फ़लस्तीनी क्षेत्र का दूसरा हिस्सा धार्मिक और रणनीतिक रूप से क्यों अहम है

फ़लस्तीनी

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    • Author, एंजेल बर्मुडेज़
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ संवाददाता

वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनी लोगों ने इसराइल की जेलों से छूटे 39 कैदियों का स्वागत जश्न मना कर और फ़लस्तीनी झंडा फहरा कर किया.

हमास और इसराइल के बीच युद्ध शुरू होने के बाद पहली बार हु्ए अस्थायी युद्धविराम के तहत शुक्रवार, 24 नवंबर की रात को इन कैदियों को वेस्ट बैंक में रिहा कर दिया गया.

सात अक्टूबर को हमास ने ज़मीन और हवाई रास्ते से इसराइल की सीमा में घुसकर उस पर हमला किया था जिसके बाद इसराइल और हमास में भीषण जंग छिड़ गई थी.

तब से दुनिया भर की नज़रें ग़ज़ा पर टिकी हैं, लेकिन इस दौरान इसराइल की पश्चिमी सीमा से सटे फ़लस्तीनी हिस्से वेस्ट बैंक से भी लगातार हिंसक झड़पों की ख़बरें मिलती रही हैं.

लेकिन जहां हमास के सात अक्तूबर के हमले के बाद इसराइल की जबावी कार्रवाई में ग़ज़ा में अब तक 14,500 लोगों की जान जा चुकी है, वहीं वेस्ट बैंक में अब तक क़रीब 205 फ़लस्तीनियों की मौत हुई है. हमास के हमले में क़रीब 1,200 इसराइलियों की जान गई थी.

वीडियो कैप्शन, इसराइल और हमास के बीच क्या डील हुई है, जिससे रुक गया युद्ध

फ़लस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार वेस्ट बैंक में हुई अधिकतर मौतों का कारण इसराइली सुरक्षाबलों के साथ हुई झड़पें हैं. हालांकि 9 लोगों की मौत यहां बसाए गए लोगों के हाथों हुई है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने संयुक्त राष्ट्र के हवाले से बताया है कि बीते 15 सालों में वेस्ट बैंक में सबसे अधिक हिंसा बीते कुछ हफ़्तों में ही हुई है.

बीते 75 सालों में फ़लस्तीन के साथ-साथ अरब-मुस्लिम देशों के साथ इसराइल के संघर्ष में 5,655 वर्ग किलोमीटर के इस इलाक़े ने बड़ी अहम भूमिका निभाई है

चलिए इस रिपोर्ट में ये समझने की कोशिश करते हैं कि इसराइलियों और फ़लस्तीनियों के बीच संघर्ष में इस कब्ज़े वाले इलाक़े की भूमिका क्या रही है.

जॉर्डन का नियंत्रण

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जिस वेस्ट बैंक को आज हम जानते हैं, 1948 के अरब-इसराइल युद्ध से पहले उसका कोई अस्तित्व था ही नहीं. इसी युद्ध ने इसराइल की आज़ादी भी पुख्ता कर दी थी.

युद्ध के बाद हुए समझौते के तहत ग़ज़ा पट्टी पर मिस्र का कब्ज़ा हो गया, और जॉर्डन की सल्तनत ने पूर्वी यरूशलम और वेस्ट बैंक पर अपना नियंत्रण कर लिया.

अपनी स्टडी "द वेस्ट बैंक: अ पोट्रेट" में जॉन पी. रिचर्डसन ने लिखा है, "वेस्ट बैंक को मिला स्पेशल स्टेटस और उसकी भूमिका इसके नाम से स्पष्ट ज़ाहिर होती है. 1949 तक और इसराइल राष्ट्र के बनने तक इस इलाक़े के लिए वेस्ट बैंक शब्द का उपयोग नहीं किया गया था. ये इलाक़ा ब्रिटिश मैन्डेट का पश्चिमी हिस्सा था और पूरे देश से अलग नहीं था."

फ़लस्तीनियों के इस इलाक़े पर जॉर्डन के कब्ज़े के बाद, इस शब्द का इस्तेमाल जॉर्डन नदी के पश्चिम में बसे जॉर्डन से अलग जगह को दिखाने के लिए किया जाने लगा. फ़लस्तीनियों का ये पूरा इलाक़ा जॉर्डन नदी के पूर्व में था.

लेकिन इस इलाक़े पर जॉर्डन के कब्ज़े को मान्यता कम ही मुल्कों ने दी. ब्रिटेन और पाकिस्तान ने इसे मान्यता दी, जबकि अधिकांश अरब मुल्कों ने इसकी कड़ी आलोचना की. उन्होंने जॉर्डन के शाह अब्दुल्ला प्रथम के इस क़दम को शक़ की नज़र से देखा.

यरूशलम का अल-अक्सा मस्जिद

जेनिन शहर में इसराली सैनिकों का विरोध करते हुए फ़लस्तीनी

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इमेज कैप्शन, जेनिन शहर में इसराली सैनिकों का विरोध करते हुए फ़लस्तीनी

इस इलाक़े पर कब्ज़े के एक साल बाद एक फ़लस्तीनी अरब व्यक्ति ने यरूशलम के अल-अक्सा मस्जिद में शाह अब्दुल्ला प्रथम की हत्या कर दी.

हालांकि इसके बाद फ़लस्तीनियों को जॉर्डन की नागरिकता दी गई और जॉर्डन के अम्मान मे उन्हें सरकारी नौकरियां भी मिली. लेकिन मोटे तौर पर ये कहा जा सकता है कि जॉर्डन नदी के दो तरफ से हिस्सों में लोगों के बीच रिश्ते कभी सौहार्दपूर्ण नहीं हो सके.

अमेरिका की पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर इयान लुस्तिक ने बीबीसी को बताया, "जॉर्डन के ख़िलाफ़ फ़लस्तीनियों का गुस्सा दो कारणों से फूटा. पहला, फ़लस्तीनी शरणार्थी 1948 के समझौते के तहत तय की गई सीमा (ग्रीन लाइन) पार कर इसराइल जाने की कोशिश करते, लेकिन इसराइली सेना उन पर और वेस्ट बैंक पर हमले करती. इस कारण कई फ़लस्तीनियों की मौत हुई और इस इलाक़े में भारी तबाही हुई. लेकिन जॉर्डन की सेना इन लोगों की रक्षा नहीं कर पाई."

"दूसरा कारण रहा- मिस्र में गमाल अब्दुल नासिर का उत्थान और अरबवाद का विस्तार. 1950 के मध्य से 60 के दशक के आख़िरी के दौर में अरब जगत में नासिर एक हीरो बन चुके थे. ख़ासकर, फ़लस्तीनियों को ये उम्मीद थी कि उनके नेतृत्व में अरब जगत एक होगा और फ़लस्तीन को आज़ादी मिलेगी, वो एक बार फिर अपने घर जा सकेंगे."

गमाल अब्दुल नासिर मिस्र के एक सैन्य अधिकारी थे जो बाद में मिस्र के राष्ट्रपति बने.

वेस्ट बैंक में रहने वाले फ़लस्तीनी अरबवाद के साथ भावनात्मक तौर पर जुड़े थे, वे उन पार्टियों का समर्थन करते जो नासिर के अरबवाद का समर्थन करते. लेकिन ये वो संस्थाएं थीं, जो जॉर्डन की राजशाही के विरोध में थी इसलिए सरकार ने उनका दमन कर दिया.

एक 'छोटा बर्लिन'

शाह अब्दुल्ला प्रथम

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उस वक्त पूरे मध्य पूर्व के भूराजनीतिक खेल में वेस्ट बैंक की अहमियत बेहद अधिक थी.

ये जगह इतनी महत्वपू्र्ण थी अमेरिका की तरफ से जॉर्डन के राजदूत विलियम मैकोम्बर ने जॉन एफ़ कैनेडी से कहा कि ये इलाक़ा एक तरह से "छोटा बर्लिन" है.

अशालोम रूबिन अपनी क़िताब "द लिमिट्स ऑफ़ द लैंड: हाउ द स्ट्रगल फ़ॉर वेस्ट बैंक शेप्ड द अरब-इसराइली कॉन्फिक्ट" (जगह की सीमाएं: वेस्ट बैंक के लिए संघर्ष ने कैसे अरब-इसराइली संघर्ष को रूप दिया) में लिखते हैं, "यूरोप में शीत युद्ध के दौरान जैसे बर्लिन बेहद अहम था, वैसे ही मध्य पूर्व में वेस्ट बैंक रणनीतिक तौर पर सबसे अधिक संवेदशील इलाक़ा था. ये वो जगह बन गया था एक बड़े संघर्ष में शामिल दो पक्ष भिड़ रहे थे."

रूबिन के अनुसार गमाल अब्दुल नासिर की महत्वाकांक्षा ने मिस्र और इसराइल को एक दूसरे के सामने ला कर खड़ा कर दिया था. इसराइल ने मिस्र से सटी अपनी सीमा और अरब प्रभाव वाले उसके इलाक़ों से सटे अपने इलाक़ों के बाड़ बिछा दी.

रूबिन कहते हैं, "1954 से लेकर 1967 के बीच जो अरब-इसराइली संघर्ष था उसे अरब दुनिया के पूर्वी हिस्से में बसे मुल्कों के बीच नेतृत्व बनाने की मिस्र की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है."

अरब मुल्कों का राजनीतिक रुझान

अब्दुल नासिर

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इस दौरान मिस्र ने कमज़ोर अरब मुल्कों के राजनीतिक रुझान को प्रभावित करने के कोशिश की. जॉर्डन ऐसा ही एक कमज़ोर देश था, और वेस्ट बैंक पर उसका कब्ज़ा था. इसराइल के लिए ये गंभीर चिंता का सबब था.

रूबिन के अनुसार, "1949 की शुरुआत में इसराइल इस बात को लेकर बेहद परेशान था कि अरब मुल्कों की सेना चाहे तो वेस्ट बैंक के इलाक़े से होते हुए, बड़ी आसानी से उसके बड़े शहरों, सड़कों और सैन्य अड्डों तक पहुंच सकती है."

साल 1918 तक जॉर्डन ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा रहा था. बाद में ये ब्रिटेन के नियंत्रण में रहा. 1946 में ये आज़ाद हुआ. यहां की राजशाही की कमज़ोरियों को लेकर इसराइल को डर था.

रूबिन कहते हैं, "जॉर्डन की हाशमी राजशाही उपनिवेशवाद से मुक्ति के दौर में ब्रितानी सम्राज्य के फ़ैसलों का नतीजा था. ये एक अरबवाद के दौर का कमज़ोर देश था और तख्तापलट की लोगों की कोशिश के समय एक राजशाही था. लेकिन आने वाले वक्त में जॉर्डन एक ताकतवर अरब मुल्क बनने वाला था और ऐसा होता तो इसराइल के सामने वो एक मज़बूत प्रतिद्वंद्वी बन जाता."

जानकार कहते हैं इसराइल भविष्य में इस तरह की स्थिति में खुद को नहीं डालना चताता था, इसलिए वो वेस्ट बैंक पर कब्ज़ा करने की कोशिश करता रहा.

राजनीति के खेल में धर्म की जगह

फ़लस्तीनी युवा

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यही कारण है कि जॉर्डन के किंग हुसैन को इसराइल एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखता था जो वेस्ट बैंक को इसराइल और दूसरे ताकतवर अरब मुल्कों के बीच एक बफ़र ज़ोन की तरह बनाए रख सकते हैं.

रूबिन कहते हैं कि जॉर्डन के शासक ने इसराइल के रुख़ में परिवर्तन आते देखा और दोनों पक्षों में रणनीतिक तौर पर अहम समझौता हुआ.

किंग हुसैन ने कहा कि वो इसराइल के साथ सटी सीमा पर शांति बहाल रखेंगे और दूसरे अरब मुल्कों की सेनाओं से वेस्ट बैंक तक नहीं पहुंचने देंगे. वहीं इसराइल ने माना कि वो अमेरिका के आगे किंग हुसैन का साथ देंगे ताकि अमेरिका उनकी सत्ता उखाड़ने की कोशिश करने वाले उनके दुश्मनों को जॉर्डन से दूर रखे.

लेकिन 1967 में छह दिन का युद्ध हुआ और स्थिति बदल गई. इस युद्ध में इसराइल ने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र का आकार कई गुना बढ़ा दिया.

उसने मिस्र के हाथों से सिनाई प्रायद्वीप और ग़ज़ा पट्टी को छीनकर उस पर नियंत्रण कर लिया, सीरिया के गोलान हाइट्स और पूर्वी यरूशलम और वेस्ट बैंक पर कब्ज़ा कर जॉर्डन की सीमा तक अपना नियंत्रण कर लिया.

यरूशलम में यहूदी

अल-अक्सा मस्जिद

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ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से देखा जाए तो ये इसराइल के लिए ये बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि यरूशलम पर कब्ज़ा उसके लिए अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि थी. ऐसा इसलिए क्योंकि यहूदी धर्म (जुडाइज़्म) में सबसे अधिक पवित्र माने जाने वाले वेस्ट वॉल के पास यहूदियों को प्रार्थना करने की अनुमति नहीं थी.

वेस्ट बैंक पर कब्ज़ा भी उसके लिए महत्वपूर्ण था. इसराइल का मानना है कि इसका कुछ हिस्सा जुडेया और सामरिया हुआ करता था, जो प्राचीन इसराइल में थे. ये वही इलाक़ा था जिस पर किंग डेविड का और फिर बाद में उनके बेटे किंग सोलोमन का शासन था.

यहूदी धर्म को मानने वालों के लिए वेस्ट बैंक में सबसे महत्वपूर्ण स्थानों में से एक हेब्रोन है. माना जाता है कि बाइबल के किरदारों में अहम रहे अब्राहम, इसाक और जेम्स को उनके साथियों सारा, रेबेका और लिया के साथ यहां दफनाया गया था.

ये जगह ईसाइयों के लिए भी पवित्र है और समान धार्मिक विरासत होने के कारण, यह जगह इस्लाम धर्म को मानने वाले मुसलमानों के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिन्होंने वहां एक मस्जिद बनाई है.

लेकिन सदियों तक ये जगह एक तरह से केवल मुसलमानों के लिए आरक्षित थी. 1967 के बाद से दूसरे धर्मों को मानने वाले भी यहां आने लगे.

विवादित इलाक़े

अल-अक्सा मस्जिद

राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर इयान लुस्तिक कहते हैं कि धर्म के मामले में पहले के ज़ायनिस्ट धार्मिक कम और निरपेक्ष अधिक थे. वो इस प्राचीन इलाक़े में अपने लिए जितनी हो सके उतनी ज़मीन चाहते थे, लेकिन इलाक़े के चरित्र का सम्मान करते हुए वो उन हिस्सों को छोड़ने के लिए तैयार था जहां पहले ये ही अरब मूल के लोग रहते थे. उनके लिए ये यहूदियों के देश का हिस्सा था.

इयान लुस्तिक कहते हैं, "1948 के इसराइल में ऐतिहासिक रूप से यहूदियों के लिए महत्वपूर्ण कई जगहें नहीं थीं, जैसे कि वेस्ट बैंक और यरूशलम. बेन गुरयॉन जब इसराइल के प्रधानमंत्री थे, उन्होंने फ़ैसला लिया कि इसके लिए युद्ध छेड़ना सही नहीं होगा."

1967 में हुए छह दिन के युद्ध के बाद इसराइल ने वेस्ट बैंक के कुछ हिस्सों में यहूदी बस्तियां बनाने का काम शुरू कर दिया.

कब्ज़े के पहले दशक के दौरान फ़लिस्तीनियों की तरफ से उन्हें लोगों का प्रतिरोध कम ही झेलना पड़ा. लेकिन 1970 के बाद से स्थिति बदलने लगी.

मेनाचेम बेगिन (1979 से लेकर 1983) इसराइल के प्रधानमंत्री बने और उन्होंने वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियां बसाने का काम काफी बढ़ा दिया. उनके कार्यकाल में बस्तियों की संख्या बढ़ कर तीन गुना हो गई और यहां रहने वाले यहूदियों की संख्या पांच गुना तक बढ़ी.

इसराइलियों का अधिकार

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: ग़ज़ा में अस्थायी संघर्ष विराम, कुछ इसराइली बंधक रिहा

इसराइल के मौजूदा प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू जिस लिकुद राजनीतिक पार्टी से नाता रखते हैं उसके संस्थापक मेनाचेम बेगिन ही थे. बेगिन वेस्ट बैंक पर नियंत्रण छोड़ने की संभावना को अस्वीकार करते थे.

1977 के चुनावों में लिकुद पार्टी ने जो मेनिफेस्टो दिया था उसमें लिखा था, "इसराइल की ज़मीन पर इसराइलियों का अधिकार शाश्वत है... इसलिए, जुडेया और सामरिया को विदेशियों को नहीं सौंपा जाना चाहिए."

उनके दौर में ग़ज़ा, सिनाई, पूर्वी यरूशलम और गोलान हाइट्स में भी यहूदियों की बस्तियां बसाई गईं. इसराइल के ख़िलाफ़ आलोचना की एक मुख्य वजह ये भी है.

फ़लस्तीनियों के अनुसार इसराइल उन्हें उनके अधिकारों से दूर रखना चाहता है और वो यहूदी बस्तियां बसाने की इसराइल की कोशिश को अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अवैध मानता है.

फ़लस्तीनियों पर हमले

मेनाचेम बेगिन

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भूराजनीतिक मामलों का विश्लेषण करने वाली कंपनी कॉग्विटिव इन्वेस्टमेन्ट के निदेशक जेकब शापिरो कहते हैं कि अलग-अलग सरकार के दौर में यहूदी बस्तियां बसाने की इसराइल की नीति अलग-अलग रही है.

बीबीसी को उन्होंने बताया, "कुछ सरकारों ने किसी भी तरह की बस्तियां बनाने को मंज़ूरी नहीं दी और वास्तव में, अवैध रूप से बनाई बस्तियों को नष्ट करने के आदेश दिए. नेतन्याहू सरकार जैसे अन्य नेताओं ने इसे धार्मिक दलों के साथ जोड़ा और बस्तियों की संख्या को अपने हिसाब से बढ़ाने की नीति अपनाई."

मौजूदा वक्त में पूर्वी यरूशलम में बसाई गई यहूदी बस्तियों मे 240,000 इसराइली रहते हैं, वहीं वेस्ट बैंक में ऐसी बस्तियों में 450,000 इसराइली रहते हैं.

बीते साल इतमार बेन-ग्विर और बेज़ालेल स्मोट्रिच जैसे धुर-दक्षिणपंथी नेताओं की पार्टियों के साथ नेतन्याहू की सरकार बनने के बाद से यहूदी बस्तियों का मुद्दा एक बार फिर बड़ा हो गया है. बीते वक्त में वेस्ट बैंक में इसराइली बस्तियों के लोगों के फ़लस्तीनियों पर हमले बढ़े हैं. नेतन्याहू और इतमार बेन-ग्विर दोनों की कब्ज़े वाले इलाक़ों में यहूदी बस्तियां बनाने का समर्थन करते हैं.

हमास के इसराइल पर हमले के बाद

हेब्रॉन का इब्राहिम मस्जिद जिसे यहूदी, ईसाई और मुसलमान अहम मानते हैं,

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संयुक्त राष्ट्र के अनुसार सात अक्तूबर को हमास के इसराइल पर हमले के बाद एक महीने के भीतर वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनियों पर यहूदियों के हमलों की 222 घटनाएं हुई हैं.

नवंबर 12 तक इसराइली एनजीओ बातसलीम के जुटाए आंकड़ों के अनुसार, वेस्ट बैंक में इसराइलियों के हमलों, रास्ता रोके जाने के कारण 874 फ़लस्तीनी अपना घर छोड़ने को बाध्य हुए हैं.

इसके अलावा, हमास के हमले के बाद से इसराइली सैन्य अधिकारियों ने वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनियों की आज़ादी को भी काफी हद तक सीमित कर दिया है, इसराइली सेना की चौकियों की संख्या कई गुना बढ़ गई हैं.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, हेब्रॉन के एच21 जिले में दो सप्ताह लकर फ़लस्तीनियों को घर से बाहर निकलने नहीं दिया गया. जब उन पर लगी पाबंदी हटी तो उन्हें सप्ताह में तीन बार केवल कुछ घंटों के लिए निकलने की अनुमति दी गई.

इस दौरान वेस्ट बैंक में इसराइली सैनिकों पर भी कई हमले हुए.

समाधान आसान नहीं है

बिन्यामिन नेतनयाहू

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साल 1993 के ओस्लो समझौते को इसराइलियों और फ़लस्तीनियों के बीच शांति बहाल करने के लिए सबसे बेहतर रास्ता माना जाता है.

लेकिन कुछ जानकार मानते हैं कि वेस्ट बैंक में इसराइली बस्तियों की संख्या इस कदर बढ़ गई है कि दो अलग-अलग देश बनाने का समाधान लगभग अव्यावहारिक हो गया है.

प्रोफ़ेसर इयान लुस्तिक कहते हैं कि बड़ी संख्या में यहूदी बस्तियों के बनने के कारण इसराइल के साथ-साथ एक अलग फ़लस्तीनी राष्ट्र का बन सकता बेहद मुश्किल है.

"पैराडाइम लॉस्ट: फ्ऱॉम टू-स्टेट सॉल्यूशन टू वन स्टेट रियलिटी" (खोया आदर्श: दो-राष्ट्र समाधान से एक-राष्ट्र की वास्तविकता तक) नाम की क़िताब लिख चुके प्रोफ़ेसर इयान लुस्तिक कहते हैं, "1980 के दशक की शुरुआत में जब वेस्ट बैंक में लगभग 40,000 यहूदी थे, उस वक्त जानकारों का कहना था कि अगर यहां एक लाख यहूदी हो जाएंगे तो इसराइल के इस इलाक़े को छोड़ने की संभावना ख़त्म हो जाएगी. क्योंकि कोई सरकार उन्हें यहां से वापिस भेजने में सक्षम नहीं होगी. अब तो यहां 750,000 यहूदी हैं."

'फ़लस्तनी राष्ट्र बनने की संभावना'

वेस्ट बैंक में विरोध प्रदर्शन

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प्रोफ़ेसर इयान लुस्तिक कहते हैं, "अगर आप इसराइल को वेस्ट बैंक से अलग करने की कोशिश भी करते हैं तो आप समझ सकते है कि कितनी बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है. एक दौर था जब दो राष्ट्र समाधान संभव था, अब ये समाधान संभव नहीं है."

हालांकि जेकब शापिरो नहीं मानते कि यहां बसाई गई यहूदी बस्तियों की संख्या कोई रुकावट है.

वो कहते हैं, "फ़लस्तीनी राष्ट्र बनाने की व्यवस्था कभी भी समस्या नहीं रही है. अगर इसे लेकर किसी तरह के राजनीतिक समझौते तक पहुंचा जा सका, तो अब तक जो कुछ भी हुआ है उसके बावजूद एक अलग फ़लस्तीनी राष्ट्र बन सकेगा. लेकिन मुद्दा ये है कि ऐसा करने की किसी भी पार्टी की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है."

वेस्ट बैंक की अहमियत को बताते हुए प्रोफ़ेसर इयान लुस्तिक कहते हैं कि आने वाले वक्त में अलग फ़लस्तनी राष्ट्र बनने की संभावना बनी तो ये हिस्सा बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा.

वो कहते हैं "फ़लस्तीनियों के लिए ये सबसे बड़ा हिस्सा है जहां क़रीब 30 लाख लोग रहते हैं. फ़लस्तीनी यहां बहुमत में हैं."

वीडियो कैप्शन, इसराइली सेना के सुरंग और बंधकों वाले वीडियो का सच

ये इसलिए भी अहम हैं क्योंकि ओस्लो समझौते के तहत यही वह इलाक़ा है जहां फ़लस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण (पीए) ने अपना मुख्यालय बनाया. इस जगह पर फ़लस्तीनियों का सेल्फ-गवर्नेंस भी रहा है.

जहां ग़ज़ा में हमास का शासन है वहीं वेस्ट बैंक में फतह आंदोलन का शासन है जिसका नेतृत्व फ़लस्तीनी प्राधिकरण के अध्यक्ष महमूद अब्बास करते हैं.

वो कहते हैं, "ग़ज़ा में संसाधन न के बराबर हैं और ज़मीन पर आबादी का दबाव अधिक है. सांस्कृतिक और आर्थिक आज़ादी के साथ एक स्वतंत्र राष्ट्र बने रहने की उसकी क्षमता सीमित है. लेकिन इससे अलग वेस्ट बैंक में हेब्रॉन, नैबुलस, जेनिन और तुल्कारेम जैसे बड़े शहर हैं. ये सांस्कृतिक और आर्थिक तौर पर स्वतंत्र राष्ट्र बने रहने की उसकी क्षमता ग़ज़ा के मुक़ाबले अधिक है."

फ़लस्तीनियों के लिए वेस्ट बैंक की अहमियत बताते हुए जेकब शापिरो कहते हैं, "उनके पास बस यही तो बचा है. ये वो एकमात्र ज़मीन है जो उनके चारों तरफ मौजूद जॉर्डन, इसराइल और मिस्र जैसी ताकतों ने अब तक उनसे नहीं ली है."

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