इसराइल क्या कभी स्वतंत्र और संप्रभु देश फ़लस्तीन के लिए तैयार होगा?

फ़लस्तीनी

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पिछले एक महीने से अधिक समय से इसराइल और हमास के बीच भयानक जंग जारी है.

इसमें अब तक दोनों तरफ के हज़ारों लोगों की जान जा चुकी है. इस लड़ाई का कोई साफ़ अंत नज़र नहीं आ रहा है. शांति पहले से कहीं अधिक दूर नज़र आ रही है.

हमास ने सात अक्टूबर को इसराइली क्षेत्र पर हमला किया था. इसके बाद से इसराइल ग़ज़ा में लगातार हमले कर रहा है.

फ़लस्तीनियों और इसराइलियों के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है. इस जटिल युद्ध को ख़त्म करने के लिए समझौते तक पहुँचने में कई तरह की बाधाएँ दशकों से मौजूद हैं.

इसराइल और भविष्य के फ़लस्तीन की सीमाएं, यरुशलम की स्थिति, शरणार्थियों की वापसी, पानी का वितरण या राजनीतिक हथियार के रूप में हिंसा का उपयोग शुरू से ही इसके समाधान की प्रमुख बाधाएं रही हैं. इन्होंने शांति प्रयासों में किसी भी तरह की प्रगति को रोक के रखा हुआ है.

हाल के सालों में वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के विस्तार और फ़लस्तीनी पक्ष में विभाजन और दोनों पक्षों में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से वे कठिनाइयां बढ़ती गईं, जो शांति से एक साथ रहने के फ़लस्तीन और इसराइल के रूप में दो देशों की संभावना को बढ़ाती हैं.

वीडियो कैप्शन, जंग का दर्द बयां करती ग़ज़ा के युवाओं की 'डायरी'

चारों तरफ़ फैली बस्तियां

इसराइली बस्तियां

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जब 1993 में ओस्लो समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, उस समय वेस्ट बैंक में क़रीब 110,000 और पूर्वी यरुशलम में क़रीब 140,000 इसराइली निवासी थे.

बस्तियों के मुद्दे को बाद में हल किया जाना था, लेकिन इसराइल और फ़लस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन (पीएलओ) ने जिन समझौतों पर हस्ताक्षर किए, उन्होंने नई कॉलोनियों के निर्माण पर रोक लगा दी.

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अधिकृत क्षेत्र में मानवाधिकारों के लिए इसरायली सूचना केंद्र बी'त्सेलम के आँकड़ों के मुताबिक़ तीस साल बाद फलस्तीनी क्षेत्रों की क़रीब 300 बस्तियों में 700,000 से अधिक इसराइली रहते हैं. इनमें से क़रीब पाँच लाख वेस्ट बैंक में और क़रीब दो लाख पूर्वी यरुशलम में रहते हैं.

डोव वैक्समैन कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में स्थित वाई एंड एस नाज़ेरियन सेंटर फ़ॉर इसराइली स्टडीज़ के निदेशक हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''बस्तियों का निरंतर विस्तार वास्तव में शांति की दिशा में एक बाधा रहा है. न केवल उन बस्तियों की संख्या के कारण जिन्हें ख़ाली करना होगा, बल्कि इसलिए कि फ़लस्तीनी इस बात के एक संकेत के रूप में देखते हैं कि इसराइल वास्तव में एक स्वतंत्र फ़लस्तीन देश नहीं बनने देना चाहता है.''

1949 के युद्ध विराम के बाद इसराइल और उसके अरब पड़ोसियों के बीच युद्ध समाप्त हुआ था. इसके बाद तथाकथित ग्रीन लाइन ने फ़लस्तीन से इसराइल के क्षेत्र को वास्तविक रूप से सीमित करने का काम किया था. ग्रीन लाइन यरुशलेम को दो भागों में बाँटती है. यह वेस्ट बैंक और ग़ज़ा का सीमांकन भी करती है.

1967 में छह दिन के युद्ध के दौरान, इसराइल ने पूर्वी यरुशलम, ग़ज़ा और वेस्ट बैंक पर कब्जा कर लिया. वहाँ इसराइली सरकारों ने ग्रीन लाइन की अनदेखी करते हुए लगातार यहूदी बस्तियों का निर्माण करवाया.

साल 2005 में, इसराइल ग़ज़ा की कॉलोनियों को नष्ट कर वहाँ से हट गया.

अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के मुताबिक़ ये सभी बस्तियां अवैध हैं.

ग़ज़ा का नक्शा

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पुष्टि की है कि 1967 से यरुशलम समेत कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी क्षेत्रों में इसराइल द्वारा बनाई गई बस्तियाँ, अंतरराष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन है. यह दो देशों के साथ-साथ रहने के नजरिए में भी एक बड़ी बाधा है.

इसराइल इसे इस तरह नहीं देखता है. वह सभी अधिकृत बस्तियों को वैध मानता है.

बी'त्सेलम में सेटेलमेंट मामलों के प्रभारी शोधकर्ता ईयाल हरुवेनी ने बताया, "बस्तियों का निर्माण 1967 के युद्ध के ठीक दो महीने बाद शुरू हुआ. यह सभी इसराइली सरकारों, चाहें उनकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी रही हो, में होता रहा."

चैटम हाउस के एसोसिएट शोधकर्ता एल्हम फाखरो बताते हैं कि वेस्ट बैंक एक प्रकार का 'स्विस पनीर' बन गया है, जिसमें फ़लस्तीनी ज़मीन के हिस्से जो ग़ायब बस्तियां हैं, वो मिल गई हैं.

फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र एजेंसी (यूएनआरडब्लूए) के मुताबिक़ ये पॉकेट्स, जिनमें 53 लाख फ़लस्तीनी रहते हैं, एक-दूसरे से अलग हो गए हैं, ये अक्सर पड़ोसियों को अपने घरों तक पहुँचने से रोकते हैं.

फाखरो बताते हैं कि उनकी सड़कों पर बनाए गए असंख्य सैन्य चौकियों ने उनके जीवन को कठिन बना दिया है. वहाँ छोटी सी भी हलचल भी घंटों के हंगामे में बदल जाती है.

ओस्लो II समझौते ने वेस्ट बैंक को तीन क्षेत्रों में बाँट दिया- ए, जिसमें फ़लस्तीनी शहरी क्षेत्र शामिल हैं. इसे फ़लस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण (पीएनए) के सिविल और पुलिस नियंत्रण में होना था; बी- फ़लस्तीनी नागरिकों और इसराइली सैन्य नियंत्रण के तहत और जोन सी- पूरी तरह से इसराइली सैन्य और नागरिक नियंत्रण में. सी वाला इलाक़ा इस क्षेत्र का करीब 60 फ़ीसदी हिस्सा है. यहीं पर बस्तियां बसी हैं.

फ़लस्तीनी और बी'सेलम-पीस नाउ जैसे संगठन इस बात की निंदा करते हैं कि इसराइल बमुश्किल ही 'सी' इलाक़े में फ़लस्तीनियों को निर्माण की इजाज़त देता है, जबकि वह यहूदी बस्तियों के प्रसार की इजाज़त देता है.

वेस्ट बैंक का करीब 20 और फीसदी जॉर्डन घाटी का अधिकांश इलाका, जहां पानी के स्रोत हैं, उसे इसराइल ने सैन्य प्रशिक्षण के लिए फायरिंग जोन नामित किया है. वहां फलस्तीनियों को जाने की इजाजत नहीं है.

यरुशलम में सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में फलस्तीनी मामलों के शोधकर्ता खालिद अबू तोमेह तर्क देते हैं कि कुछ इसराइलियों के लिए, ये बस्तियाँ एक स्वतंत्र और संप्रभु फ़लस्तीन देश के निर्माण में बाधा हो सकती हैं, लेकिन शांति के लिए बाधा नहीं हैं.

उन्होंने बताया, "जब इसराइल ने ग़ज़ा में (2005 में) 27 बस्तियों को नष्ट कर दिया और 8,000 यहूदियों को उनके घरों से निकाल दिया, तब भी इसराइल और ग़ज़ा के बीच शांति होती नहीं नजर आई."

राजनीतिक विभाजन

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शांति हासिल करने के लिए आपको उसकी तलाश करनी होगी. अक्सर इसराइल और फ़लस्तीनी दोनों पक्षों में मतभेद और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी इसकी मुख्य बाधाओं में से एक रही है.

1987 में हमास की स्थापना के बाद से फ़लस्तीनी राष्ट्रीय आंदोलन बँट गया. इसने फतह द्वारा समर्थित यासिर अराफात के फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (पीएलओ) के आधिपत्य को कमज़ोर कर दिया.

हमास ने फ़लस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण (पीएनए) के लिए संसदीय चुनाव मिली जीत और फतह के ख़िलाफ़ सशस्त्र टकराव के बाद ग़ज़ा पर नियंत्रण हासिल कर लिया. इससे फ़लस्तीनियों में विभाजन तेज हो गया.

हमास ग़ज़ा पर शासन कर रहा था, जबकि फतह के प्रभुत्व वाले पीए ने वेस्ट बैंक पर नियंत्रण बनाए रखा. उसके बाद से दोबारा चुनाव नहीं हुए हैं और एएनपी के अध्यक्ष महमूद अब्बास अपने पद पर बने हुए हैं.

कोलंबिया विश्वविद्यालय के इतिहासकार रशीद खालिदी बताते हैं, "जब हमास ने चुनाव जीता और फतह के साथ गठबंधन सरकार बनाने की कोशिश की, जिसे पश्चिम ने ख़ारिज कर दिया. इससे फ़लस्तीनियों में अलगाव और बढ़ गया. इससे शांति का एक अवसर चूक गया."

अमेरिका और यूरोपीय संघ हमास को एक चरमपंथी संगठन मानते हैं.

फाखरो कहते हैं कि इसराइल ने हमास के साथ और हमास ने इसराइल के साथ बातचीत करने से इनकार कर दिया. इसने बातचीत को पंगु बना दिया है.

इसराइली राजनीति में बदलाव और सरकारों के दक्षिणपंथी होते जाने से बातचीत का फिर शुरू होना और जटिल हो गया.

इसराइल और फ़लस्तीन का नक्शा

इसराइल की वर्तमान सरकार उसके 75 साल के इतिहास में सबसे दक्षिणपंथी सरकार है. प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के मंत्रियों का मानना ​​है कि इसराइल को वेस्ट बैंक पर कब्जा कर लेना चाहिए.

विश्लेषकों के मुताबिक हाल के सालों में अमेरिका और अरब सरकारों की स्थिति ने भी शांति प्रक्रिया को प्रभावित किया है.

फाखरो का कहना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बाद से अमेरिका ने फ़लस्तीनियों के साथ बातचीत की जगह अब्राहम समझौते के ज़रिए इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने को बढ़ावा देने के लिए अन्य अरब देशों के साथ काम करने पर ध्यान दिया.

मोरक्को, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन की ओर से दस्तख़त किए गए समझौतों ने अरब देशों के रुझान को बदल दिया.

इन अरब देशों ने पारंपरिक तौर पर फ़लस्तीनियों के साथ शांति समझौता होने तक इसराइल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने से इनकार कर दिया था. हाल के महीनों में, सऊदी अरब और इसराइल भी मेल-मिलाप पर बातचीत कर रहे थे.

रशीदी कहते हैं कि छह अक्टूबर (इसराइल पर हमास के हमले और ग़ज़ा पर इसराइली हमले के एक दिन पहले) तक यही चलन था. उसके बाद से अरब देशों में जनता की राय ने उनकी कई सरकारों को अपना रुख बदलने के लिए मजबूर किया है.

बढ़ती हुई हिंसा से बेपटरी होता समाधान

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इस क्षेत्र में फैली हिंसा न केवल शांति समझौते तक पहुँचने में असमर्थता का परिणाम है, बल्कि इसमें बाधा भी है.

डोव वैक्समैन का कहना है कि शांति प्रक्रिया तोड़फोड़ करने वालों के क्रियाकलाप से बहुत प्रभावित हुई है, जिन्होंने हिंसा से इसे पटरी से उतारने के लिए हरसंभव प्रयास किया है.

पिछला साल वेस्ट बैंक में फ़लस्तीनियों के लिए सबसे घातक रहा. वहां होने हिंसा के मामलों में वृद्धि हुई है. इस साल 7 अक्टूबर के बाद से हमले कई गुना बढ़ गए हैं. संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के मुताबिक वहां 45 बच्चों समेत 158 फलस्तीनी मारे गए हैं.

फ़लस्तीनी मिलिशिया की ओर से हिंसा का लगातार उपयोग शांति की दिशा में मुख्य बाधा है.

अपनी स्थापना के बाद से इज़राइल को 7 अक्टूबर को सबसे बड़े नरसंहार का सामना करना पड़ा, जब हमास के चरमपंथियों ने इसराइल में घुसकर 1,400 से अधिक लोगों की हत्या कर दी और 245 लोगों का अपहरण कर लिया.

इसके बाद ग़ज़ा पर इसराइल की जवाबी कार्रवाई में अब तक 10,000 से अधिक लोग मारे गए हैं.

यरूशलम और शरणार्थियों की वापसी का मुद्दा

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यरुशलम की स्थिति और लाखों फ़लस्तीनी शरणार्थियों की वापसी दो अन्य बिंदु रहे हैं, जिन पर शांति वार्ता ऐतिहासिक रूप से विफल रही है.

ग्रीन लाइन ने पवित्र शहर यरुशलम को पश्चिम में इसराइल में और पूर्व में फ़लस्तीनी क्षेत्रों में विभाजित कर दिया.

हालाँकि, 1967 के युद्ध में इसराइल ने पूर्वी हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था. उसके बाद से ही यह इसराइल के अधीन है. वो इसे अपनी अविभाज्य राजधानी मानता है. फ़लस्तीनी भी यरुशलम को अपने देश की भविष्य की राजधानी मानते हैं.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अंतरराष्ट्रीय सर्वसम्मति से कई अवसरों पर इस विलय को अमान्य घोषित किया है. वहीं इसराइल से संबंध रखने वाले अधिकांश देशों ने तेल अवीव में अपने दूतावास स्थापित किए हैं.

नक्शा

यह आम सहमति तब टूट गई, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2017 के अंत में यरुशलम को आधिकारिक तौर पर इसराइल की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी. उन्होंने इसके अगले साल दूतावास को तेल अवीव से स्थानांतरित करने का आदेश दे दिया.

ग्वाटेमाला, होंडुरास और पैराग्वे सहित कई छोटे देशों ने भी इसका अनुसरण किया, हालांकि बाद में कई ने अपने फैसले को पलट दिया.

पूर्वी यरुशलम सबसे अधिक यहूदी बस्तियों वाले स्थानों में से एक है. वहां इसराइल ने शहर की सुरक्षा के लिए एक दीवार बनाई है.

असहमति का दूसरा ऐतिहासिक बिंदु फलस्तीन की यह मांग है कि पड़ोसी देशों में रह रहे फ़लस्तीनी शरणार्थी और उनके वंशज वापस लौटें. यूएनआरडब्लूए के मुताबिक करीब 60 लाख फलीस्तीनी शरणार्थी हैं. इस मांग को इसराइल शुरू से ही ख़ारिज करता रहा है.

इन विस्थापितों की वापसी के अधिकार को 11 दिसंबर, 1948 को स्वीकृत संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 194 द्वारा अनुमोदित किया गया था.

शरणार्थियों की वापसी उन मुद्दों में से एक थी, जिसकी वजह से ओस्लो शांति वार्ता रोक दी गई थी.

क्या दो देशों के समाधान की कोई उम्मीद बची है?

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इसराइल और फ़लस्तीन के रूप में दो देशों का समाधान अब भी वह उद्देश्य है, जिसका अंतरराष्ट्रीय कूटनीति अपने सार्वजनिक बयानों में बचाव करती रहती है.

हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति और पोप फ्रांसिस जैसे लोगों ने इस संघर्ष के समाधान के रूप में दो देशों के विचार का उल्लेख किया है.

डोव वैक्समैन कहते हैं कि जनमत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि फ़लस्तीनियों और इसराइलियों के बीच दो देशों का समाधान अब भी पसंदीदा समाधान है.

वहीं खालिद कहते हैं कि इसराइल ने 1967 में जो लिया था, वह उसका 100 फीसदी वापस नहीं कर सकता क्योंकि ज़मीनी हक़ीक़त इसकी इजाज़त नहीं देते हैं और कोई भी फ़लस्तीनी नेता 100 फीसदी से कम स्वीकार नहीं करेगा.

खालिदी बताते हैं कि जब दो देश समाधान की बात की जाती है तो इसराइल और फलस्तीनियों ने दो अलग-अलग चीज़ों का उल्लेख किया है.

फ़लस्तीनियों ने एक संप्रभु राज्य की मांग की है, जिसका अपनी सीमाएं, हवाई क्षेत्र और अपने इलाक़े पर नियंत्रण हो, वहीं इसराइल ने हमेशा इसराइली सुरक्षा नियंत्रण के तहत स्वायत्तता वाले एक अर्ध-देश का उल्लेख किया है.

एल्हम फाखरो का अनुमान है कि वहाँ शायद ही कोई ज़मीन बची हो जहाँ एक देश बनाया जा सके.

आज बहुत से लोगों के लिए दो देशों का यह विचार अतीत की एक सुंदर कल्पना की तरह है.

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