पाकिस्तान: ईरान, भारत और अफ़ग़ानिस्तान से रिश्तों में तनाव, क्या अलग पड़ गया है ये देश

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    • Author, इमाद ख़ालिक़
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद

पाकिस्तान पिछले कई वर्षों से विभिन्न आंतरिक समस्याओं का शिकार है और देश की बिगड़ी हुई अर्थव्यवस्था, राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ती हुई चरमपंथी घटनाओं ने पाकिस्तान को कई मोर्चों पर फंसा रखा है.

ऐसे में ईरान के साथ हाल का तनाव जहां पाकिस्तान के लिए एक परेशानी वाली बात है, वहीं इसे दोनों देशों के बीच ‘बिरादराना’ संबंधों पर एक बड़ा धक्का समझा जा रहा है.

पाकिस्तान के अपने पूर्वी और पश्चिमी पड़ोसी देश भारत और अफ़ग़ानिस्तान के साथ संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं और ऐसे में ईरान के साथ मोर्चा खोलने को क्षेत्र में राजनयिक और भौगोलिक दृष्टि से बहुत महत्व दिया जा रहा है.

ध्यान रहे कि ईरान की ओर से 16 जनवरी की रात पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के इलाक़े ‘सब्ज़ कोह’ में चरमपंथी संगठन ‘जैश-अल-अद्ल’ के कथित ठिकानों पर हवाई हमला किया गया था जिसमें पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार दो बच्चे मारे गए थे जबकि तीन बच्चियां घायल हुई थीं.

ईरान के हमले की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान ने गुरुवार की सुबह ईरान के सीस्तान व बलूचिस्तान प्रांत में कथित चरमपंथियों के ठिकानों को निशाना बनाया जिसमें ईरानी अधिकारियों की ओर से नौ लोगों के मरने की पुष्टि की गई है.

पाकिस्तान चुनाव

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कैसे हैं पाकिस्तान के अंदरूनी हालात?

अगर पाकिस्तान के अंदरूनी हालात पर नज़र डालें तो पाकिस्तान में आम चुनाव में केवल 20 दिन बचे हैं जबकि देश को आर्थिक बदहाली से निपटने के लिए मित्र देशों से लिए गए क़र्ज़ वापस करने का वक़्त बढ़ाने का अनुरोध करना पड़ रहा है.

ऐसे में पाकिस्तान और ईरान के बीच हाल के तनाव के बाद यह राय बन रही है कि पहले से आंतरिक समस्याओं से दो चार पाकिस्तान अब अपने तीन पड़ोसी देशों- भारत, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के साथ सीमा पर लड़ाई में उलझ गया है.

पाकिस्तानी फ़ौज पहले ही देश के अंदर बहुत से चरमपंथी और विद्रोही समूहों से लड़ रही है और इस स्थिति में ईरान की ओर से हमले ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था पर और दबाव बढ़ा दिया है.

इस स्थिति में यह सवाल पैदा होता है कि पाकिस्तान की तीन पड़ोसी देशों के साथ तनाव के कारण क्या हैं? क्या ऐसा पाकिस्तान की भौगोलिक व सुरक्षा स्थिति या अंतरराष्ट्रीय शक्तियों की भूमिका के कारण हो रहा है? क्या पाकिस्तान क्षेत्रीय स्तर पर अकेला पड़ता जा रहा है?

ईरान के हमले के विरोध में इस्लामाबाद में प्रदर्शन

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पड़ोसी देशों के साथ मोर्चेबंदी की वजह क्या है?

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पाकिस्तान की अपने तीन पड़ोसी देशों के साथ मोर्चाबंदी की वजह के बारे में बात करते हुए सीनेट की रक्षा समिति के अध्यक्ष सीनेटर मुशाहिद हुसैन सैयद का कहना है कि पाकिस्तान और ईरान के बीच हाल के तनाव को भौगोलिक राजनीति की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए.

वह कहते हैं कि यह क्षेत्र पिछले तीन-चार दशकों से हिला हुआ है, यहां पहले रूस और अफ़ग़ानिस्तान की जंग हुई, फिर अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में कार्रवाइयां कीं और अब चरमपंथ ने इस क्षेत्र को प्रभावित किया है. पाकिस्तान इस क्षेत्र में अकेला परमाणु शक्ति संपन्न देश है और वह इन सभी परिस्थितियों से प्रभावित हो रहा है.

उनका कहना था कि जहां तक पाकिस्तान के अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंध हैं तो इसमें चीन, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से हमेशा ऐतिहासिक और दीर्घकालिक संबंध रहे हैं.

उनके अनुसार, "भारत के साथ संबंधों में तनाव का कारण यह है कि वह क्षेत्र, और विशेष कर कश्मीर में वर्चस्व चाहता है जबकि पाकिस्तान कश्मीर के विवाद का संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत राजनीतिक हल चाहता है."

पाकिस्तान और भारत के संबंधों का एक लंबा इतिहास है और पिछले सात दशकों में इसमें उतार-चढ़ाव रहा है. पाकिस्तान इस अर्से में अपने पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी देश के साथ दो युद्धों और कारगिल के मोर्चे पर आमने-सामने रहा है.

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अंतरराष्ट्रीय मामलों की विश्लेषक डॉक्टर हुमा बक़ाई ने इस बारे में बीबीसी से कहा कि यह स्थिति कोई नई नहीं है. “इस बारे में पाकिस्तान कई बार कह चुका है कि पड़ोसी देशों की धरती उसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो रही है.”

वो दावा करती हैं कि भारत ने ‘नो कॉन्टैक्ट वार’ की रणनीति अपनाई है और आक्रामक कार्रवाईयों को पूर्वी सीमा से दूसरे देशों में ले जाया गया है.

उनका कहना है कि पाकिस्तान इस समस्या को अफ़ग़ानिस्तान के साथ लगातार उजागर करता रहा है.

वह कहती हैं कि ईरान के साथ हाल की तनावपूर्ण स्थिति नई नहीं है बल्कि 70 के दशक के बाद से चली आ रही है और पाकिस्तान और ईरान के बीच एक संयुक्त प्रक्रिया भी तय की गई थी जिसके तहत सन 2012 में ‘जैश-अल-अद्ल’ के लोगों को पड़कर ईरान के हवाले किया गया था.

ईरानी मिसाइल

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पाकिस्तान-ईरान के बीच तनाव

उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान और ईरान के बीच सीमावर्ती समस्याओं के अलावा कुछ समस्याएं धार्मिक गुटों के कारण भी रही हैं लेकिन पाकिस्तान और ईरान ने हमेशा बातचीत से उन्हें हल करने की कोशिश की है.

हुमा बक़ाई के अनुसार ईरान के साथ हाल के तनाव की वजह ईरान के अंदर भी मिलती है. यह एक ऐसे समय में हुआ है जब चाबहार में पाकिस्तानी शिष्टमंडल मौजूद था.

वह कहती हैं, “अफ़ग़ानिस्तान और ईरान दोनों के साथ पाकिस्तान ने हमेशा रणनीतिक धैर्य दिखाया है. पाकिस्तान ने ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ संबंधों को कभी एक सीमा से अधिक खराब नहीं होने दिया.”

हुमा बक़ाई कहती हैं, “यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पड़ोसी देश भारत में भी चुनाव होने वाले हैं और कई लोग ऐसी राय रखते हैं कि जब भारत में चुनाव हो तो वह पाकिस्तान की सीमा पर कोई आक्रामक कार्रवाई करने की कोशिश करता है. इसलिए पाकिस्तान की ओर से ईरान पर जवाबी हमला केवल ईरान को ही नहीं बल्कि भारत को भी एक संदेश था कि वह किसी ‘मिसएडवेंचर’ के बारे में ना सोचे.”

पाकिस्तान में प्रदर्शन करते युवा

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ईरान के साथ हाल के तनाव पर गहरी निगाह रखने वाले पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव एज़ाज़ अहमद चौधरी ने बीबीसी से कहा कि पाकिस्तान का तीनों पड़ोसी देशों के साथ मोर्चाबंदी की राय ग़लत है और तेहरान के साथ जारी तनाव में भी कमी आ रही है.

वह कहते हैं, “ईरान के साथ पाकिस्तान के हमेशा अच्छे संबंध रहे हैं. कुछ बॉर्डर मैनेजमेंट की समस्या थी, जो अभी बढ़ी है. जो ईरान ने किया वह ग़लत था, ईरान को ऐसा नहीं करना चाहिए था.”

एज़ाज़ अहमद चौधरी का कहना है कि ईरान के विदेश मंत्रालय की ओर से कल जारी किए गए बयान से यह साफ़ हो गया है कि वह मामलों को सुलझाने की ओर ले जाना चाहता है.

पाकिस्तान से अपने वतन अफगानिस्तान लौटते शरणार्थी

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पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के संबंध

सीनेटर मुशाहिद हुसैन सैयद का कहना है कि जहां तक अफ़ग़ानिस्तान का संबंध है तो यह जियो-पोलिटिकल समस्या की बची हुई चीज़ें हैं.

वह कहते हैं, “यह अमेरिका की फैलाई हुई गंदगी है जिसे साफ़ करने में समय लगेगा.”

उनका कहना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट में कहा गया है कि अफ़ग़ानिस्तान में लगभग आठ से दस हज़ार ऐसे किराए के आतंकवादी मौजूद हैं जो पाकिस्तान, चीन, रूस और ईरान समेत दूसरे देशों के ख़िलाफ़ गतिविधियों में शामिल हैं.

उनके अनुसार पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच विवाद केवल सुरक्षा से संबंधित है और पाकिस्तान ने कई बार अफ़ग़ानिस्तान की धरती से पाकिस्तान के ख़िलाफ़ होने वाली कार्रवाइयों के बारे में आवाज़ उठाई है.

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच ऐतिहासिक, व्यापारिक और राजनयिक संबंध रहे हैं. पिछले तीन दशकों से लाखों अफ़ग़ान शरणार्थी पाकिस्तान में रह रहे हैं लेकिन 2000 के दशक में दोनों देशों के संबंध में तनाव उस समय आया जब अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान पर हमले के बाद पाकिस्तान में आतंकवाद की कार्रवाइयों में इज़ाफ़ा हुआ.

पाकिस्तान सरकार की ओर से हाल ही में लाखों अफ़ग़ान शरणार्थियों को उनके देश वापस भेजने की घोषणा के बाद भी दोनों सरकारों में कटुता पैदा हुई है.

पूर्व विदेश सचिव एज़ाज़ चौधरी का कहना है, “जहां तक अफ़ग़ानिस्तान की बात है तो पाकिस्तान ने हमेशा अफ़ग़ानिस्तान की मदद की है, चाहे वह लाखों शरणार्थियों को शरण देने की बात हो या आर्थिक सहायता हो.”

नक्शा

वह कहते हैं, “अफ़ग़ानिस्तान के साथ भी बॉर्डर मैनेजमेंट की समस्याएं हैं और इस बारे में हम उन्हें लगातार बता रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान के व्यापारिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध रहे हैं और वह क़ायम रहेंगे.”

उनका कहना है कि हालांकि भारत के साथ संबंधों में समस्या यह है कि वह बात करने को तैयार ही नहीं है. वो दावा करते हैं, “वह पाकिस्तान को नुक़सान पहुंचने का कोई मौक़ा नहीं जाने देंगे.”

उनका दावा है, “भारत से यह शिकायत रही है कि वह अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद चरमपंथियों की कथित फ़ंडिंग करके पाकिस्तान में अस्थिरता फैला रहा है.”

हालांकि, भारत ऐसे सभी आरोपों को पूरी तरह से ग़लत बताते हुए उन्हें ख़ारिज करता रहा है.

ईरान के साथ संबंधों और हाल के तनाव पर बात करते हुए मुशाहिद हुसैन सैयद का कहना था कि ईरान के साथ पाकिस्तान की कोई बुनियादी समस्या नहीं है.

वह कहते हैं, “ईरान भारत नहीं है और उसके साथ ‘गोपनीय कूटनीति’ के ज़रिए हमारे संपर्क शुरू हो गए हैं और उम्मीद है कि हम सुधार की ओर क़दम उठाएंगे.”

वह कहते हैं कि पाकिस्तान के ईरान में जवाबी हमले के बाद ईरान सरकार ने ख़ुद इस बात को माना है कि इसमें ग़ैर ईरानी नागरिक मारे गए हैं जिससे यह बात साफ़ होती है कि पाकिस्तान के दोनों इस्लामी पड़ोसी देशों में कुछ ऐसे तत्व मौजूद हैं जहां से पाकिस्तान में अस्थिरता फैलाने के लिए कार्रवाई होती है.

पाकिस्तान में अपने परिवार से मिलते कुलभूषण जाधव

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कुलभूषण जाधव की गिरफ़्तारी

ध्यान रहे कि पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत और उससे जुड़े क्षेत्रों में कई बलोच अलगाववादी संगठन पिछले कई दशकों से सक्रिय हैं और उन संगठनों ने अतीत में पाकिस्तान के सुरक्षा बलों, पुलिस और महत्वपूर्ण केंद्रों पर कई घातक हमलों की ज़िम्मेदारी ली है.

पाकिस्तानी अधिकारियों की ओर से पिछले कई वर्षों से यह दावा किया जाता रहा था कि उन पृथकतावादी संगठनों से जुड़े चरमपंथी ईरान में शरण लिए हुए हैं.

मुशाहिद हुसैन सैयद का कहना है कि यह मामला केवल ईरान और पाकिस्तान का नहीं बल्कि पूर्व में ‘सीपेक’ कॉरिडोर योजना पर हमले के ताने-बाने भी पड़ोसी देशों की धरती से जा मिलते हैं.

“चाहे वह अफ़ग़ानिस्तान हो या ईरान, और इसका एक स्पष्ट उदाहरण इंडियन नेवी के कमांडर कुलभूषण जाधव की गिरफ़्तारी है, उन पर न केवल जासूसी बल्कि देश में आतंकवादी कार्रवाइयां करने का भी आरोप है.”

याद रहे कि सन 2016 में पाकिस्तान ने भारतीय नेवी के अधिकारी कुलभूषण जाधव को बलूचिस्तान से जासूसी के आरोप में गिरफ़्तार किया था.

पाकिस्तान ने दावा किया था कि वह बलूचिस्तान में षड्यंत्रकारी कार्रवाईयों में शामिल रहे हैं. उनके बारे में यह दावा भी किया गया कि वह ईरान के रास्ते पाकिस्तान में दाख़िल हुए थे.

डॉक्टर हुमा बक़ाई भी इस बात से सहमति जताती हैं कि पाकिस्तान और ईरान के बीच तनाव को कम करने के लिए संपर्क शुरू हो गए हैं और जल्द ही तनाव में कमी आ जाएगी.

पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय का कार्यालय

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क्या पाकिस्तान अकेला पड़ रहा है?

सीनेटर मुशाहिद हुसैन सैयद इस बारे में राय देते हुए कहते हैं कि यह बात ग़लत है कि पाकिस्तान क्षेत्र में अकेला पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के इस समय भी चीन, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ व्यापारिक और राजनयिक संबंध हैं. “पाकिस्तान क्षेत्र का एक परमाणु हथियार संपन्न देश होने के कारण भी महत्व रखता है.”

भविष्य की रणनीति के बारे में उनका कहना है कि पाकिस्तान को चाहिए कि वह अपनी विदेश नीति के बारे में एक ‘रीजनल रीसेट’ करे.

वह कहते हैं, “इससे यह मतलब है कि हमारे चार पड़ोसी चीन, भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान हैं. चीन के साथ हमारे संबंध बहुत अच्छे हैं जबकि हमारी कोशिश होनी चाहिए कि विशेष कर ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ संबंध में अविश्वास का माहौल ख़त्म हो और अच्छे संबंध बने जो पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के साथ-साथ क्षेत्र के लिए भी बेहतर है.”

मुशाहिद हुसैन सैयद का कहना है कि पाकिस्तान को चाहिए कि वह चीन, रूस, तुर्की, क़तर और सऊदी अरब से बात करे क्योंकि ये देश ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ भी क़रीब हैं और उनके ज़रिए एक क्षेत्रीय कूटनीति की कोशिश होनी चाहिए ताकि क्षेत्र में स्थायी शांति और विकास हो.

एज़ाज़ अहमद चौधरी भी क्षेत्र में पाकिस्तान के अकेले पड़ जाने की राय से सहमत नज़र नहीं आते.

उनके अनुसार ऐसी राय ग़लत है कि पाकिस्तान क्षेत्रीय अकेलेपन का शिकार हो रहा है.

वह कहते हैं, “भविष्य की रणनीति के लिए ज़रूरी है कि हम ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ अपने बॉर्डर मैनेजमेंट की व्यवस्था को ठीक करते हुए अपनी समस्याएं हल करें.”

उन्होंने कहा, “ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ व्यापारिक संबंधों में सुधार लाएं. यह बहुत ज़रूरी है कि हम ईरान के साथ सीमा पर शांति स्थापित करें और अफ़ग़ानिस्तान के साथ बॉर्डर पर अमन बनाए रखने की कोशिश करें.”

वह कहते हैं कि हालांकि भारत के साथ बॉर्डर शांतिपूर्ण है लेकिन इसके साथ संबंधों में बहुत गिरावट है.

इस बारे में डॉक्टर हुमा बक़ाई कहती हैं कि आने वाले समय में ईरान और पाकिस्तान के बीच संबंधों में चीन की भूमिका का महत्व बढ़ जाएगा.

उनका कहना था कि चीन ने पाकिस्तान और ईरान दोनों देशों में भारी पूंजी निवेश कर रखा है और वह नहीं चाहेगा कि क्षेत्र में अस्थिरता हो, इसीलिए उसने सबसे पहले आगे बढ़कर मध्यस्थता की पेशकश की है.

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