पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू, सिख और ईसाई किस हाल में रह रहे हैं?

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- Author, शुमायला ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कराची से
पाकिस्तान के फ़ैसलाबाद में हाल ही में क़ुरान के कथित अपमान की घटना हुई थी जिसके बाद जरांवाला में ईसाई समुदाय पर हमला किया गया.
इस हमले के विरोध में ईसाई और सामाजिक संगठनों ने कराची प्रेस क्लब के सामने बुधवार की शाम को प्रदर्शन किया.
प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि इन घटनाओं में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज करके उन्हें सज़ा देनी चाहिए.
बीबीसी से बात करते हुए एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि ये सब एक आरोप पर हुआ जिसका कोई साक्ष्य नहीं है और आरोप पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई है.
उन्होंने कहा, "आरोप लगने के तुरंत बाद आगजनी शुरू कर दी गई. बाइबल जला दी और चर्चों को जलाना शुरू कर दिया. लोगों के घर जलाए जा रहे हैं और लोग अपने ही घरों में सुरक्षित नहीं हैं और सुरक्षित जगहों पर जा रहे हैं."

ईसाई कॉलोनी में की गई तोड़फोड़
हालांकि इस्लाम धर्म के पवित्र ग्रंथ क़ुरान के अपमान और ईशनिंदा के आरोप में जरांवाला पुलिस ने बुधवार को दो ईसाई युवकों के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज किया है.
फ़ैसलाबाद की जरांवाला तहसील में हुई हिंसा में एक चर्च में आग लगा दी गई. इसके अलावा ईसाई कॉलोनी और इलाके़ की कुछ सरकारी इमारतों में भी तोड़फोड़ की गई.
आँखों में आँसू लिए पास्टर ग़ज़ाला शफ़ीक़ ने कहा, "हमारे धार्मिक स्थल सुरक्षित नहीं हैं. यहां कुछ भी सुरक्षित नहीं है. पाकिस्तान क्यों भारत जैसा होता जा रहा है? हम मांग करते रहे हैं कि ईशनिंदा क़ानून का दुरुपयोग रुकना चाहिए."
एक ईसाई व्यक्ति ने कहा, "हमें ऐसा लगता है, जैसे हम इस देश में नहीं रहते हैं. ये देश अपनी मां जैसा नहीं है, जैसे हम अनाथ हों या हम पाकिस्तानी नहीं हों, ऐसा लगता है कि जैसे हम विदेशी हों हम दूसरे देश के नागरिक हों और पाकिस्तान में फँस गए हों."

अल्पसंख्यकों की स्थिति पर उठते सवाल
सामाजिक कार्यकर्ता सबीर माइकल ने कहा, "इस समय किसी राजनीतिक पार्टी की सरकार नहीं है. सरकार और प्रशासन की प्रतिक्रिया बहुत धीमी है, इसीलिए चर्च जलाए गए. हम मांग करते हैं कि घटना की जांच की जाए और इस तरह का आतंक जिन्होंने फैलाया है उन्हें गिरफ़्तार कर सज़ा दी जाए."
फ़ैसलाबाद में इस घटना के बाद कराची में पुलिस को हाई अलर्ट पर रखा गया है, जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा और बंदरगाह वाला शहर है.
इस घटना के बाद से पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर फिर से सवाल उठे हैं. बीते सप्ताह ही पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर पहली बार माइनॉरिटी मार्च निकाला गया था.
इस मार्च में शामिल लोगों ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के साथ होने वाले अत्याचार और उत्पीड़न का मुद्दा उठाया था.
कराची में ईसाई समुदाय, ख़ासकर जबरन धर्मांतरण कराए गए लोगों के लिए काम करने वाली संगठन लिविंग होप फाउंडेशन चलाने वाली सज्जल शफ़ीक ने बीबीसी से बात की.
जबरन धर्म परिवर्तन का मुद्दा
शफ़ीक बताती हैं, "हमारे शेल्टर होम में पांच ऐसी लड़कियां अभी रह रही हैं. जेरेश तो अभी भी रात में चीखने लगती है. उसे बुखार आ जाता है. रात में नहीं आती है. वे हर कुछ घंटे बाद चीखती रहती है."
जेरेश दो सप्ताह पहले ही उनके सेंटर में पहुंची हैं. कथित तौर पर जेरेश को बंधक बना कर जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया है.
कराची के माइनॉरिटी मार्च में सबसे अहम मुद्दा जबरन धर्म परिवर्तन कराए जाने का ही रहा.
सज्जल नेहा का उदाहरण देते हुए कहती हैं, "ये हर किसी के साथ होता है. नेहा जब हम लोगों के शेल्टर में आई थी तब रात में सो नहीं पाती थी, पुरुषों के बीच नहीं जाती थी. लेकिन पांच साल बाद वह किसी स्टेज से तमाम मुद्दों पर बोल सकती है."
पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की बीते साल की रिपोर्ट के मुताबिक़, पाकिस्तान के सिंध में हिंदू लड़कियों को जबरन धर्म परिवर्तन करवाने के मामले सामने आए थे.
पाकिस्तान में सनातन धर्म ग्लोबल मूवमेंट चलाने वाले मनोज चौहान कहते हैं, "हिंदू लड़कियों का अपहरण हो रहा है और माफ़िया हमारे मंदिरों पर क़ब्जा कर रहे हैं. लेकिन सरकार ने अपनी आंख बंद कर रखी है, कुछ नहीं कर रही है."
आंकड़े क्या कहते हैं?


ईशनिंदा क़ानून का दुरुपयोग
पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़, 2022 में देश भर में ईशनिंदा के 35 मामले दर्ज किए गए.
171 लोगों को अभियुक्त बनाया गया, जिनमें 65 प्रतिशत मामले केवल पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के थे. बीते सप्ताह माइनॉरिटी मार्च में शामिल लोगों का कहना था कि इस क़ानून का दुरुपयोग भी अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के लिए किया जाता है.
कराची में करीब चार हज़ार सिख भी रहते हैं, हालांकि बीते सप्ताह की माइनॉरिटी मार्च में उनकी बहुत हिस्सेदारी नहीं दिखी थी. लेकिन समय समय पर ये समुदाय भी सिखों और गुरुद्वारों को निशाना बनाए जाने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता रहा है.
खालसा सिख काउंसिल के चेयरमैन सरदार अमर सिंह कहते हैं, "पेशावर में पिछले दिनों एक सिख की निर्मम हत्या कर दी गई. सुकूर के गुरुद्वारे में हमले हुए हैं. मैं तो सरकार से गुरुद्वारों की पर्याप्त सुरक्षा की मांग करता रहा हूं."
पाकिस्तान में हाल की जनगणना के बाद अल्पसंख्यक समुदाय पाकिस्तान की संसद में आरक्षित सीटों को बढ़ाने की मांग कर रहा है.
ईसाई समुदाय के लिए काम करने वाली सफ़ीना जावेद बताती हैं कि पाकिस्तान की संसद में अल्पसंख्यकों की भागीदारी बढ़ानी होगी.
उन्होंने कहा, "संसद में ज़्यादा हिस्सेदारी से चीज़ें बेहतर होंगी. वे तभी अल्पसंख्यकों के लिए क़ानून बना पाएंगे और उनके साथ होने वाले अन्याय और उत्पीड़न को रोक पाएंगे."
पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली में मौजूदा समय में 336 सीटें हैं और इसमें दस सीटें गैर मुस्लिम यानी अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं.
इसके अलावा पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली में 60 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित है. अल्पसंख्यक समुदाय पाकिस्तान की संसद में अल्पसंख्यक सीटों को बढ़ाने की मांग लंबे समय से कर रही है.

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14 साल बाद निकला मार्च
यही वजह है कि बीते सप्ताह ही पाकिस्तान सरकार की ओर से अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़ा प्रस्ताव पेश नहीं किया जा सका, क्योंकि अल्पसंख्यक संगठनों के मुताबिक इन प्रस्तावों को बेहतर बनाए जाने की ज़रूरत है.
2009 में पाकिस्तान सरकार ने 11 अगस्त को अल्पसंख्यक दिवस घोषित किया था लेकिन इसके 14 साल बाद पहली बार इस तरह का कोई मार्च कराची और इस्लामाबाद में एक साथ आयोजित किया गया था.
कराची में अधिकांश सफ़ाईकर्मी हिंदू और ईसाई समुदाय के हैं और ये मार्च में बड़ी संख्या में शरीक हुए थे. इन लोगों ने सरकार सफ़ाई कर्मियों के लिए सुरक्षाकिट मुहैया कराने की मांग की है.
इस मार्च की ज़रूरत पर छात्र नेता भाविश कुमार ने बताया, "11 अगस्त को ही कायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना ने संविधान सभा की बैठक को संबोधित करते हुए कहा था कि आप मंदिर और चर्च में जाने के लिए आज़ाद है. मैं ये सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या हमें ये आज़ादी मिल गई?"
इस्लामाबाद और कराची में के विश्वविद्यालयों में होली के त्योहार के समय में हिंदू छात्रों के साथ मारपीट की घटनाएं हुई थीं.
कराची के माइनॉरिटी मार्च में हिंदू, ईसाई, सिख और पारसी समुदाय के लोग नज़र आए और इन सबके हाथों में ज़बरन धर्मांतरण के विरोध वाले पोस्टर बैनर दिखाई दिया.
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में 2016 में ज़बरन धर्मांतरण को रोकने के लिए क़ानून बनाया था, लेकिन धार्मिक कट्टरपंथियों ने इसका विरोध किया, जिसके बाद से ही ये क़ानून लंबित है.
हाल तक पाकिस्तान में सरकार चला रही पाकिस्तान पीपल्स पार्टी ने इसे संशोधित करके पारित कराने का वादा किया था, लेकिन इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई.
पाकिस्तान की आबादी में महज पांच फ़ीसदी आबादी अल्पसंख्यक समुदायों की है, जिसमें करीब दो प्रतिशत हिंदू हैं और एक प्रतिशत के आसपास ईसाइयों की आबादी है.
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