इसराइल-हमास जंग पर ब्रिक्स प्लस की अहम बैठक, पुतिन और जिनपिंग होंगे शामिल, क्या करेंगे पीएम मोदी?

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इसराइल-हमास जंग के कारण मध्य-पूर्व में पैदा हुए तनावपूर्ण हालात को लेकर मंगलवार को ब्रिक्स प्लस देशों की एक महत्वपूर्ण वर्चुअल बैठक होने जा रही है.
इस बैठक में ब्रिक्स के सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष पश्चिमी एशिया में बने संकट और इसके समाधान पर चर्चा करने वाले हैं.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस बैठक में शिरकत करेंगे जबकि ख़बर है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बैठक में शामिल नहीं होंगे.
द हिंदू के अनुसार, अधिकारियों ने पुष्टि की है कि पीएम मोदी 'अन्य व्यस्तताओं के चलते' बैठक में हिस्सा नहीं ले पाएंगे.
अभी ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे दक्षिण अफ़्रीका के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को बयान जारी करके कहा था कि राष्ट्रपति सीरिल रामाफोसा ने मध्य-पूर्व में बने हालात को लेकर 21 नवंबर को एक ‘महत्वपूर्ण संयुक्त बैठक’ बुलाई है.
बयान में कहा गया था, “ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन के साथ-साथ, नए सदस्य देशों- सऊदी अरब, अर्जेंटीना, मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के नेता भी इस महत्वपूर्ण वर्चुअल बैठक में हिस्सा लेंगे.”
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी इस बैठक भाग लेंगे.

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पुतिन और जिनपिंग होंगे शामिल
रूस के राष्ट्रपति कार्यालय की प्रेस सर्विस ने पुष्टि की है कि व्लादिमीर पुतिन इस वर्चुअल बैठक में शिरकत करेंगे.
पुतिन ने इससे पहले जोहानिसबर्ग में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भाग नहीं लिया था.
उसी सम्मेलन में छह नए देशों- सऊदी अरब, अर्जेंटीना, मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को ब्रिक्स में शामिल करने का फ़ैसला किया गया था.
ये देश आधिकारिक रूप से एक जनवरी, 2024 से ब्रिक्स का हिस्सा बनेंगे.
इसी तरह चीन के विदेश मंत्रालय ने भी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इस बैठक में शामिल होने की पुष्टि की है.
रूस लगातार ग़ज़ा में संघर्षविराम की वकालत कर रहा है और चीन ने तो इसराइल-हमास जंग रुकवाने में मदद की भी पेशकश की थी.

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पीएम मोदी क्या करेंगे?
भारतीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक़ माना जा रहा है कि राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनावों में व्यस्तता के कारण प्रधानमंत्री इस बैठक में शामिल नहीं होंगे.
25 नवंबर को राजस्थान में मतदान होना है. ऐसे में प्रचार अभियान चरम पर है और ख़बरों के अनुसार, मंगलवार को राजस्थान में उनकी तीन चुनावी रैलियां भी प्रस्तावित हैं.
ऐसे में उनकी जगह विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे.
हालांकि, ऐसे क़यास भी लगाए जा रहे हैं कि इस बैठक के बाद जो साझा बयान जारी होगा, अगर उसमें इसराइल की आलोचना की गई तो भारत असहज हो सकता है.
दरअसल, इसराइल-ग़ज़ा संघर्ष में भारत का झुकाव इसराइल के पक्ष में ज़्यादा रहा है.
ब्रिक्स के नए और पुराने सदस्य देशों में सिर्फ़ भारत और इथियोपिया ही थे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में आए उस प्रस्ताव पर मतदान नहीं किया था, जिसमें ग़ज़ा में खाना, पानी और ईंधन पहुंचाने के लिए युद्धविराम की अपील की थी. बाक़ी सभी सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया था.

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दक्षिण अफ़्रीका के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस वर्चुअल सम्मेलन के अंत में एक संयुक्त बयान भी जारी किया जाएगा.
इस बीच, सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने पीएम मोदी के इस बैठक में शामिल न होने को लेकर निशाना साधा है.
उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा है, "जी20 को लेकर प्रोपगैंडा करके मोदी और भारत को ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स का नेता बताने के प्रचार के बावजूद, अमेरिकी उपनिवेशवाद के चापलूस जूनियर पार्टनर का दर्जा हासिल करने के लिए मोदी, फ़लस्तीनियों को लंबे समय से दिए जा रहे समर्थन को बेकार कर रहे हैं."
उन्होंने लिखा है, "भारत को तुरंत संघर्षविराम के लिए कहना चाहिए."
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इसराइल पर भारत का रुख़
भारत ने इसी महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा में उस प्रस्ताव के समर्थन में वोट किया था, जिसमें कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी क्षेत्र में इसराइली बस्तियों की निंदा की गई थी.
'पूर्वी यरुशलम और सीरियाई गोलान समेत कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी क्षेत्र में इसराइली बस्तियां' टाइटल से यूएन महासभा में प्रस्ताव पेश किया गया था.
इस प्रस्ताव के समर्थन में 145 वोट पड़े थे, ख़िलाफ़ में सात और 18 देश वोटिंग से बाहर रहे थे.
जिन्होंने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ वोट किया था, वे देश थे- कनाडा, हंगरी, इसराइल, मार्शल आईलैंड्स, फेडरेटेड स्टेट्स ऑफ माइक्रोनेसिया, नाऊरु और अमेरिका.
सबसे दिलचस्प है कि भारत ने इसराइल के ख़िलाफ़ वोट किया. इसराइल के ख़िलाफ़ वोट करने वाले देशों में बांग्लादेश, भूटान, चीन, फ़्रांस, जापान, मलेशिया, मालदीव, रूस, साउथ अफ़्रीका, श्रीलंका और ब्रिटेन थे.
इससे पहले जब संयुक्त राष्ट्र महासभा में ग़ज़ा में इसराइल के हमले को लेकर युद्धविराम का प्रस्ताव लाया गया था तो भारत वोटिंग से बाहर रहा था. तब भारत के रुख़ को इसराइल के प्रति मोदी सरकार की नरमी के तौर पर देखा गया था.
यूएन में 26 अक्टूबर की वोटिंग के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरब और खाड़ी के देशों के कई नेताओं से बात की है.
इस बातचीत में पीएम मोदी से अरब के नेताओं ने फ़लस्तीनियों के पक्ष में खड़े होने की अपील की थी. इनमें ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी, यूएई के राष्ट्रपपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाह्यान और मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फ़तह अल-सीसी शामिल थे.

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ग़ज़ा में बिगड़ते हालात
मध्य-पूर्व में सात अक्टूबर से ही हालात नाज़ुक बने हुए हैं. उस रोज़ हमास के लड़ाकों ने अचानक इसराइल पर हमला कर दिया था.
इस हमले में कम से कम 1200 इसराइलियों की मौत हुई थी और 240 को बंधक बना लिया गया था.
इसके बाद से ही इसराइल की सेना ने ग़ज़ा में हमास के ख़िलाफ़ एक व्यापक अभियान छेड़ा हुआ है.
ग़ज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि अब तक इसराइली कार्रवाई में 13 हज़ार लोगों की जान जा चुकी है.
लगातार हो रही हिंसा के बीच संयुक्त राष्ट्र और कई देश संघर्षविराम की अपील कर रहे हैं, मगर इसराइल का कहना है कि जब तक वह हमास को ख़त्म नहीं कर देता और बंधक बनाए गए उसके नागरिकों की रिहाई नहीं होती, तब तक वह अभियान जारी रखेगा.
इस बीच ग़ज़ा में हालात बिगड़ते जा रहे हैं. इंटरनेशनल रेस्क्यू कमिटी नेकहा है कि फ़लस्तीनियों के मरने और उन्हें नुक़सान पहुंचने में तेज़ी आई है.
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