शी-पुतिन मुलाक़ात: रूस-चीन नज़दीकियों के भारत और पश्चिम के लिए क्या हैं मायने?

पुतिन, मोदी और शी

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, पवन सिंह अतुल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के नेता शी जिनपिंग के बीच वीडियो कॉल के ज़रिए बातचीत हुई है. ये बातचीत दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग का एक और उदाहरण है.

बैठक के बाद रूसी राष्ट्रपति के कार्यालय क्रेमलिन ने एक बयान में कहा है कि रूस-चीन संबंध अप्रत्याशित रूप से सकारात्मक हो गए हैं. बयान में कहा है कि दोनों नेता एशिया-पैसेफ़िक में यथास्थिति को बदलने की अमेरिकी कोशिशों पर चिंता व्यक्त करते हैं.

हाल की दिनों में अमेरिका और पश्चिमी देश, चीन को ताइवान और रूस को यूक्रेन के मुद्दे पर घेरते रहे हैं. इस पृष्ठभूमि में रूस-चीन की बातचीत काफ़ी महत्व रखती है.

बातचीत के बाद रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने पश्चिमी देशों के बीजिंग विंटर ओलंपिक खेलों के राजनयिक बहिष्कार को ग़लत बताते हुए कहा कि वे ओलंपिक के दौरान स्वयं चीन जाएँगे.

चीन के शिनजियांग प्रांत में वीगर मुसलमानों के मानवाधिकारों और हॉन्ग कॉन्ग में लोकतंत्र के दमन पर चिंता जताते हुए ब्रिटेन, कनाडा, न्यूज़ीलैंड लिथुआनिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका ने इन खेलों में राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजने का निर्णय लिया है.

नज़दीकियों की पृष्ठभूमि

शी और पुतिन

इमेज स्रोत, EPA

हाल के दिनों में रूस को यूक्रेन के मसले पर पश्चिम के साथ काफ़ी जूझना पड़ रहा है. पश्चिमी देशों का कहना है कि रूस ने यूक्रेन की सीमा पर सेना की भारी तैनाती की है. उन्होंने रूस को चेतावनी भी दी है कि अगर यूक्रेन के ख़िलाफ़ कोई सैन्य क़दम उठाया तो, उसे भारी क़ीमत चुकानी होगी.

रूस यूक्रेन पर हमले की किसी भी योजना से इनकार करता रहा है.

उधर, चीन ने हाल की महीनों में ताइवान पर काफ़ी दवाब डाला है. चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है, जिसे एक दिन चीन में शामिल होना है. ताइवान इस चीनी आकलन से सहमत नहीं है. चीन के दवाब के चलते दुनिया का कोई देश ताइवान के साथ कूटनीतिक संबंध तक नहीं बनाता.

लेकिन चीनी फ़ाइटर विमानों के ताइवान के वायु क्षेत्र में लगातार उड़ान भरने के मामले में अमेरिका ने कहा था कि चीन अगर ताइवान पर हमला करता है, तो अमेरिका ताइवान की रक्षा करेगा.

चीन और रूस की नज़दीकियों को इस संदर्भ में देखना ज़रूरी है.

अमेरिकी विदेश नीति का असर?

चीन

इमेज स्रोत, Getty Images

अलका आचार्य दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फ़ॉर ईस्ट एशियन स्टडीज़ में पढ़ाती हैं. वे इंस्टीट्यूट ऑफ़ चाइनीज़ स्टडीज़ से भी जुड़ी हैं.

अलका आचार्य ने बीबीसी हिंदी को इस घटनाक्रम पर बताया, "पश्चिमी देशों की तरफ़ से पड़ रहा दवाब रूस और चीन के संबंधों के गाढ़े होने की एकमात्र वजह नहीं है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही उथल-पुथल भी अहम कारण है. ट्रंप के ज़माने से शुरू हुई समस्याएँ, बाइडन के दौर में भी बरक़रार हैं. बाइडन प्रशासन को लगता है कि ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थोड़ा पीछे हट गया था. इसी सिलसिले में अमेरिका नेटो को मज़बूत करना चाहता है और एशिया में अपने सहयोगियों के साथ खड़े होना चाहता है."

"रूस और चीन दोनों की आशंका ये है कि बाइडन की विदेश नीति की वजह से उन्हें नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. दोनों का कहना है कि उनका रिश्ता दुनिया को एक स्थायित्व देगा."

चीन और रूस ने इस वर्ष सैन्य अभ्यास भी किए हैं और ये दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग के और उदाहरण हैं.

नंदन उन्नीकृष्णन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में यूरेशिया विभाग देखते हैं. उन्होंनें रूस पर कई किताबें भी लिखी हैं. बीबीसी ने उन्नीकृष्ण से पूछा कि रूस को चीन से मित्रता बढ़ाने का विचार कब आया.

उन्होंने कहा, "जब 2008 में पुतिन को ये समझ आ गया है कि पश्चिमी देश रूस के साथ बराबरी के संबंध नहीं चाहते हैं, तब उन्होंने चीन से संबंधों को मज़बूत करने की कोशिशें शुरू कर दीं. साल 2014 में जब रूस ने क्राइमिया को अपने क़ब्ज़े में ले लिया, तो पश्चिमी देशों और रूस के बीच संबंध बेहद ख़राब हो गाए. इन हालात में रूस ने चीन और अन्य एशियाई देशों की ओर रुख़ किया."

मुक़ाबला

बाइडन और शी

इमेज स्रोत, Alex Wong/Getty Images

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बनने के बाद चीन के साथ अमेरिकी प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी तो हालात बदले. उन्नीकृष्णन कहते हैं ट्रंप के आने के बाद रूस और चीन, दोनों का एक ही विरोधी था-अमेरिका. इसके बाद दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर में अपनी नीतियों में तालमेल बनाना शुरू कर दिया.

उनके मुताबिक़ ये सारा संघर्ष इस बात को लेकर है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कौन 'टॉप डॉग' बनेगा. अमेरिका अपना सुपरपॉवर का स्टेटस बरकरार रखना चाहता है इसलिए वो चीन की बढ़ने की रफ़्तार को धीमा कर रहा है.

उन्नीकृष्णन कहते हैं, "दुनिया में इस वक्त अमेरिका और चीन के बीच मुक़ाबला ही प्राथमिक विरोधाभास है. यही विरोधाभास विभिन्न देशों के आपसी रिश्तों और इन ताक़तों के साथ संबंधों को परिभाषित कर रहा है. रूस पश्चिमी देशों से कहना चाह रहा है कि अगर आप चीन के साथ मुकाबले में मुझे न्यूट्रल देखना चाहते हैं तो उसकी क़ीमत चुकाएँ."

रूस चाहता है कि यूक्रेन और जॉर्जिया को किसी भी सूरत में नेटो का हिस्सा न बनाया जाए. और उसके तटस्थ रहने की यही क़ीमत हो सकती है.

क्या चीन-रूस का सैन्य गठबंधन बनेगा?

रूस और चीन

इमेज स्रोत, Dima Korotayev/Getty Images

चीन और रूस ने संयुक्त सैनिक अभ्यास में हिस्सा लिया है. सबसे ताज़ा अभ्यास अक्तूबर में दोनों देशों की नौसेनाओं का हुआ जिस नाम दिया गया ज्वाइंट सी-2021. ये इन देशों के बीच बढ़ते राजनीतिक और सैनिक सहयोग का स्पष्ट संकेत था.

मौजूदा वक़्त में अमेरिका के सुपरपॉवर स्टेटस को चीन ही चुनौती दे रहा है. चीन की बढ़ती आर्थिक और सैन्य ताक़त पर अमेरिका चिंता जता चुका है. क्या अमेरिका के दबदबे से निपटने के लिए भविष्य में चीन-रूस कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन बना सकते हैं?

अलका आचार्य कहती हैं, "चीन और रूस के बीच एक बहुत गाढ़ा सैन्य सहयोग बनता दिख रहा है. ये भले ही कोई अलांयस न हो, लेकिन कई मायनों में उसके क़रीब है. रूस ताइवान पर चीन के साथ है और उसने साफ़ शब्दों में कहा है कि वो 'वन चाइना' की नीति पर विश्वास रखता है. 2001 में रूस और चीन के बीच हुए समझौते में ये लिखा है. चीन की अपेक्षा है कि रूस उसे ताइवान और साउथ चाइना सी में मदद करे और रूस चाहेगा कि यूक्रेन या यूरोप में रूसी हितों पर चीन उसका साथ दे."

आचार्य कहती हैं कि अगर रूस और चीन का अमेरिका और पश्चिमी देशों से यूक्रेन, ताइवान और साउथ चाइना सी पर मतभेद गहराया, तो कुछ भी संभव है.

लेकिन नंदन उन्नीकृष्णन ऐसे किसी औपचारिक गठबंधन के आसार नहीं देखते हैं. वे कहते हैं, "मैं रूस और चीन के बीच कोई औपचारिक मिलिट्री अलायंस की कल्पना नहीं कर सकता. एक ही सूरत में ये हो सकता है. और वो ये कि पश्चिमी देश एक साथ रूस और चीन पर आक्रमण कर दें. मौजूदा स्थिति में देखें तो रूस साउथ चाइना सी पर चीन का साथ नहीं देता. चीन क्राइमिया के अधिग्रहण पर रूस से बिल्कुल सहमत नहीं है. रूस चीन के विरोधियों जैसे भारत और वियतनाम को भरपूर हथियार सप्लाई करता है."

इसके अलावा भी रूस और चीन के बीच रिश्तों में कुछ विरोधाभास हैं जिनकी वजह से अभी किसी सैन्य गठजोड़ की संभावना नज़र नहीं आती.

चीन रूस के क़रीब तो भारत-रूस संबंधों का क्या?

पुतिन और मोदी

इमेज स्रोत, Getty Images

भारत-रूस के बीच मज़बूत द्विपक्षीय संबंध हैं. ये मज़बूती शायद सोवियत संघ के ज़माने सरीखी नहीं, लेकिन अब भी भारत का अधिकतर सैन्य साज़ो-सामान रूस से ही आता है.

रूस और चीन के बीच बढ़ती दोस्ती से क्या भारत के रूस के साथ संबंध प्रभावित होंगे?

प्रोफ़ेसर अलका आचार्या कहती हैं, "रूस सिर्फ़ चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहेगा. उसने बीते कुछ वर्षों में पाकिस्तान से संबंध बेहतर किए हैं. साउथ ईस्ट एशिया में वो एक बड़ा आर्म सप्लायर है. भारत का 70 फ़ीसदी डिफ़ेंस का सामान रूस से आता है. और हाल ही में पुतिन-मोदी मुलाक़ात से रूस ने ये भी दिखाया है कि भारत के साथ उनका एक स्वतंत्र रिश्ता है. भारत और चीन के बीच किसी संघर्ष की स्थिति में रूस न्यूट्रल रहेगा, लेकिन भारत को हथियारों की सप्लाई जारी रखेगा."

मॉस्को में पत्रकारिता कर चुके नंदन उन्नीकृष्णन ने इसी विषय पर किताब भी लिखी है जिसका शीर्षक है - ट्रेंड्स इन रशिया-चाइना रिलेशंस, इम्पलिकेशन फ़ॉर इंडिया. वे बताते हैं कि इस वक्त चीन, भारत का सबसे बड़ा विरोधी है और भारत उससे निपटने के लिए हर ज़रूरी क़दम उठाएगा.

नंदन कहते हैं, "पहले हम रूस से मदद लेते थे. अब रूस और चीन साथ आ रहे हैं तो हमारा झुकाव अमेरिका की ओर है. इस समय भारत के प्राथमिक संबंध रूस से नहीं अमेरिका से हैं. मौजूदा भारत-रूस संबंधों की तुलना पुराने सोवियत ज़माने से नहीं की जानी चाहिए. लेकिन रूस के साथ संबंध सदृढ़ होते रहेंगे क्योंकि उनसे हमारे सामरिक हित सधते हैं. भारत दुनिया में किसी के आधिपत्य की हिमायत नहीं करता."

वे कहते हैं कि रूस कभी भी भारत के विरुद्ध चीन का साथ नहीं देगा, न खुले तौर पर और न ही छिपकर. क्योंकि भारत-चीन संबंधों के तनाव भरे साल 2020 में भी रूस की भारत को हथियारों की सप्लाई लगातार जारी रही.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)