ग़ज़ा में मरते बच्चों की ख़बरों के बीच एक यहूदी बच्चे की कहानी, जो 'होलोकॉस्ट' से बच गया था
- Author, डेमियन मैकगिनीज
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, बर्लिन
हमास के हमले के बाद इसराइल की जवाबी कार्रवाई से ग़ज़ा में 10 हज़ार से ज़्यादा लोगों की अब तक मौत हो चुकी है. मरने वालों में चार हज़ार से ज़्यादा बच्चे हैं. यानी लगभग हर 10 मिनट में एक बच्चा मारा जा रहा है. बड़ी संख्या में बच्चों के स्कूल, घर तबाह हुए हैं. सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें भरी हुई हैं.
इन ख़बरों के बीच इसराइल से एक बच्चा 86 साल बाद जर्मनी लौटा है और उस यात्रा को फिर से शुरू कर रहा है जो उसने छह साल की उम्र में हिटलर के जनसंहार से बचने के लिए शुरू की थी.
इसराइल-हमास संघर्ष के बीच कुछ उम्मीदें हैं और ये कहानी है जो बताती है कि युद्ध किस कदर लोगों को प्रभावित करता है. ख़ासकर बच्चों को.

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एक यहूदी दुकानदार जब फुटपाथ से यहूदी-विरोधी चित्रों को हटाने की कोशिश कर रहा था तो 50-60 लोगों की एक भीड़ उसका मज़ाक उड़ा रही थी.
यहूदियों के स्वामित्व वाली टोपी की एक दुकान के सामने पूरी सड़क पर टोपियाँ और टूटे शीशे बिखरे हुए हैं.
यह वह दृश्य था जिसे छह साल के जॉर्ज शेफ़ी ने बर्लिन में अपने अपार्टमेंट के बाहर नवंबर 1938 में नाज़ियों के किए जनसंहार के बाद देखा था.
जॉर्ज, अब 92 साल के हो चुके हैं. वो इसराइल में रहते हैं. वो कहते हैं, '' यह तस्वीर अभी भी मेरे दिमाग में है. मैं सभी टोपियों और कांच को देखता हूँ, जैसे कि यह कल की ही बात हो.''
जब वह छोटे थे तभी अपने माता-पिता के बिना नाज़ी जर्मनी से भाग निकले थे. वह उन करीब 10 हज़ार यहूदी बच्चों में से एक थे, जिन्हें इन हमलों के बाद ब्रिटेन ले जाया गया था. इसे ब्रिटिश किंडरट्रांसपोर्ट कार्यक्रम के नाम से जाना जाता है.
नाज़ी जनसंहार की 85वीं बरसी

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जॉर्ज अब नाज़ी जर्मनी से भागने की अपनी यादों को ताज़ा करने के लिए जनसंहार की 85वीं वर्षगांठ के समय बर्लिन वापस आए हैं.
उन्हें बर्लिन जिले के शॉनबर्ग में हाउप्टस्ट्रैस पर अपने घर के बाहर तोड़ दी गईं दुकानें याद हैं. जनसंहार के बाद कुछ दिनों तक उन्हें बाहर ना जाने के लिए कहा गया था. जब उन्हें पता चला कि उनका स्कूल, जो एक यहूदी प्रार्थना स्थल सिनेगॉग से जुड़ा हुआ था, वह जलकर खाक हो गया है, तो वह हैरान रह गए.
लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि ऐसा पूरे जर्मनी में हो रहा है. उसे इस बात का अहसास भी नहीं था कि उनका जीवन हमेशा-हमेशा के लिए बदल जाने वाला है.
9 नवंबर 1938 की रात नाज़ियों की भीड़ ने पूरे देश में उत्पात मचाया. यहूदियों की दुकानों और घरों को तबाह कर दिया गया. जर्मनी के करीब सभी सिनेगॉग को जला दिया गया. 91 यहूदियों की हत्या कर दी गई और 30 हजार यहूदी पुरुषों को कंसंट्रेशन कैंप यानी नजरबंदी शिविर में भेज दिया गया.
जॉर्ज की माँ मैरी को इस बात की पूरी जानकारी थी कि क्या हो रहा है. यही वह क्षण था जब उन्होंने जॉर्ज को अकेले ही सुरक्षित ब्रिटेन भेजने का फैसला लिया.
यहूदियों का डर
नवंबर जनसंहार- जिसे कभी-कभी क्रिस्टालनाचट भी कहा जाता है.
यह घटना यहूदियों पर हिटलर के उत्पीड़न में एक महत्वपूर्ण मोड़ है. इस यहूदी-विरोधी हिंसा के बाद, जर्मन में रह रहे यहूदियों इस बात का अचानक अहसास हुआ कि वे सुरक्षित नहीं हैं.
वे लोग जो ऐसा कर सकते थे, उन्होंने देश छोड़ दिया. जो लोग ऐसा नहीं कर सके, उन्होंने अपने बच्चों को सुरक्षित निकालने की कोशिश की.
मैरी जुलाई 1939 तक किंडरट्रांसपोर्ट में जॉर्ज के लिए जगह बनाने में कामयाब हो गई थीं.
मां से बिछड़ना

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जॉर्ज कहते हैं, "मेरी माँ ने शाम को कहा कि अपने खिलौने चुन लो, तुम कल ट्रेन से जा रहे हो, तुम जहाज से जा रहे हो, तुम एक दूसरा देश देखने और दूसरी भाषा सीखने जा रहे हो. अद्भुत!'."
जॉर्ज कहते हैं कि उनकी माँ ने इस यात्रा को एक मज़ेदार यात्रा जैसा बनाने की कोशिश की.
लेकिन अंत में वो अपने साथ कोई खिलौना नहीं ले जा पाए. बच्चों को एक सीलबंद सूटकेस में केवल जरूरी सामान ले जाने की ही इजाजत दी गई. वहीं कुछ बच्चे तो अपना लिखा हुआ नाम लेकर ही रवाना हुए.
मैरी जॉर्ज को बर्लिन के फ्रेडरिकस्ट्रैस स्टेशन पर ले गईं, जहां वह वहां से जाने की कोशिश कर रहे बच्चों से भरी ट्रेन में सवार हुए.
उन्होंने मुझसे कहा, " यह भयावह था क्योंकि वे सभी लोग अपने बच्चों से जुदा हो रहे थे. मुझे पता ही नहीं चला कि हो क्या रहा है."
जॉर्ज कहते हैं, "मैं मां को प्लेटफार्म पर दौड़ते हुए मुझे अलविदा कहने की कोशिश करते हुए देख सकता था. मैं उन्हें देख सकता थे, लेकिन ट्रेन में इतनी भीड़ थी कि मां मुझे नहीं देख पाईं.''
जॉर्ज को यह नहीं पता था कि वो अंतिम बार अपनी मां को देख रहे हैं. मैरी स्पीगेलग्लास को 1943 में ऑश्वित्ज़ कंसंट्रेशन कैंप में ले जाया गया. वहां उन्हें ले जाए जाने के कुछ घंटे बाद ही उनकी हत्या कर दी गई.
यहूदी बच्चों को ब्रिटेन में किसने अपनाया

किंडरट्रांसपोर्ट योजना को ब्रितानी सरकार का समर्थन हासिल था. लेकिन यह गैर सरकारी संगठनों के दान और स्वयंसेवकों पर निर्भर थी.
ब्रितानी सरकार ने बच्चों के लिए वीज़ा माफ कर दिया. लेकिन उनके माता-पिता के लिए नहीं. इनमें से अधिकांश लोग होलोकॉस्ट में मारे गए.
जॉर्ज कहते हैं कि जो बच्चे बचकर भाग निकले, उनके लिए इंग्लैंड पहुंचना और ऐसे परिवारों की ओर से चुना जाना, जिनसे आप कभी नहीं मिले थे और जिनकी भाषा आप नहीं समझते थे, बहुत दुखद था.
उन्होंने कहा, "यह एक मवेशी बाज़ार जैसा था. यदि आप सुनहरे बालों और नीली आंखों वाली पांच साल की लड़की होतीं, तो आपको आमतौर पर एक अच्छा परिवार मिलता. यदि आप 17 साल की बच्ची होतीं और आपकी नाक थोड़ी टेढ़ी होती, तो कोई आपको कोई सस्ते घरेलू नौकर के रूप में अपनाता.''
वो कहते हैं कि जिन परिवारों ने इन बच्चों को अपनाया उनकी कोई निगरानी नहीं की गई. बाद में अपनाए गए कुछ बच्चों ने कहा कि उन्हें भावनात्मक या शारीरिक शोषण का सामना करना पड़ा है.
क्या करने बर्लिन आए हैं जॉर्ज

बर्लिन में जॉर्ज के अपने स्कूल की साइट पर, खेल के मैदान पर बना स्मारक होलोकॉस्ट में मारे गए मैरी समेत स्थानीय यहूदी लोगों की याद दिलाता है. जॉर्ज यहां 11 साल के स्कूली बच्चों की एक क्लास से अपने जीवन के बारे में बात करने के लिए आए हैं.
तुआना नाम की एक छात्रा कहती हैं, " एक मां के लिए यह वास्तव में बहुत कठिन होगा. आप अपने बच्चे को ट्रेन में बिठाते हैं और आप उन्हें फिर कभी नहीं देख पाते हैं."
बच्चे जॉर्ज को एक उपहार देते हैं. यह एक छोटा बक्सा है, जिसमें टाइल का एक टुकड़ा है. यह उनके स्कूल भवन का अवशेष है जो जनसंहार में जल गया था.
यह एक यात्रा का हिस्सा है, जिसे जॉर्ज और दो अन्य जीवित बचे लोग कर रहे हैं. वो जर्मनी में अपने बचपन के घरों से लंदन के लिवरपूल स्ट्रीट ट्रेन स्टेशन तक की यात्रा नाव और ट्रेन से कर रहे हैं. लंदन के लिवरपूल स्ट्रीट ट्रेन स्टेशन पर ही किंडरट्रांसपोर्ट के बच्चों की मुलाकात अपने पालने वाले परिवारों या रिश्तेदारों से हुई थी.
क्या है जॉर्ज की यात्रा का उद्देश्य

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स्कॉट सॉन्डर्स जैसे इस यात्रा के आयोजकों का मानना है कि इसराइल-ग़ज़ा युद्ध के साथ मध्य पूर्व में जो हो रहा है, उसे देखते हुए इस तरह की घटनाएं पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं.
सॉन्डर्स होलोकॉस्ट के बारे में बताने वाली संस्था मार्च ऑफ द लिविंग यूके के लिए काम करते हैं.
वो कहते हैं, " जब आप आज की दुनिया को देखते हैं और आप यहूदी विरोध की भावना में बढ़ोतरी और नफरत के सभी रूपों में बढ़ोतरी को देखते हैं, चाहे वह इस्लामोफोबिया हो या समलैंगिकों से नफरत हो, ऐसे समय में हमारी जिम्मेदारी है कि हम खड़े हों और कहें- नहीं , फिर नहीं, इसका मतलब यह होना चाहिए कि फिर कभी नहीं.''
जॉर्ज ने 13 साल की उम्र में अपने दम पर एक और यात्रा की. इस बार नाव से अमेरिका तक गए. जब वह 18 साल के थे तो वे इसराइल चले गए. वहां वे नौसेना में शामिल हो गए और एक परिवार शुरू किया.
मैंने जॉर्ज से पूछा कि वह अलगाव के सदमे से बचे कैसे.
मेरे इस सवाल पर वो मुस्कुराते हुए कहते हैं, '' मैं जीवन में भाग्यशाली था. किंडरट्रांसपोर्ट पर होना और जर्मनी से बाहर निकाला जाना भाग्य नहीं है.''
वो कहते हैं, '' वहीं दूसरी ओर मैं बहुत से लोगों से मिला जिन्होंने मेरी मदद की. मुझे एक अच्छा परिवार मिला और मैं 92 साल की उम्र तक पहुंच गया. मैं सचमुच उस आदमी से शिकायत नहीं कर सकता."
जॉर्ज और उनका परिवार लोगों से बात करने के लिए कई बार बर्लिन आया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इतिहास कभी भुलाया न जाए और कभी दोहराया भी न जाए.
हर यात्रा पर उनकी एक परंपरा है: जॉर्ज उसी स्थान पर अपनी तस्वीर लेते हैं, जहां क़रीब 90 साल पहले, एक छोटे लड़के के रूप में मुस्कुराते हुए उनकी तस्वीर ली गई थी. इस बात से अनजान कि क्या होने वाला है.
उसी स्थान पर उनकी बाद की तस्वीरें उनके बढ़ते परिवार के साथ उनकी निडरता को दिखाती है. जॉर्ज शेफ़ी के बच्चे, पोते-पोतियाँ और परपोते हिटलर पर उनकी अंतिम जीत हैं.
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