तेल की ज़रूरत पर क्या हम रोक लगा सकते हैं? - दुनिया जहान

जलवायु परिवर्तन

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जुलाई में विंबलडन टेनिस प्रतियोगिता के दौरान लोग हैरान रह गए जब अचानक कुछ प्रदर्शनकारियों ने हवा में कन्फेटी यानि नारंगी रंग के काग़ज़ के टुकड़े बरसाना शुरू कर दिया और खेल रुक गया.

यह घटना अजीब तो थी लेकिन पहली बार नहीं घट रही थी. कई बड़ी खेल प्रतियोगताओं के दौरान पर्यावरण संबंधी कार्यकर्ताओं के गुट ‘जस्ट स्टॉप ऑइल’ ने पहले भी इस तरह का विरोध प्रदर्शन किया है.

इस गुट की मांग है कि ब्रिटेन की सरकार तेल की खोज के लिए लाइसेंस जारी करना बंद करे.

ब्रिटेन की सरकार अगले कुछ सालों में तेल और गैस उत्पादन के लिए लगभग 100 प्रोजेक्ट शुरू करना चाहती है.

सभी को पता है कि तेल और गैस का जलवायु परिवर्तन पर क्या असर पड़ता है. लेकिन फिर भी कई देश तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

दरअसल कई देशों की अर्थव्यवस्था इस हद तक तेल पर निर्भर है कि उनके लिए इसे ख़त्म करने के बारे में सोचना भी असंभव है.

इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानेंगे कि क्या हम तेल की ज़रूरत पर रोक लगा सकते हैं?

वीडियो कैप्शन, ऑयल ड्रिलिंग के दौरान बड़े पैमाने पर गैस निकलती है, जिसे जलाकर ख़त्म किया जाता है.

इतिहास

तेल इतिहासकार और यूरेशिया ग्रुप में विश्लेषक ग्रेगरी ब्रू ने बताया फ़िलहाल दुनिया में प्रतिदिन 10 करोड़ बैरल तेल की खपत हो रही है. पिछले 75 सालों में तेल की खपत दस गुना बढ़ गई है.

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एपिसोड

समाप्त

लगभग 150 साल पहले अमेरिका के पूर्वी पेन्सिल्वेनिया क्षेत्र में तेल भंडारों की खोज होने के बाद पहली बार इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हुआ था.

ग्रेगरी कहते हैं, “19वीं सदी के मध्य से 20वीं सदी की शुरुआत तक दुनिया में सबसे अधिक तेल का उत्पादन अमेरिका में होता रहा और वहीं सबसे अधिक खपत भी होती रही.”

1870 के दशक में जॉन रॉकरफ़ेलर नाम के एक अमेरिकी ने स्टैंडर्ड ऑइल कंपनी की स्थापना की. 19वीं सदी के अंत तक तेल उद्योग में इस कंपनी का एकाधिकार बन गया था.

इसके वर्चस्व को तोड़ने के लिए 1911 में अमेरिकी सरकार ने इस कंपनी को तीन हिस्सों में बांट दिया और तीन नई कंपनियां बनीं. ये थीं- शेवरॉन, मोबिल और एक्सॉन.

20वीं सदी की शुरुआत में औद्योगिक क्रांति पूरे विश्व में फैल गई थी और मशीनों और वाहनों के लिए तेल की मांग बढ़ गई थी. तेल का इस्तेमाल युद्ध में होने लगा था.

ग्रेगरी ब्रू कहते हैं कि, “बीसवीं सदी में युद्ध का स्वरूप आधुनिक होता चला गया जिसमें मशीनों का इस्तेमाल होने लगा. टैंक, युद्धक नौकाओं और विमानों के लिए तेल की ज़रूरत थी जिसकी सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए कई देशों ने क़दम उठाने शुरू कर दिए थे.”

यूरोपीय देशों ने तेल निकालने के लिए एशिया, अफ़्रीका और मध्य-पूर्व में अपने साम्राज्य के अधीन देशों का रुख़ किया.

इस तरह रॉयल डच शेल, ब्रिटिश पेट्रोलियम और टोटेल जैसी तेल कंपनियां मैदान में आईं.

वीडियो कैप्शन, अब किस ईंधन पर है सऊदी अरब की नज़र?

ग्रेगरी ब्रू का कहना है कि ये बड़ी कंपनियां तेल के बाज़ार में आ गईं लेकिन जिन देशों में तेल था उन देशों के पास तेल के नियंत्रण और क़ीमत तय करने के कुछ ख़ास अधिकार नहीं थे. क्योंकि इनमें से कई देश यूरोपीय देशों के नियंत्रण में थे.

ईरान, इराक़, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला जैसे देशों के पास तेल के विशाल भंडार थे लेकिन बड़ी तेल कंपनियों के साथ व्यापार की शर्तें तय करने की शक्ति नहीं थी. उन कंपनियों को बड़ी यूरोपीय शक्तियों का समर्थन हासिल था.

लेकिन 1950 के बाद स्थिति बदलने लगी और उन देशों ने अपने तेल भंडारों के नियंत्रण के लिए आवाज़ उठाना शुरू कर दिया.

1960 में ईरान, इराक़, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेज़ुएला ने तेल निर्यातक देशों के संगठन ‘ओपेक’ का गठन किया.

10 साल बाद इराक़, कुवैत और सऊदी अरब सहित कई देशों ने अपने तेल उद्योग का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया.

वीडियो कैप्शन, एस जयशंकर का वो जवाब जो वायरल हो गया

1970 में ओपेक के सदस्य देशों ने अपने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकण कर दिया और बड़ी विदेशी कंपनियों को बाहर कर तेल की क़ीमत भी बढ़ा दी.

इसके बाद तेल की क़ीमतों में अप्रत्याशित उतार चढ़ाव आने लगे. ओपेक देशों ने केवल अपने तेल उत्पादन का नियंत्रण अपने हाथ में नहीं लिया बल्कि विश्व के तेल बाज़ार पर अपना प्रभाव डालना शुरू कर दिया.

उस समय ओपेक दुनिया के आधे से अधिक तेल उत्पादन को नियंत्रित कर रहा था और इसका संबंध राजनीति से भी था.

1973 में जब इसराइल के मिस्र और सीरिया के साथ युद्ध में अमेरिका ने इसराइल का साथ दिया तो ओपेक देशों ने अमेरिका को तेल सप्लाई करने वाले टैंकरों पर रोक लगा दी.

इसकी वजह से अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में तेल की क़ीमतें बढ़ गईं. और यह साफ़ हो गया कि दुनिया की राजनीति की तस्वीर बदल गई है और अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे पर कितना निर्भर हैं.

ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान भी विश्व में तेल की सप्लाई प्रभावित हुई थी.

और अब रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण करने के बाद रूस के तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.

ग्रेगरी ब्रू कहते हैं कि “अब साफ़ है कि युद्ध की वजह से तेल की क़ीमत बहुत अधिक बढ़ सकती है और कई देशों को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में तार्किक बात तो यही होगी कि हम तेल पर अपनी निर्भरता कम करें. लेकिन नज़दीक भविष्य में ऐसा होने की संभावना नज़र नहीं आती.”

वीडियो कैप्शन, शुरुआती दिनों में जर्मनी को रूसी गैस का विकल्प खोजने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी.

नाइजीरिया की कहानी

नाइजीरिया, अफ़्रीका का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है. 2021 में नाइजीरिया के कुल निर्यात का 75 प्रतिशत हिस्सा तेल था.

1956 में नाइजीरिया ब्रिटेन के अधीन था और ब्रिटिश पेट्रोलियम और रॉयल डच शेल कंपनी वहां से तेल निकालती थी.

1960 में नाइजीरिया ब्रिटेन से आज़ाद हो गया और अगले 10 सालों में उसने तेल की क़ीमत में आयी वृद्धि से मुनाफ़ा कमाना शुरू कर दिया.

हमारे दूसरे एक्सपर्ट ओमोलेड अडूंबी, मिशिगन यूनिवर्सिटी के अफ़्रीकन स्टडीज़ सेंटर के निदेशक कहते हैं कि तेल के मुनाफ़े का अधिकांश लाभ नाइजीरिया के उच्च वर्ग को हुआ.

वो कहते हैं, ‘पहले तेल से होने वाली आय का हिस्सा केंद्रीय सरकार और उन राज्य सरकारों के बीच बंटता था जिन राज्यों में तेल भंडार थे. मगर सरकार ने एक नया पेट्रोलियम कानून बनाकर इसे बदल दिया जिसके तहत तेल से होने वाली पूरी आय केंद्र सरकार को मिलने लगी.”

“तेल को सार्वजानिक संसाधन माना जाता था लेकिन नाइजीरिया में इसका लाभ केवल ऊपर के कुछ लोगों को हुआ.”

ओमोलेड अडूंबी कहते हैं कि तेल के दोहन से नाइजेर डेल्टा क्षेत्र का सामाजिक पतन शुरू हो गया.

“खेतों में अब तेल की पाइप लाइनें बिछी हुई हैं. क्षेत्र के जल स्रोतों के नीचे भी पाइपलाइनें बिछा दी गई हैं जिससे जल और ज़मीन दोनों प्रदूषित हो रहे हैं. इससे किसानों और मछुआरों को नुकसान हो रहा है.”

नाइजीरिया में तेल का इतिहास, दरअसल देश में प्रदूषण और भ्रष्टाचार की कहानी का हिस्सा है.

देश में आधी से अधिक आबादी को बिजली उपलब्ध नहीं है.

नाइजीरिया 2060 तक नेट ज़ीरो एमिशन प्राप्त करने के लिए कटिबद्ध है.

नेट जीरो एमिशन का मतलब एक ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार करना है जिसमें जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल ना के बराबर हो और कार्बन उत्सर्जन का स्तर लगभग शून्य हो.

ओमोलेड अडूंबी ने कहा कि “पिछली सरकार ने जलवायु क़ानून पारित कर दिया था जिससे लगता था कि नाइजीरिया की सरकार जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के बारे में गंभीर है. लेकिन इसे अमल में कैसे लाया जाए और तेल के बिना अर्थव्यवस्था को कैसे चलाया जाए इस पर कोई ख़ास चर्चा नहीं हो रही है.”

नाइजीरिया की अर्थव्यवस्था का 10 प्रतिशत हिस्सा तेल उत्पादन से जुड़ा है. उसके लिए नए विकल्प अपनाना आसान नहीं होगा.

लेकिन एक ऐसा देश भी है जो तेल से होने वाली आय का इस्तेमाल तेल पर निर्भरता को ख़त्म करने के लिए कर रहा है.

नॉर्वे

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इमेज कैप्शन, नॉर्वे पश्चिमी यूरोप में तेल और प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा उत्पादक है

नॉर्वे जो तेल से मुक्ति का रास्ता तलाश रहा है

1969 में नॉर्थ सी यानि उत्तरी सागर में नॉर्वे के तट के पास तेल के बड़े भंडारों की खोज हुई.

मगर समस्या यह थी कि तेल के ये भंडार समुद्र तट से 300 किलोमीटर दूर समुद्र में 70 मीटर की गहराई में थे जिसकी वजह से वहां से तेल निकालना ज़मीन से तेल निकालने की तुलना में काफ़ी महंगा था.

हमारे तीसरे एक्सपर्ट, डगलस कोप ओस्लो यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर हैं. वो कहते हैं कि 1970 के दशक में तेल की क़ीमत में उछाल आने के बाद यह स्थिति बदल गई.

“वो बड़ा महत्वपूर्ण दौर था. ईरान में इस्लामी क्रांति और बाद में ईरान और इराक के बीच युद्ध छिड़ने से तेल और गैस की क़ीमत में भारी वृद्धि हो गई थी. इसलिए 1980 तक समुद्र से तेल निकालना मंहगा होने के बावजूद फ़ायदेमंद हो गया था. इससे नॉर्वे की अर्थव्यवस्था को बहुत फ़ायदा हुआ.”

नॉर्वे ने इस मुनाफ़े का इस्तेमाल देश की समाज कल्याण योजनाओं और देश के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए किया. वहां नदियों और झरनों की भरमार थी जिसके चलते उसकी बिजली की ज़रूरतें हाइड्रो पावर यानि जलविद्युत परियोजनाओं से पूरी हो रही थीं और उसे तेल जलाने की आवश्यकता नहीं थी.

डगलस कोप कहते हैं कि, “बिजली उत्पादन के लिए हम कभी तेल पर निर्भर नहीं थे. 100 साल से अधिक समय से नॉर्वे हाइड्रो पॉवर से बिजली बनाता आ रहा है. यहां पर घरों को गर्म रखने और खाना पकाने के लिए बिजली का इस्तेमाल होता है. हमने इसके लिए कभी भी गैस या तेल का इस्तेमाल नहीं किया. हम तेल और गैस केवल निर्यात करते रहे हैं.”

नॉर्वे

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इमेज कैप्शन, नॉर्वे ने जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम किया है.

हालांकि नॉर्वे अपने देश में रिनिवेबल एनर्जी यानि अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल करता है.

मगर कार्बन उत्सर्जन करने वाले तेल को दूसरे देशों को बेचता है. यानि एक तरह से वो जलवायु परिवर्तन की समस्या को दूसरे देशों में धकेल रहा है.

डगलस कोप मानते हैं कि “यह एक विरोधाभास है जो सभी को नज़र आ रहा है. अब दूसरे देश कह रहे हैं कि आप हमें कार्बन उत्सर्जन कम करने को कहते हैं लेकिन आप ख़ुद कार्बन पैदा करने वाले तेल और गैस का उत्पादन करते हैं.”

नॉर्वे के कुल निर्यात का 50 प्रतिशत तो केवल तेल है और उसकी कुल आय का 40 प्रतिशत हिस्सा तेल निर्यात से आता है. यूक्रेन युद्ध के चलते तेल से होने वाली आमदनी बढ़ गई है.

डगलस कोप ने बताया कि नॉर्वे में इस बात पर बहस हो रही है कि देश को तेल से होने वाले मुनाफ़े को यूक्रेन को दे देना चाहिए और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए दूसरे देशों को अधिक योगदान देना चाहिए.

वो कहते हैं कि नॉर्वे ऐसा कर भी रहा है, “हम दूसरे देशों में वर्षावनों के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन नियंत्रण के उपायों के लिए धन दे रहे हैं लेकिन वो हमारे तेल से होने वाले मुनाफ़े का एक छोटा सा हिस्सा है. हमें अधिक योगदान देना चाहिए. यह एक नैतिक समस्या है.”

डगलस कोप कहते हैं तेल हमेशा तो नहीं रहेगा और नॉर्वे ने तेल पर निर्भरता को कम करने के लिए भविष्य के लिए एक फंड बनाना शुरू कर दिया है ताकि तेल उत्पादन बंद होने पर भी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर ना पड़े और आमदनी के दूसरे विकल्प विकसित हो जाएं.

वीडियो कैप्शन, रिज़र्व भंडार से तेल क्यों निकाल रहा है भारत?

नये तेल उत्पादक

पश्चिमी विकसित देश तेल उत्पादन से किनारा करने की योजनाएं बना रहे हैं और अपनी अर्थव्यवस्था को भविष्य के अनुसार ढाल रहे हैं.

मगर अफ़्रीका और लातिन अमेरिका के उन देशों का क्या होगा जो तेल उत्पादन क्षेत्र में नये हैं?

हमने बात की वैलरी मार्सेल से जो न्यू प्रोड्यूसर्स ग्रुप की निदेशक हैं. इस संगठन में 26 नए तेल उत्पादक देशों की सरकारों से जुड़ी संस्थाएं शामिल हैं. इस ग्रुप में मोज़ांबिक, गुयाना और युगांडा जैसे देश शामिल हैं.

वैलरी मार्सेल का कहना है कि नए तेल उत्पादक देशों को समझना होगा कि विश्व में आने वाले 15-20 सालों के भीतर पेट्रोलियम उत्पादों का राजनीतिक और आर्थिक महत्व घट जाएगा.

उनके मुताबिक, “हम अक्सर यह भूल जाते हैं, कि कई देश बिल्कुल अलग दिशा में जा रहे हैं. जिन देशों के साथ मैं काम करती हूं, वो कार्बन उत्सर्जन कम करते हैं. लेकिन समस्याओं से घिरे हुए हैं.”

वो कहती हैं, “ये ग़रीब देश हैं जो पूरी तरह पेट्रोलियम उत्पादन पर निर्भर हैं. उन्हें आशा है कि यह उनकी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करके विकास करने में मदद करेगा जिससे वो रिनिवेबल ऊर्जा के स्रोतों में निवेश भी कर सकेंगे. समस्या यह है कि इन देशों के पास पेट्रोलियम के अलावा दूसरे विकल्प नहीं हैं.”

इन देशों के सामने एक समस्या यह भी है कि पश्चिमी देश इन देशों में नये पेट्रोलियम प्रोजेक्ट को सहायता नहीं देना चाहते.

वैलरी मार्सेल ने कहा कि अमेरिका, कनाडा और नॉर्वे जैसे यूरोपीय देशों ने विकासशील देशों के पेट्रोलियम प्रोजेक्ट को दी जाने वाली तकनीकी सहायता घटा दी है क्योंकि वो तेल उत्पादों को बढ़ावा नहीं देना चाहते.

अगर यह देश बिना तकनीकी सहायता के अपने प्रोजेक्ट जारी रखते हैं तो उन्हें नुक़सान होगा और इन प्रोजेक्ट से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा. यह जोख़िम भरा क़दम है.

वैलरी मार्सेल कहती हैं कि तेल के इस्तेमाल से तो कार्बन उत्सर्जन होता है लेकिन जिस जगह पर तेल उत्पादन होता है वहां भी कार्बन उत्सर्जन होता है.

उनके अनुसार, तेल उत्पादों के इस्तेमाल से होने वाले उत्सर्जन को कम करना तो मुश्किल है लेकिन तेल और गैस उत्पादन प्लांट से होने वाले उत्सर्जन को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है.

ऐसा करने के लिए विकासशील देशों को इन प्रोजेक्ट के लिए तकनीकी सहायता देना ज़रूरी है.

वीडियो कैप्शन, लोग बढ़ते प्रदूषण और महंगे पेट्रोल का हल ई-गाड़ियों में खोज रहे हैं.

लेकिन प्रमुख सवाल है कि क्या हम तेल की ज़रूरत को रोक सकते हैं?

तेल उद्योग की कहानी संपत्ति, भ्रष्टाचार और ग़रीबी की कहानी है. अब देशों को तेल से पीछा छुड़ाने के लिए कहा जा रहा है.

मगर कई देशों की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है और एक वैकल्पिक भविष्य के हिसाब से योजना बनाना उनके लिए मुश्किल साबित हो रहा है.

तेल पर निर्भरता ख़त्म करने के लिए कई देशों को भविष्य के लिए नयी योजनाएं बनानी होंगी.

अगर सही योजनाएं नहीं बनाई गईं तो भविष्य में तेल की मांग ख़त्म होने के बाद कई देश कहीं ज़्यादा बदतर स्थित में आ सकते हैं.

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