भारत जिस प्रोजेक्ट से निकल गया, ईरान उसे पाकिस्तान के साथ कर रहा है पूरा

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- Author, तनवीर मलिक
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, इस्लामाबाद
ईरान से पाकिस्तान को गैस उपलब्ध कराने के प्रोजेक्ट में पिछले दिनों एक बड़ी प्रगति हुई है.
पाकिस्तान सरकार की ऊर्जा के लिए कैबिनेट कमिटी ने इस परियोजना के तहत ईरान के साथ सीमा से लेकर बलूचिस्तान के तटीय शहर ग्वादर तक पाइपलाइन बिछाने की मंज़ूरी दी है.
पाकिस्तान की ओर से इस गैस पाइपलाइन परियोजना के तहत ईरानी सीमा से लेकर ग्वादर तक पाइपलाइन बिछाने की मंज़ूरी इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण समझी जा रही है कि डेढ़ महीने पहले पाकिस्तान और ईरान के बीच उस समय स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी जब ईरान ने पाकिस्तान के अंदर मिसाइल हमला किया था.
इस हमले के जवाब में पाकिस्तान ने भी ईरान के अंदर हमला किया था. पाकिस्तान की ओर से जवाबी हमले के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर वार्ता हुई, जिससे तनाव में कमी आई.
ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना एक पुरानी परियोजना है. सन 2013 में पाकिस्तान पीपल्स पार्टी की सरकार के आख़िरी दिनों में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने ईरान के दौरे के दौरान इसका उद्घाटन किया था. हालांकि उसके बाद इस परियोजना पर कोई ख़ास काम नहीं हो सका.
पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के कार्यकाल में इस परियोजना में कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई.
पीडीएम (पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट) सरकार के दौर में प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने इस परियोजना पर काम के लिए जनवरी 2023 में एक कमिटी बनाई थी.
अब एक साल से अधिक समय के बाद प्रभारी सरकार की ऊर्जा के लिए कैबिनेट कमिटी ने इस परियोजना के एक भाग को मंज़ूरी दी है.
ध्यान रहे कि इस परियोजना पर अमेरिका ने आपत्ति जताई थी, जिसकी वजह ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध बताए गए थे.
हालांकि अब पाकिस्तान की ओर से एक हिस्से पर पाइपलाइन बिछाने की मंज़ूरी इसलिए दी गई है ताकि इस परियोजना पर काम न करने के कारण संभावित जुर्माने से बचा जा सके जो ईरान अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के ज़रिए पाकिस्तान पर लगा सकता है.
ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना क्या है?

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पाकिस्तान सरकार की ओर से ईरान- पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना के तहत ईरानी सीमा से लेकर तटीय शहर ग्वादर तक पाइपलाइन बिछाने की मंज़ूरी दी गई है.
पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्रालय के पूर्व सचिव जीए साबरी ने इस परियोजना पर काम किया है.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि इस परियोजना पर 1990 के दशक में बेनज़ीर भुट्टो के दौर में विचार किया गया. पहले यह परियोजना ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट थी.
बाद में भारत इस परियोजना से बाहर आ गया. इसकी वजह सुरक्षा ख़तरे बताए गए थे. हालांकि यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं था क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत था.
असल में भारत चाहता था कि पाकिस्तान ईरान से गैस की क़ीमत पहले तय करे और उसके बाद इस पर काम होता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद भारत ने इस परियोजना में शामिल होने से इनकार कर दिया.
इस्लामाबाद में रहने वाले ऊर्जा क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार ख़लीक़ कयानी इस परियोजना के बारे में लंबे समय से रिपोर्टिंग कर रहे हैं. वह पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ ज़रदारी के साथ ईरान जाने वाले उस शिष्टमंडल में भी थे जो इस परियोजना के उद्घाटन समारोह में शामिल हुआ था.
ख़लीक़ कयानी ने बीबीसी को बताया कि इस परियोजना पर सबसे पहले 1990 के दशक में विचार-विमर्श शुरू हुआ.
उन्होंने कहा कि 2000 के बाद इस परियोजना पर काम शुरू किया गया. साल 2013 में उस समय के राष्ट्रपति ज़रदारी और ईरानी राष्ट्रपति अहमदी निज़ाद ने इसका उद्घाटन किया था.
ख़लीक़ कयानी ने बताया कि भारत को भी यह अहसास हुआ कि उसकी गैस सप्लाई भी पाकिस्तान से होनी है, जो किसी समय भी उसे रोक सकता है, इसलिए वह इस परियोजना से निकल गया, जिसके बाद यह ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट रह गया.
उन्होंने बताया कि जब वे उद्घाटन समारोह में शामिल हुए थे तो ईरान ने अपनी ओर से इस पाइपलाइन का अधिकतर हिस्सा बना दिया था. पाकिस्तानी सीमा से 70-80 किलोमीटर के हिस्से पर काम बाक़ी था.
परियोजना गतिरोध का शिकार क्यों हुई?

मार्च 2013 में उस समय के पाकिस्तानी और ईरानी राष्ट्रपतियों की ओर से इस परियोजना के उद्घाटन के बाद इस परियोजना पर काम में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई.
जीए साबरी ने बताया कि इस परियोजना पर काम की रुकावट में एक बड़ी वजह तो अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध थे, लेकिन इसके अलावा यह भी सच्चाई है कि कुछ दूसरे देश इस पर काम होता नहीं देखना चाहते थे. ऐसे देश पाकिस्तान के अंदर गैस और तेल की परियोजनाओं में रोड़े अटकाते आए हैं.
वहीं ख़लीक़ कयानी ने कहा कि इस परियोजना पर पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के कार्यकाल में कोई प्रगति नहीं हुई.
इसकी वजह उन दोनों सरकारों की ओर से अमेरिका और सऊदी अरब के साथ संबंध बेहतर रखने की नीति थी. अमेरिका ने इस परियोजना पर आपत्ति जताई थी.
ख़लीक़ ने बताया कि ईरान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से उसका तेल और गैस का निर्यात भी पाबंदियों का शिकार है. जो कंपनी इस परियोजना पर काम करती है, उसे भी पाबंदियों का निशाना बनना पड़ सकता है.
ध्यान रहे कि पाकिस्तान सरकार की एक मंत्रिमंडलीय कमिटी ने अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी फ़र्म विल्की फ़र ऐंड गैलाहर से भी इस बारे में सलाह ली थी. उसने कहा था कि ईरान के साथ इस परियोजना पर काम करने वाली कंपनी को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है.
तनाव के बाद भी परियोजना पर दोबारा काम क्यों शुरू हुआ?

इस साल जनवरी के महीने में पाकिस्तान और ईरान के बीच संबंध में उस समय तनाव पैदा हो गया जब ईरान की ओर से पाकिस्तान सीमा के अंदर मिसाइल हमला किया गया. ईरान ने दावा किया कि इस हमले में आतंकवादियों को निशाना बनाया गया.
ईरान के हमले के जवाब में पाकिस्तान ने भी ईरान के अंदर मिसाइल हमले किए, जिसमें आतंकवादियों की मौत का दावा किया गया.
दोनों ओर से हमले के बाद कूटनीतिक स्तर पर इस समस्या को हल कर लिया गया था, लेकिन इस तनाव के एक महीने के बाद दोनों देशों के बीच गैस पाइपलाइन परियोजना पर पाकिस्तान की ओर से दी जाने वाली मंज़ूरी एक महत्वपूर्ण प्रगति है.
इस बारे में ख़लीक़ कयानी कहते हैं कि यह मंज़ूरी अचानक नहीं दी गई बल्कि इस पर कई महीनों से काम हो रहा था.
उन्होंने बताया कि चूंकि ईरान पर प्रतिबंधों की वजह से जो कंपनी भी इस परियोजना पर काम करेगी उस पर पाबंदी लगा सकती है, इसलिए अब इस परियोजना पर काम इंटर स्टेट गैस सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड कंपनी करेगी. यह कंपनी पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्रालय के तहत काम करती है.
उन्होंने कहा कि इस कंपनी का अंतरराष्ट्रीय अनुभव नहीं है. यानी कि यह बाहर से कोई सामान नहीं मंगवा रही है. इसका ग्राउंड पर भी अभी तक कोई काम नहीं है. इस पर पाबंदी लग सकती है.
उन्होंने बताया कि गैस इंफ़्रास्ट्रक्चर डिवेलपमेंट की मद में 500 अरब रुपए मौजूद हैं, जिससे इस पर काम की शुरुआत होगी.
उन्होंने कहा कि ईरानी सीमा से ग्वादर तक जो गैस पाइपलाइन बिछाई जाएगी उस पर 15 करोड़ 80 लाख डॉलर यानी 44 अरब पाकिस्तानी रुपए की लागत आने का अनुमान है.
उन्होंने बताया कि अगर पाकिस्तान इस परियोजना पर काम नहीं करता तो ईरान अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता काउंसिल में जा सकता है, जहाँ पाकिस्तान पर जुर्माना हो सकता है.
उन्होंने कहा कि हालांकि ईरान अभी तक देरी की वजह से वहाँ नहीं गया लेकिन वह किसी वक़्त भी जा सकता है. इससे बचने के लिए पाकिस्तान ने अपनी तरफ़ पाइपलाइन बिछाने को मंज़ूरी दी है.
ईरान से आने वाली गैस कितनी सस्ती होगी?

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इस परियोजना से पाकिस्तान को मिलने वाली गैस के सवाल पर जीए साबरी ने बताया कि जब इस परियोजना के बारे में शुरुआती काम किया गया था तो उस समय हर दिन एक अरब क्यूबिक फ़ीट गैस की उपलब्धता की बात की गई थी, लेकिन जब भारत इस परियोजना से निकल गया तो इसकी मात्रा में कमी लाई गई.
ख़लीक़ कयानी ने बताया कि इस परियोजना के तहत पाकिस्तान को 750 एमएमसीएफ़डी (मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक फ़ीट पर डे) गैस मिलेगी.
उन्होंने कहा कि ईरान से जो गैस ग्वादर पहुंचेगी, वह ग्वादर की ज़रूरत से बहुत अधिक है क्योंकि ग्वादर में घरेलू और औद्योगिक गैस की ज़रूरत भी 100 एमएमसीएफ़डी से अधिक नहीं हो सकती.
इसलिए बाक़ी गैस को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाया जाएगा. इसे ग्वादर से पाइपलाइन से साउथ-नॉर्थ पाइपलाइन में लाया जाएगा. यह पाइपलाइन रूस की मदद से बनाई जा रही है. इस पर काम की गति काफ़ी बढ़ चुकी है.
पाकिस्तानी उपभोक्ताओं के लिए इस गैस की क़ीमत के साव लपर साबरी ने कहा कि इस गैस को आयातित एलएनजी से 30 से 40 फ़ीसदी सस्ती होनी चाहिए तभी यह स्थानीय उपभोक्ताओं के लिए आर्थिक तौर पर लाभदायक होगी.
उन्होंने बताया कि स्थानीय गैस से यह महंगी होगी, क्योंकि स्थानीय गैस पुरानी गैस फ़ील्ड से निकाली जाती है, जिसकी दर कम है.
ख़लीक़ कयानी ने बताया कि इसकी दर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेंट ऑयल की क़ीमत के साथ जुड़ी होती है, लेकिन यह विदेश से मंगवाई जाने वाली एलएनजी से सस्ती और देश के अंदर पैदा होने वाले स्थानीय गैस से महंगी होगी. उन्होंने कहा कि जब परियोजना पूरी हो जाएगी तो इस गैस की क़ीमत पर दोबारा बातचीत होगी.
इस परियोजना पर काम करने वाली इंटर स्टेट गैस कंपनी से पक्ष लेने के लिए संपर्क किया गया तो उन्होंने बीबीसी के लिखित सवालों के जवाब के लिए वक़्त मांगा. इसकी वजह इस परियोजना की जानकारी देने के लिए एक औपचारिक प्रक्रिया है.
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