इमरान ख़ान और फ़ौज 'सेम पेज' के दावे के बावजूद आमने-सामने कैसे आ गए

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- Author, सहर बलोच
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
पाकिस्तान की राजनीति में सिविल-मिलिट्री संबंध हमेशा से बहस का मुद्दा रहा है और हर दौर में राजनीतिक नेतृत्व व सैन्य प्रशासन के संबंध में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं.
पिछले एक दशक से राष्ट्रीय राजनीति में सिविल-मिलिट्री के इस 'लव एंड हेट' रिलेशन में एक और शब्दावली 'एक पेज पर' होने का इस्तेमाल चर्चा में आई.
पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के दल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने इस 'सेम पेज' यानी 'एक साथ, एक राय' की शब्दावली को बहुत अधिक इस्तेमाल किया.
साल 2011 में मीनार-ए-पाकिस्तान में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की जनसभा के दृश्य कुछ लोगों को याद होंगे. उस जनसभा को राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर पीटीआई के उत्कर्ष की शुरुआत भी कहा जाता है.
उस जनसभा के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी आम हुई थी कि इमरान ख़ान को सेना का आशीर्वाद प्राप्त हो गया है.
साल 2018 के आम चुनाव में पीटीआई (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़) के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा और पंजाब में सरकार बनाने में सफलता के बाद जब इमरान ख़ान प्रधानमंत्री चुने गए तो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ने उनको 'सेलेक्टेड' की उपमा दी जिसका मतलब यह था कि उनको जनता ने नहीं बल्कि सेना ने चुना है.
बिलावल का इशारा फ़ौज की ओर था. अगले तीन साल के दौरान प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कई बार सेना के साथ अच्छे संबंध का दावा भी किया और उसका बचाव भी.
इमरान ख़ान और उनकी पार्टी ने खुलकर सेना को समर्थन का इज़हार किया और मीडिया व ख़बरों में सिविल व मिलिट्री नेतृत्व को 'एक पेज पर' बताया जाता रहा.
इमरान और फ़ौज के संबंधों में 'दरार'

राष्ट्रीय सियासी इतिहास पर नज़र दौड़ाएं तो फ़ौज का जो समर्थन पीटीआई के हिस्से में आया, ऐसा किसी और दल को कभी नहीं मिला और इस बात का दावा शुक्रवार को प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान भी किया.
मगर पीटीआई और फ़ौज के 'एक पेज पर' होने के दावे में परिवर्तन के संकेत पिछले साल के अंत में उस समय सामने आने शुरू हुए जब उस वक्त के डीजी आईएसआई लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद की जगह नए मुखिया की तैनाती का मामला सामने आया.
और 'एक पेज पर' होने के दावे में दरार पैदा होती गई और फिर यह मामला इस साल अप्रैल मैं प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के सत्ता से बाहर होने पर आकर रुका.
इस परिस्थिति में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पहले दबे शब्दों में और फिर खुलेआम फ़ौज के शीर्ष नेतृत्व को इस राजनीतिक झटके में शामिल बताया.
कभी 'न्यूट्रल' तो कभी किसी और शब्द का सहारा लेकर इमरान ख़ान ने संस्था को आलोचना का निशाना बनाना शुरू किया तो यह स्पष्ट हो चुका था कि अब वह 'एक पेज पर' होने का दावा बाक़ी नहीं रहा.

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हालात 'टकराव' तक पहुंचे कैसे?

हाल ही में पीटीआई चेयरमैन इमरान ख़ान और दूसरे नेताओं की ओर से शीर्ष फ़ौजी अफ़सरों के नाम लेकर उन पर गंभीर आरोप लगाया जाना और इसकी प्रतिक्रिया में असाधारण तौर पर आईएसआई के मुखिया की ओर से एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस ने इस मामले पर मुहर लगा दी.
लेकिन यहां कुछ सवाल उभरते हैं कि वही इमरान ख़ान जो कुछ समय पहले तक आर्मी चीफ़ जनरल क़मर जावेद बाजवा के लोकतंत्र प्रेम पर लट्टू थे और उनका दल संस्था के साथ होने का दम भरते नहीं थकता था, आख़िर क्यों इस हद तक नाराज़ हुए?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए बीबीसी ने कुछ वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों से बात की है.
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक नुसरत जावेद के अनुसार, "हालात इस हद तक ऐसे पहुंचे कि इमरान ख़ान की सरकार के दौरान आम जनता निराशा प्रकट कर रही थी, आर्थिक स्थिति बदतर होती जा रही थी और बात नेतृत्व पर आ गई. इमरान ख़ान को इस दौरान पूरी तरह यह मालूम था कि उनके बारे में सैन्य नेतृत्व क्या कह रहा है और क्या कर रहा है."
उनका कहना था, ''इसकी एक कड़ी जुड़ती है मार्च 2021 से जब पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के यूसुफ रज़ा गिलानी मुल्तान से चुनाव जीत गए थे. चुनाव आयोग ने 2021 के सीनेट चुनाव के लिए गिलानी के नामांकन पत्र को मंज़ूर करते हुए सत्तारूढ़ दल की ओर से उठाई गई आपत्तियों को रद्द कर दिया था."
उच्च सदन में गिलानी की जीत पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने आरोप लगाया था कि 'सीनेट चुनाव में पैसा चला है' क्योंकि चुनाव से कुछ दिन पहले ही एक वीडियो सामने आया था जिसमें यूसुफ रज़ा गिलानी के पुत्र अली हैदर गिलानी कथित तौर पर पीटीआई सदस्यों को वोट रद्द करवाने का तरीक़ा बता रहे थे."
नुसरत जावेद कहते हैं, "इमरान ख़ान को समझ आ गया था कि यह सैन्य नेतृत्व की ओर से किया गया है."

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'पाकिस्तान की राजनीति में सिर्फ़ एक बॉस है'

पत्रकार सिरिल अल्मीडा कहते हैं, "पाकिस्तान में नागरिक और सैन्य नेतृत्व के बीच होने वाली झड़पों की बुनियाद एक ही है कि राजनीति में एक समय में एक ही बॉस हो सकता है. देर सवेर इस बात का अंदाज़ा सभी राजनीतिज्ञों को हो जाता है और ऐसा ही कुछ इमरान ख़ान के मामले में भी हुआ है."
उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा, "ऊपरी तौर पर तो इमरान ख़ान और फ़ौज के बीच विवाद डीजी आईएसआई की तैनाती पर हुआ, लेकिन वास्तव में इसका संबंध इस बात से भी है कि अगला आर्मी चीफ़ कौन होगा?'
पत्रकार सिरिल अल्मीडा का कहना है, "इमरान ख़ान और सेना अध्यक्ष जनरल क़मर जावेद बाजवा के बीच इस बात पर सहमति थी कि जनरल बाजवा इमरान ख़ान को प्रधानमंत्री बनवाएंगे और इमरान ख़ान बदले में जनरल बाजवा को सेवा विस्तार देंगे और ऐसे ही चलता रहेगा."
वह कहते हैं कि इस तरह के समझौतों में हुआ ये कि, "क्योंकि इमरान ख़ान भविष्य का सोचते हैं तो उन्होंने अपने आने वाले पांच साल की तैयारी करनी शुरू कर दी और इस दौरान आर्मी चीफ़ इमरान के लिए ग़ैर ज़रूरी हो गए और उन्हें किसी और साझीदार की ज़रूरत पड़ गई, जिसके बाद से चीज़ें ख़राब होनी शुरू हो गईं."
वह टिप्पणी करते हुए कहते हैं, "अगर डीजी आईएसआई की तैनाती पर होने वाले विवाद की बात करें तो इमरान ख़ान नहीं चाहते थे कि लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद का तबादला किया जाए, इस बात को वह खुलकर स्वीकार भी कर चुके हैं, लेकिन उनका तबादला हो गया. यह विवाद सार्वजनिक होने के बाद विपक्ष को अपने लिए अवसर नज़र आया."
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'जूनियर बाजवा कहलाना कैसा लगता था?'

सिरिल अल्मीडा का कहना है, "बहुत से लोगों को और मुझे भी इस बात की जिज्ञासा थी कि इमरान ख़ान हर दिन जनरल बाजवा के जूनियर पार्टनर के नाम से बुलाए जाने के बारे में क्या सोचते थे या महसूस करते थे, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ऐसा नहीं था."
"समय के साथ इमरान ख़ान को अपने कार्यालय की शक्ति और बतौर प्रधानमंत्री अपने अधिकारों का एहसास हुआ, जिसके बाद उन्होंने इस शक्ति का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, चाहे वह अंतरराष्ट्रीय मामले हों या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा के, और यहीं से इमरान ख़ान के लिए कठिनाइयों की शुरुआत हुई."
वह कहते हैं, "यहां यह बात स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि पाकिस्तान की सेना ने पहली बार एक लोकप्रियतावादी के साथ समझौता किया और इमरान ख़ान का समर्थक, सेना के राजनीतिक समर्थक से बहुत अलग है.
इमरान ख़ान के बारे में यह कहा जाता है कि 2018 के चुनाव के बाद उनको सेना की ओर से लाया गया था, लेकिन इमरान ख़ान के समर्थक सिर्फ़ इमरान ख़ान की सुनते हैं, वे फ़ौज के मातहत नहीं."
मगर पत्रकार नुसरत जावेद की राय इससे कुछ अलग है.
उनका कहना है, "यह एक ऐसा समय है जब इमरान ख़ान काफ़ी अतिवाद दिखा रहे हैं. इमरान ख़ान की लोकप्रियता इस हद तक नहीं है कि लोग उनके लिए सैन्य नेतृत्व पर हमलावर हो जाएंगे. पाकिस्तान की लोकतांत्रिक व्यवस्था इतनी सुदृढ़ नहीं कि फ़ौज के साथ टकराव को बर्दाश्त कर सके. इमरान ख़ान पर हमले के बाद उनको समय मिल गया है और इस समय उन्हें चुप्पी साध लेनी चाहिए."

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अब आगे क्या हो सकता है?

पूर्व आईएसआई मुखिया असद दुर्रानी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "फ़ौज और इमरान ख़ान के बीच मनमुटाव तो बाद में हुआ, लेकिन इमरान ने पहले ही शोर मचाना शुरू कर दिया था."
उन्होंने यह भी कहा, "फ़ौज को यह मान लेना चाहिए कि राजनीतिक इंजीनियरिंग ग़लत हो गई है और हो जाती है. इसको मानने में कोई हर्ज़ नहीं है."
असद दुर्रानी इस बारे में कहते हैं, "राजनीति में कोई भी लड़ाई सदा के लिए नहीं होती. अगले छह महीनों में यही लोग चुनाव की तैयारी करते नज़र आएंगे."
जबकि पत्रकार सिरिल अल्मीडा के अनुसार, "अगर कल चुनाव होते हैं तो इमरान ख़ान की पार्टी सबसे लोकप्रिय पार्टी होने के साथ-साथ संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनकर आएगी.
अब वह साधारण बहुमत के साथ आएगी या भारी बहुमत के साथ आएगी, यह अलग सवाल है, लेकिन एक बात तय है कि इमरान ख़ान को अगले चुनाव के लिए फ़ौज की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."
उन्होंने कहा कि आने वाले सैन्य नेतृत्व के लिए सवाल होगा कि वह इमरान ख़ान के साथ चल सकते हैं या नहीं. उनके साथ समझौता करना चाहते हैं या नहीं और वह तभी पता चलेगा जब नया आर्मी चीफ़ तैनात होगा."
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