अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को अपनी आवाज़ से कैसे चुनौती दे रही हैं ये दो बहनें

अपना नया गीत रिकॉर्ड करतीं बहनें

इमेज स्रोत, Kawoon Khamoosh

इमेज कैप्शन, ये बहनें सोशल मीडिया पर रातोंरात चर्चित हो गईं. यहां वो अपना एक वीडियो रिकॉर्ड करती दिख रही हैं
    • Author, कावून ख़ामूश
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

2021 में अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत पर क़ाबिज़ होने के बाद से तालिबान ने महिलाओं के तमाम अधिकारों और आज़ादियों पर कई तरह की पाबदियां लगा दी हैं.

लेकिन, दो बहनें ऐसी हैं, जिन्हें ये कु़बूल नहीं था कि वो अपने अधिकारों के इस हनन को ख़ामोशी से देखती और बर्दाश्त करती रहे हैं.

उन्होंने बड़ी ख़ामोशी से अपनी आवाज़ का इस्तेमाल करके तालिबान के ज़ुल्मों का विरोध करना शुरू किया था.

अगस्त 2021 में जब तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत में दोबारा वापसी की तो बाक़ी दुनिया चुप रहकर ये तमाशा देखती रही थी. उस समय अफ़ग़ानिस्तान की करोड़ों महिलाओं में काबुल की रहने वाली दो बहनें भी थीं, जिन्हें तालिबान की आमद के साथ ही अपने ऊपर कसते शिकंजे से दम घुटता हुआ महसूस हुआ था.

उन दोनों बहनों ने तय किया वो अपने अधिकार छिनने का ये तमाशा चुपचाप बैठकर नहीं देखेंगी.

उन्होंने इस ज़ुल्म के विरोध के लिए अपनी आवाज़ को हथियार बनाया और गाने गाकर, तालिबान के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज कराने लगीं.

अपनी जान को भयंकर जोखिम में डालकर इन बहनों ने सोशल मीडिया पर गायिकी की मुहिम छेड़ दी, जिसका नाम ‘आख़िरी मशाल ‘रखा गया है.

ये मुहिम छेड़ने से पहले इन बहनों में से एक ने सोशल मीडिया पर अपना वीडियो पोस्ट किया, जिसमें वो कह रही थीं कि वो गाना तो गाने जा रही हैं लेकिन इसकी क़ीमत उन्हें अपनी जान देकर भी चुकानी पड़ सकती है.

उनका पहला गाना अगस्त 2021 में तालिबान के दोबारा सत्ता में लौटने के कुछ दिनों बाद ही जारी किया गया था और ये बहुत तेज़ी से वायरल हो गया.

दोनों बहनें अपनी पहचान छुपाने के लिए बुर्क़े पहनकर गाती हैं. बिना किसी बैकग्राउंड म्यूजिक के इन बहनों ने ऐसे सुर छेड़े कि वो रातोंरात मशहूर हो गईं.

दोनों बहनों में से छोटी शक़ायेक़ (असली नाम नहीं) कहती हैं कि, ‘तालिबान के ख़िलाफ़ हमारी मुहिम ठीक तालिबान के झंडे तले शुरू हुई थी.’

वो बताती हैं, ‘'तालिबान की सत्ता में वापसी से पहले तक हमने एक भी गीत नहीं लिखा था. पर, तालिबान ने हमारे साथ कुछ ऐसा किया कि हम नज़्में लिखने लगे.’'

वीडियो कैप्शन, गाने गाकर तालिबान का विरोध
बुर्का पहने ये दोनों बहनें एक वीडियो में दिख रही हैं

इमेज स्रोत, Last Torch

इमेज कैप्शन, आख़िरी मशाल का नेतृत्व ये दोनों बहनें कर रही हैं
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

सत्ता में वापसी के बाद से तालिबान ने 20 दिनों के भीतर ही अफ़ग़ानिस्तान में अपना अनूठा नज़रिया लागू करना शुरू कर दिया था.

उन्होंने हर शख़्स की ज़िंदगी में शरीयत (इस्लामिक धार्मिक क़ानून) लागू कर दी और महिलाओं को पढ़ाई से रोकना उनकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर था.

महिलाओं ने पढ़ने पर पाबंदी के ख़िलाफ़ राजधानी काबुल और देश के दूसरे शहरों में प्रदर्शन किए. मगर, तालिबान ने इन विरोध प्रदर्शनों को सख़्ती से कुचल दिया.

शक़ायेक़ कहती हैं कि, ‘सड़कों पर उतरी ये महिलाएं हमारी उम्मीद की आख़िरी किरण थीं. यही वजह थी हमने उनके कंधे से कंधा मिलाते हुए अपनी आज़ादी की ये मुहिम शुरू की और इसका नाम आख़िरी मशाल रखा है.’

दोनों बहनों ने बहुत जल्दी कई और गाने भी सोशल मीडिया पर जारी किए. नीले बुर्क़े में अपनी पहचान छुपाकर उन्होंने अपने सुरों से बग़ावत की चिंगारी को सुलगा रखी है.

उनके गाए गानों में एक तो वो मशहूर नज़्म है, जिसे दिवंगत नादिया अंजुमन ने तब लिखा था, जब 1996 में तालिबान पहली बार सत्ता पर क़ाबिज़ हुए थे.

मैं शहद का स्वाद क्या बताऊं, जब मेरे मुंह में ज़हर भरा है

अफ़सोस, मेरी ज़ुबान को इक बर्बर मुट्ठी ने कुचल डाला है

ऐ सबा मुझे इंतज़ार उस दिन का है ,जब मैं इस क़ैद को तोड़ डालूंगी

तब इस तन्हाई से रिहा होकर मैं ख़ुशी से झूमकर गाऊंगी.

 पवित्रता मंत्रालय के बाहर महिलाओं पर लगे प्रतिबंधों का विरोध करने के लिए एकजुट हुईं महिलाएं.

इमेज स्रोत, Haroon Sabawoon/Anadolu/Getty Images

इमेज कैप्शन, पवित्रता मंत्रालय के बाहर महिलाओं पर लगे प्रतिबंधों का विरोध करने के लिए एकजुट हुईं महिलाएं.

जब 1996 में तालिबान ने महिलाओं की तालीम पर पाबंदी लगाई थी, तो नादिया और उनकी सहेलियां ज़मीन के भीतर बने एक स्कूल में मिला करती थीं.

उसका नाम सुनहरी सुई था. ऊपरी तौर पर तो वो ये दिखावा करती थीं कि वो सिलाई कढ़ाई करती हैं. लेकिन, असल में नादिया और उनकी सहेलियां किताबें पढ़ती थीं. वो भी नीला बुर्क़ा पहनकर, जिसे अफ़ग़ानिस्तान में चादरी कहा जाता है.

गायिकी से मशहूर हुई दोनों बहनों में से बड़ी मशाल (बदला हुआ नाम) बुर्क़े की तुलना चलते फिरते पिंजरे से करती हैं. वो कहती हैं कि, ‘ये एक क़ब्रिस्तान की तरह है, जहाँ हज़ारों औरतों और लड़कियों के ख़्वाब दफ़्न हैं.’'

बुर्क़े के बारे में शक़ायेक़ कहती हैं, ‘'ये बुर्क़ा एक पत्थर है, जिसे तालिबान ने 25 बरस पहले महिलाओं के ऊपर फेंका था और उन्होंने दोबारा सत्ता में लौटने पर फिर से वही किया है. हम चाहते थे कि हम भी उनके ऊपर वही हथियार इस्तेमाल करें, जो उन्होंने हम पर फेंका था ताकि उनकी लगाई पाबंदियों से मुक़ाबला कर सकें.’'

दोनों बहनें अपने बुर्के का इस्तेमाल अपनी पहचान छुपाने के लिए करती हैंय
इमेज कैप्शन, दोनों बहनें अपने बुर्के का इस्तेमाल अपनी पहचान छुपाने के लिए करती हैंय

दोनों बहनों ने अब तक केवल सात गानें रिलीज़ किए हैं. लेकिन हर एक गीत पूरे अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं के जज़्बात की अदायगी बनकर ख़ूब मशहूर हुआ है.

शुरुआत में दोनों बहनें दूसरों की लिखी नज़्में गाया करती थीं. लेकिन, शकाएक़ कहती हैं कि, ‘आख़िर में हम ऐसे मकाम पर पहुँच गए, जहाँ दूसरों के लिखे गीत हमारी भावनाओं का इज़हार नहीं कर पा रहे थे. हम जो महसूस कर रहे थे, वो बात गीतों के बोलों में नहीं थे.’ इसीलिए, हमने अपने गीत भी ख़ुद लिखने शुरू कर दिए.

उनके गाए गीतों के जवाब में चाहने वालों ने अपने गाने भी सोशल मीडिया पर पोस्ट करने शुरू कर दिए. इनमें से कई महिलाओं ने अपनी पहचान छुपाने के लिए बुर्क़े पहन रखे थे.

अफ़ग़ानिस्तान के बाहर रह रहे कुछ स्कूली बच्चों ने इन बहनों के गाये एक गाने को अपने स्कूल के ऑडिटोरियम में पेश किया.

तालिबान, महिलाओं पर पाबंदी लगाकर जो मक़सद हासिल करना चाह रहे थे, उसका ये उल्टा हो रहा था.

सत्ता में वापसी के बाद उन्होंने महिला संबंधी मामलों के मंत्रालय को ख़त्म करके उसकी जगह, सवाब के प्रचार और गुनाहों पर रोक-थाम का मंत्रालय बना दिया.

इस नए मंत्रालय ने न केवल बुर्क़ा पहनने को अनिवार्य बनाया बल्कि, संगीत पर भी ये कहते हुए पाबंदी लगा दी कि इससे इस्लाम की बुनियाद नष्ट हो जाती है.

मंत्रालय के प्रचार वाले एक वीडियो में नज़र आने वाला अधिकारी सवाब गुल कहते हैं कि, ‘गाना और संगीत सुनना बहुत नुक़सानदेह है. इससे अल्लाह और इबादत पर से लोगों का ध्यान हट जाता है… इसलिए सबको इससे दूर रहना चाहिए.’

जल्दी ही तालिबानी फ़ौजियों के वीडियो सोशल मीडिया पर आने लगे थे, जिनमें वो वाद्य यंत्रों को नष्ट कर रहे थे और गिरफ़्तार हुए संगीतकारों की परेड करा रहे थे.

तालिबान लड़ाके ज़ब्त किए गए संगीत यंत्रों को आग लगाते हुए दिख रहे हैं.

इमेज स्रोत, Bakhter News Agency

इमेज कैप्शन, तालिबान लड़ाके ज़ब्त किए गए संगीत यंत्रों को आग लगाते हुए दिख रहे हैं.

मशाल और शक़ायेक़ जब तक अपने घर से गाने पोस्ट कर रही थीं, तब तक वो बहुत बड़ा जोखिम ले रही थीं.

शक़ायेक़ कहती हैं कि कई बार तो ये सोचकर उनकी रातों की नींद उड़ जाती थी कि कहीं तालिबान उन्हें पहचान न लें.

मशाल बताती हैं, ‘'सोशल मीडिया पर हमें धमकियां दी जा रही थीं. कहा जा रहा था कि एक बार हमारा पता भर चल जाए, हम जैसों का नाम-ओ-निशान मिटाना उन्हें बख़ूबी आता है. जब ये बयान हमारे माँ-बाप पढ़ते थे, तो वो बहुत घबरा जाते थे. वो कहते थे कि अब बस, बहुत हो गया.

गाना-वाना बंद करो. लेकिन हम उनसे कहते थे कि हम ऐसा करना बंद नहीं कर सकते. हम अपनी आम ज़िंदगी में फिर से मसरूफ़ नहीं हो सकते.’

अपनी हिफ़ाज़त के लिए, दोनों बहनो ने पिछले साल अफ़ग़ानिस्तान छोड़ दिया था. मगर, उन्हें जल्द ही अपने वतन वापस जाने की उम्मीद है.

महिलाओं ने तालिबान के शिक्षा पर पाबंदी लगाने का सड़कों पर विरोध किया और इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की
इमेज कैप्शन, महिलाओं ने तालिबान के शिक्षा पर पाबंदी लगाने का सड़कों पर विरोध किया और इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की

अफ़ग़ानिस्तान की पेशेवर रैपर सोनिता अलीज़ादा अब कनाडा में रहती हैं. वो उन लोगों में से हैं, जो विदेश में रहते हुए ‘आख़िरी मशाल’ के वीडियो की तारीफ़ करती रही हैं. सोनिता कहती हैं कि, ‘जब मैंने दो औरतों को बुर्क़ा पहनकर गाते हुए देखा, तो सच बताऊं मैं रो पड़ी थी.’

सोनिता अलीज़ादा 1996 में पैदा हुई थीं, यानी उसी साल जब तालिबान पहली दफ़ा अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर क़ाबिज़ हुआ था.

जब वो छोटी सी बच्ची थीं, तभी उनका परिवार भागकर ईरान चला आया था. वहां, उनकी मां ने ज़बरदस्ती उनकी शादी करानी चाही. लेकिन, सोनिता, संगीत के रास्ते इस मुश्किल से निकलने में कामयाब रहीं.

‘आख़िरी मशाल’ की दो बहनों की तरह सोनिता भी तालिबान के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाली महिलाओं में उम्मीद की एक लौ देखती हैं.

दोनों बहनों का एक गीत सीधे सीधे इन प्रदर्शनकारी महिलाओं का ज़िक्र करता है

तुम्हारी जंग ख़ूबसूरत है. तुम्हारी ज़नाना चीख़

तुम तो खिड़की में मिरी टूटी हुई तस्वीर हो

सोनिता कहती हैं कि, ‘इस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान के हालात बेहद निराशाजनक हैं, क्योंकि हमने दशकों में हासिल की हुई तरक़्क़ी गंवा दी है. लेकिन इस स्याह अंधेरे में भी उम्मीदों का एक चराग़ जल रहा है. हम देख रहे हैं कि लोग अपनी अपनी क़ुव्वत के हिसाब से लड़ाई लड़ रहे हैं.’

फ़रीदा महवाश की तस्वीर
इमेज कैप्शन, फ़रीदा महवाश कहती हैं- ये दोनों बहनें चार में बदल जाएंगी, फिर दस में और फिर हज़ारों में.

बीबीसी ने दोनों बहनों का सबसे हालिया एक गाना फ़रीदा माहवाश को भी दिखाया. फ़रीदा, अफ़ग़ानिस्तान की सबसे मशहूर गायिकाओं में से एक हैं. फ़रीदा की गायिकी का करियर लगभग आधी सदी लंबा है. उन्होंने हाल ही में गायिकी से रिटायरमेंट लिया है.

फ़रीदा कहती हैं कि, ‘ये दो बहनें, पहले चार में तब्दील होंगी, फिर इनकी तादाद दस और देखते ही देखते हज़ार तक पहुंच जाएगी. अगर किसी रोज़ वो स्टेज पर जाने का फ़ैसला करती हैं तो मैं भी उनके साथ चलूंगी भले ही मुझे छड़ी का ही सहारा क्यों न लेना पड़े.’

काबुल में विरोध प्रदर्शनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई पिछले साल और भी तेज़ हो गई है. अधिकारियों ने महिलाओं के रैली करने पर रोक लगा दी है और इस पाबंदी को तोड़ने वाली महिलाओं को गिरफ़्तार किया जा रहा है.

इन बहनों का एक हालिया गाना इन महिला प्रदर्शनकारियों पर ही है, जिन्हें तालिबान ने क़ैद में डाल दिया था और उन्हें ऐसे हालात में रखा था, जिन्हें ह्यूमन राइट्स वाच ने ‘अपमानजनक स्थिति’ वाला क़रार दिया था.

औरतों की आवाज़ की लहरें

तोड़ डालती हैं जेल के ताले और ज़ंजीरें

हमारे ख़ून से भरा हमारा ये क़लम

तोड़ डालेगा तुम्हारे तीर और शमशीरें

शक़ायेक़ कहती हैं कि ‘ये गाने तो उन तक़लीफ़ों और दर्द का महज़ एक टुकड़ा भर है, जो हमारे दिलों में भरा है. अफ़ग़ानिस्तान के लोगों का दर्द और उनका संघर्ष और जो दु:ख उन्होंने पिछले कुछ सालों में तालिबान के राज के दौरान झेले हैं, वो किसी एक नज़्म में समेटा नहीं जा सकता है.’

संयुक्त राष्ट्र कहते हैं कि अगर तालिबान अपनी मौजूदा नीतियों को लागू करना जारी रखते हैं, तो फिर वो लैंगिक रंगभेद के लिए ज़िम्मेदार होंगे.

इसके जवाब में तालिबान ने कहा है कि वो शरीयत लागू कर रहे हैं और अपने देश के अंदरूनी मामलों में कोई बाहरी दख़लंदाज़ी बर्दाश्त नहीं करेंगे.

शक़ायेक़ और मशाल इन दिनों अपने नए गीत पर काम कर रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि उनके गाने, अफ़ग़ानिस्तान में

अपनी आज़ादी और पढ़ने के अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रही औरतों की आवाज़ बनकर गूंजेंगे.

वो कहती हैं कि, ‘हमारी सदा को ख़ामोश नहीं किया जा सकता है. हम थकी नहीं हैं. ये तो हमारी लड़ाई की शुरुआत भर है.’

(दोनों बहनों की सुरक्षा के लिए उनके नाम बदल दिए गए हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)