तालिबान: यूनिवर्सिटी के दरवाज़े बंद करने के फ़ैसले पर क्या कहती हैं छात्राएं

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तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं को विश्वविद्यालयों में जाने से प्रतिबंधित कर दिया है जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा हो रही है और देश में युवा इससे निराश हैं.
उच्च शिक्षा मामलों के मंत्री ने मंगलवार को इसकी घोषणा की और कहा कि ये तुरंत प्रभाव से लागू होगा.
इस फ़ैसले से महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध और बढ़ेगा क्योंकि बीते साल तालिबान की वापसी के बाद लड़कियों के सेकंडरी स्कूल में दाख़िला लेने पर रोक लगा दी गई थी.
बुधवार को राजधानी काबुल में कुछ महिलाओं ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी किया.
अफ़ग़ानिस्तान विमेंस यूनिटी एंड सॉलिडेरिटी ग्रुप के प्रदर्शनकारियों ने कहा, "लड़कियों के लिए यूनिवर्सिटी बंद करने के ख़िलाफ़ हम अपनी आवाज़ उठाने के लिए काबुल की सड़कों पर आज उतरे हैं."
तालिबान के अधिकारियों ने इस छोटे से प्रदर्शन को तुरंत बंद करा दिया.

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा
संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने इस आदेश की निंदा की है. माना जा रहा है कि यह फ़ैसला अफ़ग़ानिस्तान को वापस तालिबान के पहले दौर में ले जाएगा जब लड़कियां औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं कर सकती थीं.
अफ़ग़ानिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत ने कहा है कि यह 'शिक्षा के समान अधिकार का उल्लंघन है और महिलाओं को अफ़ग़ान समाज से मिटाने की एक और कोशिश है.'
अमेरिका ने कहा है कि इस तरह के क़दम 'तालिबान के लिए कुछ परिणाम लेकर आएंगे.'
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने एक बयान में कहा, "तालिबान अंतरराष्ट्रीय समुदाय का तब तक वैध सदस्य नहीं माना जा सकता है जब तक कि वो अफ़ग़ानिस्तान में सभी के अधिकारों का सम्मान करे."
"कोई भी देश तब तक फल-फूल नहीं सकता जब तक की उसकी आधी आबादी को रोक कर रखा जाता है."
छात्राओं ने बीबीसी से अपने दुख के बारे में बताया है. काबुल यूनिवर्सिटी की एक छात्रा ने कहा, "उन्होंने उस इकलौते पुल को तोड़ दिया है जो मुझे मेरे भविष्य से जोड़ सकता था."
एक दूसरी छात्रा ने बीबीसी से कहा कि वो एक ऐसी महिला है जो 'सबकुछ गंवा चुकी है.'
वो शरिया इस्लामी क़ानून पढ़ रही हैं और उन्होंने दलील पेश करते हुए कहा कि तालिबान का आदेश उस अधिकार के ख़िलाफ़ जाता है जो 'इस्लाम और अल्लाह ने हमें दिया है.'
उन्होंने बीबीसी से कहा, "उन्हें दूसरे इस्लामी देशों में जाना चाहिए और देखना चाहिए कि उनकी कार्रवाई इस्लामी नहीं है."
पश्चिमी देश पूरे साल ये मांग करते रहे हैं कि तालिबान अगर अफ़ग़ानिस्तान सरकार की आधिकारिक तौर पर मान्यता चाहता है तो वो महिलाओं की शिक्षा को सुधारे.
अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी देश पाकिस्तान के विदेश मंत्री का कहना है कि वो तालिबान के फ़ैसले से 'निराश' हैं और वो अभी भी बातचीत के पेरोकार हैं.
विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने कहा, "महिलाओं की शिक्षा और दूसरे मामलों में असफलताओं के बावजूद मैं अभी भी सोचता हूं कि हमारे लक्ष्य का सबसे आसान रास्ता काबुल से और अंतरिम सरकार की ओर से जाता है."

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'आख़िरी चीज़ जो वो कर सकते थे'
बीते साल देश से अमेरिका के जाने के बाद तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़ा कर लिया था और एक नरम शासन का वादा किया था. हालांकि कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने महिलाओं के अधिकारों और देश में उनकी आज़ादी को वापस लेना शुरू कर दिया.
तालिबान के नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़दा और उनके क़रीबी लोग आधुनिक शिक्षा के ख़िलाफ़ हैं जिसमें महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा ख़ासतौर पर शामिल है.
अधिक उदार अधिकारी इस क़दम के ख़िलाफ़ हैं और विश्लेषकों का कहना है कि इस मुद्दे पर पूरे साल गुटबाज़ी रही.
मंगलवार को शिक्षा मंत्रालय ने कहा कि उसके विशेषज्ञों ने विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम और माहौल का आंकलन किया है और लड़कियों की उपस्थिति तब तक के लिए स्थगित कर दी गई जब तक कि 'उपयुक्त वातावरण' मुहैया नहीं करा दिया जाता.
साथ ही मंत्रालय ने आगे कहा कि वो एक व्यवस्था मुहैया कराएगा और 'नागरिकों को चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है.'
हालांकि, मार्च में तालिबान ने लड़कियों के लिए कुछ हाई स्कूल वापस खोलने की घोषणा की थी लेकिन जिस दिन ये करना था उस दिन उसने ये फ़ैसला रद्द कर दिया.
हाल के महीनों में महिलाओं के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों की नई लहर चली है. नवंबर में राजधानी में महिलाओं के पार्क और जिम में जाने और सार्वजनिक तौर पर नहाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.
अमेरिका में एक विश्वविद्यालय में लेक्चरर और अफ़ग़ान कार्यकर्ता हुमैरा क़ादरी ने कहा है कि महिलाओं के लिए विश्वविद्यालय स्थगित करके तालिबान ने महिलाओं के लिए एकाकीपन को पूरा कर दिया है.
हुमैरा क़ादरी ने बीबीसी से कहा, "ये आख़िरी चीज़ थी जो तालिबान कर सकता था. अफ़ग़ानिस्तान महिलाओं के लिए देश नहीं है बल्कि वो महिलाओं के लिए एक पिंजरा है."
सिर्फ़ तीन महीने पहले तालिबान ने हज़ारों लड़कियों और महिलाओं को देश के कई प्रांतों में विश्वविद्यालयों की प्रवेश परीक्षा में बैठने की अनुमति दी थी.
हालांकि इसमें कुछ विषयों में आवेदन करने पर रोक थी जिनमें इंजीनियरिंग, इकोनॉमिक्स, वेटरनरी साइंस और एग्रीकल्चर शामिल थे जबकि जर्नलिज़्म कठोर रूप से प्रतिबंधित था.

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कई औरतों ने मान ली है हार
मंगलवार को हुई घोषणा से पहले ही विश्वविद्यालय महिलाओं को लेकर भेदभावपूर्ण नियमों के तहत काम कर रहे थे.
विश्वविद्यालयों में लिंग के आधार पर दरवाज़े और कक्षाएं थीं और छात्राओं को केवल महिला प्रोफ़ेसर या बूढ़े मर्द ही पढ़ा सकते थे.
हालांकि उस दौरान महिलाएं शिक्षा ले सकती थीं. यूनेस्को ने मंगलवार को तालिबान के 2001 के पहले शासन से तुलना करते हुए बताया था कि 2018 में उच्च शिक्षा में महिलाओं की उपस्थिति 20 गुना बढ़ी थी.
बीबीसी की दक्षिण एशिया की संवाददाता योगिता लिमाये ने बताया है कि एक महीने से ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि तालिबान सरकार महिलाओं की यूनिवर्सिटी की शिक्षा पर रोक लगा सकती है.
कुछ हफ़्तों पहले एक छात्रा ने अनुमान लगाते हुए कहा था कि 'एक दिन हम जागेंगे और वे कहेंगे कि लड़कियां यूनिवर्सिटी में प्रतिबंधित हैं.'
हालांकि कई अफ़ग़ान मानकर चल रहे थे कि आज नहीं तो कल यह फ़ैसला लिया जाएगा लेकिन इस पर अभी भी सबको झटका लगा है.
योगिता लिमाये कहती हैं कि बीते साल से तालिबान नेताओं से बातचीत के दौरान ये साफ़ था कि लड़कियों की शिक्षा को लेकर तालिबान के बीच असहमति थी.
कई महिलाओं ने बीबीसी से कहा कि तालिबान के क़ब्ज़े के बाद 'कई मुश्किलों' की वजह से उन्होंने हार मान ली है.
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