सीओपी27: जलवायु परिर्वतन के बारे में किए जा रहे इन दावों की असलियत क्या है?

- Author, मार्को सिल्वा
- पदनाम, बीबीसी क्लाइमेट डिसइन्फॉरमेशन स्पेशलिस्ट
दुनिया में जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता. लेकिन आजकल सोशल मीडिया पर ग्लोबल वॉर्मिंग से जुड़ी कई तरह की गलत और झूठी सूचनाओं की भरमार है, जिससे इस समस्या को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है.
मिस्र में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे से जुड़ी बैठक 'सीओपी 27' हो रही है.
लिहाजा जलवायु परिवर्तन इंटरनेट पर काफी सर्च हो रहा है. लेकिन इसके साथ ही भ्रामक जानकारियों की भी बाढ़ आ रही है.
जलवायु परिवर्तन और इसके असर को लेकर कई मिथक फैले हुए हैं. इनमें से कुछ आम मिथक इस तरह हैं.
दावा 1 : जलवायु परिवर्तन वास्तविक चीज नहीं है
कुछ लोगों का मनना है कि जलवायु परिवर्तन नहीं हो रहा है. उनका मानना है कि ये एक साजिश का हिस्सा है.
ऐसे लोग इस बात पर विश्वास कर सकते हैं कि ये बड़े ही सुनियोजित तरीके से फैलाई गई अफवाह है.
ये सब संगठित तरीके से किसी साजिश के तहत हो रहा है.
कुछ लोगों का मानना है कि यह पैसा बनाने की स्कीम है या हमारे अधिकार और आजादी में कटौती करने की कोई कुटिल चाल.
लेकिन इस तरह के दावों का समर्थन में कोई सुबूत नहीं है. 99 फीसदी वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन कोई काल्पनिक चीज नहीं है. ये हो रहा है और इसमें मनुष्य का हाथ है.
जलवायु परिवर्तन का अध्ययन करने वाले यूएन के वैज्ञानिकों के इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के मुताबिक 1850 से लेकर अब तक दुनिया का तापमान औसतन 1.1 सेंटीग्रेड बढ़ चुका है.
तापमान में इस बदलाव की वजह मौसम से जुड़ी प्रतिकूल घटनाएं अब जल्दी-जल्दी सामने आ रही हैं. इससे दुनिया के लाखों का जीवन और जीविका में खतरे में पड़ती दिख रही है.
आईपीसीसी की 2021 की रिपोर्ट में कहा गया है, '' इसमें कोई शक नहीं है मानव असर से वातावरण, समुद्र और जमीन गर्म हुई है. ''
ब्रिटिश आर्कटिक सर्वे की वैज्ञानिक डॉ. इला गिलबर्ट कहती हैं, '' जलवायु परिवर्तन हर जगह हो रहा है. अगर इस पर विश्वास नहीं है तो इस साल आने वाले मौसम की प्रतिकूल घटनाओं का इंतजार करें. ''

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दावा 2 : जलवायु परिवर्तन पश्चिम की समस्या है
ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बनडाइक्साइड इत्यादि के उत्सर्जन से ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ती जा रही है. ये गैसें सूरज की गर्मी को कैद कर लेती हैं और इससे धरती गर्म हो जाती है.
अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी इस उत्सर्जन के लिए ऐतिहासिक रूप से ज्यादा जिम्मेदार हैं.
लेकिन इससे गरीब देशों के कुछ लोग मानने लगे हैं कि जलवायु परिवर्तन का हल निकालना पश्चिमी देशों की समस्या है.
लेकिन जलवायु परिवर्तन किसी देश की सीमा से बंधा नहीं है. ये हर जगह दिख रहा है. पाकिस्तान इसका एक उदाहरण है, जहां हाल में आई बाढ़ ग्लोबल वॉर्मिंग का नतीज़ा मानी जा रही है.
रिसर्च से भी पता चला है कि सबसे गरीब देशों पर जलवायु परिवर्तन का असर ज्यादा होगा. ऐसा होने की वजह भी है. विशेषज्ञों का मानना है कि उनके पास जलवायु परिवर्तन से निपटने के संसाधन भी कम होंगे.
बॉन (जर्मनी) यूनिवर्सिटी में रिसर्चर डॉ. लीसा शिपर कहती हैं, '' जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक मुद्दा है.'' वह कहती हैं, '' सबसे गरीब और कम औद्योगिकीकरण वाले देशों पर इसका परोक्ष असर नहीं पड़ रहा है बल्कि वे इस परिवर्तन के सक्रिय एजेंट हैं. ''
अगर इन देशों की सरकारें चाहती हैं कि सीओपी27 समेत दूसरे जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में उनकी सुनी जाए तो ये भी इसकी एक वजह है. ऐसे सम्मेलनों में क्लाइमेट जस्टिस का मुद्दा एजेंडा में काफी ऊपर होगा.

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दावा 3 : 'जलवायु परिवर्तन हमारे लिए बेहतर हो सकता है'
लगातार भारी ठंड का सामना कर रहे देश ये सोच रहे हैं धरती का गर्म होना उनके हित में है. पहली नज़र में ये सोच बड़ी लुभावनी लग सकती है.
रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन का ही मामला ले लीजिये. 2003 में उन्होंने कहा था,'' गर्म रूस में लोग फर के कोट पर कम खर्च करेंगें और फसल जल्द पकने से पैदावार बढ़ जाएगी. ''
रूस के सोशल मीडिया में इस तरह के विचार आज भी प्रचारित किए जाते हैं.
लेकिन दिक्कत ये है कि इस तरह के छोटे फायदे अगर होंगे भी जलवायु परिवर्तन से होने वाला बड़े नुकसान उन्हें ढंक लेंगे.
आईपीसीसी का अनुमान है कि इस सदी के अंत तक अगर औसत वैश्विक तापमान 1.5 सेंटीग्रेड भी बढ़ा तो जलवायु परिवर्तन से 54 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान होगा. अगर तापमान दो सेंटीग्रेड बढ़ा तो ये नुकसान बढ़ कर 69 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा.
धरती का तापमान बढ़ने के भयावह नतीजे होंगे. मध्यपूर्व के देशों में खेती की जमीन रेगिस्तान में तब्दील हो सकती है. प्रशांत क्षेत्र के द्वीप उठते समुद्र के गर्त में समा सकते हैं और कुछ अफ्रीकी देशों को भयावह खाद्य समस्या का सामना करना पड़ सकता है.
रूस जैसे ठंडे देशों में भी 2021 की साइबेरिया के जंगलों में लगी आग जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं. मौसम गर्म और सूखा होते जाने की वजह से ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं.

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दावा 4 : समुद्र तल ऊपर नहीं उठ रहा है, ये सिर्फ लहरें हैं
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा का कहना है कि समुद्र ने हाल के दशकों में ग्रीनहाउस गैसों की वजह से पैदा 90 फीसदी गर्मी को सोख लिया है. लिहाजा ग्लेशियर के अंदर बंद बर्फ पिघलने लगे हैं.
चूंकि पानी गर्म होने के साथ फैलने लगता है इसलिए गर्मी के साथ समुद्र का भी विस्तार हो रहा है.
सोशल मीडिया पर मैंने जलवायु परिवर्तन पर शक जताने वालों को देखा है. समुद्र की लहरों के उतार-चढ़ाव की वजह से पैदा हालात को अक्सर हल्के में लिया जाता है. लेकिन वास्तविकता ज्यादा जटिल है.
समुद्र की लहरों में उतार-चढ़ाव छोटे परिवर्तन का सुबूत हैं जो समय के साथ संतुलन लाता है. लेकिन माना जा रहा है कि 100 साल के अंदर दुनिया भर में समुद्र तल 160 से 210 मिमी. तक ऊपर उठ जाएगा .
एडिनबरा यूनिवर्सिटी के भौतिकी के प्रोफेसर केन राइस कहते हैं, '' ये 20वीं सदी की शुरुआत के समुद्र तल से बहुत ज्यादा ऊंचा है. और यह प्रक्रिया काफी तेज होती जा रही है.
हालांकि यह परिवर्तन हम आंखों से नहीं देख सकते लेकिन इसका असर स्पष्ट है. समुद्र का ऊंचा उठने का मतलब है कि तटीय इलाकों के क्षरण की गति तेज हो गई है और बाढ़ की आशंका भी रफ्तार पकड़ने लगी है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर तेज कदम नहीं उठे तो 2100 तक समुद्र तल 6.5 फुट तक ऊपर उठ जाएगा. इसका मतलब है कि समुद्र तटीय इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोगों के सामने बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाएगी. या उनका इलाका ही पूरा डूब जाएगा. ऐसे हालात एशिया में ज्यादा पैदा होंगे.

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दावा 5 : जलवायु परिवर्तन से निपटने में देर हो चुकी है
जलवायु परिवर्तन के बारे में चिंता स्वाभाविक है. अक्सर इस तरह की चेतावनियां आती हैं कि ये आखिरी मौका है. और भी गंभीर चेतावनियां आती रहती हैं.
इससे ऐसा लगता है कि अब इस समस्या को लेकर कुछ नहीं हो सकता. अब धरती का विनाश तय है. जलवायु परिवर्तन तेजी से हो रहा है और इन बदलावों का असर आने वाले सौ साल तक महसूस होगा.
लेकिन सब कुछ बुरा ही नहीं है. वैज्ञानिकों के अध्ययन से हमें ये मालूम है कि इस अभूतपूर्व संकट से निपटने के लिए क्या करना होगा.
तमाम देशों को उपाय करने होंगे. इन देशों को ग्रीन हाउस उत्सर्जन में काफी कटौती करनी होगी. इसके साथ ही वातावरण में मौजूद गैसों को कैद करने का रास्ता निकालना होगा.
यही वजह है कि सीओपी27 जैसे सम्मेलनों की काफी अहम भूमिका है. यह राजनेताओं के लिए एक मौका है कि वे एक साथ बैठकर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ अपने एक्शन प्लान पर विचार-विमर्श करें.
ब्रिटिश अंटाकर्टिक सर्वे की डॉ. गिलबर्ट का कहना है, '' जलवायु परिवर्तन कम करने की दिशा में उठाए गए हरेक कदम का असर दिखेगा. हालांकि इस तरह के कदम उठाने के लिए वक्त अब कम है. लिहाजा हमें हर मौके का फायदा उठाना चाहिए. ''
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