दूसरे दूतावास के ज़्यादातर लोग यहां ठहरते हैं या यहां खाने-पीने के लिए जाते हैं.
साल 2008 में भी इस होटल पर चरमपंथी हमला हुआ था जिसमें 50 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
पेशावर में तालिबान की उगाही

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पाकिस्तान में सुरक्षा मामलों की जानकार और सेना पर क़रीब से नज़र रखने वाली आयशा सिद्दिक़ा ने बीबीसी हिंदी के पॉडकास्ट दिनभर से बातचीत के दौरान कहा कि यह सच है कि हाल में चरमपंथी हमलों में इज़ाफ़ा हुआ है लेकिन यह मसला दरअसल सरकार की नीति का है.
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उनके अनुसार अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका के चले जाने के बाद तालिबान का आना सबसे बड़ा कारण है.
आयशा सिद्दिक़ा कहती हैं कि पेशावर में लगभग हर कारोबारी टीटीपी को पैसे देने के लिए मजबूर है. लोग इसके ख़िलाफ़ विरोध भी कर रहे हैं लेकिन सरकार उनको सुरक्षा देने में नाकाम है.
वो कहती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में बैठे तालिबान से पाकिस्तानी सरकार की दोस्ती है जिसके कारण पाकिस्तान तालिबान को कोई सख़्त संदेश नहीं देता है.
हालांकि मोहम्मद आमिर राना का कहना है कि पाकिस्तान की सरकार अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार को अब सख़्त संदेश भेज रही है.
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सीज़फ़ायर के दौरान टीटीपी हुई मज़बूत

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राशिद रहमान के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता संभालने के बाद टीटीपी की गतिविधियां पाकिस्तान में बहुत ज़्यादा बढ़ गईं हैं.
उनके अनुसार 2014 के बाद से टीटीपी के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी सेना ने जब ऑपरेशन शुरू किया तो टीटीपी के बहुत सारे चरमपंथी तो अफ़ग़ानिस्तान चले गए लेकिन उनके बहुत सारे स्लीपर सेल पाकिस्तान में ही रह गए थे.
वो कहते हैं, "अब जब टीटीपी के लोग अफ़गानिस्तान से पाकिस्तान वापस आ गए हैं तो वो उन लोगों की मदद से चरमपंथी हमले तेज़ कर दिए हैं और अब ऐसा लगने लगा है कि वो राजधानी इस्लामाबाद तक पहुँच गए हैं."
राशिद रहमान के अनुसार सेना ने ऑपरेशन शुरू तो किया लेकिन वो टीटीपी को पूरी तरह ख़त्म नहीं कर सकी.
उनके अनुसार सेना और सिविलियन सरकार के बीच तालमेल की भी पूरी कमी थी. उनके अनुसार एक नेशनल एक्शन प्लैन बनाया गया था लेकिन ज़मीन पर उसको अमल में नहीं लाया जा सका और यही कारण है कि आज टीटीपी फिर इतनी शक्तिशाली हो गई है.

टीटीपी के बड़े हमले
- 2008 में इस्लामाबाद में मैरियट होटल पर बमों से हमला
- 2009 में पूरे सेना के मुख्यालयों समेत पूरे पाकिस्तान में हमले
- 2012 में नोबेल विजेता मलाला युसूफ़ज़ई पर हमला
- 2014 में पेशावर में आर्मी स्कूल पर भीषण हमला
- इस हमले में 131 स्टूडेंट्स समेत 150 लोगों की मौत
- पूरी दुनिया में इस हमले की भारी निंदा हुई थी

ज़िम्मेदार कौन?

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राशिद रहमान के अनुसार इस दौरान पाकिस्तान में कई सरकारें आईं इसलिए किसी एक सरकार को इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. उनका मानना है कि नेक्टा भी ज़मीन पर प्रभावी तरीक़े से काम करने में नाकाम रही है.
मोहम्मद आमिर राना के अनुसार भी पिछले एक साल में जो चरमपंथी हमले हुए हैं उनमें सरकार के बदलने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा है. इमरान ख़ान के समय में भी हमले हुए और जब शहबाज़ शरीफ़ (2022) की सरकार बनी उसके बाद से भी हमले हो रहे हैं.
हालांकि आयशा सिद्दिक़ा और राशिद रहमान इस बात पर एकमत हैं कि मौजूदा संकट का एक कारण यह भी है कि केंद्र में शहबाज़ शरीफ़ की सरकार है जबकि ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह में इमरान ख़ान की पार्टी की सरकार है और दोनों के बीच समन्वय की सख़्त कमी है.
इमरान ख़ान का मानना था कि चरमपंथ को सैन्य तरीक़े से हल नहीं किया जा सकता है और इसके लिए बातचीत का रास्ता अपनाया जाना चाहिए.
राशिद रहमान का मानना है कि इमरान ख़ान की सरकार ने अफ़ग़ान तालिबान की मदद से टीटीपी से बातचीत शुरू की उसका नतीजा यह निकला कि टीटीपी ने आहिस्ता-आहिस्ता पाकिस्तान में अपनी जड़ें मज़बूत कर लीं.
शहबाज़ शरीफ़ की सरकार बनने के बाद शुरुआत में टीटीपी से बातचीत जारी रही लेकिन बहुत जल्द सरकार को समझ में आगया कि टीटीपी की मांगों को मानना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है और फिर टीटीपी ने सीज़फ़ायर रद्द कर दी और चरमपंथी हमले शुरू कर दिए.
क्या किया जाना चाहिए?

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राशिद रहमान के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में दख़ल देने की क़ीमत पाकिस्तान अब तक चुका रहा है. उनके अनुसार अब तक का अनुभव बताता है कि टीटीपी के लोग इतने कट्टर हैं कि उनसे बातचीत करने से कुछ हासिल नहीं होगा.
आयशा सिद्दिक़ा भी मानती हैं कि टीटीपी पर क़ाबू पाने के लिए अफ़ग़ानिस्तान तालिबान से भी किसी तरह की मदद की कोई उम्मीद नहीं है.
उनके अनुसार अफ़ग़ान तालिबान के अंदर ही क़ंधारी और हक़्क़ानी गुट मौजूद हैं जो एक दूसरे को देखना नहीं चाहते हैं.
आयशा सिद्दिक़ा कहती है, "अफ़ग़ानिस्तान में कुछ इलाक़ों में इस्लामिक स्टेट (आईएस) तो कुछ इलाक़ों में अल-क़ायदा या दूसरे चरमपंथी संगठन सक्रिय हैं. ऐसे में कोई ऐसा नहीं है जिसका पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण हो तो फिर वहां किससे बात की जाए."
राशिद रहमान और आयशा सिद्दिक़ा दोनों का ही मानना है कि चरमपंथियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई के अलावा शायद दूसरा कोई विकल्प फ़िलहाल नहीं है.
टीटीपी क्या है?
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान पिछले 14 साल से देश में कड़े इस्लामी क़ानून लागू करने के लिए लिए लड़ रही है. टीटीपी चाहती है कि सरकार क़ैद में डाले गए उसके सदस्यों को रिहा करे और पहले के जनजातीय इलाक़ों में सेना की मौजूदगी घटाए.
चूंकि इन इलाक़ों में टीटीपी अपना वर्चस्व बढ़ाने में लगी है इसलिए वो इन इलाक़ों में फ़ौज नहीं चाहती. टीटीपी यहां अपना हुकूमत चलाना चाहती है और इस वजह से फ़ौज से उसका टकराव होता रहता है.
टीटीपी को पाकिस्तान का तालिबान कहा जाता है. 2007 में बने इस संगठन के तहत कई छोटे-छोटे ग्रुप हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सक़लैन इमाम कहते हैं, ''तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान कोई एक संगठन नहीं है. इसमें छोटे-छोटे कई गुट हैं. देश के फ़ाटा और पड़ोसी ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह इलाक़े में ये पाकिस्तान का असर कम करना चाहती है. पाकिस्तान सरकार चाहती है कि इन्हें शांत करा कर इनका असर कम किया जाए.
वो कहते हैं, ''इसके लिए इसने टीटीपी के सदस्यों को स्वात, बाजौर और कुर्रम एजेंसियों में इन्हें बसाना भी शुरू किया लेकिन वहां उनका शिया पठानों जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों से टकराव होने लगा. टीटीपी ने अल्पसंख्यकों को निशाना भी बनाना शुरू किया. जिससे पाकिस्तान सरकार को एक बार फिर इनके ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाना पड़ा.''
कुल मिलाकर टीटीपी पाकिस्तान में इस्लामी साम्राज्य स्थापित करना चाहती है. इसके लिए उसे पाकिस्तान की मौजूदा सत्ता को उखाड़ फेंकना होगा. लिहाज़ा पाकिस्तान की सरकार और सेना से उसका टकराव लाज़िमी है.
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