पाकिस्तान के आंबेडकर जोगिंदरनाथ मंडल जो वहाँ 'देशद्रोही' कहलाए और भारत में 'अछूत'

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- Author, सक़लैन इमाम
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता के उदय और उसके प्रसार के लिए पूर्व सैन्य तानाशाह जनरल ज़िया-उल-हक़ की सरकार और उसके बाद मुस्लिम कट्टरपंथियों की ताक़त को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है.
लेकिन पाकिस्तानी इतिहास के एक अहम किरदार, जोगिंदरनाथ मंडल ने 70 साल पहले ही तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को लिखे अपने त्यागपत्र में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देने की बात कह दी थी.
उन्होंने इसके लिए पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान की मज़हब को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने और फिर उसके सामने घुटने टेकने की नीति को ज़िम्मेदार ठहराया था.
पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने जोगिंदरनाथ मंडल को पाकिस्तान की संविधान सभा के पहले सत्र की अध्यक्षता की ज़िम्मेदारी दी थी. वह पाकिस्तान के पहले क़ानून मंत्री भी बने.
जोगिंदरनाथ मंडल बंगाल के दलित समुदाय से थे. भारत के बँटवारे से पहले बंगाल की राजनीति में केवल ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आज़ादी एक महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं था, बल्कि कुछ लोगों की नज़र में उससे भी ज़्यादा अहम मुद्दा बंगाल में ज़मींदारी व्यवस्था की चक्की में पिसने वाले किसानों का था. इनमें ज़्यादातर मुसलमान थे. उनके बाद दलित थे, जिन्हें 'शूद्र' भी कहा जाता था. लेकिन अंग्रेज़ों के समय में उन्हें 'अनुसूचित जाति' कहा जाने लगा था.
ज़मींदारों में से अधिकांश हिंदू ब्राह्मण और कायस्थ थे जिन्हें स्थानीय भाषा में 'भद्रलोक' कहा जाता था.
अविभाजित बंगाल की कुल जनसंख्या पाँच करोड़ दस लाख थी. इनमें 80 लाख दलितों समेत हिंदुओं की कुल आबादी दो करोड़ बीस लाख थी. जबकि मुसलमानों की आबादी लगभग दो करोड़ अस्सी लाख थी. उच्च जाति के हिंदुओं यानी 'भद्रलोक' की कुल आबादी तीस लाख थी.
इस तरह बंगाल में मुसलमानों की आबादी 54 फ़ीसद थी, उसके बाद दलित और फिर हिंदू ब्राह्मण थे. ईसाई और अन्य धर्मों के मानने वाले बहुत कम तादाद में थे.
दलितों में सबसे बड़ा जातीय समूह 'महेशियों' का था. इनकी आबादी 35 लाख थी. इसके बाद 'नामशूद्र' आते थे. जोगिंदरनाथ मंडल इसी समूह से संबंधित थे. उन्होंने बँटवारे से पहले की राजनीति में दलितों को मुस्लिम लीग से जोड़ा था. बंगाल के नामशूद्र 1930 के दशक से ही मुस्लिम लीग के मज़बूत सहयोगी बन गए थे.
पाकिस्तान की संविधान सभा की पहली बैठक 11 अगस्त 1947 को हुई थी. औपचारिक स्वतंत्रता से तीन दिन पहले. जब भारत और पाकिस्तान ने 14 और 15 अगस्त की दरम्यानी रात को स्वतंत्रता प्राप्त की, तब तक मुस्लिम लीग दलितों के साथ संबंधों को एक सांचे में ढाल चुकी थी.
भारत और पाकिस्तान दोनों के पहले क़ानून मंत्री दलित थे
इसके बाद जब भारत में संविधान लिखने की प्रक्रिया शुरू हुई तो नेहरू ने अपने मंत्रिमंडल ने एक ग़ैर-कांग्रेसी दलित नेता डॉ. भीमराव आम्बेडकर को जगह दी और देश का पहला क़ानून मंत्री बनाया. उन्हें देश के संविधान का मसौदा तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई.
पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना का पहला भाषण सिर्फ़ उनकी एक परिकल्पना नहीं थी बल्कि यह एक राजनीतिक रणनीति भी थी. उसी रणनीति के तहत उन्होंने अपने भाषण से पहले बंगाल के एक हिंदू दलित नेता जोगिंदरनाथ मंडल से संविधान सभा के पहले सत्र की अध्यक्षता करवाई थी. (यह अलग बात है कि अब पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली की वेबसाइट पर पहले अध्यक्ष के तौर पर मंडल का नाम मौजूद नहीं है.)

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कौन थे जोगिंदरनाथ मंडल?
मंडल का जन्म बंगाल के एक क़स्बे बाक़रगंज में एक किसान परिवार में हुआ था. उनके पिता चाहते थे कि घर में कुछ हो या न हो उनका बेटा शिक्षा ज़रूर हासिल करे.
मंडल की शिक्षा का ख़र्च उनके बेऔलाद चाचा ने उठाया. एक स्थानीय स्कूल में पढ़ने के बाद उन्होंने बंगाल के बारिसाल के सबसे अच्छे शिक्षण संस्थान बृजमोहन कॉलेज में दाख़िला लिया. बारिसाल 'पूर्वी बंगाल' का एक शहर था जो बाद में 'पूर्वी पाकिस्तान' बन गया था.
अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने बारिसाल की नगरपालिका से अपने राजनीतिक सफ़र की शुरुआत की. उन्होंने निचले तबक़े के लोगों के हालात सुधारने के लिए संघर्ष शुरू किया.
वह भारत के बँटवारे के पक्ष में नहीं थे. लेकिन उन्होंने महसूस किया कि उच्च जाति के हिंदुओं (सवर्णों) के बीच रहने से शूद्रों की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता. इसलिए पाकिस्तान दलितों के लिए एक बेहतर अवसर हो सकता है.
जब उन्होंने जिन्ना के आश्वासन के बाद पाकिस्तान जाने का फ़ैसला किया, तो उन्हें उनके सहयोगी और भारत के उस समय के सबसे बड़े दलित नेता डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने चेताया था.
तक़दीर का खेल ऐसा हुआ कि डॉ. आंबेडकर भारत के पहले क़ानून मंत्री बने और जोगिंदरनाथ मंडल पाकिस्तान के पहले क़ानून मंत्री बने. कुछ साल बाद दोनों को ही अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा.
मंडल ने 8 अक्टूबर, 1950 को इस्तीफ़ा दे दिया, जबकि आंबेडकर ने 27 सितंबर, 1951 को त्यागपत्र दे दिया. दोनों के बीच फ़र्क़ यह था कि मंडल ने हताशा में त्यागपत्र दे दिया था. वो पाकिस्तान का संविधान बनते हुए नहीं देख सके, जबकि आंबेडकर ने जनवरी 1950 में भारत के संविधान को पूरा करके अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई.
संविधान का मसौदा तैयार होने के बाद आंबेडकर ने हिंदू विरासत क़ानून में लड़कों के साथ लड़कियों को भी संपत्ति में बराबर का अधिकार दिलाने के लिए क़ानून बनाने की कोशिश की. इसमे नाकाम रहने पर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया.
जिन्ना का 11 अगस्त का भाषण और अल्पसंख्यक

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इतिहासकारों का मानना है कि 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के संस्थापक और देश के पहले गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने संविधान सभा की पहली बैठक में अध्यक्ष के तौर पर अपने भाषण में पाकिस्तान के भविष्य का ख़ाका पेश करते हुए रियासत को मज़हब से अलग रखने का ऐलान किया था.
उसी भाषण में जिन्ना ने यह भी कहा था कि "समय के साथ हिंदू अब हिंदू नहीं रहेंगे और मुसलमान मुसलमान नहीं रहेंगे. धार्मिक रूप से नहीं, क्योंकि धर्म एक निजी मामला है, बल्कि राजनीतिक रूप से एक देश के नागरिक होने के नाते."
जिन्ना ने यह भी कहा था, "हम एक ऐसे दौर की तरफ़ जा रहे हैं जब किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा. एक समुदाय को दूसरे पर कोई वरीयता नहीं दी जाएगी. किसी भी जाति या नस्ल के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा. हम इस मूल सिद्धांत के साथ अपनी यात्रा शुरू कर रहे हैं कि हम सभी नागरिक हैं और हम सभी इस राज्य के समान नागरिक हैं."
मोहम्मद अली जिन्ना के इस भाषण से एक दिन पहले संविधान सभा के कार्यकारी अध्यक्ष और पहले स्पीकर जोगिंदरनाथ मंडल ने अपने पाकिस्तान चुनने की वजह बताई थी. उन्होंने कहा था कि उन्होंने पाकिस्तान को इसलिए चुना क्योंकि उनका मानना था कि "मुस्लिम समुदाय ने भारत में अल्पसंख्यक के रूप में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया है, लिहाज़ा वो अपने देश में अल्पसंख्यकों के साथ न केवल न्याय करेगा बल्कि उनके प्रति उदारता भी दिखाएगा."
अमरीका के जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय की ग़ज़ल आसिफ़ ने अपने हालिया शोध पत्र 'जोगिंदरनाथ मंडल एंड पॉलिटिक्स ऑफ़ दलित रिकग्निशन इन पाकिस्तान' ('जोगिंदरनाथ मंडल और पाकिस्तान में दलितों की मान्यता की राजनीति') में कहा है कि "मंडल ने पाकिस्तान के निर्माण में दलित स्वतंत्रता के सपने को साकार होते हुए देखा था, लेकिन नए राज्य में हिंदू अल्पसंख्यक के आंतरिक अंतर को समझे बिना (यानी, एक राज्य की विचारधारा के सामने जो अनुसूचित जाति और उच्च जाति के हिंदुओं के बीच अंतर के बिना अल्पसंख्यकों को एक इकाई मानता है), मंडल का विज़न टिक नहीं सका."
क्या पाकिस्तान ने मंडल के साथ ज़्यादती की?
प्रोफ़ेसर अनिर्बान बंदोपाध्याय के मुताबिक़ यह जानना आसान काम नहीं है कि पाकिस्तान में जोगिंदरनाथ मंडल के साथ ज़्यादती की गई थी या नहीं.
प्रोफ़ेसर बंदोपाध्याय भारत में गांधीनगर के कनावती कॉलेज के इतिहास विभाग के साथ जुड़े हैं. उन्होंने आम्बेडकर और मंडल पर एक महत्वपूर्ण शोध पत्र लिखा है. वो कहते हैं, "इसका सही जवाब तभी दिया जा सकता है जब कोई इतिहासकार पाकिस्तान के आर्काइव्स में रखे दस्तावेज़ खंगाले."
हालांकि, "(मंडल) ने अपने लंबे टाइप किए हुए इस्तीफ़े में अपना नज़रिया साफ़ कर दिया था. यह इस्तीफ़ा बहुत स्पष्ट है. वास्तव में सवाल ठीक तरीक़े से होना चाहिए. यह सच है कि नए राज्य के भविष्य के नागरिकों के लिए समान अधिकारों के ज़ोरदार दावे जिन्ना ने किए थे. लेकिन उनके साथ तो ख़ुद कुछ धोख़ा हुआ और कुछ बेवफ़ाई की गई."
प्रोफ़ेसर बंदोपाध्याय का कहना है कि "जिन्ना को इस बात पर पूरा विश्वास था कि धार्मिक राष्ट्रवाद के जिस राक्षस को उन्होंने जगाया था उस पर वो क़ाबू कर लेंगे. उनकी यह सोच ग़लत साबित हुई. वो (जिन्ना) एक बहुत ही शरीफ़ आदमी थे लेकिन उन्होंने अपनी ताक़त का ग़लत अंदाज़ा लगा लिया था. आने वाले दिनों में उनकी अचानक मौत ने पाकिस्तान के चरमपंथियों को लगभग बेक़ाबू छोड़ दिया था."
प्रोफ़ेसर बंदोपाध्याय आगे कहते हैं, "यह सिर्फ़ एक संयोग नहीं था कि मंडल को उस माहौल में पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया गया था. उनके लिए ज़िंदगी इतनी मुश्किल कर दी गई थी कि उन्हें पाकिस्तान छोड़कर भागना पड़ा. अगर उन्हें पाकिस्तान में किसी चीज़ से धोख़ा हुआ था तो वह जिन्ना का अपने अधिकारों के बारे में ग़लत अंदाज़ा था."
जिन्ना का विज़न

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लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेज़ के एक शोधकर्ता और इतिहासकार डॉ. अली उस्मान क़ासमी का कहना है, "देश की पहली संविधान सभा के प्रमुख के रूप में एक दलित को नियुक्त करके क़ायद-ए-आज़म ने पाकिस्तान के दृष्टिकोण के बारे में बहुत साफ़ संकेत दिया था. यदि वे अल्पसंख्यक नेता को केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व देना चाहते थे, तो उन्हें एक मंत्रालय देकर ख़ानापूर्ती कर सकते थे."
अली उस्मान क़ासमी का कहना है, "जिन्ना (अल्पसंख्यकों के) प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से ज़्यादा अहम बात पेश करना चाहते थे. इसलिए 1949 में 'उद्देश्यों के संकल्प'(Objectives of Resolution) की मंज़ूरी के बाद मंडल का पाकिस्तान छोड़कर चले जाना इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ है. क्योंकि अब वह देख सकते थे कि नए राज्य (पाकिस्तान) का रास्ता जिन्ना के 'दृष्टिकोण' से अलग हो चुका है."
जोगिंदरनाथ मंडल को एक दिन के लिए संविधान सभा का अध्यक्ष चुना गया था. अगले दिन मोहम्मद अली जिन्ना को इसका अध्यक्ष चुना गया था. लेकिन पाकिस्तान की पहली कैबिनेट में मंडल को क़ानून मंत्री बनाया गया. जब तक जिन्ना जीवित थे, उन्होंने उनसे स्पष्ट रूप से कोई शिकायत नहीं की.
जिन्ना की मौत के बाद कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनसे जोगिंदरनाथ मंडल निराश हुए कि इस देश में अब अल्पसंख्यकों से किए गए वादों को पूरा करने वाला कोई नहीं था. बल्कि ऐसे लोग सरकार में आ गए थे जो बहुत शिद्दत के साथ मज़हब को रियासत पर थोप रहे थे.
इस पृष्ठभूमि में 'उद्देश्यों का संकल्प' पारित किया गया. मियां इफ्तिख़ारुद्दीन को छोड़कर संविधान सभा के सभी मुस्लिम सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया था, जबकि एक को छोड़कर सभी अल्पसंख्यक सदस्यों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था.
एक अल्पसंख्यक सदस्य ने तो यहां तक कहा था कि अगर क़ायदे-आज़म जीवित होते, तो ऐसा कोई संकल्प कभी पारित ही नहीं होता. विडंबना यह है कि प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने वाले एकमात्र अल्पसंख्यक नेता स्वयं मंडल थे.
ग़ज़ल आसिफ़ अपने शोध पत्र में कहती हैं, "पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों पर शोध करने वाले सभी शोधकर्ता इस बात पर एकमत हैं कि 'उद्देश्यों का संकल्प' (पाकिस्तान के इतिहास में) एक ऐसा क्षण था जब पाकिस्तान को एक इस्लामिक राज्य बनाने के लिए अल्पसंख्यकों की सभी चिंताओं को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर किया गया था... विशेष रूप से दलितों का अपनी संवैधानिक हैसियत को मनवाना जो किसी भी हालत में इन प्रस्तावों के विरोध में नहीं था."
मंडल का इस्तीफ़ा और भारत प्रस्थान

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मंडल 1950 तक प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान के मंत्रिमंडल में बने रहे. इस दौरान उन्होंने बार-बार प्रधानमंत्री से पूर्वी पाकिस्तान में दलितों पर अत्याचार की शिकायत की.
फिर उन्होंने अक्टूबर, 1950 में त्यागपत्र दे दिया, जिसमें उन्होंने अल्पसंख्यकों के भविष्य के बारे में अपनी निराशा का इज़हार करते हुए उन कारणों का ज़िक्र किया जिनसे उनकी यह राय क़ायम हुई थी. उन्होंने अपने इस्तीफ़े में लिखा था कि सेना, पुलिस और मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं के हाथों बंगाल में सैकड़ों दलितों की हत्या की घटनाएं हुईं हैं.
मंडल की बार-बार की शिकायतों के बाद प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान ने मंडल से दलितों पर अत्याचार की घटनाओं का विस्तृत ब्यौरा माँगा. लेकिन अब समय निकल चुका था. मंडल ने अपने इस्तीफ़े में दलितों (अनुसूचित जातियों) पर पुलिस और स्थानीय मुसलमानों की तरफ़ से किए गए अत्याचारों की घटनाओं का सिलसिलेवार ढंग से ब्यौरा दिया गया था.
मंडल ने खुलना और बारिसाल (अपने निर्वाचन क्षेत्र) में हुई हिंसा का वही विवरण लिखा, जो स्थानीय दलितों ने उन्हें लिख कर भेजा था. उन्होंने एक गांव में फ़सलों की कटाई की घटना का भी उल्लेख किया जिसमें एक मुस्लिम की मौत हो गई थी. इसका बदला लेने के लिए स्थानीय पुलिस और एक मुस्लिम संगठन 'अंसार' की मदद से नामशूद्र दलितों के गांव के गांव लूट लिए गए.
दलितों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की फ़ेहरिस्त ठीक वैसी ही थी जैसी कि बँटवारे के वक़्त हुई हिंसा के दौरान देखी गई थी. अब इसमें दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार की घटनाएं भी शामिल हो गई थीं. मसलन 'जबरन धर्म परिवर्तन, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, लूटपाट, जबरन वसूली, गोकशी, और उनके पूजास्थलों में रखी मूर्तियों का अपमान करना.'
भारत के बँटवारे पर मंडल के विचार
अपने इस्तीफ़े में भारत के बँटवारे पर जोगिंदरनाथ मंडल ने कहा, "हालांकि मैं समझता था कि मुसलमानों के प्रति उच्च जाति के हिंदुओं के रवैये के कारण भारत का बँटवारा मुसलमानों की शिकायतों का एक जायज़ जवाब था. लेकिन मुझे यक़ीन था कि पाकिस्तान के निर्माण से सांप्रदायिकता की समस्या का समाधान नहीं होगा. इसके विपरीत यह केवल संप्रदायवाद और नफ़रत को बढ़ाएगा."
"इसके अलावा, मेरा दृढ़ विश्वास है कि (पाकिस्तान का निर्माण) मुसलमानों की स्थिति में सुधार नहीं करेगा. बँटवारे का परिणाम यह होगा कि स्थायी रूप से न सही, लेकिन लंबे समय तक, दोनों देशों के मेहनतकशों के लिए ग़रीबी, जहालत और दुखों का लंबा दौर रहेगा. मुझे डर है कि पाकिस्तान शायद दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे पिछड़ा देश बन जाएगा."
अपने लंबे इस्तीफ़े में, जोगिंदरनाथ मंडल ने जहां अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर विस्तार से चर्चा की, वहीं यह भी कहा, "न केवल अल्पसंख्यकों को बल्कि पाकिस्तान में उन मुसलमानों को भी अपमानित किया जा रहा है जो मुस्लिम लीग और सरकार के भ्रष्ट नौकरशाहों के दायरे से बाहर हैं."
पाकिस्तान ने मंडल को 'देशद्रोही' कहा
जोगिंदरनाथ मंडल का त्यागपत्र नए पाकिस्तानी राज्य के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट बन गया था. ख़ासकर जब मंडल कलकत्ता चले गए, तो उन्होंने पाकिस्तान पर और अधिक गंभीर आरोप लगाए.
ग़ज़ल आसिफ़ पाकिस्तान के राष्ट्रीय आर्काइव्स से प्राप्त दस्तावेज़ों के हवाले से लिखती हैं कि मंडल के बयानों को 'धोख़ा' कहते हुए उन्हें 'झूठा, ग़द्दार और कायर' कहा गया.
उनके बेटे जगदीश चंद्र मंडल ने प्रोफ़ेसर अनिर्बान बंदोपाध्याय से कहा था कि जब उनके पिता कराची में रहते थे, तब भी उनके मंत्री रहते ही उन्हें पूरी तरह अलग-थलग कर दिया गया था. वे आगे बताते हैं, "उन्होंने पाकिस्तान में जिन्ना पर भरोसा किया और दलितों के बेहतर भविष्य की उम्मीद में भारत में अपना सब कुछ त्याग दिया, लेकिन जिन्ना के बाद उसी पाकिस्तान में उन्हें राजनीतिक रूप से अछूत बना दिया गया."
भारत में 'राजनीतिक अछूत'

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जब मंडल ने इस्तीफ़ा दिया और 1950 में पाकिस्तान छोड़ कर भारत के बंगाल राज्य में शिफ़्ट हो गए, तो उन्हें अपनी ही जाति के लोगों ने भी शक की निगाहों से देखा. क्योंकि वह पाकिस्तान से आए थे. हालाँकि पाकिस्तान जाने से पहले, वो भारत में दलितों के सबसे बड़े नेता डॉ. आम्बेडकर के सहयोगी रहे थे, लेकिन अब मंडल का समर्थन करने वाला कोई नहीं था.
मंडल ने बँटवारे से पहले 1946 में डॉ. आम्बेडकर को अपने प्रभाव वाले एक निर्वाचन क्षेत्र से इंडियन लेजिस्लेटिव काउंसिल (संविधान सभा) का सदस्य बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन जब 1950 में मंडल भारत लौटे, तो वह अब न केवल एक अछूत दलित थे, बल्कि वो एक 'राजनीतिक अछूत' भी बन गए थे.
पूर्व मंत्री का झुग्गी में निवास
1950 में पाकिस्तान से भारत आने के बाद 1968 तक उन्होंने अपना अधिकांश समय कलकत्ता के एक बेहद पिछड़े इलाक़े में बिताया. ये तत्कालीन प्रसिद्ध रवींद्र सरोवर या डकारिया झील का दलदली क्षेत्र था. पहले यहां दलित झुग्गियां थीं. मंडल उन्हीं झुग्गियों में रहा करते थे. अब यहां की ज़मीन सूख जाने के बाद अमीर लोगों के लिए कालोनी बन गई है.
इस क्षेत्र के लोग बहुत बुरी हालत में रहते थे. मंडल ने भी बेहद ग़रीबी में दिन बिताए. उनकी झुग्गी के सामने हमेशा दलितों का तांता लगा रहता था ताकि वे उनकी समस्याओं को हल कर सकें.
इनमें से अधिकांश मुद्दे नौकरियों से संबंधित थे. लेकिन जिन दलितों को पूर्वी पाकिस्तान में प्रताड़ित किया गया और पश्चिम बंगाल में पलायन के लिए मजबूर किया गया, उनके पुनर्वास संबंधी गंभीर समस्याएं थीं. ये लोग लुटी-पिटी हालत में कलकत्ता पहुंचे थे. इन शरणार्थियों को भारत सरकार ने उतनी सुविधाएं नहीं दी थीं जितनी भारत सरकार ने पाकिस्तानी पंजाब से आए लोगों को दी थीं.
'जोगन अली मुल्ला'
मंडल एक प्रसिद्ध व्यक्ति तो थे, लेकिन अब उनके पास लोगों की समसयाएं दूर करने के लिए न तो संसाधन ही थे और न ही उनका राजनीतिक प्रभाव बाक़ी रह गया था.
पाकिस्तान के साथ अपने पिछले संबंधों के कारण, ऊंची जाति के हिंदुओं ने उन्हें बँटवारे और उनके मौजूदा हालात के लिए ज़िम्मेदार ठहराया. उच्च जाति के हिंदू उनका मज़ाक़ उड़ाते और उन्हें जोगिंदरनाथ मंडल की जगह 'जोगन अली मुल्ला' कह कर पुकारते थे.
प्रोफ़ेसर बंदोपाध्याय का कहना है कि सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने उनसे बहुत सावधानी से दूरी बनाए रखी.
"यहां तक कि जब वह (अपनी हैसियत याद करते हुए और अपनी जाति के लोगों की समस्याओं को हल करने की माँग करते हुए) बंगाल के मुख्यमंत्री या भारत के प्रधानमंत्री या अन्य अधिकारियों को पत्र लिखते थे, तो कभी-कभी अधिकारी उन्हें मुलाक़ात का मौक़ा दे देते थे. लेकिन उनकी शिकायतों को शायद ही कभी हल किया गया था. हालांकि, उन्होंने कभी हार नहीं मानी. उस वक़्त भी उनमें नौजवानों जैसी हिम्मत थी."
चुनावी राजनीति
प्रोफ़ेसर बंदोपाध्याय के अनुसार 1950 में वे 46 और मृत्यु के समय 64 वर्ष के थे. वह कहीं से कुछ संसाधन जुटा कर चुनाव लड़ते रहे. उन्होंने चार बार चुनाव लड़ा लेकिन चारों बार उनकी ज़मानत ज़ब्त हुई. उन्होंने एक छोटा समाचार पत्र या पत्रिका प्रकाशित करने की भी कोशिश की. लेकिन छोटा पाठक वर्ग होने की वजह से उन्हें इसमें भी कामयाबी नहीं मिली. उनके अपने कई साथी और अनुयायी उनका आंदोलन छोड़ के देश की प्रमुख पार्टियों में शामिल हो गए थे.
बंदोपाध्याय कहते हैं, "अब उनके पास सरपरस्ती करने के लिए कुछ भी नहीं बचा था. उदाहरण के लिए उनके अनुयायियों में से एक अबुरबल मजूमदार ने एक विपक्षी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और उसने उन्हें आसानी से हरा दिया. उन्होंने दलित पार्टी महेशिया समाज के साथ गठबंधन बनाने की भी कोशिश की, लेकिन 1950 के बाद बंगाल में निचली जातियों के अधिकारों की राजनीति की अपील बेहद कमज़ोर पड़ चुकी थी या यू कहें कि ख़त्म हो गई थी."
मंडल 'हर बुराई के लिए ज़िम्मेदार'

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जब किसी के ख़िलाफ़ हवा चलती है तो लोग उसकी अच्छाइयां छीन लेते हैं और उसमें वो बुराइयां भी डाल देते हैं जो उसमें नहीं होती हैं. अब आम लोग भी 1943 के बंगाल अकाल के लिए मंडल को दोषी ठहरा रहे थे क्योंकि वह ख्वाजा नाज़िमुद्दीन की तत्कालीन सरकार में नागरिक आपूर्ति मंत्री थे. (हालांकि कुछ शोधकर्ता अब अकाल के लिए चर्चिल को दोषी मानते हैं.)
बाद में उन्हें 1946 के हिंदू-मुस्लिम दंगों के लिए दोषी ठहराया गया (जो कि जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के ऐलान के बाद शुरू हुआ था. इसमें 5 से 10 हज़ार तक लोग मारे मारे गए थे.
उनके अपने समर्थकों ने सरकारी मशीनरी से पुनर्वास, नौकरियों और अन्य लाभों के लिए प्रमुख राजनीतिक दलों में जाना शुरू कर दिया था.
हालांकि, सभी इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि मंडल ने कभी हार नहीं मानी. वह एक मेहनती आदमी थे उन्होंने राजनीति में अपनी जगह के लिए लड़ना जारी रखा और निचली जातियों के अधिकारों की हमेशा आवाज़ बने रहे. संघर्ष की इसी यात्रा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई.
'रहस्यमयी मौत या हत्या'
एहमर्स्ट कॉलेज में साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर द्वापायन सेन अपनी किताब 'द डिक्लाइन ऑफ़ द कास्ट क्वेश्चन: जोगिंदरनाथ मंडल एंड डिफ़ीट ऑफ़ दलित पॉलिटिक्स इन बंगाल' में इशारा करते हैं कि भारत लौटने के बाद भी उनकी राजनीति उच्च जाति के हिंदुओं के वर्चस्व के लिए ख़तरा थी. चाहे वो कांग्रेस, हिंदू महासभा या फिर कम्युनिस्ट पार्टी के ब्राह्मण थे.
अमरीका में टफ्ट्स विश्वविद्यालय में इतिहासकार डॉ. आयशा जलाल कहती हैं, "मंडल के पाकिस्तान छोड़ने और भारत वापस जाने के फ़ैसले का कारण धार्मिक कट्टरता थी जिसने उन्हें मुस्लिम लीग के नेताओं के लिए अस्वीकार्य बना दिया था. जिन्होंने नए देश के प्रति उनकी निष्ठा पर महज़ इसलिए सवाल उठाए क्योंकि वह एक नीची जाति के हिंदू थे."
मंडल ने लियाक़त अली ख़ान को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने पाकिस्तान छोड़ने और भारत वापस जाने की वजह बताई थी. लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें भारत में भी स्वीकार नहीं किया गया. डॉ सेन कहते हैं, "स्वतंत्रता के बाद, जाति आधारित जन आंदोलन अब भारतीय नेताओं के लिए स्वीकार्य नहीं था."
इसीलिए प्रोफ़ेसर सेन कहते हैं, "समस्या यह है कि मंडल जैसी हैसियत और विचारधारा वाला राजनीतिज्ञ अपने पुराने कारनामों का इस्तेमाल करने के बावजूद क्यों किसी भी निर्वाचित निकाय का सदस्य नहीं बन सका, जबकि वो बंगाल के दलितों (नामाशूद्रों) के बीच बेहद लोकप्रिय थे."
आज़ादी और भारत के बँटवारे के पहले के अपने शानदार राजनीतिक करियर के बावजूद मंडल का अपने जीवन के आख़िरी दिनों में राजनीती में अछूत बनकर रह जाना क्या साबित करता है? हालांकि वो बँटवारे से पहले दो बार बंगाल के मंत्री रहे, डॉ. आम्बेडकर को 1946 में भारत की अंतरिम सरकार के लिए काउंसिल का चुनाव जितवाया, ख़ुद भारत की अंतरिम सरकार में मंत्री रहे, पाकिस्तान की संविधान सभा के पहले अध्यक्ष बने. इसके बावजूद वो भारत आकर राजनीतिक अछूत ही बने रहे.
जोगिंदरनाथ मंडल ने कांग्रेस के साथ संबंधों में सुधार करके 1952 में और फिर 1957 में उत्तरी कलकत्ता से चुनाव जीतने की कोशिश की लेकिन हर बार नाकाम रहे. उस वक़्त वो बेहद पिछड़ा इलाक़ा था और दलितों के लिए आरक्षित लोकसभा क्षेत्र था.
जोगिंदरनाथ मंडल की राजनीतिक पार्टी पर शोध करने वाले पुरकायस्थ बिस्वास का हवाला देते हुए प्रोफ़ेसर सेन लिखते हैं, "आज भी वे (उच्च जाति के हिंदू) उन्हें (दलितों को) अपनी प्रजा मानते हैं. उच्च जाति के शासक वर्गों में से कोई भी नहीं चाहता कि उनमें (दलितों में) अपना ख़ुद का नेता उभरे. वो दलितों के बीच उनके नेताओं के देवता बन जाने से डरते हैं."
भारत में मंडल के विरोधियों ने भी उन पर प्रतिक्रियावादी होने का आरोप लगाया. क्योंकि उनके विरोधियों के अनुसार उन्होंने पूरे समाज में न्याय स्थापित करने के बजाय केवल दलितों के कल्याण की बात की. मंडल ने व्यंग्यात्मक रूप से कहा था कि जब गांधी दलितों के लिए काम करते थे तो उन्हें महात्मा कहा जाता था. लेकिन जब एक दलित ने दलितों की भलाई के लिए काम किया तो उसे प्रतिक्रियावादी कहा गया.
अपनी किताब में प्रोफ़ेसर सेन ने भारत लौटने के बाद मंडल के 18 साल के राजनीतिक संघर्ष के इतिहास को याद करते हुए कहा कि उन्हें कई बार झटका लगा. लेकिन जब 1968 के चुनावों में उनकी सफलता की संभावनाएं साफ़ नज़र आने लगी थीं तो उनका देहांत हो गया. उस वक़्त तत्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार के मुख्यमंत्री कांग्रेसी के अजय मुखर्जी थे.
जोगिंदरनाथ मंडल की मौत 1968 में हुई थी. एक नाव से नदी पार करते समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा. नाविक के अलावा उस समय वहां कोई गवाह नहीं था. उनका पोस्टमार्टम भी नहीं किया गया था. यह बात उनके पुत्र जगदीश चंद्र मंडल ने अपनी किताब में कही है. उनके बेटे ने कई साल बाद अपने पिता के लेखन के सात खंड प्रकाशित किए.
प्रोफ़ेसर अनिर्बान बंदोपाध्याय कहते हैं कि दोपहर की यात्रा पर जाने से पहले उन्होंने खाना खाया और पूरी तरह स्वस्थ थे. वह शाम को एक राजनीतिक रैली में भाग लेने के लिए जाने वाले थे, लेकिन उनके बेटे ने ज़ोर दिया कि वो वहां न जाएं. मंडल को बताया गया कि उनकी ग़ैर-मौजूदगी जटिलताओं को जन्म देगी. हालांकि मंडल की मौत के सही कारण का पता नहीं चल सका है और अब कभी पता चल भी नहीं सकता है.
लेकिन दूसरी ओर प्रोफ़ेसर सेन ने अपनी किताब में लिखा है कि निश्चित तौर पर यह तय नहीं कर सकते कि उनकी मृत्यु कैसे हुई. लेकिन जोगिंदरनाथ मंडल के पुत्र जगदीश का कहना है कि उनके पिता के शरीर की स्थिति ऐसी थी जिससे लगता था कि उनकी मौत प्राकृतिक नहीं थी.
इसलिए, उस समय के राजनीतिक हालात और उनके मृत शरीर की स्थिति के बारे में बयानों को देखते हुए, प्रोफ़ेसर सेन इसे "रहस्यमयी मौत" क़रार देते हैं और संदेह व्यक्त करते हैं कि "उन्हें ज़हर दिया गया था" जो उन्होंने लिखा है, "वह एक रहस्यमयी परिस्थिति में मर गए, यह संदेह पैदा करता है कि उन्हें मारा गया था."
मौत जैसी ज़िंदगी
प्रोफ़ेसर सेन का कहना है कि सब बातों को अगर जमा करके देखें तो ऐसा लगता है कि मंडल ने कभी यह नहीं माना कि पश्चिम बंगाल में दलित राजनीति असंभव है. न ही उन्होंने उन अज्ञात बाधाओं को बहुत मज़बूत माना जो हमेशा उनके पैरों में बेड़ियों की तरह पड़ी रहीं. बहरहाल मंडल के क़रीबी एक वकील ने यह दावा ज़रूर किया है कि उन्होंने ढलती उम्र में एक बार मंडल को यह कहते हुए सुना था, "मुझे एहसास हुआ है कि मौत से बदतर ज़िंदगी कैसी होती है."
मंडल ने पाकिस्तान आकर कितनी बड़ी ग़लती की? या यह ग़लती थी भी या नहीं? यह तय होना अभी बाक़ी है.
प्रोफ़ेसर सेन के अनुसार, बंगाल में दलित राजनीति उनकी मृत्यु के साथ ही हार गई थी.
लेकिन 21वीं सदी में जब अतिवादी हिंदू एक बार फिर न केवल अल्पसंख्यकों के लिए बल्कि दलितों के लिए भी जीवन मुश्किल बना रहे हैं, ऐसा लगता है कि भारत में एक नए जोगिंदरनाथ मंडल की ज़रूरत जन्म ले रही है.
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