रूस क्या चीन के लिए अब भारत के ख़िलाफ़ जा सकता है?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दो फ़रवरी को लोकसभा में कहा था कि मोदी सरकार की ग़लत रणनीति के कारण चीन और पाकिस्तान साथ आ गए हैं.
राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा था कि जम्मू और कश्मीर में 'ग़लत रणनीति' के कारण चीन-पाकिस्तान साथ आ गए हैं और सरकार ने भारत की जनता के ख़िलाफ़ एक बड़ा अपराध किया है.
अब कहा जा रहा है कि यूक्रेन संकट ने रूस और चीन को भी साथ ला दिया है.
चीन और पाकिस्तान का साथ आना भारत के लिए किसी भी लिहाज से अच्छा नहीं हो सकता है. दोनों देशों से भारत के सीमा विवाद हैं और दोनों से भारत के युद्ध भी हो चुके हैं.
रूस को पारंपरिक रूप से भारत का दोस्त माना जाता है लेकिन यूक्रेन संकट के कारण जैसी वैश्विक स्थिति पैदा हुई है, उसमें रूस के लिए चीन ज़्यादा अहम हो गया है.
चीन की अहमियत को भारत कम नहीं कर सकता है. ऐसे में चीन और रूस की क़रीबी बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है.
यूरोपियन यूनियन की अध्यक्ष उर्सुला वोन भारत में आई थीं.
वोन ने सोमवार को नई दिल्ली में आयोजित वार्षिक रायसीना डायलॉग सत्र के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि रूस और चीन के बीच दोस्ती की कोई सीमा नहीं है.
उर्सुला जब यह बात कह रही थीं तब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर भी मौजूद थे.

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भारत के लिए मुश्किल परिस्थिति
ईयू प्रमुख ने चीन और रूस के संबंधों की व्याख्या करते हुए कहा, "दोनों देशों ने घोषणा कर रखी है कि उनकी दोस्ती की कोई सीमा नहीं है. इस साल फ़रवरी में ही इन्होंने कहा था कि ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसमें दोनों देशों के बीच सहयोग नहीं है. इसके बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया. हम इन दोनों से नए अंतरराष्ट्रीय संबंधों में क्या उम्मीद कर सकते हैं, जबकि दोनों अपनी मंशा बता चुके हैं."
उर्सुला ने ये भी कहा कि यूक्रेन मामले में यूरोप रणनीतिक रूप से कामयाब नहीं रहा है. उन्होंने कहा कि रूस पर प्रतिबंध लगाना कोई अकेला समाधान नहीं है.
जब रूस और यूक्रेन में तनाव बढ़ रहा था तब ही आशंका जताई जा रही थी कि यह भारत के लिए मुश्किल परिस्थिति पैदा करने वाला साबित होगा.
आशंका जताई जा रही थी कि यूक्रेन संकट में रूस-चीन की दोस्ती और गहराएगी, जो भारत के लिए ठीक नहीं होगी.
कई विशेषज्ञों का मानना है कि यूक्रेन संकट ने रूस को चीन के और क़रीब ला दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने इसी डर से यूक्रेन संकट में ख़ुद को तटस्थ रखने की कोशिश की.

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क्या चीन और रूस की दोस्ती भारत के ख़िलाफ़ जाएगी?
यूक्रेन को लेकर संयुक्त राष्ट्र में जितनी बार रूस के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पर वोटिंग हुई, भारत ने वोट नहीं किया. भारत ने यूक्रेन पर हमले की रूस का नाम लेकर निंदा नहीं की.
भारत ने पश्चिमी देशों के दबाव के सामने रूस को लेकर अपनी रणनीति उस तरह से नहीं बदली. लेकिन क्या भारत की यह रणनीति चीन और रूस को क़रीब लाने से रोकने में कामयाब रही?
रेज़ा-उल हसन लस्कर अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में अंतरराष्ट्रीय संपादक हैं.
वह कहते हैं, "भारत के लिए अभी बेहद मुश्किल स्थिति है. यूक्रेन पर रूस के हमले से लेकर अब तक देखें तो भारत के बयान और रुख़ बदले हैं. शुरू में भारत ने सभी पक्षों की सुरक्षा चिंताओं की बात की. भारत ने फिर संप्रभुता की बात की. बुचा में रूसी हमले के बाद भारत ने हिंसा की निंदा की. हालाँकि रूस का नाम नहीं लिया. भारत और रूस बहुत गहरे दोस्त हैं लेकिन रूस को अभी की वैश्विक परिस्थिति में चीन की ज़रूरत है और चीन को भी अमेरिका के ख़िलाफ़ रूस की ज़रूरत है."
रेज़ा-उल हसन लस्कर कहते हैं, "यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले चीन और रूस का साझा बयान आया था. इसी बयान में कहा गया था कि रूस और चीन की दोस्ती की कोई सीमा नहीं है. इसी से स्पष्ट होता है कि रूस और चीन के बीच सहयोग किस स्तर पर है. यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद दोनों देश और क़रीब आए हैं. चीन का सहयोग रूस से और बढ़ा है. ज़ाहिर है कि यह भारत के लिए बहुच अच्छी ख़बर नहीं है. चीन से सरहद पर तनाव जारी है. भारत अब भी रूसी हथियारों पर निर्भर है. ऐसे में चीन से तनाव और बढ़ता है तो रूस और चीन का गठजोड़ भारत के हक़ में नहीं होगा."
क्या चीन के साथ रूस की साझेदारी भारत के ख़िलाफ़ भी जा सकती है?
इस सवाल के जवाब में रेज़ा-उल हसन लस्कर कहते हैं, "मैं इतना ही कह सकता हूँ कि भारत के लिए स्थिति बेहद संवेदनशील है. भारत को संतुलनवादी रुख़ पर और अडिग होना होगा."
रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता
पिछले 30 सालों में चीन और रूस के संबंधों का विस्तार हुआ है. पिछले साल 28 जून को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच वर्चुअल समिट हुआ था.
यह समिट 'ट्रीटी ऑफ गुड नेबरलीनेस एंड फ्रेंडली कोऑपरेशन' की 20वीं बरसी के मौक़े पर हुआ था. समिट के बाद राष्ट्रपति पुतिन और जिनपिंग का साझा बयान जारी हुआ था.
साझे बयान में कहा गया था, "शीत युद्ध के दौरान जिस तरह से सैन्य और राजनीतिक गठजोड़ था, वैसा हमलोग के बीच नहीं है लेकिन दोनों देशों का संबंध इससे बढ़कर है. हमारा संबंध मौक़ापरस्ती से परे है और हम एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं."
सोवियत संघ के पतन के बाद रूस और चीन के रिश्ते लगातार मज़बूत हुए हैं. सोवियत के ज़माने से ही दोनों देशों के बीच सीमा विवाद था.
साल 1969 में सीमा विवाद को लेकर सोवियत संघ और चीन आपस में भिड़े भी थे. हालांकि 2001 के बाद दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ता गया. शी जिनपिंग और पुतिन के शासनकाल में दोनों देश लगातार नज़दीक आते गए.
रूस और चीन के संबंध को गति देने में चार अहम कारकों का अक़्सर ज़िक्र होता है. दोनों देशों के बीच 4,200 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है. दोनों देश चाहते हैं कि सीमा पर शांति बनी रहे. 1989 से ही रूसी नेता मिखाइल गोर्बाचोव और चीनी नेता डेंद श्याओपिंग ने सीमा विवाद सुलझाने की कोशिश की थी. 2006 में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद का अंत हो गया और द्विपक्षीय संबंधों की सारी अड़चनें जाती रहीं.

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अर्थव्यवस्था और व्यापार
दोनों देशों की अर्थव्यवस्था भी एक दूसरे से जुड़ी हुई है. रूस में प्राकृतिक संसाधनों की भरमार है लेकिन उसे तकनीक की ज़रूरत है. इस मामले में चीन रूस के लिए मददगार बन रहा है. चीन ने घोषणा की है कि 2060 तक वह अपनी अर्थव्यवस्था को कार्बन मुक्त कर लेगा.
लेकिन इसके लिए उसे कोयला से प्राकृतिक गैस की ओर बढ़ना होगा. दोनों देशों के बीच व्यापार 2001 में 10.7 अरब डॉलर का था जो 2021 में बढ़कर 140 अरब डॉलर पहुँच गया. इसके अलावा दोनों देश कई परियोजनाओं पर साथ मिलकर काम कर रहे हैं.
साइबेरिया गैस पाइपलाइन पूरी क्षमता 36 अरब क्यूबिक मीटर प्रति वर्ष से काम कर रही है. इसके अलावा साइबेरिया 2 भी है, जिसकी क्षमता 50 अरब क्यूबिक मीटर प्रति वर्ष है.
चीन लैंड रूट के ज़रिए रूस में अपनी पहुँच सुनिश्चित करने में लगा है तो रूस चाहता है कि वह यूरोप के बाज़ार से अपनी निर्भरता कम करे. इसके अलावा दोनों देशों की राजनीतिक और घरेलू व्यवस्था में कोई समानता नहीं है पर दोनों देशों में एक ऐसा शासन है, जो व्यक्ति केंद्रित है.
पुतिन को रूस में कोई चुनौती देने वाला नहीं है और शी जिनपिंग को चीन में. दोनों एक दूसरे के घरेलू मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करते हैं. न तो चीन रूस के विपक्षी नेता एलेक्सेई नवालनी को क़ैद किए जाने पर बोलता है और न ही रूस चीन के शिन्जियांग प्रांत के अलावा हॉन्ग कॉन्ग में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर बोलता है. पुतिन और जिनपिंग के बीच निजी स्तर पर संबंधों में भरोसे की बात कही जाती है.
दोनों मुल्क संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं. दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वैश्विक मुद्दे पर साथ मिलकर काम करते हैं. अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के ख़िलाफ़ दोनों देश संयुक्त राष्ट्र में एक लाइन पर होते हैं.
दोनों देश साथ में मिलकर हथियारों के उत्पादन पर भी काम कर रहे हैं. दोनों के बीच सैन्याभ्यास का भी विस्तार हुआ है. पश्चिम के ख़िलाफ़ दोनों देश एक आवाज़ में बोलते हैं. अमेरिका और यूरोप के बढ़ते प्रतिबंधों के कारण रूस की निर्भरता चीन पर बढ़ी है.

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रूस और चीन की दोस्ती की सीमाओं से परे है?
क्या रूस और चीन की दोस्ती वाक़ई सीमाओं से परे है? एलेक्जेंडर गाबुएव कर्नेगे एन्डॉमेंट फोर इंटरनेशल पीस के सीनियर फेलो हैं. उन्होंने पिछले साल 31 दिसंबर को लिखा था कि दोनों देशों के संबंधों में गहराई के बावजूद उसकी सीमाएं भी हैं.
उन्होंने लिखा है, "सबसे अहम है कि दोनों देश अपनी सामरिक स्वायत्तता को लेकर काफ़ी संवेदनशील है. इसलिए दोनों देश आपस में सुरक्षा गांरटी वाली व्यवस्था पर आग नहीं बढ़ सकते जैसे कि अमेरिका ने नेटो जैसा गठजोड़ बना रखा है. इसके अलावा अमेरिका का इंडो-पैसिफिक में भी सुरक्षा गारंटी को लेकर गठजोड़ बन रहा है. दोनों देशों के अलग-अलग वैश्विक सुरक्षा हित भी है. मिसाल के तौर पर चीन ने क्राइमिया को लेकर रूस को समर्थन नहीं दिया था. सीरिया और अफ़्रीका में भी रूस के सैन्य अभियान को चीन ने समर्थन नहीं दिया था. इसके साथ ही रूस चीन को ताइवान के मामले में बहुत आक्रामक होकर समर्थन नहीं देता है. साउथ चाइना सी में भी रूस चीन के सैन्य ठिकानों से समहत नहीं है."
एलेक्जेंडर गाबुएव का कहना है कि आर्थिक मोर्चे पर भी दोनों देशों के संबंधों की सीमाएं हैं. उन्होंने लिखा है, "ऐतिहासिक रूप से रूस में चीनी कंपनियों का कोई बड़ा निवेश नहीं रहा है. रूस में निवेश का माहौल भी ऐसा नहीं है. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार बढ़ रहा है, तब भी यह स्थिति है."

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वैश्विक हथियार निर्यात
यह भी तर्क दिया जा रहा है कि चीन और रूस की दोस्ती बराबरी की नहीं है. रूस के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में चीन की हिस्सेदारी 2013 में 10.5 फ़ीसदी थी जो 2021 में क़रीब 20 फ़ीसदी हो गई.
आने वाले दिनों में पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण चीन की हिस्सेदारी और बढ़ेगी. दूसरी तरफ़ चीन की रूस पर आर्थिक निर्भरता बहुत मामूली है.
साल 2021 के अंत तक चीन के व्यापार में रूस की हिस्सेदारी महज़ 2.4 फ़ीसदी थी. कहा जा रहा है कि रूस को चीन की ज़्यादा ज़रूरत है और चीन को रूस की ज़रूरत कम है.
भारत और वियतनाम के संबंध चीन से अच्छे नहीं हैं लेकिन रूस के संबंध बहुत अच्छे हैं. सोवियत के ज़माने से ही रूस के संबंध भारत और वियतनाम से अच्छे रहे हैं.
पिछले पाँच सालों में रूसी हथियारों की भारत में बिक्री बढ़ी है. 2016 से 2020 के बीच रूस के कुल वैश्विक हथियार निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 23 फ़ीसदी है. इसके अलावा 1990 के दशक से वियतनाम में रूसी हथियारों की बिक्री बढ़ी है.
एलेक्ज़ेंडर ने लिखा है, "ऐतिहासिक रूप से भारत और वियतनाम को रूसी हथियार मिलने के कारण चीन असहज रहा है. बदलती सुरक्षा व्यवस्था में चीन रूस पर भारत और वियतनाम को हथियार देने के मामले में दबाव बना सकता है. अभी चीन इस स्थिति में नहीं है कि रूस को भारत को हथियार देने के मामले में रोके लेकिन भविष्य में ऐसा हो सकता है. मध्य एशिया में चीन की मौजूदगी पिछले कुछ सालों में तेज़ी से बढ़ी है. मध्य एशिया के बाज़ार में चीनी बाज़ार फैल रहा है और यह रूस के लिए चिंतित करने वाला है."

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भारत क्या करेगा?
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में मध्य एशिया और रूसी अध्ययन केंद्र की प्रमुख प्रोफ़ेसर अर्चना उपाध्याय कहती हैं कि रूस चीन के लिए भारत को नहीं छोड़ सकता है और न भारत पश्चिम के लिए रूस को छोड़ सकता है.
वह कहती हैं, "रूस और चीन की दोस्ती भी सीमा से परे नहीं है. दोनों देशों के हालिया संबंध ज़रूर गहरे हुए हैं लेकिन दोनों की ज़रूरतें भी टकराती हैं. भारत और रूस के संबंध में जो ऐतिहासिकता और भरोसा है, वो चीन और रूस में नहीं है. गलवान में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हिंसक झड़प हुई. इसमें चीन और भारत दोनों देशों के सैनिकों की मौत हुई लेकिन रूस ने हथियारों की आपूर्ति नहीं रोकी. रूस ने भारत को कभी छोड़ा नहीं है और मुझे लगता है कि आगे भी नहीं छोड़ेगा."
अर्चना उपाध्याय कहती हैं कि पश्चिम की नज़र भारत के बाज़ार पर है. वह कहती हैं, "पश्चिम भारत के हथियार ज़रूरतों में रूस की भूमिका को ख़त्म करना चाहता है लेकिन भारत भूल नहीं जाएगा कि परमाणु परीक्षण पर कैसे पश्चिम ने प्रतिबंध लगाए थे. अमेरिका ने कैसे पाकिस्तान को बढ़ावा दिया और भारत में आतंकवादी हमले को लेकर दोहरा रवैया अपनाया. रूस हमारा परखा हुआ पार्टनर है. उसे भारत किसी भी दबाव में नहीं छोड़ सकता है. रूस में प्राकृतिक संसाधनों की भरमार है और आने वाले दिनों में हमारा ऊर्जा सहयोग और बढ़ने वाला है."
अर्चना उपाध्याय कहती हैं कि भारत की विदेश नीति अब दबाव से मुक्त है और इसका ताज़ा उदाहरण है कि भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वॉशिंगटन में दो टूक कहा कि अगर भारत में मानवाधिकारों को लेकर अमेरिका के कुछ विचार हैं तो भारत भी अमेरिका में मानवाधिकारों की स्थिति पर अपनी राय रखता है. अर्चना उपाध्याय कहती हैं कि अमेरिका में उसी की भाषा में उसके जवाब पहली बार दिया गया. इसके अलावा रूस से तेल ख़रीदने पर भी एस जयशंकर ने कहा था कि यूरोप एक दोपहर में रूस से जितना तेल ख़रीदता है, उतना भारत एक महीने में ख़रीदता है.
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