इसराइल को लेकर मुस्लिम देश जुटे लेकिन इतने मजबूर क्यों दिखे?

अरब और मुस्लिम मुल्कों की बैठक

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    • Author, फ्रैंक गार्डनर
    • पदनाम, बीबीसी रक्षा संवाददाता, सऊदी अरब से

पिछले हफ़्ते सऊदी अरब की राजधानी रियाद में 57 अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं की एक अहम बैठक हुई, जिसमें इन देशों के नेताओं ने पश्चिम और ख़ासकर अमेरिका पर ढोंग करने, दोहरे मानदंड अपनाने और मध्य-पूर्व के इलाक़े को लेकर समझ न होने का आरोप लगाया.

कुछ देशों के विदेश मंत्रियों ने मुझसे सवाल किया कि ऐसा क्यों है कि जहाँ एक तरफ़ पश्चिमी मुल्क रूस पर यूक्रेन में आम नागरिकों की हत्या करने का आरोप लगाते हैं, वहीं दूसरी तरफ "इसराइल को गज़ा में आम नागरिकों पर ज़ुल्म ढाने को उन्होंने हरी झंडी दी हुई है?"

अरब इस्लामिक मुल्कों के नेताओं की ये बैठक रियाद के रिट्ज़ कार्लटन होटल में हुई, जिसे राजकुमारों और राष्ट्राध्यक्षों के लिए फूलों के विशाल गुलदस्तों और चमचमाते झूमरों से सजाया गया था. देखने में इस जगह की तस्वीर ग़ज़ा की तबाही की तस्वीरों से बिल्कुल उलट थी.

बैठक में ग़ज़ा-इसराइल युद्ध के लिए, ग़ज़ा में आम लोगों के जानोमाल को हुए भारी नुक़सान के लिए इसराइल और उसके समर्थकों को एकतरफ़ा ज़िम्मेदार ठहराया गया.

सात अक्तूबर को दक्षिणी इसराइल पर हमले के लिए किसी ने हमास को दोषी नहीं ठहराया. इस हमले में क़रीब 1,200 इसराइली नागरिकों की मौत हुई थी और लगभग 240 लोगों को हमास के लड़ाके अपने साथ बंधक बनाकर ले गए थे. हमास के इसी हमले की जवाबी कार्रवाई में इसराइल ने ग़ज़ा में उसके ठिकानों पर हमला किया था.

अरब मुल्कों का सम्मेलन

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अरब इस्लामिक मुल्कों की बैठक में क्या हुआ?

अरब लीग के महासचिव ने इसराइल पर आपराधिक काम को अंजाम देने का आरोप लगाया.

बैठक के बाद जारी हुए बयान में कहा गया, "ग़ज़ा पर इसराइल की आक्रामक जवाबी कार्रवाई के ख़तरनाक परिणामों को लेकर हम चेतावनी देते हैं, यहाँ जो हो रहा है वो युद्ध अपराध है."

बयान मे नेताओं ने कहा, "न तो इसराइल अपना आक्रामक रवैया ख़त्म करना चाहता है और न ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद इस आक्रामकता को ख़त्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को लागू कर पा रही है. ऐसे में इस युद्ध के इलाक़े में फैलने का ख़तरा बन गया है."

मैंने सम्मेलन में कुछ लोगों से बात की जिनका मानना था कि उन्हें उम्मीद है कि इसराइल इस पर अधिक ध्यान देगा.

असल में ये स्पष्ट था कि इस सम्मेलन और यहाँ दिखे एकजुटता के संदेश का निशाना इसराइल नहीं था बल्कि उसका सबसे बड़ा समर्थक अमेरिका था.

सम्मेलन में शामिल हुए नेता चाहते हैं कि बाइडन प्रशासन और पश्चिमी मुल्क इसराइल पर इस युद्ध को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी दबाव बनाएं.

लेकिन जिस एक बात पर ये मुल्क सहमत नहीं हो सके, वो ये था कि इस उद्देश्य को हासिल कैसे किया जाए. सम्मेलन में कुछ बेहद क़रीबी दोस्त भी शामिल हुए, जो इस बात की तरफ इशारा है कि ग़ज़ा में नियंत्रण से बाहर जा रही स्थिति को देखकर इलाक़े के दूसरे मुल्क कितने परेशान हैं.

इसराइल का मुख्य प्रतिद्वंदी ईरान सम्मेलन में शिरकत करने पहुंचा. ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी अपने काले लिबास में सम्मेलन कक्ष में दिखाई दिए, उनके साथ बिना कॉलर वाली शर्ट और काले रंग के सूट में उनके सुरक्षाकर्मी दिखाई दिए. ये दृश्य अपने आप में हैरान करने वाला था.

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ रईसी

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ईरान और सऊदी अरब के बीच रिश्ते बीते कई सालों से तनावपूर्ण रहे थे, लेकिन इसी साल मार्च में दोनों क़रीब आए और दोनों ने हाथ मिलाने का फ़ैसला किया.

हालांकि अब भी दोनों के एजेंडे अलग-अलग हैं. ईरान ग़ज़ा में हमास, लेबनान में हिज़बुल्लाह और यमन में हूती विद्रोहियों को समर्थन देता है, जिन्हें कई मुल्क "प्रॉक्सी मिलिशिया" का नाम देते हैं.

सऊदी अरब और मिस्र और जॉर्डन की तरह कट्टरपंथी विचारधारा वाले उसके अरब सहयोगी इन विद्रोही आंदोलनों को ख़तरा मानते हैं. उनका मानना है कि ये विद्रोही आंदोलन इलाक़े में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं.

रियाद के लिए रवाना होते हुए इब्राहिम रईसी ने तेहरान हवाई अड्डे पर मीडिया से बात करते हुए कहा कि ग़ज़ा को लेकर ये एक्शन लेने का वक़्त है न कि बातों का.

लेकिन अगर कोई भी इस बैठक से अमेरिका या फिर ब्रिटेन के ख़िलाफ किसी ठोस क़दम की उम्मीद कर रहा था तो उसे निराशा हुई.

संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने इसराइल के साथ संबंध तोड़ने की अपील का विरोध किया. दोनों ने हाल ही में अब्राहम अकॉर्ड्स के तहत इसराइल के साथ व्यापार और रक्षा संबंध बढ़ाए हैं. साथ ही उन्होंने इसराइल के साथ कूटनीतिक रिश्ते में पूरी तरह कायम किए हैं.

हमास के लड़ाके

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हमास ने कैसे बदली मध्य-पूर्व की कहानी?

सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद भी सम्मेलन में शामिल हुए. सीरियाई गृह युद्ध में अपनी दमनकारी कार्रवाई के लिए आलोचना के घेरे में रहे बशर अल-असद अब तक अरब दुनिया से अलग-थलग ही थे.

उन्होंने सम्मेलन में कहा कि ठोस क़दम न उठाए गए तो सम्मेलन से कुछ हासिल नहीं हो सकेगा.

हालांकि सम्मेलन में तेल को लेकर प्रतिबंध लगाने और अरब मुल्कों में मौजूद अमेरिका के सैन्य अड्डों को हटाने को लेकर दिए गए प्रस्ताव पर एक तरह की चुप्पी देखने को मिली.

लेकिन इन सबके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सात अक्तूबर को हमास के लड़ाकों के इसराइल में घुसकर तबाही मचाने की घटना और उसके बाद शुरू हुए युद्ध ने मध्य पूर्व की पूरी कहानी को ही बदल कर रख दिया है.

सात अक्तूबर के सवेरे तक इस इलाक़े की राजनीति में हवा का रुख़ ईरान और उसके समर्थन वाले विद्रोही गुटों के ख़िलाफ़ दिख रहा था.

छह अरब मुल्कों ने इसराइल के लिए अपने कूटनीतिक रिश्ते पूरी तरह से बहाल कर लिए थे. इस कड़ी में अगला नंबर सऊदी अरब का होने जा रहा था.

हमास के हमले से कुछ ही दिन पहले इसराइली पर्यटन मंत्री ने रियाद का दौरा किया था.

दुबई बड़ी संख्या में इसराइली पर्यटकों का स्वागत करने के लिए बांहे फैलाए बैठा था. तकनीक, सर्विलांस, बायो टेक और भी कई दूसरे क्षेत्रों में इसराइल की दक्षता में अरब देशों की दिलचस्पी बढ़ रह थी.

क़तर को छोड़ दिया जाए तो खाड़ी के अरब देश फ़लस्तीनी नेतृत्व में भ्रष्टाचार, उनकी अक्षमता और उनके बीच बढ़ रहे आंतरिक कलह को लेकर थक चुके थे. एक क़तर ही है जिसने हमास के निर्वासित नेताओं को पनाह दी हुई है.

बिन्यामिन नेतन्याहू

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बैठक में आम फ़लस्तीनियों की दुर्दशा और 75 साल बाद भी उनका बिना मुल्क के होने को लेकर सहानुभूतिपूर्ण रवैया साफ़ दिखा.

लेकिन सम्मेलन में बड़े पैमाने पर ये भी दिखा कि इसराइल बेहद महत्वपूर्ण मुल्क है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता और वक़्त आ गया है, जब उसके साथ सामान्य रिश्ते बहाल किए जाने चाहिए.

भविष्य में फ़लस्तीनियों के एक अलग देश को लेकर चिंता बातों में और बयानों में तो साफ़ दिखी लेकिन व्यावहारिक तौर पर इस पर ध्यान कम ही था.

हालांकि ये भी सच है कि आज के वक़्त में अरब मुल्कों और इसराइल के बीच संबंध भले ही टूटे न हों, लेकिन वो कमज़ोर हो रहे हैं.

एक अरब मुल्क के विदेश मंत्री ने मुझसे कहा, "हम अपने युवाओं में बढ़ रहे कट्टरपंथ को लेकर चिंतित हैं. वो टेलीविज़न पर देख रहे हैं कि ग़ज़ा में क्या हो रहा है और इससे वो बेहद नाराज़ हैं."

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: ग़ज़ा के अस्पताल क्यों बनते जा रहे हैं क़ब्रगाह?

अरब मुल्कों की बढ़ रही परेशानी

मैंने सम्मेलन में शामिल हुए कई प्रतिनिधियों को ये शिकायत करते सुना कि इसराइली राष्ट्रपति बिन्यामिन नेतन्याहू की सरकार अब आत्मरक्षा की कार्रवाई से कहीं आगे बढ़ गई है और वो इस पूरे इलाक़े को एक ख़तरनाक रास्ते की तरफ़ धकेल रही है.

इस बात को लेकर चिंता जताई जा रही है कि जैसे-जैसे ग़ज़ा पर हमले बढ़ रहे हैं ऑनलाइन दुनिया में लोगों के बीच अति कट्टरपंथ विचारधारा लोकप्रिय हो रहा है.

अरब और मुस्लिम मुल्कों के नेता इस बात को लेकर भी परेशान हैं कि ग़ज़ा में इसराइल की सैन्य कार्रवाई पर लगाम लगाने में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद नाकाम साबित हुआ है.

ग़ज़ा-इसराइल युद्ध में अमेरिका युद्ध विराम का बार-बार विरोध कर रहा है, ये इलाक़े में उसके सहयोगी मुल्कों के लिए शर्मिंदगी का कारण बन रहा है.

तेल की खान कहे जाने वाले अरब मुल्कों के साथ अमेरिका के रणनीतिक रिश्तों का इतिहास 1945 में शुरू हुआ था. युद्ध के उस दौर में लाल सागर में अमेरिका के एक युद्धपोत पर पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट और सऊदी अरब के संस्थापक शाह अब्दुलअज़ीज की मुलाक़ात हुई थी.

उस वक़्त शुरू हुए रिश्ते आज भी बरकरार हैं. आज भी अमेरिका, सऊदी अरब और खाड़ी के कई और मुल्कों की रक्षा ज़रूरतें पूरी करता है.

बशर अल-असद

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लेकिन सतह के नीचे कहानी अब बदल रही है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व वाले प्रशासन ने जब से "एशिया की तरफ रुख़ करने" का इशारा किया है, तब से मध्य-पूर्व में इलाक़े में ये डर है कि इस क्षेत्र में अमेरिका की दिलचस्पी कम हो रही है.

इस इलाक़े के मुल्क ये मानने लगे हैं कि एक वफ़ादार सहयोगी के रूप में वो अमेरिका पर भरोसा नहीं कर सकते.

ठीक इसी वक़्त यहां रूस और चीन की धमक बढ़ रही है. ईरान और सऊदी अरब के बीच सालों से तल्ख़ रहे रिश्तों में एक बार फिर गर्माहट आई है. चीन की मध्यस्थता में दोनों मुल्कों ने आपसी रिश्ते बहाल करने का फ़ैसला किया है.

सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अटूट समर्थन ने कई अरब मुल्कों को प्रभावित किया है. पुतिन की तुलना वो अमेरिका से करते हैं.

साल 2011 में मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक़ के ख़िलाफ़ लोगों ने विद्रोह कर दिया था और वो काहिरा के तहरीर स्क्वायर पर जमा होने लगे. ऐसे वक़्त अमेरिका ने होस्नी मुबारक़ का साथ छोड़ दिया था.

इन सब बातों का ये मतलब भी नहीं है कि पश्चिमी मुल्क मध्य पूर्व में अपने सहयोगियों को खो चुके हैं. अमेरिका के अरब सहयोगी उसके ख़िलाफ़ कड़े शब्दों का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन इससे आगे जाकर कुछ कदम उठाना नहीं चाहते.

लेकिन वो ये ज़रूर चाहते हैं कि इससे पहले कि मध्यपूर्व के इलाक़े में स्थिति और बिगड़े और उनके अपने मुल्क में हालात उनके नियंत्रण से बाहर जाए, उनकी बात सुनी जाए और ग़ज़ा में हो रही हिंसा पर लगाम लगाई जाए.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: जंग के बाद ग़ज़ा का क्या होगा?
वीडियो कैप्शन, इसराइल हमास जंग: पेरिस और लंदन की सड़कों पर फ़लस्तीनियों के समर्थन में उतरे लोग

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