ऐसे यहूदी जो इसराइल के ख़िलाफ़ और फलस्तीन के पक्ष में हैं

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- Author, आर्ची अतंद्रिला
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
इसराइल का जन्म यहूदियों के अपने अलग राष्ट्र की अवधारणा से हुआ था.
यहूदियों के अस्तित्व और अधिकारों की पृष्ठभूमि में इसराइल का जन्म होने के बावजूद ऐसे बहुत से यहूदी हैं जो इसराइल का समर्थन नहीं करते.
इसके पीछे कई वजहें हैं.
उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दौर में यहूदी विरोध के मुक़ाबले और फलस्तीनी इलाके में एक यहूदी राष्ट्र की स्थापना के मक़सद से यहूदी राष्ट्रीय आंदोलन 'ज़ायनवाद' का उदय हुआ था.
हालांकि 'यहूदीवाद' और 'ज़ायनवाद' समान नहीं हैं. हिब्रू बाइबिल में जिउन शब्द से युरूशलम को समझाया जाता है और 'ज़ायनवाद' मुख्य रूप से इसराइल की वकालत है.
'ज़ायनवाद' बनाम 'ज़ायनवाद-विरोधी'

इस समय यहूदी राष्ट्र के तौर पर इसराइल की सुरक्षा, विकास और विस्तार पर भरोसा करने वाले को भी 'ज़ायोनिस्ट' या 'ज़ायनवादी' कहा जाता है. अगर दूसरे धर्म का कोई भी व्यक्ति इस विचार में विश्वास करता है वह भी 'ज़ायनवादी' है.
दूसरी ओर, इसराइली राष्ट्र का विरोध करने वाले को 'एंटी-ज़ायोनिस्ट' कहा जाता है. ये लोग इसराइल के हस्तक्षेप का विरोध करते हैं और वहां की सरकार की नीतियों की आलोचना करते हैं.
'एंटी-ज़ायोनिस्ट' को कई बार यहूदी-विरोधी के तौर पर भी देखा जाता है. ख़ासकर इसराइल के राष्ट्रवाद और उस देश के समर्थन में रहने वाले अक्सर इसी तरीके से दिखाना चाहते हैं.
यहूदी-विरोधी नफरत फैलाने के मामले को यहूदी विरोधी भावना के नाम से जाना जाता है.
'एंटी-सेमिटिज़्म' सीधे यहूदी विरोध है और 'एंटी-ज़ायोनिज़्म' इसराइली राष्ट्र का विरोध. यहूदी-विरोध की पृष्ठभूमि में ही 'जायनवाद' आंदोलन शुरू हुआ था.
यहूदियों का एक तबका इसराइल के ख़िलाफ़ क्यों है?

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कई लोग मानते हैं कि इसराइल सरकार अपने आलोचकों को 'यहूदी-विरोधी' या 'एंटी-सेमिटिक' के तौर पर पेश करना चाहती है. हालांकि राष्ट्र के विचार का विरोध और यहूदी धर्म के प्रति विद्वेष एक बात नहीं है.
'ज़ायनवाद' या यहूदी राष्ट्र की धारणा पर विश्वास करने वाले ऐसे यहूदी भी हैं जो सरकार के हस्तक्षेप की नीति को पसंद नही करते.
यहूदियों में इसराइल का विरोध करने वाली विचारधारा के कई लोग हैं. इनमें वामपंथियों के अलावा कट्टर यहूदी विचारधारा को मानने वाले लोग भी हैं.
मिसाल के तौर पर इसराइल-ग़ज़ा के बीच जारी युद्ध की पृष्ठभूमि में 18 अक्तूबर को हजारों यहूदियों ने अमेरिका में कैपिटल हिल के सामने फलस्तीनियों के उत्पीड़न के विरोध में प्रदर्शन किया.
वहां हाथों में फलस्तीनी झंडे लेकर कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि इसराइल ग़ज़ा में सामूहिक हत्याएं कर रहा है. उस दिन अमेरिकी पुलिस ने वहां कम से कम तीन सौ लोगों को गिरफ्तार किया था.
उस आंदोलन का नेतृत्व 'ज्यूइश वॉयस फॉर पीस' या 'शांति के लिए यहूदी आवाज़' नामक एक 'ज़ायनवादी' संगठन ने किया था.
जिस तरह से 'ज़ायनवाद' ने फलस्तीन के लोगों को नुकसान पहुँचाया है, वे उसके ख़िलाफ़ हैं. संगठन की वेबसाइट पर इस बात का जिक्र किया गया है कि 'ज़ायनवाद' असल में यहूदियों में नफ़रत और वैमनस्य पैदा करता है.
'ज़ायनवाद' के विरोधी हिंसा-विद्वेष और आक्रामकता के ख़िलाफ़ हैं. वे लोग फलस्तीन की ज़मीन पर इसराइल की सरकार के कब्ज़े को भी अच्छा नहीं मानते.
उनका मानना है कि 'ज़ायनवाद' की धारणा एक ऐसी परिस्थिति पैदा करती है जिससे लगता है कि जो लोग इसराइल की आलोचना करते हैं वो 'यहूदी-विरोधी' हैं. हालांकि यहूदियों में इसराइल के प्रति समर्थन ही ज़्यादा है.
वामपंथियों के अलावा अति कट्टर यहूदी भी इसराइल राष्ट्र की धारणा से सहमत नहीं हैं. इसमें खासकर 'हरेदी समूह' शामिल हैं जो यहूदी धर्म के रीति-रिवाजों का सख़्ती से पालन करते हैं.
फलस्तीनियों के पक्ष में प्रदर्शन

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कट्टर यहूदियों के एक तबके ने भले ही कुछ हद तक सामाजिक आधुनिकता को अपना लिया हो, कट्टर यहूदी अपने प्राचीन धर्म का पालन करते हैं.
नेतुरेई कार्टा ऐसा ही एक अति-कट्टर और ज़ायनवाद-विरोधी संगठन है. वर्ष 1938 में गठित यह संगठन अमेरिका में काफी मजबूत है. यह जर्मनी, ब्रिटेन और इसराइल में भी सक्रिय है.
इस संगठन के फेसबुक पेज को देखने से पता चलता है कि यह इसराइल के हमले के ख़िलाफ़ और फलस्तीनियों के पक्ष में रोजाना प्रदर्शन कर रहा है.
उनके हाथों में फलस्तीनी झंडे हैं और इसराइल के झंडे के पोस्टर को लाल स्याही से क्रॉस कर दिया गया है.
10 नवंबर को न्यूयॉर्क से पोस्ट एक वीडियो में उनके एक रब्बी (पुजारी) को भाषण देते देखा जा सकता है.
राजनीतिक हित
इसराइल के डेविड वाइस नामक वह रब्बी कहते हैं कि फलस्तीन में यहूदी और मुस्लिम शांति के साथ रहते थे. लेकिन ज़ायनवाद इसमें बाधा बन कर उभरा है.
उन्होंने आरोप लगाया है कि ज़ायनवादी अपने राजनीतिक हित के लिए यहूदियों के धर्म का दुरुपयोग कर रहे हैं और नफ़रत फैला रहे हैं.
बीबीसी बांग्ला के साथ बातचीत में उन्होंने यहूदी धर्म या यहूदीवाद की व्याख्या की.
उनका कहना था, "हमें दो हजार साल पहले निर्वासित कर दिया गया था. राजा सोलोमन की भविष्यवाणी के जरिए हमारे सृष्टिकर्ता ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि यहूदी राज्य या संप्रभुता बहाल करना हमारे लिए वर्जित है."
"उस पवित्र धरती (यरूशलम) में हमारी बड़े पैमाने पर वापसी वर्जित है और हम जिस देश में रहते हैं वहीं एक वफ़ादार नागरिक के तौर पर रहना होगा."
निर्वासित यहूदी

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रब्बी वाइस अपने धर्मग्रंथ तोराहा (जिसे मुसलमान तौरात के नाम से जानते हैं) का जिक्र करते हुए कहते हैं कि निर्वासन से यहूदियों का लौटना वर्जित है.
यहूदियों के मसीहा के आगमन के साथ ही उनका अपना देश और राजत्व लौटेगा. वही मसीहा उनकी जमीन को कब्ज़ा-मुक्त करेंगे और ईश्वर ही उनके आवास की स्थापना करेंगे.
कैम्ब्रिज डिक्शनरी के अनुसार मसीहा का मतलब ईश्वर की ओर से भेजा गया एक यहूदी राजा है.
उधर, ईसाइयों के लिए, मसीहा यीशु मसीह हैं तो मुसलमानों के लिए वह पैगंबर नबी ईशा (आ) के नाम से जाने जाते हैं.
ज़ायनवाद-विरोधी कट्टर यहूदियों की दलील है कि मसीहा के आगमन से पहले अपने राष्ट्र की स्थापना की कोई जरूरत नहीं है. यहूदी धर्म कभी दूसरों को नुकसान पहुंचाने या रक्तपात का समर्थन नहीं करता.
वाइस की बातों में बार-बार सह-अस्तित्व का जिक्र आता है.
उनका कहना है कि महज डेढ़ सौ साल पहले आए ज़ायनवाद से लोकतंत्र की स्थापना हुई है. यह एक राजनीतिक स्थिति है, जो धर्म नहीं है.
हालांकि इस सिद्धांत को ज्यादातर यहूदी अच्छी निगाहों से नहीं देखते. कई लोग यह सोच भी नहीं सकते कि यहूदी भी ज़ायनवाद-विरोधी हो सकते हैं.
स्कॉटलैंड की यहूदी कम्युनिटी के एक प्रतिनिधि और गारनेट होली सिनागोग के चेयर सुजन सहगल ने बीबीसी बांग्ला कहा कि उन्होंने अब तक ज़ायनवाद-विरोधी यहूदी को नहीं देखा है और यहूदी लोग आमतौर पर इसराइल पर ही भरोसा करते हैं.
लेकिन वाइस मानते हैं कि अति धार्मिक यहूदी संशोधित या परिवर्तित यहूदीवाद और उसके साथ मौजूदा यहूदी राष्ट्र की अवधारणा का समर्थन नहीं कर सकते.
हिब्रू भाषा का आधुनिकीकरण

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ऐसे कट्टर यहूदी मूलधारा से अलग ही रहते हैं और ज्यादातर मामलों में धर्म के पालन पर ही ध्यान देते हैं.
इसराइल में ऐसी कम्युनिटी के लोग वहां की पूरी समाज व्यवस्था से ही अलग-थलग हैं.
वह लोग अपनी धर्म-आधारित शिक्षा व्यवस्था का पालन करते हैं और आधुनिक जीवन के कर्मकांडों से परहेज करते हैं.
रब्बी वाइस का कहना था कि यहूदी धर्म के मौजूदा बदलाव को वह लोग स्वीकार नहीं कर सकते.
इस समय यहूदियों की शिक्षा व्यवस्था और पहनावे में धर्म की छाप नहीं है और उनकी हिब्रू भाषा का भी आधुनिकीकरण किया गया है.
वे फलस्तीनियों के प्रति सहानुभूति जताते हुए कहते हैं कि इसराइल में जो 1400 लोग मरे हैं वह भी आक्रामकता का ही नतीजा है.
इसे बंद करना ही शांति बहाल करने का एकमात्र उपाय है.
दूसरे लोग उनके इस रुख को यहूदी-विद्वेष या एंटी-सिमेटिक बताते हैं.
इसके विपरीत वाइस मानते हैं कि ज़ायनवाद और यहूदीवाद परस्पर विरोधी हैं और असल में ज़ायनवाद ही यहूदी-विद्वेष है.
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