'बवाल' फ़िल्म में दिखाया गया नाज़ी कैंप कैसा है?

इमेज स्रोत, TWITTER@Varun_dvn
- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मेनस्ट्रीम हिंदी फ़िल्म की एक मॉर्डन प्रेम कहानी और कहानी के केंद्र में दूसरा विश्व युद्ध. वरुण धवन और जान्हवी कपूरी की फ़िल्म 'बवाल' का थीम अपने आप में थोड़ा अलग है.
लेकिन इसे लेकर रिलीज़ के बाद से ही विवाद चल रहा है और इसराइली दूतावास ने भी एतराज़ दर्ज कराया है.
फ़िल्म में इस युवा जोड़े की बिखरती प्रेम कहानी बर्लिन और पोलैंड जैसी जगहों पर बनती-बिगड़ती है जहाँ वो दूसरे विश्व युद्ध से जुड़ी जगहों पर एक ख़ास वजह से घूमने गए हैं और ये जगहें उनकी निजी ज़िंदगी बदल कर रख देती हैं.
'बवाल' में पोलैंड के नाज़ी कॉन्संट्रेशन कैंप को काफ़ी करीब से दिखाया गया है जहाँ हिटलर ने यहूदी समुदाय के लोगों को रखा था.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड में नाज़ियों के बनाए यातना शिविरों में करीब 10 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई जिसमें ज़्यादातर यहूदी थे.
कुछ साल पहले मैं जब पोलैंड गई थी तो इन शिविरों में जाने का मौका मिला.
ऑस्त्विज़ के उन कैंप में जाना जिनका ज़िक्र फ़िल्म में किया गया है, भावनात्मक उथल-पुथल वाला अनुभव है.

ऑस्त्विज़ का म्यूज़ियम
25 दिसंबर को पोलैंड में क्रिसमस मनाने के बाद अगले दिन सोचा पोलैंड को करीब से देखा-समझा जाए. और पोलैंड के इतिहास को वहाँ बने यहूदी यातना शिविरों के बगैर समझना नामुमिकन सा है.
वहाँ के एक छोटे से शहर से कार के ज़रिए मैं अपनी मेज़बान के साथ सुबह पहुँची ऑस्त्विज़ कैंप.
जब ऑस्त्विज़ कैंप में लोहे के गेट से आप शिविर के अंदर आते हैं तो एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर लिखा है, 'आपका काम आपको आज़ादी दिलवाता है.'
अंदर आने पर नज़र एक खास दरवाज़े पर गई.
नाज़ी काल से जुड़ी हॉलीवुड की कई फ़िल्में बनी हैं जिनमें एक दृश्य अकसर रहता है जहाँ यहूदी लोगों से लदी रेलगाड़ियाँ एक दरवाज़े से होते हुईं शिविर के अंदर पहुँचती थीं.
इस दरवाज़े को 'गेट ऑफ़ डेथ' कहा जाता है.
शून्य से कई डिग्री कम तापमान में बर्फ़ से ढके इस दरवाज़े के पास जब मैं खड़ी थी तो एक अजीब सी सिहरन मेरे अंदर दौड़ गई.
यहाँ की वीरानगी और सन्नाटे के बीच खड़े होकर आप उस मंज़र की कल्पना भर ही कर सकते हैं.
इस शिविर का दौरा करवाने वाली गाइड हमें एक ख़ास जगह ले गईं और बताया कि लाखों लोगों को इन गैस चैम्बरों में डालकर मार दिया जाता था.
यूँ तो आज तक देश विदेशों में कई म्यूज़ियमों में जाना का मौका मिला लेकिन ऑस्त्विज़ के म्यूज़ियम में जाना बेहद अलग और दिल को हिला देने वाला एहसास रहा.
म्यूज़ियम के अंदर करीब दो टन बाल रखे गए हैं.

इमेज स्रोत, EPA
'गेट ऑफ़ डेथ'
गाइड ने बताया कि मरने से पहले नाज़ी लोगों के बाल काट लेते थे ताकि उनसे कपड़े वगैरह बनाए जा सकें.
लकड़ी के कुछ बिस्तर भी वहाँ रखे हैं जहाँ बंदी सोते थे. यहाँ की हर चीज़ एक कहानी कहती है. शिविर में घूमते हुए मैं वहाँ बने शौचालयों तक पहुँची.
गाइड ने बताया कि बंदी इन शौचालयों को साफ़ करने की ड्यूटी करने को बेहतर काम समझते थे क्योंकि शौचालय साफ़ करने वालों को यातनाएँ कम उठानी पड़ती थीं.
लेकिन इन शिविरों में एक अनोखी चीज़ भी देखने को मिली. यातनाओं के बीच छिप-छिपाकर कुछ क़ैदी कला को ज़िंदा रखे हुए थे.
एक क़ैदी की बनाई कलाकृति देखकर मन में ख़्याल आया कि उस क़ैदी के ज़हन में उस समय क्या चल रहा होगा.
ऑस्त्विज़ शिविर के परिसर में एक दीवार है जिसे 'वॉल ऑफ़ डेथ' कहते हैं. कहते है कि यहाँ अक्सर लोगों को बर्फ़ के बीच खड़ा कर गोली मार दी जाती थी.
ऑस्तिविज़ कैंप के मेरे इस दौरे में एक बात मुझे खटकी. मेरी मेज़बान दूसरे शहर से गाड़ी चलाकर मुझे यहाँ लाईं पर अंदर नहीं गईं.
उन्होंने घंटों खड़े होकर बाहर ही मेरा इंतज़ार किया. पूछने पर कोई खास वजह नहीं बताई. शाम को वो मुझे अपनी दादी के यहाँ ले चलीं.
80 साल से ज़्यादा की उम्र, आँखों में रोशनी न के बराबर.
जब बातों का सिलसिला निकला तो उन्होंने बताया था कि कैसे वो नाज़ी यातना शिविर से ज़िंदा बच निकलने में सफल रहीं लेकिन उनके परिवार के लोग मारे गए थे.

इमेज स्रोत, AFP
हिटलर और ऑस्त्विज़ यहूदी कैंप
दादी ने बताया था कि कैसे हर साल इसराइल से कितने ही अनजान लोग उनसे मिलने आते हैं, वो लोग जिनके अपने कभी ऑस्त्विज़ कैंप से ज़िंदा बाहर नहीं आ सके.
इस उम्मीद में कि शायद दादी भी उसी कैंप में रही हों और वो उनके रिश्तेदारों के बारे में कुछ बता पाएँ.
यातना शिविरों के किस्से किताबों के पन्नों में पढ़े थे, फ़िल्मों में देखे थे लेकिन एक चश्मदीद से ये सब सुनना स्तब्ध करने वाला था.
इसके बाद मैने अपनी मेज़बान से कुछ पूछना मुनासिब नहीं समझा कि क्यों वो मेरे साथ ऑस्त्विज़ कैंप के अंदर नहीं गई और दोबारा कभी ऑस्त्विज़ के बारे में उनसे बात नहीं की.
फ़िल्म की बात करें तो 'बवाल' हिटलर और ऑस्त्विज़ यहूदी कैंपों के बहाने कई सवाल खड़े करती है.
एक जगह जान्हवी कपूर सवाल कहती हैं , "हम सब भी तो थोड़े बहुत हिटलर जैसे ही हैं न. जो अपने पास है उससे ख़ुश नहीं है, जो दूसरे के पास है वो चाहिए. ये जुनून कभी ख़त्म ही नहीं होता. ये वर्ल्ड वॉर तो ख़त्म हो गया ये अंदर की वॉर कब ख़त्म होगी कोई नहीं जानता."
तो एक जगह जान्हवी कहती हैं कि 'हर रिश्ता अपने अपने ऑस्त्विज़ से गुज़रता है.'

इमेज स्रोत, Getty Images
नाज़ी शिविरों से जुड़े असल ज़िंदगी के भयानक दर्दनाक किस्से और इन्हीं किस्सों को फ़िल्म में एक रिश्ते की दरारों को बयां करने के लिए इस्तेमाल करना, यहीं पर कई लोग फ़िल्म की आलोचना कर रहे हैं तो कुछ फ़िल्म की भावनात्मक अपील की तारीफ़ कर रहे हैं.
इसराइली दूतावास का कहना है, "हम फ़िल्म बवाल में होलोकास्ट के तुच्छीकरण (हल्का करके दिखाने) से डिस्टर्ब हैं."
"कुछ शब्दों के चयन बहुत ख़राब था. हालांकि जब मानते हैं कि ये ग़लत मंशा से नहीं किया गया लेकिन हम उन लोगों से आग्रह करते हैं जो होलोकास्ट की भयावहता के बारे में नहीं जानते वो इस बारे में जानें."
वहीं फ़िल्म का समर्थन भी बहुत लोगों ने किया है.
शाहरुख़ की फ़िल्म 'जवान' के निर्देशक अटली ने कहा है कि एक नायाब तरीके से दिखाई गई फ़िल्म जिसे देखकर लगा कि कोई किताब पढ़ रहे हों.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)














