बग़दादी के ख़लीफ़ा बनने के दस साल बाद कहां खड़ा है इस्लामिक स्टेट

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    • Author, फ़्रैंक गार्डनर
    • पदनाम, बीबीसी सुरक्षा संवाददाता

इस्लामी चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने ठीक दस साल पहले अपने ख़लीफ़ा की घोषणा की थी.

आईएस के संस्थापक अबू बकर अल बग़दादी ने मोसुल की नूरी मस्जिद से यह बात दुनिया की सामने रखी थी.

आईएसआईएस को लोग अरबी में दाएश के नाम से भी जानते हैं. आईएस, सीरिया और इराक़ के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर चुका था. उसने यहां पर शरिया (इस्लामी क़ानून) के सबसे कठोर नियम लागू किए थे.

वह अक्सर क्रूर तरीके से लोगों को दंड देता था, हत्याएं करता था. इतना ही नहीं वह इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग ऑनलाइन पोस्ट भी करता था.

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शुरुआती पांच साल में आईएस दुनियाभर से हज़ारों संभावित जिहादियों को अपनी तरफ़ आकर्षित करने में कामयाब रहा था. आईएस ने एक आदर्शवादी इस्लामिक दुनिया बनाने का वादा किया था.

सच्चाई यह थी कि यहां ज़िंदगी पूरी तरह हिंसा से भरी हुई थी. शहर के चौक की रेलिंग पर कटे हुए सिर टंगे दिखते थे. गश्त करने वाली ‘मोरेलिटी पुलिस’ की तरफ़ से उत्पीड़न लगातार जारी थी. इतना ही नहीं अमेरिका के नेतृत्व वाला गठबंधन, आईएस के इलाकों पर लगातार बमबारी कर रहा था.

इस गठबंधन में 70 से ज़्यादा देश थे, जिसने साल 2019 में पूर्वी सीरिया के बाग़ूज़ से भी आईएस को खदेड़ दिया था.

भले ज़मीनी स्तर पर आईएस और उसके ख़लीफ़ा को गठबंधन ने खदेड़ दिया हो, लेकिन उसकी विचारधारा बनी रही.

ऐसे में सवाल यह है कि आज की तारीख़ में इस्लामिक स्टेट कहां खड़ा है और क्या कर रहा है?

कमज़ोर हालत में आईएस

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लंदन में व्हाइटहॉल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आईएस की स्थिति पर कहा उसे पूरी तरह से ख़त्म नहीं किया जा सका है.

संगठन का लड़खड़ाता नेतृत्व सीरिया में बना हुआ है, लेकिन आईएस ने कई महाद्वीपों में अपना विस्तार कर लिया है.

आईएस के नाम पर अब बड़े हमले उप-सहारा अफ्रीका में किए जा रहे हैं. यूरोप और मध्य पूर्व में इसकी सबसे खतरनाक शाखा आईएस-खोरासान प्रांत मानी जाती है.

इस साल आईएस-खोरासान को रूस की राजधानी मॉस्को और ईरान के शहर केरमान में बड़े पैमाने पर हुए हमलों के लिए व्यापक रूप से दोषी ठहराया गया है.

आईएस-खोरासान प्रांत (आईएसकेपी), अफ़ग़ानिस्तान और उत्तर-पाकिस्तान में स्थित है. यहां बैठकर यह अफ़ग़ानिस्तान में सत्तारूढ़ तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहा है.

यह बात अजीब लग सकती है, क्योंकि तालिबान ने ख़ुद अपने यहां शरिया क़ानून लागू किया हुआ है, जिसमें महिलाओं को नौकरी और लड़कियों को उच्च शिक्षा से दूर कर दिया गया है.

सत्ता में तालिबान की वापसी के बाद, अफ़ग़ानिस्तान में पत्थर मारकर मौत की सज़ा देने जैसी घटनाएं फिर शुरू की गई हैं. बावजूद इसके कि तालिबान और आईएस, कट्टर प्रतिद्वंदी हैं.

20 साल तक विद्रोही की भूमिका में रहने वाले तालिबान के कंधों पर अब व्यवस्था चलाने की ज़िम्मेदारी आ गई है.

जब इस्लामिक स्टेट ने सीरिया और इराक़ में बड़े पैमाने पर कब्ज़ा कर रखा था, तब वो ऐसे लोगों को आसानी से अपनी तरफ़ खींच पा रहा था, जो फ्लाइट से पहले तुर्की, वहां से बस से बॉर्डर तक और फिर सीरिया में आना आसान समझते थे.

इस तरह से आईएस के साथ जुड़ने वाले ज़्यादातर लोगों के पास सैन्य अनुभव और सीरिया में चल रहे गृह युद्ध की वास्तविक समझ नहीं थी.

कई ऐसे लोग थे जो पहले छोटे-मोटे अपराध और नशे के कारोबार से जुड़े हुए थे. इनमें पश्चिमी लंदन के चार लोग शामिल थे. इन्हें कैद में रखने वालों ने बीटल्स नाम दिया था. इन लोगों ने पश्चिमी सहायता कर्मियों और पत्रकारों को प्रताड़ित किया.

आज की तारीख़ में उनमें से एक की मौत हो चुकी है और अन्य जेल में हैं. दो लोग अभी अमेरिका की सुपर मैक्स जेल में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे हैं.

लेकिन इस्लामिक स्टेट अभी भी ऑनलाइन तरीकों से हमलों को तेज़ कर रहा है. फिलहाल दो तरीकों से यह काम कर रहा है.

आईएस लोगों से ग़ज़ा में पिछले नौ महीने से जारी इसराइली हमले का बदला लेने और उत्तरी सीरिया में आईएस की महिलाओं और बच्चों को कैद करने का बदला लेने की मांग कर रहा है.

अफ़्रीका की ओर रुख़

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अल-क़ायदा की तरह, आईएस भी अव्यवस्था, निराशा और ख़राब प्रशासन व्यवस्था के दम पर फल-फूल रहा है.

अफ्रीका के कुछ हिस्सों में तीनों ही तरह के समूह बड़े पैमाने पर मौजूद हैं. हाल के वर्षों में साहेल बेल्ट के देशों, खासकर माली, नीज़ेर और बुर्किना-फासो में सैन्य तख्तापलट हुए हैं, जिससे इलाके में अस्थिरता बढ़ी है.

फ्रांसीसी, अमेरिकी और यूरोपीय संघ के सैनिक इस तरह के चरमपंथी खतरों को दूर रखने के लिए स्थानीय सरकारों की मदद कर रहे थे, लेकिन उन्हें खदेड़ दिया गया. भाड़े के रूसी सैनिकों ने बड़े पैमाने पर यह काम किया है.

आईएस की अफ्रीका में अब पांच शाखाएं हैं, जिन्हें वह विलायत (प्रांत) कहता है. यह पश्चिमी अफ्रीका, लेक चाड एरिया, कांगो और उत्तरी मोज़ाम्बिक में फैली हुई हैं.

यहां भी आईएस और अल-क़ायदा, एक दूसरे से लड़ रहे हैं और दोनों के बीच अक्सर टकराव होता रहता है.

आईएस का दावा है कि वह अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों का विस्तार कर रहा है. असल में यह उन सरकारों के मुकाबले ज़्यादा मज़बूत दिखाई देता है जिनसे वह लड़ाई लड़ रहा है.

आईएस आमतौर पर घात लगाकर हमले करता है, जिससे दूरदराज़ के इलाकों में दर्जनों सैनिक या स्थानीय लोग मारे जाते हैं.

अफ्रीका अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठनों के लिए भौगोलिक रूप से उतना फायदेमंद साबित नहीं हुआ है जितना 10 साल पहले सीरिया था.

इन इलाकों में वॉलंटियर उस तरह से नहीं पहुंच पाते, जैसे सीरिया में आ जाते थे, क्योंकि वहां तुर्की-सीरिया की सीमा थी और उससे पहले उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के कबाइली इलाके पड़ते थे.

लेकिन आईएस की शाखाओं में अभी भी बहुत लोग हैं. इनमें ज़्यादातर युवा, स्थानीय पुरुष हैं. ये वे लोग हैं जिनके पास मौकों की कमी है.

अफ्रीका में होने वाले छोटे लेकिन अत्यंत हिंसक संघर्ष भले ही यूरोप के तटों से हज़ारों मील दूर हों, लेकिन जैसे जैसे जिहादी खतरा वहां बढ़ेगा, लोग अपनी मिट्टी छोड़कर यूरोप की तरफ सुरक्षित जीवन की तलाश में और ज़्यादा संख्या में भागने लगेंगे.

निशाने पर यूरोप

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2010 के दशक के मध्य में आईएस अपने चरम पर था. यह यूरोप में बड़े पैमाने पर हमले करने में सक्षम था.

इसी तरह का एक हमला आईएस ने साल 2015 में पेरिस के एक कॉन्सर्ट हॉल पर किया था, जिसमें 130 लोग मारे गए थे.

हमला करने वालों को ट्रेनिंग दी गई थी और उन्हें सीरिया से भेजा गया था. उन्होंने आसानी से कई सीमाओं को पार किया. उन्हें बाल्कन से क्लाशनिकोव जैसे शक्तिशाली स्वचालित हथियार हासिल करने में भी किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा.

तब से लेकर अब तक, यूरोप के शहरों में कई हमलों के बाद पुलिस बलों और सुरक्षा एजेंसियां आपस में खुफिया जानकारियां पहले के मुकाबले ज़्यादा अच्छे से साझा कर रही हैं.

ब्रिटेन के अधिकारियों का अब मानना है कि आईएस या अल-क़ायदा के लिए साल 2005 के लंदन बम हमले या साल 2015 के बटाक्लन जैसे हमले करना बहुत मुश्किल होगा. हालांकि अधिकारियों के मुताबिक, ये कहना सही नहीं होगा कि वो ऐसा नहीं कर सकते.

इसके बजाय वे उन लोगों को लेकर ज़्यादा चिंता में हैं जो ऑनलाइन जिहाद के चक्कर में पड़कर कट्टरपंथ के रास्ते पर निकल पड़ते हैं.

यूके में काउंटर टेररिज्म और सुरक्षा एजेंसी एमआई-5 का ज़्यादा समय अभी भी आईएस या अलक़ायदा की साज़िशों और हमलों से निपटने में जा रहा है.

यूरोप अभी भी उनकी ज़द में है. रूस की राजधानी मॉस्को में मार्च, 2024 में हमला हुआ था. इस हमले में 140 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

इससे यह पता चलता है कि आईएस अपने दुश्मन का ध्यान भटकने पर हमला कर सकता है.

नेतृत्व को लेकर चुनौतियां

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इस्लामिक स्टेट का ऑनलाइन प्रचार प्रसार अब उतना मज़बूत नहीं है जितना तब था जब उसने बड़े पैमाने पर कब्ज़ा कर रखा था.

हालांकि अभी भी वह ऐसे ग्राफ़िक्स और वेब डिज़ाइनर्स को भर्ती करने में सक्षम है जो उसके लिए नफ़रत और बदला लेने वाली सामग्री को बहुत अच्छे से बना सकते हैं.

हाल ही में आईएस ने एक वीडियो जारी किया था. इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से एक व्यक्ति अरबी में संदेश दे रहा था. ऐसी स्थिति में व्यक्ति की पहचान उजागर होने का भी कोई ख़तरा नहीं रहता है.

साल 2019 में अबू बकर अल बग़दादी की मौत के बाद से ही पहचान का यह जोखिम आईएस के नेतृत्व के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है.

लगातार ऑनलाइन मौजूदगी के बिना संगठन का नेतृत्व अपने लोगों से दूर हो जाता है.

हालांकि इसके उलट चरमपंथी नेताओं का जीवनकाल छोटा होता है. एक बार जब वे सार्वजनिक हो जाते हैं तो उनके ठिकाने का पता चलने का जोखिम बना रहता है.

मौजूदा समय में इस्लामिक संगठन का नेता कौन है, इसे लेकर कुछ भी मालूम नहीं है.

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