'मेरे पति की न्यूड तस्वीरें फैलाने के बाद मेरी तस्वीरें भी ग़लत वेबसाइट पर डाली गईं'

- Author, नाज़िश फ़ैज़
- पदनाम, पत्रकार, इस्लामाबाद
"मेरे शौहर की एडिटेड तस्वीरें हमारे जानने वालों को भेजी गईं जिनमें मेरे शौहर को न्यूड हालत में किसी दूसरी महिला के साथ दिखाया गया. यह सिलसिला इस हद तक भी ना रुका तो उन्होंने मेरी तस्वीरें ग़लत (एडल्ट) वेबसाइट पर नंबर के साथ डाल दीं जहां से मुझे फ़ोन आते और हर दिन कोई ग़लत मांग की जाती."
यह कहना है फ़ौज़िया (बदला हुआ नाम) का, जिनके पति ने कुछ महीनों पहले ऑनलाइन ऐप से दस हज़ार रुपये क़र्ज़ लिए थे और कुछ समय में ही यह क़र्ज़ दस हज़ार से बढ़कर दस लाख रुपये तक पहुंच गया.
इसके बाद फ़ौज़िया और उनके शौहर को क़र्ज़ उतारने के लिए घर की चीज़ें तक बेचनी पड़ीं.
सोशल मीडिया के दौड़ते-भागते दौर में कहीं ना कहीं इंसान इस बात से डरता ज़रूर है कि उसकी तस्वीरें किसी ग़लत आदमी के हाथ न लग जाएं क्योंकि उसके बाद उनका ग़लत इस्तेमाल किया जा सकता है.
फ़ौज़िया और उनके पति को पैसे देने के लिए ब्लैकमेल किया जाने लगा जिसके लिए उनकी तस्वीरों का ग़लत इस्तेमाल किया गया.
फ़ौज़िया के पति का सब्ज़ी का कारोबार था जिसमें वह दूसरे लोगों को काम पर रखते थे मगर नौबत यहां तक पहुंच गई है कि इस वक़्त उनके पास अपनी बच्ची को देने के लिए दूध भी नहीं.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 1
फ़ौज़िया और उनके पति को क़र्ज़ अदा करने के लिए घर का सामान बेचने की नौबत क्यों आई? इस सवाल के जवाब में वह कहानी छिपी हुई है जिसको सुनते ही इंसान डर का शिकार हो जाता है.
2020 में पाकिस्तान में कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन ऐप्स के ज़रिए आसान क़िस्तों पर क़र्ज़ लेने का सिलसिला शुरू हुआ. इस क़र्ज़ को लेने वाले लोग जब ऐप डाउनलोड करके क़र्ज़ लेने की शर्तें देखते हैं तो इनको यह जानकारी नहीं होती कि जो कुछ लिखा हुआ है उनके साथ उससे उलट होने वाला है.
उदाहरण के लिए क़र्ज़ वापस करने के लिए 91 दिन का समय बताया जाता है और ली गई रक़म पर केवल तीन प्रतिशत सूद अदा करने की बात कही जाती है.
लेकिन जब कोई व्यक्ति उन ऑनलाइन ऐप्स के ज़रिए क़र्ज़ ले लेता है तो एक सप्ताह के अंदर ही उसको क़र्ज़ वापस करने के लिए अलग-अलग नंबरों से कॉल आना शुरू हो जाती हैं और दिन-ब-दिन क़र्ज़ की रक़म दुगनी होती जाती है.
जब कोई भी ऐप प्ले स्टोर या एप्पल स्टोर से डाउनलोड की जाती है तो ऐप के ज़रिए यूज़र से फ़ोन के कॉन्टैक्ट्स का एक्सेस मांगा जाता और यह अनुमति देते ही उपभोक्ता के फ़ोन का डेटा संबंधित कंपनी को मिल जाता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
'पति ने दो बार आत्महत्या की कोशिश की'
ऐसा ही फ़ौज़िया और उनके पति के साथ हुआ. उनको एक हफ़्ते बाद फ़ोन आया और उनसे कहा गया कि जो क़र्ज़ उन्होंने ले लिया है उसको अदा करें वरना इस पर पांच हज़ार सूद अदा करना पड़ेगा.
वह अपने इस बुरे अनुभव के बारे में बताती हैं, "मेरे शौहर को फ़ोन पर बोलते हैं कि पैसे दो वरना हम तुम्हारे जानने वालों को बताएंगे कि तुमने क़र्ज़ लिया है और अब वापस नहीं दे रहे हैं. मेरे शौहर ने कहा कि 91 दिन का वक़्त है और आप हमें अभी क़र्ज़ वापस करने पर क्यों मजबूर कर रहे हैं? बहरहाल, हमने किसी तरह पांच हज़ार उनको दे दिए मगर यह सिलसिला यहां नहीं रुका."
वह कहती हैं, "अब हालात यह हैं कि एक वक़्त खाते हैं तो दो वक़्त इंतज़ार करते हैं कि कोई आए और हमें खाने को दे. मैं और शौहर तो गुज़ारा कर लेते हैं लेकिन हमारी एक बेटी है जो खाना कम मिलने की वजह से इतनी कमज़ोर हो गई है कि अपनी उम्र से छोटी लगती है."
फ़ौज़िया ने बताया कि उनके शौहर इन हालात से इतना तंग आ गए कि उन्होंने कुछ दिन पहले दो बार आत्महत्या की कोशिश भी की.
"उन्होंने मुझे और बेटी को कमरे से बाहर निकाल कर पंखे से लटक कर आत्महत्या की कोशिश की. उसके बाद एक दिन बार-बार की फ़ोन कॉल से तंग आकर उन्होंने बिजली के तारों से करंट लगाकर ख़ुदकुशी करने की कोशिश भी की."
फ़ौज़िया और उनके पति जैसे हज़ारोंं लोग हैं जो इस ऑनलाइन फ़्रॉड का शिकार हुए और ब्लैकमेलिंग का सामना करते रहे.
इन ऑनलाइन ऐप्स से किसी ने तेरह हज़ार का क़र्ज़ लिया तो घर बेचकर सत्रह लाख अदा किए, किसी ने बीस हज़ार लिए तो तेरह लाख अदा करने के लिए अपनी दुकान और बीवी के ज़ेवर तक बेच दिए.
इसका एक और उदाहरण पंजाब प्रांत के शहर रावलपिंडी के 42 साल के मोहम्मद मसूद का है. उन्होंने ऐसी ही ऑनलाइन ऐप से क़र्ज़ लिया और ब्लैकमेलिंग से तंग आकर कथित तौर पर आत्महत्या कर ली.
मोहम्मद मसूद की आत्महत्या के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने उन ऐप्स और उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की जिसके बाद सरकारी संस्थाएं सक्रिय हुईं और उन फ़्रॉड करने वाली कंपनियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई तेज़ की गई.

इमेज स्रोत, SOCIAL MEDIA
ऑनलाइन कंपनियों के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई हुई?
फ़्रॉड का शिकार होने वाले कई लोगों से बात की तो मालूम हुआ के कई लोगों ने एफ़आईए (फ़ेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) को कई बार इन ऐप्स के बारे में बताया मगर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई.
एडिशनल डायरेक्टर साइबर क्राइम विंग, इस्लामाबाद अयाज़ ख़ान से बीबीसी ने बात करके यह जानने की कोशिश की कि अब तक जो भी ऐसी कंपनियां ऑनलाइन फ़्रॉड में शामिल रही हैं उनके ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई की गई है?
अयाज़ ख़ान का कहना था कि उनको एक लंबे समय से ऑनलाइन ऐप्स के बारे में शिकायतें मिल रही थीं जिस पर उन्होंने पहले ही जांच शुरू कर रखी थी.
वह कहते हैं, "जब भी यह ऐप्स गूगल या एप्पल स्टोर से डाउनलोड की जाती हैं तो उनको सिक्योरिटी ऐंड एक्सचेंज कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान (एसईसीपी) रेगुलेट करता है. इसका मतलब है ये ऐप्स कौन सी कंपनी की है, उनका संस्थापक कौन है और बाक़ी सभी जानकारी उनके पास मौजूद होती है."
"इस वजह से जब हमें शिकायतें मिलीं तो हमने सबसे पहले एसईसीपी से पूछा कि क्या जिन ऐप्स के बारे में शिकायतें मिल रही हैं उन्होंने लाइसेंस ले रखा है. वहां से जवाब मिला कि इन ऐप्स के पास लाइसेंस ही नहीं है और अगर किसी ऐप को लाइसेंस मिला हुआ है भी तो यह उनके क़ानून का उल्लंघन कर रही है."
अयाज़ ख़ान कहते हैं कि क्योंकि क़र्ज़ देने वाली ऐसी ऐप्स का कोई दफ़्तर नहीं होता और क़र्ज़ लेने वालों को हर बार एक नए नंबर से क़र्ज़ वापसी की कॉल आती है इसलिए इस बात का पता लगाना मुश्किल होता है कि उनका ठिकाना कहां है.

वह कहते हैं कि उन कंपनियों से आने वाली कॉल को ट्रैक करके कार्रवाई की गई है और हाल ही में मोहम्मद मसूद की कथित आत्महत्या के बाद इन कार्रवाइयों में तेज़ी आई है.
उन्होंने बताया, "हमने सात एफ़आईआर दर्ज की हैं, 25 लोगों को गिरफ़्तार किया है जबकि सात कंपनियों के कॉल सेंटर के रूप में मिलने वाले दफ़्तरों को बंद किया है और 35 बैंक अकाउंट्स फ़्रीज़ किए हैं."
अयाज़ ख़ान ने बताया कि साइबर क्राइम का सबसे कठोर क़ानून तस्वीरों को एडिट करने वालों के लिए बनाया गया है. इसके तहत ऐसा करने वाले व्यक्ति को पांच साल क़ैद की सज़ा हो सकती है. यह ग़ैर-ज़मानती अपराध है और इसमें जुर्माना भी किया जाता है.
अयाज़ ख़ान कहते हैं कि बहुत से लोग उन ऐप्स फ़्रॉड के बारे में नहीं जान रहे थे और ज़रूरत पड़ने पर उसको डाउनलोड कर लेते थे मगर सोशल मीडिया पर रावलपिंडी के एक व्यक्ति की कथित आत्महत्या और उस केस में उनकी वायरल होने वाली फ़ोन रिकॉर्डिंग की वजह से लोगों को उन ऐप्स की सच्चाई के बारे में जानकारी मिली है.
साइबर क्राइम इस्लामाबाद के एडिशनल डायरेक्टर अयाज़ ख़ान ने बताया कि अगर किसी व्यक्ति को तंग या परेशान किया जा रहा है तो वह भी साइबर क्राइम की वेबसाइट पर अपने क्षेत्र में एफ़आईए (फ़ेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) या साइबरक्राइम के दफ़्तरों में जाकर शिकायत दर्ज करवाए.
उन्होंने भरोसा दिलवाया कि ऐसा फ़्रॉड करने वाले लोगों के ख़िलाफ़ तुरंत कार्रवाई की जाएगी.

कई बार सरकारी दफ़्तरों में जाकर इस फ़्रॉड ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया
अक़ील नोमी और इमरान चौधरी जैसे लोग उन ऐप्स के संबंध में लोगों को जानकारी दे रहे हैं. वह ख़ुद भी उन ऐप्स के फ़्रॉड का शिकार हो चुके हैं.
अक़ील नोमी ने यूट्यूब पर एक चैनल बनाया है जहां वह लोगों को बताते हैं कि वह कैसे ख़ुद को इस ब्लैकमेलिंग से बचा सकते हैं.
इसी तरह इमरान चौधरी ने भी कई बार सरकारी संस्थाओं के कार्यालयों के सामने जाकर उन ऐप्स की जालसाज़ी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया है.
इमरान चौधरी कहते हैं, "मुझे जब पता चला कि यह एक बहुत बड़ा फ़्रॉड है जिसका हर दिन लाखों लोग शिकार बन रहे हैं और कई लोग आत्महत्या करने की नौबत तक भी पहुंच गए हैं तो मैं कई न्यूज़ चैनलों, एफआईए और एसईसीपी के कार्यालयों में जाकर प्रदर्शन करता रहा."
इमरान चौधरी पिछले चार साल से उन ऐप्स के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं. उन्होंने पूरे पाकिस्तान में इसके बारे में जागरूकता अभियान चलाया है और अब उनके पास ऐसे हज़ारों लोग व्हाट्सऐप पर मौजूद हैं जो ब्लैकमेलिंग से तंग आकर उनसे मदद मांगते हैं.
इमरान बताते हैं कि कई बार एफ़आईए को इस फ़्रॉड के बारे में बताया मगर उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की.
उनका कहना है कि अब एफ़आईए की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि वह पूरे देश में उन कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है और फिर सोशल मीडिया पर भी लोगों को काफी जानकारी मिल गई है.
"हमें उम्मीद है कि भविष्य में उन ऐप्स को पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा."

उन ऐप्स को लाइसेंस कैसे जारी किया जाता है?
ईज़ी लोन या आसान क़र्ज़ की ऐप को किस तरह लाइसेंस जारी किया जाता है और ग़ैर-क़ानूनी ऐप्स के ख़िलाफ़ क्या ऐक्शन लिया गया है?
इस बारे में सिक्योरिटी ऐंड एक्सचेंज कमीशन ऑफ़ पाकिस्तान की सेक्रेटरी डायरेक्टर ख़ालिदा हबीब ने बताया कि एसईसीपी आर्थिक क्षेत्र को रेगुलेट करता है.
"इसका मतलब यह है कि नॉन- बैंकिंग कंपनियों को यह संस्था लाइसेंस जारी करता है. इससे यह कंपनियां देश में क़र्ज़ देने का काम कर सकती हैं."
वह कहती हैं, "हम जब भी किसी कंपनी को लाइसेंस देते हैं तो उससे पहले उस कंपनी में कौन पूंजी निवेश कर रहा है, इसका प्रमुख कौन है और दूसरी बातों की तसल्ली करते हैं. फिर हम साइबर क्राइम का फ़ॉर्म देते हैं जिसमें सभी जानकारी रहती है कि क़र्ज़ देते हुए किन किन बातों पर ध्यान रखा जाएगा. हम यह भी देखते हैं जिस ऐप को हम मंज़ूरी दे रहे हैं उनकी व्यवस्था और प्रक्रिया साइबर सिक्योरिटी के अनुरूप हो."
ख़ालिदा हबीब का कहना था उन ऐप्स के लॉन्च होने के बाद उनके बारे में शिकायतें मिलनी शुरू हुईं जिनसे उन ऐप्स पर कई सवाल खड़े हो रहे थे.
"एसईसीपी ने 2022 में एक पत्र जारी किया जिसमें उन बातों को सुनिश्चित किया गया कि यूज़र के मोबाइल फ़ोन तक एक्सेस को सीमित किया जाएगा. क़र्ज़ की रक़म और दूसरी बातों के बारे में उपभोक्ता को पूरी जानकारी दी जाएगी."
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 2
वह कहती है, "हमने पीटीए (पाकिस्तान टेलीकम्यूनिकेशन अथॉरिटी), गूगल, स्टेट बैंक और दूसरे हितधारकों से बात की और उन सभी ऐप्स के बारे में ऐक्शन लिया जो ग़ैर-क़ानूनी तौर पर काम कर रही थीं. हमने गूगल को बताया कि हम जिन ऐप्स को चिन्हित कर रहे हैं उनको बंद किया जाए जिस पर अब तक गूगल ने 65 ऐप्स को बंद कर दिया है."
ख़ालिदा हबीब का कहना है कि गूगल ने एक नई पॉलिसी भी लाई है जिसके अनुसार किसी भी ऐप को काम करने के लिए एसईसीपी और स्टेट बैंक का लाइसेंस दिखाना होगा.
"इसके अलावा एसईपीसी ने पीटीए से भी कहा है कि वह पहले यूज़र के मोबाइल फ़ोन पर डाउनलोड उन ग़ैर-क़ानूनी ऐप के ईपीआई एड्रेस को ब्लॉक कर दे और साथ ही स्टेट बैंक को भी बताया गया है कि वह ऐसी किसी भी ऐप को बैंक या दूसरे ज़रिए से पैसों के लेनदेन के लिए इस्तेमाल न होने दें जिसके पास एसईसीपी का लाइसेंस न हो."
क्या ग़ैर-क़ानूनी ऐप्स को स्थायी तौर पर बंद कर दिया जाएगा? इस सवाल के जवाब में ख़ालिदा हबीब ने कहा, "एसईसीपी एक निगरानी संस्था है. इसका काम ग़ैर-क़ानूनी ऐप्स को चिन्हित करके बंद करना है, हम भविष्य में भी उन ऐप्स को बंद करते रहेंगे और इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















