'नकबा' पर चाबी लेकर प्रदर्शन क्यों करते हैं फ़लस्तीनी

अपने घर की चाबी के साथ एक फ़लस्तीनी महिला

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    • Author, पाउला रोज़ास
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़

वे सरल और भारी हैं. उनमें से कुछ में जंग लग गया है, लेकिन वे धातु के साधारण टुकड़े भर नहीं हैं.

फ़लस्तीनी हर साल, 'नकबा दिवस' पर, सबसे कीमती अवशेषों में से एक को लेकर सड़कों पर उतरते हैं.

इन अवशेषों को वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित करने में कामयाब रहे हैं. ये अवशेष हैं उन घरों की चाबियाँ, जिनसे उन्हें 75 साल पहले निष्कासित कर दिया गया था. वे कभी वहां वापस नहीं लौट पाए.

लुब्ना शोमाली, वेस्ट बैंक में नागरिकता और शरणार्थी अधिकारों के लिए फ़लस्तीनी संसाधन केंद्र, BADIL की बोर्ड सदस्य हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "उन्होंने चाबियाँ इसलिए रखीं, क्योंकि उनमें वापस लौटने की इच्छा और उम्मीद बनी हुई है और वे उन घरों की प्रतीक हैं."

वे कहते हैं, "इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे अभी भी खड़े हैं या नष्ट हो गए हैं. अपने घरों में लौटने का अधिकार, जो अंतरराष्ट्रीय कानून ने उनसे वादा किया था."

14 मई, 1948 को ब्रिटिश सरकार से आजादी की घोषणा के अगले दिन इसराइल युद्ध में उतर गया. इस अरब-इसराइल युद्ध के दौरान 750,000 से अधिक फ़लस्तीनी पलायन कर गए या उन्हें उनके घरों से निकाल दिया गया. यह युद्ध 15 महीने तक चला था.

इसे अरब लोग 'नकबा' या 'तबाही' के रूप में जानते हैं. इसे हर साल 15 मई को मनाया जाता है. इस प्रदर्शन में चाबियाँ प्रमुख भूमिका निभाती हैं.

इसराइल बनने वाले इलाके में रहने वाले फ़लस्तीनियों ने इसराइली सैनिकों और ज़ायोनी मिलिशिया पर उन्हें बाहर निकालने का आरोप लगाया था. इन फ़लस्तीनियों को कभी वापस लौटने की इजाजत नहीं दी गई.

क्या कहना है इसराइल का

अनुमान है कि फ़लस्तीन की 80 फीसदी आबादी को उनके घरों से विस्थापित कर दिया गया था

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आधिकारिक तौर पर हालांकि इसराइली अधिकारियों ने तब इसका बचाव किया था.

उनका कहना था कि यह अरब देश थे, जिन्होंने फ़लस्तीनियों को अपनी जमीन और घर छोड़ने के लिए कहा था ताकि नवजात राज्य इसरायल पर आक्रमण करने के बाद उन्हें युद्ध के परिणाम न भुगतने पड़ें.

आज, संयुक्त राष्ट्र करीब 60 लाख फ़लस्तीनी शरणार्थियों को मान्यता देता है. इनमें से कई जॉर्डन, ग़ज़ा, वेस्ट बैंक, सीरिया, लेबनान और पूर्वी यरुशलम के शिविरों में रहते हैं.

शोमाली कहते हैं, "फ़लस्तीनी समुदायों के बीच बहुत डर था, बहुत से लोग जो कुछ ले जा सकते थे उसे लेकर भाग गए. बेशक, उन्होंने चाबियाँ भी ले लीं."

"उन्होंने यह सोचकर अपने घर बंद कर दिए कि जब हिंसा कम हो जाएगी, तो वे उनके पास लौट सकते हैं और अपना जीवन फिर से शुरू कर सकते हैं."

लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ.

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कई मामलों में, लौटने के लिए कुछ भी नहीं बचा था, जैसा कि महान फ़लस्तीनी कवि महमूद दरवेश के गृहनगर अल-बिरवा के मामले में था.

जब 11 जून को इसरायली सैनिक पहुंचे, तो एकर से करीब 10 किलोमीटर दूर अल-बिरवा में करीब 1,500 लोग रहते थे. आज केवल वहां एक स्कूल खड़ा है, जो कभी वहां था.

गलील के अल मकर में रहने वाले मोहम्मद कयाल, जिनके परिवार को भी अल-बिरवा से भागना पड़ा था.

उन्होंने युदेदी में स्थित अपने घर से बीबीसी को बताया, "जिस दिन सैनिक सामने आए, मेरे माता-पिता अपनी कुछ चीजें लेकर पास के एक शहर में चले गए. वहां उन्होंने मेरे दादा-दादी और मेरे दो बड़े भाइयों के साथ जैतून के पेड़ों के नीचे कई दिन बिताए."

उनके माता-पिता, अब्दुल रज़िक और अमीना के पास अधिक ज़मीन थी. उन्होंने अपने खेत में फलों के पेड़, जैतून के पेड़ और अन्य फसलें लगाईं थीं.

पत्रकार और अनुवादक कयाल कहते हैं, ''उन्होंने अच्छा जीवन जीया, उन्हें किसी चीज की कमी नहीं थी,''

वो कहते हैं कि उन्हें याद है कि वे अक्सर फिल्मों या उस समय के अरब सितारों, जैसे उम्म कुलजुम या मोहम्मद अब्देल वहाब के संगीत कार्यक्रमों के लिए हाइफा जाते थे.

आराम की यह जिंदगी रातोरात खत्म हो गई.

कयाल कहते हैं, "अल-बिरवा में केवल 50 लोग बचे थे, जो पादरी के साथ शहर के चर्च में शरण लिए हुए थे. कुछ दिनों बाद हुई हिंसक झड़पों के बाद उन्हें भी निष्कासित कर दिया गया."

कयाल परिवार ने आस-पास के गाँवों से अपनी तीर्थयात्रा शुरू की, जहाँ सालों उनका स्वागत किया गया, पहले एक ड्रूज़ परिवार ने, फिर एक ईसाई परिवार द्वारा और अंत में एक मुस्लिम द्वारा.

ग़ज़ा में विस्थापन

आप कहां से हैं?

अब्दुल रज़िक ने एक कारखाने में काम करना शुरू किया. वो दिन में मज़दूर और रात में गार्ड का काम करते थे.

इस तरह काम करके वह अपने गृहनगर से करीब 2 किलोमीटर दूर युडेदी में जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा खरीदने और एक कमरा बनाने के लिए बचत करने में कामयाब रहे.

मोहम्मद का जन्म वहीं हुआ था और वो 67 साल तक वहीं रहे, हालांकि, कई अन्य फिलिस्तीनियों की तरह, यदि आप उनसे पूछें कि वह कहां से हैं, तो वह हमेशा जवाब देंगे, "अल-बिरवा से."

कयाल कहते हैं, "मेरे माता-पिता ने अल-बिरवा लौटने की उम्मीद कभी नहीं खोई , हालांकि उन्होंने दुबारा अपने शहर में कदम नहीं रखा."

जब उनकी मौत हुई तो उन्हें उस जमीन पर दफनाया भी नहीं गया, जहां वे पैदा हुए थे. शहर के कब्रिस्तानों को अपवित्र कर दिया गया और 1948 के बाद वहां दोबारा किसी को दफनाया नहीं गया, यहां तक ​​कि उनके सबसे मशहूर पड़ोसी महमूद दरवेश को भी.

दरवेश या कयाल की कहानी निर्वासन की उन सैकड़ों-हजारों कहानियों में से एक है, जिन्होंने फ़लस्तीनी राष्ट्रीय चेतना को बुना है.

फ़लस्तीनी-अमेरिकी इतिहासकार रशीद खालिदी बताते हैं, "फ़लस्तीनी जानते हैं कि उनमें से कई कस्बे और वे घर अब मौजूद नहीं हैं, लेकिन चाबी 'फ़लस्तीन' लौटने की इच्छा का प्रतीक बनी हुई है.''

खालिदी अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में धुनिक अरब अध्ययन के एडवर्ड सईद प्रोफेसर हैं.

घुसपैठ और गैर हाजिरी

अपने घर की चाबी के साथ प्रदर्शन करते फ़लस्तीनी

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कितने फ़लस्तीनियों का हुआ निष्कासन

अल-बिरवा की तरह, करीब 400 फ़लस्तीनी नगर पालिकाएं प्रभावित हुईं.

प्रोफेसर खालिदी के मुताबिक 1947 के अंत में लड़ाई शुरू होने और 14 मई, 1948 को इसराइल राज्य की घोषणा तक करीब तीन लाख फ़लस्तीनियों को उनके घरों से निष्कासित कर दिया गया था.

प्रोफेसर खालिदी ने 'फ़लस्तीन, वन हंड्रेड इयर्स ऑफ कॉलोनियलिज्म एंड रेजिस्टेंस' नाम से किताब लिखी है.

प्रो. खालिदी

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वो कहते हैं, ''युद्ध की शुरुआत के बाद, इजरायली सेना ने फ़लस्तीनियों का अधिक व्यवस्थित निष्कासन शुरू किया. इससे साढ़े चार लाख अतिरिक्त लोगों को अपने घर और जमीन छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा.

लुब्ना शोमाली बताते हैं कि आंकड़े अनुमानित हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक ऐसा माना जाता है कि 80 फीसदी फ़लस्तीनियों को निष्कासन का सामना करना पड़ा.

लुब्ना शोमाली

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प्रोफेसर खालिदी कहते हैं, "केवल वे लोग जो इसराइल में रुके थे और जो पहली जनगणना में पंजीकृत थे, उन्हें ही इसराइली नागरिक माना गया था. अन्य सभी को अनुपस्थित घोषित कर उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई थी.

कुछ स्थानों पर जहां लोगों ने विरोध किया, इतिहासकारों ने कुछ नरसंहारों का दस्तावेजीकरण किया है, जैसे दीर यासीन, जहां सौ फलस्तीनियों की हत्या कर दी गई थी. यह हाल ही में आई एक इसराइली डाक्यूमेंट्री का विषय रहा है.

इतिहासकारों के मुताबिक 1948 में ब्रिटिश मैंडेट के मुताबिक फ़लस्तीन की केवल एक तिहाई आबादी, करीब छह लाख लोग ही यहूदी थे.

प्रोफेसर खालिदी कहते हैं कि इस समुदाय के पास केवल करीब सात फीसदी जमीन का ही मालिकाना था, जो निजी हाथों में नहीं थी.

वे कहते हैं कि यह जमीन ज्यूइश नेशनल फंड या ज्यूइश कॉलोनाइजेशन एजेंसी जैसे यहूदी संगठनों के हाथों में थी. जबकि ज़मीन का अधिकांश हिस्सा राज्य या अरब मालिकों का था.

'इसराइल सुव्यवस्थित नीति'

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ करीब 60 लाख फ़लस्तीनी शर्णार्थी हैं

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प्रोफेसर खालिदी प्रमुक अकादमिक जर्नल, 'जर्नल ऑफ फ़लस्तीन स्टडीज' के सह निदेशक भी हैं.

वो कहते हैं, ''लोगों को निकालना युद्ध की एक आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि एक सुव्यवस्थित नीति थी. आप जनसांख्यिकी को बदले बिना एक बहुसंख्यक अरब देश को यहूदी राज्य में परिवर्तित नहीं कर सकते थे."

प्रमुक कहते हैं, "यहूदी नेताओं ने 1930 के दशक से ही समझ लिया था कि केवल आप्रवासन द्वारा यहूदी बहुमत बनाना संभव नहीं है, उन्हें अरब में स्थानांतरित होना होगा.''

हालाँकि, इसराइल के पहले शासकों ने एक बहुत अलग कहानी गढ़ी थी.

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में यहूदी इतिहास के प्रोफेसर डेरेक पेंसलर ने बीबीसी से कहा कि कई यहूदी आज भई यह मानते हैं कि इसराइल की वजह से फलस्तीनियों ने पलायन नहीं किया.

प्रो. पेंसलर

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प्रोफेसर पेंसलर कहते हैं, "वास्तव में इसराइलियों ने यह सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव प्रयास किया कि अरब न जाएं."

लेकिन आज इतिहासकारों के बीच दृष्टिकोण बदल गया है.

पेंसलर कहते हैं, "इसराइली इतिहासकारों में इस बात पर आम सहमति है कि फ़लस्तीनियों ने अपनी मर्जी से नहीं छोड़ा''

1967 के युद्ध में कितने लोग विस्थापित हुए

1967 के छह दिन के युद्ध में यरूशलम पर कब्जे के बाद वहां निर्माण करवाते इसराइली

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यह नाटक 1948 में ख़त्म नहीं हुआ.

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनआरडब्लूए) के आंकड़ों के मुताबिक़ 1967 के छह दिनों के युद्ध के बाद अन्य तीन लाख लोग विस्थापित हुए.

हजारों फ़लस्तीनी जो उन दिनों विदेश में काम कर रहे थे, रिश्तेदारों से मिलने गए थे या पढ़ाई कर रहे थे, जैसा कि लुब्ना शोमाली के पति के साथ हुआ, वे अपने घर नहीं लौट सके. वे शरणार्थी बन गए.

उसके बाद से इसराइल ने फ़लस्तीनी क्षेत्रों में 140 बस्तियों के निर्माण की इजाजत दी है. इनमें करीब छह लाख यहूदी रहते हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय अवैध मानता है.

इन विस्थापित लोगों की वापसी के अधिकार को 11 दिसंबर, 1948 को स्वीकृत संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 194 द्वारा अनुमोदित किया गया है. यह फ़लस्तीनियों और उनके नेताओं की प्रमुख मांगों में से एक है.

इस प्रस्ताव में कहा गया है, "जो शरणार्थी अपने घरों में लौटना चाहते हैं और अपने पड़ोसियों के साथ शांति से रहना चाहते हैं, उन्हें जल्द से जल्द ऐसा करने की अनुमति दी जानी चाहिए."

इसमें यह भी बताया गया है कि जो लोग वापस न लौटने का फैसला करते हैं, उन्हें उनकी संपत्ति के लिए मुआवजा दिया जाना चाहिए.

इजरायली सरकारों का मानना रहा है कि संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 194 फ़लस्तीनियों के लौटने के विशिष्ट अधिकार को मान्यता नहीं देता है, बल्कि यह सिफारिश करता है कि शरणार्थियों को लौटने की अनुमति दी जानी चाहिए.

डेरेक पेंसलर कहते हैं, "1950 के दशक में सरकार की कहानी यह थी कि अरबों ने युद्ध शुरू किया. इसलिए उन्हें इसके परिणाम भुगतने पड़े, और यह कहानी आज भी मौजूद है."

यह अरब-इजरायल संघर्ष के समाधान के तार्किक खोज में मुख्य बाधाओं में से एक बन गया है.

90 लाख की आबादी वाले इसराइल का दावा है कि वह 50 लाख से अधिक शरणार्थियों को वापस नहीं आने दे सकता क्योंकि इसका मतलब एक यहूदी राज्य के रूप में उसके अस्तित्व का अंत होगा.

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