चीन के लिए काफ़ी अहम पाकिस्तान का ग्वादर क्यों और कैसे 'डूब' रहा है?

ग्वादर
    • Author, रियाज़ सोहैल
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, कराची

कज़बानो बलोच का घर ग्वादर के पुराने इलाक़े में है, जो हाल की बारिश में पूरी तरह ढह गया है. उनकी एक बेटी हैं और दामाद दर्ज़ी के पास दिहाड़ी पर काम करते हैं.

कज़बानो फ़िश हार्बर रोड के पास स्थित घर में रहती थीं.

उनका कहना है कि पूरे16 घंटे बारिश हुई तो फिर उनके इलाक़े में पानी भर गया और यह काफ़ी ज़्यादा पानी था. कज़बानो के अनुसार, ये तूफ़ान साल 2021 में आए तूफ़ान से भी बड़ा था.

बारिश के साथ-साथ सड़क का पानी भी घर के अंदर आ गया.

इसके बाद कज़बानो का घर, बावर्ची ख़ाना और सड़क की तरफ़ बनी हुई एक दुकान गिर गई.

कज़बानो अपना घर ढहने के बाद किराए के मकान में रह रही हैं.

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ग्वादर में बेतहाशा बारिश

मौसम विभाग के अनुसार, यह असामान्य बारिश थी. फ़रवरी के आख़िर और मार्च की शुरुआत में एक हफ़्ते के दौरान लगभग 250 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई.

इससे पहले ग्वादर में मार्च के महीने में बारिश का रिकॉर्ड 38 मिलीमीटर था.

प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए राज्य की संस्था पीडीएमए (प्रोविंशियल डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी) के अनुसार, हाल की बारिश से 450 घर पूरी तरह ढह गए जबकि 8200 घरों और इमारतों को आंशिक नुक़सान पहुंचा है.

इस बारिश की वजह से ग्वादर शहर ने एक तालाब का रूप ले लिया. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. साल 2005 से लेकर 2024 तक ग्वादर पांच बार जलमग्न हो चुका है.

सवाल यह है कि यह बाढ़ जैसी स्थिति केवल बारिश की वजह से है या इसमें ग्वादर के तेज़ी से हो रहे निर्माण कार्य और प्रोजेक्टों का भी हाथ है.

बीबीसी ने इन ही सवालों के जवाब जानने की कोशिश की है.

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ग्वादर मछुआरों की एक बस्ती थी लेकिन इस बस्ती और इसके आसपास उस समय तेज़ी के साथ बदलाव होने लगा जब साल 2007 में पूर्व सैन्य राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने यहां बंदरगाह का उद्घाटन किया. इस बंदरगाह का निर्माण चीन ने किया था.

चीन और पाकिस्तान के बीच जब साल 2015 में आर्थिक कॉरिडोर सीपेक (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) की घोषणा हुई थी तो ग्वादर इस प्रोजेक्ट का दिल बन गया.

इस पिछड़े इलाक़े को दूसरा ‘शेनज़न’ बनाने का दावा किया गया जो कभी ग्वादर की तरह मछुआरों की बस्ती हुआ करता था.

इस समय शेनज़न चीन का तीसरा सबसे बड़ा शहर बन चुका है.

कोह-ए-बातिल (पहाड़ी) की गोद में बनने वाले बंदरगाह ने स्थानीय लोगों के रास्ते में रुकावट डाली ही, बारिश के पानी के रास्ते को भी रोक दिया.

जब मैं कोह-ए-बातिल और बंदरगाह के बीच स्थित गवर्नमेंट हाई स्कूल, गोत्री बाज़ार पहुंचा तो मैदान के साथ-साथ स्कूल के अंदर भी पानी भरा पाया.

स्कूल के हेड मास्टर मोहम्मद हसन ने मुझे गीले रजिस्टर दिखाए और हाथ से इशारा किया कि सामने वाला कमरा कंप्यूटर लैब है, जिसके सभी कंप्यूटर पानी में डूब चुके हैं.

हेड मास्टर मोहम्मद हसन का कहना था कि ऐसा नहीं है कि यह बारिश पहली बार हुई है, “इससे पहले भी तेज़ बारिश होती थी लेकिन पानी समंदर में चला जाता था.”

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उनके अनुसार, “पहले जेटी बने, इसके बाद पोर्ट बना और फिर एक्सप्रेसवे बनाया गया. इसकी वजह से पानी आबादी की तरफ़ आ रहा है. पहले पानी बहने का प्राकृतिक रास्ता हुआ करता था, जहाँ से होकर पानी समंदर में गिरता था."

"लेकिन रास्ते बंद कर दिए गए और वैकल्पिक रास्ते नहीं बनाए गए. अब, पानी को रास्ता तो चाहिए. इसने पूरा रुख़ आबादी की तरफ़ कर लिया और इसकी वजह से घर भी गिरे.”

ग्वादर बंदरगाह की चारों ओर कंक्रीट की दीवार थी जो आबादी को अलग करती है. मलाबंद के इलाक़े में एक कोने से दीवार को तोड़ा गया था ताकि बारिश के पानी की निकासी हो सके.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ. इससे पहले भी बारिश में इसी तरह दीवार गिराकर पानी निकाला गया और दोबारा दीवार बना दी गई.

ग्वादर डिवेलपमेंट अथॉरिटी के चीफ़ इंजीनियर सैयद मोहम्मद यह बात मानते हैं कि पहले पानी का बहाव पोर्ट वाले इलाक़े में होता था. बाद में वहां ओपन ड्रेन बनाया गया जो बंद था.

उनके अनुसार, यह ड्रेन क्यों बंद था, यह पोर्ट वाले ही जानते हैं. इसकी वजह से पूरा पानी क़ब्रिस्तान से होते हुए मलाबंद के इलाक़े में आ गया.

समुद्र किनारे के सामने मरीन ड्राइव के नाम से एक चौड़ी और छह लेन वाली सड़क बनाई गई है, जिसने इलाक़े की ख़ूबसूरती तो बढ़ाई लेकिन आबादी और समंदर के बीच एक बांध का रूप ले लिया.

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ग्वादर में प्राथमिकता बंदरगाह और उसके बाद उससे जुड़ा इंफ़्रास्ट्रक्चर है.

2018 में सरकार ने बंदरगाह से कार्गो के आने-जाने के लिए एक छह लेन वाला 19 किलोमीटर का पूर्वी एक्सप्रेसवे बनाया.

इससे स्थिति और गंभीर हो गई. इस एक्सप्रेसवे की सतह आबादी से ऊंची थी. स्थानीय लोगों के अनुसार, इससे पानी की निकासी के प्राकृतिक रास्ते भी बंद हो गए.

म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष शरीफ़ मियांदाद कहते हैं कि इसको मेगा सिटी, दुबई सिटी, सीपेक सिटी कहा जाता है लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि इससे पहले वाला जो ग्वादर था, वह इससे बेहतर हुआ करता था.

उनके अनुसार, इससे पहले जब भी बारिश होती थी तो उसका पानी समंदर में चला जाता था.

यहां पानी निकालने के लिए दायीं और बायीं ओर दो रास्ते थे. इन दोनों रास्ते से पानी समुद्र में निकल जाता था लेकिन दोनों ओर विकास के नाम पर जो सड़कें बनाई गईं उनमें निर्माण के समय प्लास्टिक की शीट लगाई गई है.

ऐसा इसलिए किया गया ताकि समुद्र का पानी ना आए लेकिन इससे बारिश का पानी भी वहां नहीं जा रहा है.

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सीवरेज की व्यवस्था सही नहीं

मुराद बलोच मछुआरे हैं. 2010 की बारिश में उनके घर के तीन कमरे ढह गए थे.

हाल के दिनों में होने वाली बारिश से दोबारा उनके घर के दो कमरों समेत वॉशरूम और बावर्ची ख़ाने में दरार पड़ गई है.

जब उनसे मुलाक़ात हुई तो उस समय वह घर से जनरेटर की मदद से बाहर सड़क पर पानी निकाल रहे थे.

मुराद बलोच ने बताया कि उन्होंने पहले बाल्टी से पानी निकाला लेकिन थक गए. स्थानीय पार्षदों के पास गए और जनरेटर मांगा तो उन्होंने जवाब दिया कि पेट्रोल नहीं है.

मुराद बलोच ने ख़ुद पेट्रोल खरीदा. दोस्तों और पड़ोसियों से पाइप के टुकड़े जमा करके एक लंबा पाइप बनाकर पानी की निकासी की.

मुराद बलोच को यह सब कोशिश इसलिए करनी पड़ी क्योंकि उनके इलाक़े में सीवरेज की व्यवस्था सही नहीं है.

हाल की बारिश के अलावा पिछले 15 वर्षों में जब भी बारिश होती है तो शहर से पानी की निकासी खाई खोदकर की जाती है. दूसरा तरीक़ा पाइप के ज़रिए पानी निकालने का है.

ग्वादर डिवेलपमेंट अथॉरिटी भी इसी तरीक़े को अपनाती है. यह सब करने में सड़क दोबारा टूट-फूट जाती हैं.

2004 में ग्वादर डिवेलपमेंट अथॉरिटी (जीडीए) की स्थापना के समय शहर का मास्टर प्लान बनाया गया था. इस मास्टर प्लान में शहरी ढांचे के लिए केंद्र सरकार ने 25 अरब रुपए देने की घोषणा की थी.

जीडीए अधिकारियों के अनुसार, 20 साल गुज़रने के बाद भी केवल आधी रक़म मिल सकी है. इसमें भी शहर के ड्रेनेज और सीवरेज के लिए पैसे शामिल नहीं थे.

बलूचिस्तान में डॉक्टर मालिक बलोच की सरकार आने के बाद ग्वादर की जल निकासी व्यवस्था के लिए राज्य सरकार ने 1.35 करोड़ रुपए निर्धारित किए थे. इसमें से अभी केवल आधी रक़म जारी हो सकी है और एक फेज़ का काम पूरा हुआ है.

जीडीए के चीफ़ इंजीनियर सैयद मोहम्मद के अनुसार, उन्होंने 8.5 किलोमीटर ड्रेनेज और 16 किलोमीटर सीवरेज का निर्माण कराया. यह ओल्ड टाउन के 15 से 16 फ़ीसद हिस्से को कवर कर रहा है.

इस निर्माण में उन्होंने उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जहां पानी जमा रहता था. उनके दावे के अनुसार, जहां-जहां उन्होंने यह निर्माण कराया, वहां से पानी निकल गया था.

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आगे बढ़ता समुद्र और भूगर्भीय जल

अलहदाद बलोच के घर के अंदर और गली में पानी जमा था. वह घर के अंदर बाल्टी से पानी निकालते मगर दोबारा पानी आ जाता. उन्होंने बताया कि वह शाम तक पानी निकालते हैं, फिर सुबह दोबारा पानी जमा हो जाता है.

विशेषज्ञों का कहना है की भूगर्भीय जल का स्तर ऊपर आ गया है. इसकी वजह एक ओर सीवरेज और ड्रेनेज के पानी को रास्ता न मिलने से होने वाला ‘सिपेज’ है तो दूसरी ओर समुद्री कटाव है, जिसका पानी आगे बढ़ गया है.

पज़ीर बलोच भूगर्भ शास्त्री (जियोलॉजिस्ट) हैं. उनका कहना है कि समुद्री सतह ऊपर आ रही है.

उनके मुताबिक़, “सीवरेज और ड्रेनेज व्यवस्था मौजूद नहीं है. अगर है तो सही से काम नहीं कर रही है. इस बारिश से पहले ही यहां ज़मीन के नीचे के पानी की सतह ऊपर थी. इस वजह से पानी दोबारा बाहर आ रहा है.”

उनके अनुसार, “आबादी के साथ निर्माण कार्य में वृद्धि हुई है. इस वजह से पानी के बहाव का जो प्राकृतिक रास्ता था वह बदल गया है. इसके साथ पानी की मांग बढ़ी है, जिसके लिए लोग ज़मीन के नीचे के पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं. जैसे ही ओवर पंपिंग होती है, समंदर का पानी ख़ुद ब ख़ुद आगे बढ़ जाता है. इससे जो बदलाव आए हैं, उस कारण निचले इलाक़े में ज़मीन धंसती जा रही है.”

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ग्वादर डिवलपमेंट अथॉरिटी के चीफ़ इंजीनियर सैयद मोहम्मद कहते हैं की स्थिति चिंताजनक है.

शहर के पुराने इलाक़ों में डेढ़ फ़ीट के बाद समुद्र का पानी निकल आता है. कई जगहों पर उन्होंने रातोरात जल निकासी करके ड्रेन बनाया है.

उनके अनुसार, “अगर घर की बुनियाद भी रखें तो इसके लिए भी ज़मीन के नीचे का पानी निकालना पड़ता है. आबादी घनी होगी तो ज़मीन पर भार बढ़ जाएगा. पहले कच्चे घर थे, अब लोग कंक्रीट के पक्के मकान बना रहे हैं.”

ग्वादर बंदरगाह की व्यवस्था पोर्ट अथॉरिटी के पास है और बाक़ी शहर की प्लानिंग ग्वादर डिवेलपमेंट अथॉरिटी के पास. इन दोनों के बीच एक और संस्था है- म्यूनिसिपल कमिटी, ग्वादर. यह स्थानीय जनप्रतिनिधियों की संस्था है.

रोचक बात यह है कि प्लानिंग तो मेगा सिटी की है लेकिन स्थानीय निकाय ग्रामीण है. इसके पास न तो संसाधन हैं और न जल निकासी की कोई व्यवस्था.

ग्वादर में पीने के पानी की कमी है. यहां पहले सवाल यह था कि यह पानी कहां से आएगा.

अब यह सवाल भी गंभीर हो चुका है कि यह इस्तेमाल किया हुआ पानी कहां जाएगा क्योंकि अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, नए आवासीय प्रोजेक्ट और फ़्री ज़ोन में उद्योग लगता है तो वहां के पानी की भी निकासी होनी है.

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