बंगाल का अकाल: जब थोड़े से अनाज के लिए लोगों ने बेटे-बेटियों को बेच दिया, उस दौर को देखने वालों की कहानी

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- Author, कविता पुरी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
बंगाल में 1943 में आए अकाल में 30 लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. यह दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मित्र देशों में आम नागरिकों की सबसे बड़ी क्षति थी.
बंगाल के अकाल में मारे गए लोगों को दुनिया में कहीं कोई स्मारक नहीं बना है, उनका कोई संग्रहालय नहीं है और न ही कहीं उनके नाम की कोई पट्टिका लगी है.
हालांकि इस अकाल में बच गए लोगों में में से कुछ अभी भी जिंदा हैं. इन्हीं में से एक व्यक्ति उन लोगों की कहानियों को जुटा रहा है.
हमारे पीछे पड़ी थी भूख

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बंगाल के अकाल में जो कुछ लोग बच गए थे, विजयकृष्ण त्रिपाठी उन्हीं में से एक हैं.
वो उन तरीकों के बारे में बताते हैं, जिससे लोग थोड़े से भोजन की व्यवस्था करते थे.
वो कहते हैं, '' बहुत से लोगों ने थोड़े से चावल के लिए अपने बेटे-बेटियों को बेच दिया. कई महिलाएं और लड़कियों उन पुरुषों के साथ भाग गईं, जिन्हें वो जानती तक नहीं थीं.''
विजयकृष्ण त्रिपाठी को यह नहीं पता है कि उनकी आयु कितनी है, लेकिन उनका मतदाता पहचान पत्र बताता है कि वो 112 साल के हैं. वे उन गिने-चुने जिंदा लोगों में से है, जिन्हें अकाल की याद है.
वे मेदिनीपुर में अपने बचपन के बारे में बहुत धीमी आवाज में बताते हैं.
यह बंगाल का एक जिला है. वहां चावल ही मुख्य भोजन था. उन्हें आज भी याद है कि 1942 की गर्मियों में चावल की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ी थीं.
उसी साल अक्टूबर में चक्रवात आया था. इस चक्रवात ने उनके घर की छत को उड़ा दिया था और उस साल धान की फसल को बरबाद कर दिया था. इसकी वजह से चावल उनके परिवार की पहुंच से बाहर हो गया था.
वो कहते हैं, ''भूख ने हमारा पीछा किया. भूख और बीमारी ने. हर उम्र के लोग मरने लगे.''
विजयकृष्ण को याद है कि कुछ खाद्य राहत मिली थी, जो नाकाफी थी.
'आंखों में देखा भूख का भय'

वो कहते हैं, ''हर व्यक्ति को आधा पेट खाकर रहना पड़ता था. क्योंकि वहां खाने के लिए कुछ नहीं था. ऐसे में उनके गांव में बहुत से लोगों की मौत हो गई. लोगों ने खाने की तलाश में लूटपाट शुरू कर दी.''
विजयकृष्ण के बरामदे में उनकी चार पीढ़ियां अकाल की कहानियां सुन रही थीं. उनके साथ सेलेन सरकार भी हैं, जो कि पिछले कुछ साल से बंगाल के गांवों में घूम-घूमकर उस विनाशकारी अकाल में बचे लोगों के अनुभव जुटा रहे हैं.
72 साल के सरकार गर्मजोशी से भरे हुए हैं. हरदम मुस्कुराते रहते हैं. विजयकृष्ण जैसे लोग उनके सामने खुलकर बात करते हैं. वो सैंडल पहनकर गांवों में घूमते हैं. मौसम कैसा भी हो वो अपने बैकपैक और बनाकर पी जाने वाली सिगरेट के साथ यात्रा करते हैं. पुराने जमाने के सेलेन सरकार लोगों की कहानियों को पेन से कागज पर उतारते हैं.
सेलेन सरकार बताते हैं कि वो अपने परिवार का एक फोटो एलबम देखकर बंगाल के अकाल के लिए आसक्त हो गए. वो कलकत्ता (अब कोलकाता) में एक छोटे बच्चे के रूप में इन कृशकाय लोगों की तस्वीरों को देखा करते थे.
ये तस्वीरें उनके पिता ने ली थी, जो उन दिनों एक भारतीय स्वयंसेवी संस्था के साथ काम करते थे. वो अकाल के दौरान लोगों को सहायता पहुंचाते थे. सेलेन कहते हैं कि उनके पिता एक गरीब व्यक्ति थे.
वो कहते हैं, '' मैंने अपने बचपन में उनकी आंखों में भूख के भय को देखा था.''
'...गांव में नहीं बचा चावल'

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रिटायर्ड टीचर सेलेन ने 2013 में ये काम शुरू किया. मेदिनीपुर की यात्रा के दौरान उनकी 86 साल के एक व्यक्ति से मुलाकात हुई और अकाल को लेकर बातचीत हुई.
विजयकृष्ण की तरह श्रीपतिचरण सामंत को भी उस विनाशकारी चक्रवात की याद है. उस समय उनका जीवन पहले से ही कठिन था. चावल की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं.
अक्टूबर 1942 तक वो रोज थोड़ा सा चावल खा रहे थे. इसी दौरान चक्रवाती तूफान आया.
श्रीपतिचरण को याद है कि कैसे चक्रवात के बाद चावल की कीमत आसमान छूने लगी थीं. जो भी कुछ बचा था उसे व्यापारियों ने मुंहमांगी कीमत पर खरीद लिया था.
उन्होंने सेलेन को बताया,'' इसके बाद उनके गांव में चावल नहीं बचा था.''
उन्होंने बताया, ''लोग बचाकर रखे गए अनाज पर निर्भर थे. लेकिन खाने के लिए चावल खरीदने के लिए लोगों ने अपनी जमीनें बेचनी शुरू कर दीं.''
तूफान के बाद, उनके परिवार में रखा चावल कुछ दिन तक तो चला, फिर खत्म हो गया.
हजारों अन्य लोगों की तरह, श्रीपतिचरण भी राहत की उम्मीद में कलकत्ता रवाना हो गए. वो भाग्यशाली थे कि कलकत्ता में उनके परिवार का एक व्यक्ति रहता था, इस वजह से वो बच गए. लेकिन बहुत से अन्य लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे, वे सड़कों के किनारे, कूड़ेदानों के आसपास गिर रहे थे और फुटपाथों पर मर रहे थे.
लाखों लोगों की अकाल मौत

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ब्रिटिश भारत में 1943 में बंगाल के अकाल में कम से कम 30 लाख लोग मारे गए थे. पहली बार प्रत्यक्षदर्शियों ने इसकी कहानी बताई.
अकाल के कई जटिल कारण थे. उन पर व्यापक रूप से बहस जारी है.
साल 1942 में, बंगाल में चावल की आपूर्ति पर बहुत अधिक दवाब था.
बर्मा, जिसकी सीमा बंगाल से लगती है, उस पर उसी साल के शुरू में जापान ने हमला किया. इससे बर्मा से होने वाले चावल का आयात अचानक से बंद हो गया.
बंगाल लड़ाई की अग्रिम पंक्ति के पास था. कलकत्ता मित्र देशों के हजारों सैनिकों और युद्धकालीन उद्योगों से जुड़े मजदूरों का मेजबान बन गया. इससे चावल की मांग बढ़ गई. युद्ध के समय महंगाई बहुत अधिक थी. इस वजह से चावल की कीमत उन लाखों लोगों की पहुंच से बाहर हो गई, जो पहले से ही जूझ रहे थे.
इस बीच, अंग्रेजों को डर था कि जापानी पूर्वी भारत पर हमले का प्रयास करेंगे.

अंग्रेज नई नीति के तहत बंगाल डेल्टा के कस्बों और गांवों में बचे हुए चावल और नौकाओं की जब्ती करने लगे. इस नीति का उद्देश्य आगे बढ़ने वाली किसी भी सेना को खाद्य आपूर्ति और परिवहन सेवा से वंचित करना था. लेकिन इससे पहले से ही स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर दिखने लगा था जिससे कीमतें और बढ़ गईं. चावल का भंडारण खाद्य सुरक्षा के लिए किया जाता था, लेकिन आम तौर पर मुनाफा कमाने के लिए किया जाने लगा.
अक्टूबर 1942 में आए विनाशकारी चक्रवात ने चावल की कई फसलों को नष्ट कर दिया. वहीं बाकी बची फसल बीमारी के चलते तबाह हो गई.
इस मानवीय आपदा के लिए किसे दोषी ठहराया जाए, इस पर काफी लंबे समय से जोरदार बहस चल रही है.
इस बहस में खासतौर पर ये सवाल पूछा जाता है कि क्या उस समय के ब्रितानी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने संकट को कम करने और भारतीयों की मदद के लिए पर्याप्त प्रयास किए? क्या उन्हें इसकी गंभीरता की जानकारी थी?
साल 1943 के अंत में नए वायसराय, फील्ड मार्शल लॉर्ड वेवेल के आने के साथ ही राहत के प्रयास शुरू हुए. लेकिन तब तक कई लोगों की मौत हो चुकी थी.
60 से अधिक लोगों की कहानी

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अकाल के कारणों और इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए, इस पर होने वाली चर्चा अक्सर जीवित बचे लोगों की कहानियों पर हावी हो गई.
सेलेन ने अब तक अकाल के 60 से अधिक प्रत्यक्षदर्शियों की कहानियां जुटाई हैं. उन्होंने जिन लोगों से बात की है, उनमें से ज्यादातर लोग अशिक्षित थे. उन्होंने शायद ही कभी अकाल के बारे में बात की या उनसे किसी ने अकाल के बारे में पूछा था, यहां तक कि उनके अपने परिवार ने भी नहीं.
अकाल में जिंदा बच गए लोगों की गवाही के लिए कोई लेख भी नहीं है. सेलेन को लगता है कि उनकी कहानियों को नजरअंदाज कर दिया गया क्योंकि वे समाज में सबसे गरीब और सबसे कमजोर थे.
वो कहते हैं, "ऐसा लगता है जैसे उन सभी को इस बात का इंतजार था कि काश कोई उनकी बातें सुनता."
सेलेन की मुलाकात जब निरतन बेदवा से हुई तब उनकी उम्र 100 साल हो चुकी थी. उन्होंने अपने बच्चों की देखभाल करने वाली मांओं के दर्द का बयान किया.
उन्होंने कहा, "मांओं के स्तन में दूध नहीं था. उनके शरीर में केवल हड्डियां बची थीं, मांस नहीं था.''
उन्होंने बताया, "कई बच्चे जन्म के समय ही मर गए, उनकी मांएं भी. यहां तक कि जो बच्चे स्वस्थ पैदा हुए थे, वे भी भूख की वजह से कम उम्र में ही मर गए. उस समय बहुत सी महिलाओं ने खुद को मार डाला."
उन्होंने सेलेन को यह भी बताया, "कुछ पुरुष जब अपनी पत्नी को खाना नहीं दे पाए तो वे दूसरे मर्दों के साथ भाग गईं. उस समय लोग इन बातों से इतने परेशान नहीं होते थे. जब आपके पेट में चावल नहीं है और आपको खिलाने वाला कोई नहीं है, तो आपको जज कौन करेगा?"
कहानियां सुनाने के इंतजार में बैठे लोग

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सेलेन ने उन लोगों से भी बात की जिन्हें अकाल से फायदा हुआ था. एक व्यक्ति ने स्वीकार किया कि उसने थोड़े से चावल-दाल या थोड़-बहुत पैसे के बदले बहुत सारी जमीन खरीद लीं.
उन्होंने सेलेन को यह भी बताया कि एक परिवार बिना वारिस के मर गया, इसलिए उनकी जमीन को उन्होंने अपना मान लिया.
अकाल में जीवित बचे कुछ लोगों से मिलने के लिए सेलेन की एक यात्रा के दौरान उनके साथ बंगाली-अमेरिकी लेखक कुशनावा चौधरी भी थे.
वे कहते हैं, "हमें उन्हें खोजना नहीं पड़ा. वे छिपे नहीं थे. वे सभी पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के गांवों में साफ दिखाई दे रहे थे. वे दुनिया के सबसे बड़े ऐतिहासिक अभिलेख के रूप में वहां बैठे थे."
वो कहते हैं, "किसी ने भी उनसे बात करने की कोशिश नहीं की. मुझे इसको लेकर बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई."
अकाल को उस समय की भारतीय फिल्मों, फोटोग्राफ और चित्रों में याद किया जाता है, लेकिन कुशनावा का कहना है कि अकाल पीड़ितों या उसमें जिंदा बचे लोगों की आवाज के रूप में शायद ही इसे कभी याद किया गया.
वो कहते हैं, "अकाल की कहानी उन लोगों ने लिखी है जिन पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा था.''
भारत में मौतों का साल

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प्रोफ़ेसर श्रुति कपिला कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं. उनका कहना है कि अकाल पीड़ितों के भाग्य पर शायद इसलिए ग्रहण लग गया है क्योंकि 1940 का दशक भारत के लिए मौत का दशक था.
साल 1946 में कलकत्ता में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे हुए. इन दंगों में हजारों लोगों की जान गई.
"इसके एक साल बाद, अंग्रेज देश को हिंदू बहुल भारत और मुस्लिम बहुल पाकिस्तान में बांट कर चले गए. आज़ादी की ख़ुशी तो थी, लेकिन बंटवारा रंक्तरंजित और दर्दनाक था- दस लाख से अधिक लोग मारे गए, क्योंकि लोगों ने दूसरे धर्म के लोगों पर हमला बोल दिया. एक करोड़ 20 लाख लोगों ने नई सीमा पार की."
बंगाल को ही भारत और पूर्वी पाकिस्तान, जो बाद में बांग्लादेश बना, में बांट दिया गया.
अस्सी साल बाद, अकाल में बचे कुछ ही लोग जीवित हैं. सेलेन को अनंगमोहन दास नाम के एक व्यक्ति से बात करने जाना याद है, जो उस समय 91 साल के थे. यह सुनकर कि वह वहां क्यों आए है, वो आदमी कुछ देर के लिए चुप हो गया. फिर उनके चेहरे पर आँसू बहने लगे.
उन्होंने कहा, "तुम इतनी देर से क्यों आए?"
सेलेन ने ऐसे कई लोगों के जो विवरण जुटाए हैं, वे उस घटना का एक छोटा सा प्रमाण भर हैं, जिसमें लाखों लोगों की मौत हो गई और लाखों लोगों की जिंदगियां बदल गईं.
वो कहते हैं, "जब आप अपना इतिहास भूलना चाहते हैं, आप सब कुछ भूलना चाहते हैं." लेकिन सेलेन ने ठान लिया है कि ऐसा होना नहीं चाहिए.
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