रॉ के एक जासूस ने जब भाग कर ली अमरीका में शरण: विवेचना

रॉ का मुख्यालय

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बात अप्रैल, 2004 की है.

रॉ के दफ़्तर के मुख्यद्वार पर ऑफ़िस समाप्त होने के बाद घर जाने वालों की लंबी लाइन लगी हुई थी. जब इसका कारण पूछा गया तो पता चला कि हर कर्मचारी के ब्रीफ़केस की तलाशी ली जा रही है.

रॉ के 35 वर्ष के इतिहास में इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. रक्षा संस्थानों और सेना मुख्यालय में गाहे-बगाहे एक दो महीने के अंतराल पर इस तरह की तलाशी ज़रूर ली जाती थी.

रबिंदर सिंह

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अगली साप्ताहिक बैठक में रॉ के प्रमुख सीडी सहाय ने स्पष्ट किया कि ये तलाशी किसी एक व्यक्ति के खिलाफ़ केंद्रित नहीं थी.

इसका उद्देश्य रॉ की सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत करना मात्र था. इस बैठक में रॉ में संयुक्त सचिव रबिंदर सिंह भी मौजूद थे.

वो ज़ोर ज़ोर से बड़बड़ाते हुए बाहर आए कि वरिष्ठ अधिकारियों से पेश आने का ये सही ढ़ंग नहीं है.

हाल ही में प्रकाशित पुस्तक 'रॉ अ हिस्ट्री ऑफ़ इंडियाज़ कॉवर्ट ऑप्रेशंस' के लेखक यतीश यादव बताते हैं कि 'ये सारी कार्रवाई रबिंदर सिंह को ही ध्यान में रखकर की गई थी.

उस दिन उनको अपने ड्राइवर से हवा लग गई थी कि गेट पर सब लोगों के ब्रीफ़केस खुलवाकर देखे जा रहे हैं. जब रबिंदर सिंह का ब्रीफ़केस खुलवाया गया तो उस में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं निकला.'

'रॉ अ हिस्ट्री ऑफ़ इंडियाज़ कॉवर्ट ऑप्रेशंस'

रबिंदर सिंह पर रॉ की नज़र

रबिंदर सिंह पिछले कई सालों से अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के लिए डबल एजेंट के तौर पर काम कर रहे थे और भारत की ख़ुफ़िया सूचनाएं उस तक पहुंचा रहे थे.

उनको इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उन पर रॉ की काउंटर इंटेलिजेंस यूनिट पिछले कई महीनों से नज़र रख रही है. उनको इस बात का सपने में भी गुमान नहीं था कि उनके घर के पास फल बेचने वाला दाढ़ी वाला अधेड़ शक्स रॉ का एजेंट है और उनका ड्राइवर उनकी गतिविधियों के बारे में सभी सूचनाएं संबंधित अधिकारियों तक पहुंचा रहा है.

रबिंदर सिंह अमृतसर के एक ज़मीदार परिवार से आते थे.

वो जाट सिख समुदाय से थे लेकिन उन्होंने अपने बाल कटा दिए थे. वो एक अधिकारी के तौर पर भारतीय सेना में चुने गए थे. सेना में रहते हुए ही उन्होंने ऑप्रेशन ब्लूस्टार में भाग लिया था. इसके कुछ समय बाद वो रॉ में प्रतिनियुक्ति पर आ गए थे.

रॉ

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रॉ में काम कर चुके मेजर जनरल विनय कुमार सिंह अपनी किताब 'इंडियाज़ एक्सटर्नल इंटेलिजेंस सीक्रेट्स ऑफ़ रिसर्च एंड अनालिसिस विंग' में लिखते हैं, "अपने पूरे करियर के दौरान रबिंदर के अफ़सर और साथी उन्हें एक औसत अफ़सर मानते थे."

"शुरू में उन्हें अमृतसर में पोस्ट किया गया था जहाँ उन्हें सीमा पार पाकिस्तान और आएसआई द्वारा सिख पृथकतावादियों को दी जा रही ट्रेनिंग के बारे में जानकारी जुटाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी."

"इसके बाद पहले उन्हें पश्चिम एशिया और फिर हॉलैंड में हेग में तैनात किया गया जहाँ वह उस इलाके में काम कर रहे सिख चरमपंथियों की गतिविधियों पर नज़र रख रहे थे."

'कश्मीर द वाजपेई इयर्स'

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रॉ के प्रमुख रहे एएस दुलत ने भी अपनी किताब 'कश्मीर द वाजपेई इयर्स' में लिखा है, "भारतीय विमान का अपहरण करने वाले हाशिम क़ुरैशी ने मुझे बताया था कि हॉलैंड में रबिंदर की छवि एक बहुत ख़राब अफ़सर की थी."

"उनका अधिकतर समय औरतों के पीछे और शराब पीने में बीतता था. वो बड़बोले भी थे और अक्सर अनजान लोगों के सामने वो बातें भी कह जाते थे जो उन्हें नहीं कहनी चाहिए थी."

रिचर्ड हेल्म्स

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सत्तर के दशक से ही सीआईए की भारत में सक्रिय भूमिका

ख़ुफ़िया हल्कों में ये बात किसी से छिपी नहीं है कि सत्तर के दशक से ही सीआईए भारत सरकार में अपनी पैंठ जमाने की कोशिश करती रही है.

टॉमस पॉवर्स ने सीआईए प्रमुख रिचर्ड हेल्म्स की जीवनी 'द मैन हू केप्ट द सीक्रेट्स' में साफ़ साफ़ इशारा किया कि 1971 में इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडल में एक सीआईए एजेंट था.

जैक एंडरसन

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यही नहीं मशहूर स्तंभकार जैक एंडरसन ने भी एक लेख में इसकी पुष्टि की थी. वाशिंगटन पोस्ट ने भी अपने 22 नवंबर, 1979 के अंक में 'हू वाज़ द सीआईए इन्फ़ॉर्मर इन इंदिरा गाँधी कैबिनेट' शीर्षक लेख में इस पूरे मुद्दे पर कई क़यास लगाए थे.

मई 1998 में भारत द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण से भी सीआईए की काफ़ी किरकिरी हुई थी और उस पर अमरीका की सरकार को पहले से आगाह न करने के आरोप लगे थे.

अमरीका में इसे तब तक की सबसे बड़ी 'ख़ुफ़िया असफलता' माना गया. तब से ही इस बात की शिद्दत से ज़रूरत महसूस की गई कि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास भारत में एक चोटी का स्रोत होना चाहिए जिससे उन्हें उसके बारे में खुफ़िया जानकारी मिलती रहे.

भारतीय ख़ुफ़िया स्रोतों का मानना है कि 90 के दशक में हॉलैंड में भारतीय दूतावास में काउंसलर के तौर पर काम करने के दौरान सीआईए ने रबिंदर सिंह को भर्ती किया था.

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साथियों को मँहगे होटलों में दावतें

रबिंदर सिंह की निगरानी करवाने वाले रॉ में विशेष सचिव रहे अमर भूषण ने बाद में इस घटना पर आधारित एक उपन्यास लिखा 'इस्केप टू नो व्हेयर' जिसमें उन्होंने लिखा कि "संदिग्ध ( रबिंदर सिंह) दूसरे विभाग में काम कर रहे जूनियर आप्रेशनल डेस्क देख रहे रॉ अधिकारियों से जानकारी निकालने की कोशिश में लगा रहता था."

"वो उन्हें या तो अपने कमरे या घर या मँहगे होटलों में खाने की दावत देता. 1992 में नैरोबी में पोस्टिंग के दौरान रबिंदर को दिल की बीमारी हुई थी लेकिन उसके पास बाईपास सर्जरी कराने के पैसे नहीं थे."

"अमरीका और कनाडा से दोस्तों की मदद मिलने के बाद ही उसका वियना के एकेएच अस्पताल में ऑप्रेशन किया गया था. मुझे कोई ताज्जुब नहीं होगा जब ये पता चले कि ये पैसा किसी विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसी ने उपलब्ध कराया होगा.'

सिक्योर इंटरनेट प्रोटोकॉल का इस्तेमाल

जब से रबिंदर सिंह को निगरानी में रखा गया रॉ के जासूस दूसरे अफ़सरों से की गई उसकी हर बातचीत को सुन सकते थे.

यतीश गुप्ता बताते हैं, "रबिंदर का काम करने का तरीका बहुत साधारण था. वो गुप्त रिपोर्टों को घर लाता था और अमरीकियों द्वारा दिए गए उच्च कोटि के कैमरों से उनकी तस्वीरें लेता था. सारी फ़ाइलों को एक बाहरी हार्ड डिस्क में स्टोर करता था और सिक्योर इंटरनेट प्रोटोकॉल के ज़रिए अपने हैंडलर्स को भेज देता था. बाद में वो हार्ड डिस्क और अपने दो लैपटॉप से सभी फ़ाइलें मिटा देता था. उसने कम से कम बीस हज़ार दस्तावेज़ों को इस तरह बाहर भेजा."

रॉ के जासूसों को इस बात से भी शक हुआ कि रबिंदर साल में कम से कम दो बार नेपाल जाया करते थे.

वीके सिंह

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रॉ के पास ये मानने के पर्याप्त कारण थे कि रबिंदर इन यात्राओं का इस्तेमाल काठमांडू में अमरीकियों, ख़ास तौर से काठमाँडू में सीआईए के स्टेशन चीफ़ से मिलने के लिए करते थे जो कि उस समय काठमांडू के अमरीकी दूतावास में काउंसलर इकॉनॉमिक अफ़ेयर्स के कवर में काम कर रहे थे.

मेजर जनरल विनय कुमार सिंह अपनी किताब 'इंडियाज़ एक्सटर्नल इंटेलिजेंस' में लिखते हैं, "रबिंदर को कई बार अपने दफ़्तर में अपना कमरा बंद कर गुप्त दस्तावेज़ों की फ़ोटोकॉपी करते हुए देखा गया था. उसने अमरीका में रह रही अपनी बेटी की मँगनी में शामिल होने के लिए अमरीका जाने का अनुमति माँगी थी लेकिन उसे रॉ के प्रमुख ने अस्वीकार कर दिया था."

सीआईए

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विदेश में काम कर रहे रॉ एजेंटों के नाम सीआईए को बताए

सवाल उठता है कि रबिंदर की ग़द्दारी से भारत को कितना नुक़सान पहुंचा?

एक ख़ुफ़िया स्रोत का कहना है कि रबिंदर के भागने के बाद की गई जाँच से पता चला कि उन्होंने अपने हैंडलर्स को विदेशों में काम कर रहे रॉ एजेंटों की एक लिस्ट उपलब्ध कराई थी.

रॉ की काउंटर इंटेलिजेंस इकाई द्वारा बाद में की गई जाँच में पता चला कि रबिंदर सिंह ने सीआईए के अपने हैंडलर्स को कम से कम 600 ईमेल भेजे थे और उन्होंने देश की सूचनाओं को बाहर पहुंचाने के लिए कई ईमेल आईडीज़ का इस्तेमाल किया था.

क्या रबिंदर का भंडाफोड़ हो जाने के बाद भी रॉ के अधिकारी जानबूझ कर रबिंदर को ख़ुफ़िया सूचनाएं उपलब्ध करा रहे थे?

रॉ के एक अधिकारी ने जिसका कोडनेम केके शर्मा था, ने यतीश यादव को बताया था कि जनवरी 2004 से अप्रैल 2004 के बीच एजेंसी के 55 से अधिक अफ़सरों ने इस डबल एजेंट को ख़ुफिया सूचनाए मुहैया करवाई थीं.

मेजर जनरल विनय कुमार सिंह लिखते हैं, "रबिंदर को जानबूझ कर रॉ के मॉनिटरिंग स्टेशन द्वारा इस्लामाबाद में अमरीकी मिशन से इंटरसेप्ट की गई जानकारी फ़ीड की गई. रॉ का उन पर शक और गहरा हो गया जब उसने इस तरह की और जानकारी की माँग की."

रबिंदर को पता चल गय़ा कि उस पर रखी जा रही है नज़र

भारत से फ़रार होने से दो हफ़्ते पहले रबिंदर को ये भनक लग गई थी कि उन पर नज़र रखी जा रही है.

यतीश यादव बताते हैं, "उन्होंने रॉ की सुरक्षा यूनिट से कहा था कि उनके दफ़्तर को 'स्वीप' करवाया जाए ताकि वहाँ लगाए गए ख़ुफ़िया उपकरणों का पता लगाया जा सके. जिस रात रबिंदर सिंह नेपाल भागे उनके घर के बाहर तैनात रॉ की निगरानी टीम ने उनकी पत्नी को घर से बाहर निकलते देखा. उसके बाद उनकी पत्नी एक पारिवारिक मित्र के साथ घर वापस आई. मित्र रात के खाने के बाद अपने घर चले गये. रॉ की टीम ने रबिंदर और उसकी पत्नी को घर से बाहर निकलते नहीं देखा."

"हड़कंप तब मचा जब अगले दिन घर के अंदर कोई गतिविधि नहीं दिखाई. जब रॉ के जासूस ज़रूरी डाक देने के बहाने से घर के अंदर घुसे तो नौकर ने बताया कि साहब और मेमसाहब एक शादी में शामिल होने पंजाब गए हैं."

आरके यादव
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सड़क मार्ग से नेपाल और फिर वहाँ से अमरीका

बाद में रॉ के एजेंटों को पता चला कि रबिंदर और उनकी पत्नी परमिंदर सड़क मार्ग से नेपाल पहुंचे. जहाँ उन्हें भारतीय सीमा के पास नेपालगंज के एक होटल में बुक किया गया था.

रॉ पर एक और किताब मिशन रॉ लिखने वाले आर के यादव बताते हैं, "रबिंदर और उनकी पत्नी को उनके एक रिश्तेदार ने कार में बैठा कर नेपाल की सीमा तक पहुंचाया था. रॉ के एजेंट ये पता लगाने में सफल रहे कि उनके होटल में रहने का बिल काठमांडू में सीआईए के स्टेशन चीफ़ डेविड वसाला ने दिया था और उनके लिए कमरा भी उनके ही नाम से बुक किया गया था. उनको नेपालगंज के स्नेहा होटल में ठहराया गया था. बाद में इन दोनों को काठमांडू में सीआईए के सेफ़ हाउज़ में शिफ़्ट कर दिया गया. वहीं उनको राजपाल प्रसाद शर्मा और दीपा कुमार शर्मा के नाम से दो अमरीकी पासपोर्ट जारी किए गए. 7 मई, 2004 को ये दोनों वॉशिंगटन जाने वाली ऑस्ट्रियन एयरलाइंस की फ़्लाइट नंबर 5032 पर बैठ गए."

ब्रजेश मिश्रा

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ब्रजेश मिश्रा की वजह से गिरफ़्तारी में देरी

कहा जाता है कि रॉ के अफ़सरों ने तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र से रबिंदर को गिरफ़्तार करने की अनुमति माँगी थी लेकिन उन्होंने उस पर तुरंत फ़ैसला नहीं लिया.

यतीश यादव बताते हैं, "ऐसा लगता है कि मिश्रा रबिंदर से पिंड छुड़ाना चाहते थे और चाहते थे कि वो अपनेआप यहाँ से दफ़ा हो जाए. उस समय भारत में चुनाव हो रहे थे और रॉ के भीतर सीआईए के एक जासूस होने की ख़बर सरकार को राजनीतिक रूप से नुक़सान पहुंचा सकती थी. उन्होंने रबिंदर के जासूसी में लिप्त होने और उनके अमरीकी हेंडलर्स के बारे में और सबूत माँगे. ये शायद बहुत बड़ी गलती थी."

इस घटना के बाद ये सवाल भी उठे कि एक व्यक्ति के बारे में ये मालूम हो जाने के बाद कि वो किसी विदेशी सरकार के लिए जासूसी कर रहा है, रॉ को उसकी गिरफ़्तारी के लिए सरकार से अनुमति लेने का क्या ज़रूरत थी?

रॉ

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सीआईए का खंडन

मई के मध्य में रॉ प्रमुख सीडी सहाय ने दिल्ली में सीआईए के स्टेशन चीफ़ को बुला कर पूछा कि क्या रबिंदर के अमरीका भाग जाने के बारे में अमरीकी सरकार को कोई जानकारी है?

जैसी कि उम्मीद थी अमरीका ने रबिंदर सिंह और उसकी पत्नी के बारे में किसी भी जानकारी से इनकार किया.

उन्होंने इस बात का भी खंडन किया कि रॉ का कोई अधिकारी कभी सीआईए के संपर्क में था. जासूसी की दुनिया में हमेशा से ये रिवाज रहा है कि एक बार पकड़े जाने के बाद उनके हैंडलर्स उनके अस्तित्व तक को पहचानने से इनकार कर देते हैं जो उनके लिए काम कर रहे होते हैं.

अमरीका द्वारा जारी किये गए पासपोर्ट

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5 जून 2004 को राष्ट्रपति ने संविधान की धारा 311 (2) के तहत रबिंदर सिंह को नौकरी से बर्ख़ास्त कर दिया. इस धारा के तहत राष्ट्रपति को राष्ट्रहित में बिना विभागीय जाँच करवाए केंद्रीय सरकार के किसी भी अधिकारी को नौकरी से निकालने का अधिकार है.

मैंने यतीश यादव से पूछा कि आपको ये बात असमान्य नहीं लगती कि रबिंदर सिंह एक तरह से अपना घर खुला छोड़ कर अचानक ही अमरीका भाग गये थे?

यतीश यादव कहते हैं कि "जासूसी के धंधे में पकड़े जाने के बाद आपके पास बच निकलने के लिए कुछ घंटों या मिनटों का ही समय होता है. उस समय ये बात नहीं देखी जाती कि आप क्या छोड़ कर जा रहे हैं. और फिर आपके हैंडलर्स आपको होने वाले हर नुक़सान की भरपाई के लिए तैयार रहते हैं."

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रबिंदर सिंह की मौत

रॉ के इतिहास के इस अप्रिय प्रकरण को कुछ समय के लिए दफ़न कर दिया गया लेकिन रबिंदर को इसके लिए कभी माफ़ नहीं किया गया.

यतीश यादव बताते हैं, "वर्ष 2016 के अंत में वाशिंगटन से डिप्लोमेटिक बैग में एक कोडेड संदेश आया जिसमें कहा गया था कि डबल एजेंट रबिंदर सिंह की मौत हो गई. बाद में पता चला कि रबिंदर की मौत मैरीलैंड में एक सड़क दुर्घटना में हुई थी. ये भी पता चला कि काठमांडू के ज़रिए अमरीका पहुंचने के कुछ महीनों के अंदर ही सीआईए ने रबिंदर से अपना पल्ला झाड़ लिया था."

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रबिंदर का आख़िरी समय बहुत बुरा गुज़रा. वो पैसे पैसे के मोहताज हो गए, क्योंकि सीआईए ने उनकी मदद करनी बंद कर दी. सीआईए के पूर्व उप निदेशक द्वारा चलाए जा रहे एक थिंक टैंक में रबिंदर ने नौकरी पाने की कोशिश भी लेकिन उसमें उन्हें सफलता नहीं मिली.

देश के ख़िलाफ़ जासूसी करने के बाद रबिंदर ने अपने जीवन के आख़िरी बारह वर्ष न्यूय़ॉर्क, वर्जीनिया और मैरीलैंड में बहुत मुफ़लिसी में बिताए.

रॉ में रबिंदर सिंह पर इतनी कड़ी नज़र रखने के बावजूद उसके भाग निकलने को एक असफलता के तौर पर देखा गया. मैंने इस संबंध में इस मामले से जुड़े हुए रॉ के कम से कम पाँच उच्चाधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन सभी ने इस मुद्दे पर बात करने से इनकार कर दिया.

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