इसराइल-हमास युद्ध: मध्य-पूर्व में चीन क्या अमेरिका को टक्कर दे सकता है?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सोमवार को चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने अरब और मुस्लिम बहुल आबादी वाले देशों के विदेश मंत्रियों के साथ बीजिंग में एक बैठक के दौरान कहा कि ग़ज़ा में चल रहे युद्ध को रोकने के लिए दुनिया को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए.
सऊदी अरब, जॉर्डन, मिस्र, फ़लस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण और इंडोनेशिया के विदेश मंत्री और इस्लामिक सहयोग संगठन के प्रमुख के साथ कई और अधिकारी दो दिन की बीजिंग यात्रा पर थे. यहाँ इन्होंने चीनी समकक्ष से इसराइल और हमास के बीच चल रहे युद्ध को ख़त्म करने की ज़रूरत पर चर्चा की.
माना जा रहा है कि चीन भी ग़ज़ा में युद्धविराम की कोशिशों में एक बड़ी भूमिका निभाना चाहता है और इसीलिए वो इन देशों की मेज़बानी कर रहा है.
साथ ही ये बात भी हो रही है कि चूँकि अरब और मुस्लिम देश मौजूदा संकट के हल के लिए चीन की तरफ़ देख रहे हैं तो क्या ये एक बाई पोलर (दो ध्रुवों वाली) दुनिया बनने की शुरुआत है?
मध्य-पूर्व में चीन की कूटनीतिक रणनीति

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बैठक के दौरान युद्धविराम की मांग को दोहराते हुए चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस त्रासदी को फैलने से रोकने के लिए प्रभावी क़दम उठाते हुए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए.
साथ ही उन्होंने कहा कि चीन इस युद्ध में न्याय और निष्पक्षता के साथ दृढ़ता से खड़ा है.
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक्स पर लिखा कि चीन शीघ्र युद्धविराम और ग़ज़ा में मानवीय संकट से राहत के साथ स्थिर मध्य-पूर्व के लिए अरब-इस्लामिक देशों के साथ काम करना जारी रखेगा

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समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने सोमवार की बैठक में कहा कि बीजिंग "अरब और मुस्लिम देशों का अच्छा दोस्त और भाई" है और उसने फ़लस्तीनियों के वैध राष्ट्रीय अधिकारों और हितों को बहाल करने के उचित कारण का हमेशा दृढ़ता से समर्थन किया है.
बीजिंग में चीनी विदेश मंत्री के साथ अपनी बैठक में मिस्र के विदेश मंत्री सामेह शौक्री ने उम्मीद जताई कि इसराइल-हमास संकट से निपटने के लिए चीन बड़ी भूमिका निभाएगा.
मिस्र के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक्स पर लिखा कि विदेश मंत्री शौक्री ने चीनी विदेश मंत्री से कहा कि मिस्र "ग़ज़ा में फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ हमलों को रोकने के लिए चीन जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय देशों की बड़ी भूमिका की आशा करता है".
शौक्री ने ये भी कहा कि कुछ प्रमुख देशों को वर्तमान इसराइली हमलों को कवर देते देखना दुर्भाग्यपूर्ण है.

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इसराइल और हमास के बीच जंग शुरू होने के बाद से चीन के विदेश मंत्रालय ने लगातार हमास की निंदा करने से परहेज़ किया है और तनाव कम करने और इसराइल और फ़लस्तीन के बीच "द्वि-राष्ट्र समाधान" की बात की है.
माना जा रहा है कि चीन मध्य-पूर्व में अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने के साथ-साथ अरब और इस्लामिक देशों के साथ अपने अच्छे रिश्तों का फ़ायदा उठाकर इस क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिशें कर रहा है.
पिछले एक साल में मध्य-पूर्व पर चीन के विशेष दूत ज़ाई जुन ने द्वि-राष्ट्र समाधान और संयुक्त राष्ट्र में फ़लस्तीन के लिए मान्यता पर चर्चा करने के लिए इसराइल और फ़लस्तीनी प्राधिकरण के साथ-साथ अरब लीग और यूरोपीय संघ के अधिकारियों के साथ बैठकें की हैं.
हालिया संकट शुरू होने के बाद से भी जुन मध्य पूर्व के कई देशों का दौरा कर चुके हैं और चीन को एक संभावित मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिशें करते दिखे हैं.
हाल ही में अपनी बहरीन यात्रा के दौरान ज़ाई जुन ने कहा था कि फ़लस्तीन-इसराइल टकराव का लगातार बढ़ना एक बार फिर साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा फ़लस्तीन के प्रश्न को नज़रअंदाज़ या भुलाया नहीं जा सकता है.
साथ ही उन्होंने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सर्वसम्मति बनाने और फ़लस्तीनी प्रश्न को दो-राज्य समाधान के सही रास्ते पर वापस लाने के लिए तेज़ी से काम करना चाहिए.
जुन ने ये भी कहा था कि चीन अरब देशों के साथ संचार और समन्वय बनाए रखने और क्षेत्र में शांति और स्थिरता की शीघ्र प्राप्ति को बढ़ावा देने के लिए उचित प्रयास करने के लिए तैयार है.
चीन को क्या हासिल होगा?

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डॉ. एंड्रयू स्कोबेल यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ पीस में चीन कार्यक्रम के एक प्रतिष्ठित फेलो हैं.
वे लिखते हैं, "हालांकि ये चीनी बयान आवश्यक रूप से निष्ठाहीन बयानबाजी नहीं हैं लेकिन हकीक़त में ये खोखली बातें हैं. बीजिंग एक शांतिपूर्ण और स्थिर मध्य-पूर्व चाहता है क्योंकि निरंतर संघर्ष से उसके पास भौतिक रूप से हासिल करने के लिए बहुत कम है और आर्थिक रूप से खोने के लिए बहुत कुछ है - विशेष रूप से पेट्रोलियम आपूर्ति और अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग मार्गों में व्यवधान - अगर संकट बना रहता है या बढ़ता है."
डॉ. स्कोबेल के मुताबिक़ मध्य-पूर्व में सैन्य शक्ति और कूटनीतिक ताक़त दिखाने की चीन की क्षमता बेहद मामूली है. वे लिखते हैं कि अगर अमेरिका की पहलों के साथ तुलना की जाए तो ये साफ़ हो जाता है कि मौजूदा संकट के दौरान वॉशिंगटन और बीजिंग जो कुछ हासिल कर सकते हैं, उसमें बहुत अंतर है.
उदाहरण के तौर पर डॉ स्कोबेल अमेरिका के तेज़ी से पूर्वी भूमध्य सागर में दो शक्तिशाली विमान वाहक जहाज़ों को भेजने का ज़िक्र करते हैं और उसकी तुलना इस बात से करते हैं कि अक्टूबर महीने के अंत तक चीन अस्थायी रूप से अदन की खाड़ी में छह नौसैनिक जहाजों को तैनात करने में सक्षम था.
'मध्यस्थ के तौर पर चीन की भूमिका पर सवाल'

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तो बड़ा सवाल यही उभर कर आ रहा है कि क्या चीन इसराइल और हमास के बीच चल रही जंग में एक मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा है?
प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष हैं.
वे कहते हैं, "बेशक़ चीन खुद को एक तरह के मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन क्या वह मध्यस्थ के रूप में उभर सकता है या नहीं यह अभी भी एक खुला प्रश्न बना हुआ है.''
हर्ष पंत कहते हैं, ''मुझे लगता है कि एक मध्यस्थ को दोनों पक्षों के साथ प्रभाव की ज़रूरत होती है और इस वक़्त चीन के पास इसराइल के ऊपर कोई प्रभाव नहीं है क्योंकि चीन ने ऐसा रुख़ अपनाया है जो अरब देशों के समर्थन में है.''
''मुझे नहीं लगता कि इस मामले में मध्यस्थ की भूमिका चीन के लिए उपयुक्त है. इसराइली इस समय अमेरिका की बात भी नहीं सुन रहे हैं तो कितनी संभावना है कि वे चीन की बात सुनेंगे और इसमें चीन के लिए भूमिका तलाशेंगे."
पंत कहते हैं कि उन्हें संदेह है कि चीन के पास इस वक़्त मध्यस्थ बनने के लिए आवश्यक क्षमता है. वे कहते हैं कि हो सकता है कि बाद में चीन की भूमिका हो जाए लेकिन फ़िलहाल ऐसा नहीं लगता.
तो क्या मध्य-पूर्व को लेकर चीन की सारी कवायद अमेरिकी प्रभाव को टक्कर देने की एक रणनीति है?
प्रोफ़ेसर पंत कहते हैं कि जहाँ तक बीजिंग का सवाल है, उसका इरादा ख़ुद को अमेरिका के विकल्प के रूप में स्थापित करना है.
वे कहते हैं, "मुझे लगता है कि इसमें से बहुत कुछ अरब दुनिया की स्थिति के बारे में है, जहाँ यह भावना है कि अमेरिका की नीति स्पष्ट रूप से इसराइलियों का पक्ष ले रही है और ऐसे में चीन आता है और कहता है कि हम अरब दुनिया की आकांक्षाओं के प्रति अधिक तटस्थ और समर्थक हैं. ''
''इसलिए मुझे लगता है कि यह चीन द्वारा ख़ुद को अमेरिका के विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश के बारे में है जो वह दुनिया के हर हिस्से में कर रहा है."
'चीन की एंट्री ईरान के इशारे पर'

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ए.के. महापात्रा दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर हैं.
वे कहते हैं कि मध्य-पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाने की ये चीन की कोशिश है लेकिन इस कोशिश में वो कामयाब नहीं होगा.
महापात्रा कहते हैं, "इसराइल के पीछे अमेरिका है और वो कभी नहीं चाहेगा कि उसकी जगह चीन ले ले. इसराइल भी अमेरिका का हाथ नहीं छोड़ेगा ख़ासकर जिस तरह अमेरिका ने इसराइल का साथ दिया है चाहे वो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हो या पूर्वी भूमध्यसागर में अपने दो एयरक्राफ्ट कैरियर भेजना हो. अमेरिका में कई विरोध प्रदर्शन होने के बावजूद अमेरिका इसराइल के साथ खड़ा रहा है."
प्रोफ़ेसर महापात्रा के मुताबिक़ "इस मसले में चीन की एंट्री ईरान के इशारे पर हुई है".
वे कहते हैं, "ईरान चाहता है कि इसराइल की सैन्य कार्रवाई जल्द से जल्द ख़त्म हो क्यूंकि उसे लगता है कि उसकी साख ख़तरे में आ गई है. ईरान ने हमास को उकसाया और उसे इस्तेमाल किया लेकिन जब हमास ने ईरान से उसके साथ लड़ने को कहा तो ईरान इसके लिए तैयार नहीं है. मुझे लगता है कि ईरान के इशारे पर ही चीन इस मामले में बोल रहा है."
हालिया मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि अमेरिकी अधिकारियों ने चीन पर दबाव बनाया कि वह ईरानियों को नरम रुख़ अपनाने को कहें. यहाँ ये याद रखना ज़रूरी है कि चीन ईरान का सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी है.
ईरान का भी कहना है कि वह ग़ज़ा में पैदा हुए हालात के समाधान के लिए चीन के साथ संवाद बढ़ाने के लिए तैयार है.
क्या ये द्विध्रुवीय दुनिया की शुरुआत है?

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चीन जिस तरह से मध्य-पूर्व में चल रहे संकट में बढ़-चढ़ कर एक भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है उसे देखते हुए ये चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या ये एक बाई पोलर वर्ल्ड (एक ऐसी दुनिया जिसमें दो बड़े ध्रुव हों) की शुरुआत है?
हर्ष पंत कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि चीन मध्य-पूर्व में एक बहुत महत्वपूर्ण ध्रुव के रूप में उभर रहा है. वे कहते हैं कि मध्य-पूर्व में जिस तरह का प्रभाव और ताक़त अमेरिका के पास है वो काफ़ी ठोस है और चीन उसे दोहराने की स्थिति में नहीं है और इस बात को अरब देश भी पहचानते हैं.
पंत कहते हैं, "इसलिए जब भारत मध्य-पूर्व यूरोप आर्थिक कॉरिडोर प्रस्तावित किया गया तो यह अमेरिका की ताक़त थी जिसने इसे संभव बनाया. चीन के पास इस क्षेत्र में उस प्रकार की इक्विटी नहीं है. चीन की कोशिश ख़ुद को अरब दुनिया के लिए एक स्पष्ट विकल्प के रूप में स्थापित करने की और धीरे-धीरे अरब दुनिया को अमेरिका से दूर करने की है.”
प्रोफ़ेसर महापात्रा के मुताबिक़ ऐसा कहना जल्दबाज़ी होगी कि ये द्विध्रुवीय दुनिया की शुरुआत है.
वे कहते हैं, "अभी ये कहना मुश्किल है कि दुनिया दो बड़े धड़ों में बँटने जा रही है. आज की तारीख़ में ईरान का सबसे क़रीबी दोस्त चीन ही है. जब से चीन ने ईरान और सऊदी अरब का शांति समझौता करवाया है और ईरान को पच्चीस साल के लिए 400 अरब डॉलर देने की बात कही है तो साफ़ है कि अपना प्रभाव बढ़ाने की चीन की कोशिश जारी है. ''
''लेकिन अमेरिका जैसी भूमिका निभाने के लिए उसे बहुत कुछ करना पड़ेगा. पश्चिम एशिया की राजनीति बहुत जटिल है. चीन के पास इतने विशेषज्ञ ही नहीं है जो अरबी या फ़ारसी ठीक से बोल सकें. साथ ही पश्चिम एशिया में चीन की वैसी सैन्य उपस्थिति नहीं है, जैसी अमेरिका की है. वेस्ट एशिया में अमेरिका अब भी नंबर वन है और अगले कुछ साल तक रहेगा."
प्रोफ़ेसर महापात्रा कहते हैं कि हालिया घटनाक्रम को देखते हुए एक संभावना ये बन सकती है कि अमेरिका का मुक़ाबला करने के लिए चीन और रूस एक साथ आ जाएं और एक बड़े धड़े के रूप में उभरें. लेकिन चूंकि रूस फ़िलहाल यूक्रेन के साथ युद्ध में फंसा हुआ है ऐसा होने की सम्भावना भी कम ही नज़र आती है.
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