जाति आधारित जनगणना पर आरएसएस के इस रुख़ के मायने क्या हैं?

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सोमवार को जाति आधारित जनगणना को समर्थन देने के संकेत दिए हैं.
संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि यह संवदेनशील मामला है और इसका इस्तेमाल राजनीतिक या चुनावी उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि इसका इस्तेमाल पिछड़ रहे समुदाय और जातियों के कल्याण के लिए होना चाहिए.
उन्होंने ये भी कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उप वर्गीकरण की दिशा में बिना किसी सर्वसम्मति के कोई क़दम नहीं उठाया जाना चाहिए.
वर्गीकरण के मुद्दे पर दलित और आदिवासी समूहों की ओर से तीखे विरोध के चलते बीजेपी और अन्य राजनीतिक पार्टियां इस पर कोई साफ़ स्टैंड लेने से बचती रही हैं.
आरएसएस का बयान ऐसे समय में आया है, जब विपक्षी इंडिया गठबंधन ने जाति आधारित जनगणना को अपना प्रमुख मुद्दा बना लिया है.

जाति आधारित जनगणना पर आरएसएस की राय

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केरल के पलक्कड़ में संघ के तीन दिवसीय अखिल भारतीय स्वयंसेवक बैठक के अंतिम दिन आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने प्रेस कांफ्रेन्स की.
आंबेकर ने कहा, "हिंदू समाज में जाति और जातीय संबंध एक संवेदनशील मुद्दा है. ये हमारी राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा है. इसे बहुत गंभीरता से निपटाना चाहिए न कि केवल चुनाव या राजनीति के लिए."
उन्होंने कहा, ''आरएसएस को लगता है कि सभी कल्याणकारी योजनाओं के लिए विशेष रूप से जो जाति पिछड़ रही है, उन पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत होती है और इसके लिए अगर सरकार को कभी आँकड़ों की ज़रूरत है, तो यह एक स्थापित परंपरा है.’'
उन्होंने कहा, “इससे पहले भी सरकार ने इस तरह के काम किए हैं. इसलिए वो आगे भी कर सकती है. लेकिन यह केवल उन समुदायों और जातियों के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए. इसे चुनावी राजनीति के उपकरण के तौर पर नहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए.”
“इसलिए हमने सभी के लिए इस बारे में सावधानी बरतने की बात कही है.”
एससी/एसटी के उपवर्गीकरण का मुद्दा भी सामने है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य चाहें तो ऐसा कर सकते हैं.
इसे लेकर आंबेकर ने कहा, “हमारा मानना है कि संवैधानिक आरक्षण बहुत महत्वपूर्ण है. संघ ने इसका हमेशा समर्थन किया है. कोर्ट में जो बात हुई वो बहुत संवेदनशील मुद्दा है. इस पर सरकार और क़ानूनी अधिकारियों को फ़ैसला लेना चाहिए. लेकिन ये सुनिश्चित करना चाहिए कि आरक्षण का लाभ लेने वालों समेत सभी समुदायों के बीच सहमति बनाने की कोशिश हो. इससे पहले कोई क़दम नहीं उठाया जाना चाहिए.”
संघ के बयान पर प्रतिक्रिया

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जाति आधारित जनगणना को लेकर विपक्षी दलों ने संघ को घेरा है.
आंबेकर के बयान पर मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, “आरएसएस स्पष्ट रूप से देश को बताए कि वो जातिगत जनगणना के पक्ष में है या विरोध में है? देश के संविधान की बजाय मनुस्मृति के पक्ष में होने वाले संघ परिवार को क्या दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और ग़रीब-वंचित समाज की भागीदारी की चिंता है या नहीं?”
उधर, बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने सोमवार को पत्रकारों से कहा, “आज कोई खुल कर नहीं कह सकता कि जाति जनगणना न हो. लेकिन उनके मन में है कि ये न हो. लेकिन बीजेपी बार-बार इन मुद्दों को खड़ा करती है.”
“हमने कई बार मांग की लेकिन इन लोगों ने इनकार किया. इनकी कथनी कुछ और करनी कुछ. इनका आरक्षण से कोई मतलब नहीं है. ये लोग केवल बाबा साहब के संविधान को बदलना चाहते हैं.”
लालू प्रसाद यादव ने एक्स पर लिखा कि आरएसएस जातिगत जनगणना को रोक नहीं सकता है.
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरएसएस पर निशाना साधते हुए चार सवाल पूछे हैं.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "जातीय जनगणना को लेकर आरएसएस की उपदेशात्मक बातों से कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं. पहला, क्या आरएसएस के पास जाति जनगणना पर निषेधाधिकार है?"
"दूसरा, जाति जनगणना के लिए इजाज़त देने वाला आरएसएस कौन है? तीसरे, आरएसएस का क्या मतलब है, जब वह कहता है कि चुनाव प्रचार के लिए जाति जनगणना का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए? क्या यह जज या अंपायर बनना है?"
"और चौथा, आरएसएस ने दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के लिए आरक्षण पर 50% की सीमा को हटाने के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता पर रहस्यमय चुप्पी क्यों साध रखी है?"
इसके साथ ही जयराम रमेश ने पूछा, "अब जब आरएसएस ने हरी झंडी दिखा दी है, तब क्या नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री कांग्रेस की एक और गारंटी को हाईजैक करेंगे और जाति जनगणना कराएंगे?"
बीजेपी पर बढ़ता दबाव

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जाति आधारित जनगणना पर संघ का यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि इस मुद्दे पर बीजेपी विपक्ष के निशाने पर है.
जाति आधारित जनगणना कराए जाने को लेकर केवल विपक्ष और ख़ासकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की ओर से ही नहीं बल्कि बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और जेडीयू जैसे सहयोगी दलों की ओर से भी मांग हो रही है.
पिछले साल जेडीयू की अगुवाई वाली सरकार ने बिहार में जातिवार सर्वे कराया था. तब जेडीयू इंडिया गठबंधन का हिस्सा थी और राज्य में जेडीयू-आरजेडी की सरकार थी.
जेडीयू और एलजेपी (रामविलास) ने भी जाति आधारित जनगणना की मांग की है. हाल ही में संसद की ओबीसी कल्याण समिति में जेडीयू ने इस बात को उठाया था.
अभी तक बीजेपी ने खुले तौर पर जाति आधारित जनगणना का विरोध नहीं किया है लेकिन उसने इस पर कोई टिप्पणी भी नहीं की है.
उसे जाति आधारित जनगणना में अपने हिन्दू वोट बैंक के बिखरने का ख़तरा दिखता है. इसलिए वो खुलकर इसका न तो समर्थन कर पा रही है और न विरोध.
बीजेपी ने विपक्ष पर “हिंदू समाज को बांटने” की कोशिश करने का आरोप लगाया था.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी इस बारे में टिप्पणी की थी.
हाल ही में कंगना ने एक निजी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा कहा था कि ‘जाति आधारित जनगणना नहीं कराई जानी चाहिए.’
इसी साल मई में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना में झटका लगा था.
राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि इसकी बड़ी वजह रही कि विपक्ष एससी/एसटी वोटरों में ये संदेश देने में सफल रहा कि संविधान ख़तरे में है.
अब चूंकि आरएसएस ने जाति आधारित जनगणना को कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में अहम बताया है तो बीजेपी को इस मामले में फ़ैसला लेने में आसानी हो सकती है.
संघ के विचार में परिवर्तन?

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साल 2015 में मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी तब काफ़ी विवाद हुआ था.
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में मोहन भागवत की यह टिप्पणी मुद्दा बनी थी. इस चुनाव में बीजेपी को हार मिली थी.
उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मोहन भागवत के बयान पर सफ़ाई दी थी.
मोहन भागवत ने 2019 में कहा था, "आरक्षण के विरोधी और उसके समर्थक अगर एक दूसरे की बात समझ लेंगे तो इस समस्या का हल चुटकी में निकाला जा सकता है."
इस बयान पर भी काफ़ी विवाद पैदा हुआ और एनडीए के साझीदार दल जैसे रामदास अठावले और रामविलास पासवान ने इस बयान पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी.
तब आरएसएस ने सफाई दी थी कि ‘संघ का आरक्षण से विरोध नहीं है. आरक्षण के मुद्दे पर सर्वसम्मति से बात होनी चाहिए.’
उस समय आरएसएस के क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख प्रमोद बापट ने बीबीसी मराठी से कहा था, "आरक्षण के मुद्दे पर संघ का मानना है कि जिनको आरक्षण का लाभ मिल रहा है, वे इसका लाभ लें या लेना छोड़ दें, ये उन पर ही निर्भर करता है."
"आरक्षण चाहिए या नहीं चाहिए, इस पर चर्चा करने के बजाय जिनको आरक्षण मिल रहा है, उनको आरक्षण का क्या फ़ायदा हुआ, इसका मूल्यांकन होना चाहिए."
आरएसएस की सोच में जातियां

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हिंदुत्व की राजनीति पर गहरी नज़र रखने वाले फ़्रांसीसी विद्वान क्रिस्टोफर जेफरलो ने साल 2020 में अपने एक लेख में लिखा था कि मराठी ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए आरएसएस ने सभी जातीय पृष्ठभूमि वाले हिंदुओं को धीरे-धीरे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की है.
उन्होंने लिखा है, ''असल में आरएसएस, तत्कालीन महाराष्ट्र में आंबेडकर के नेतृत्व में दलित राजनीति के उभार की प्रतिक्रिया में सामने आया. तब उस इलाक़े में आंबेडकर ने पहली बार जाति विरोधी आंदोलन शुरू किया, जिसमें महार सत्याग्रह और दलितों के मंदिर प्रवेश की मुहिम थी.''
आरएसएस को पता है कि सत्ता में बने रहना है तो बहुजनों को साथ जोड़ना होगा. इसी के तहत बीजेपी अब संगठन और सरकार में जाति का ख़ासा ख़्याल रख रही है. हाल ही में रेलवे बोर्ड का चेयरमैन एक दलित को बनाया गया है. राष्ट्रपति के पद पर भी बीजेपी ने जनजाति समुदाय से आने वाली द्रौपदी मुर्मू को बनाया.
1925 में गठन के बाद से अब तक आरएसएस के कुल छह सरसंघचालक हुए हैं और इनमें चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया यानी राजेंद्र सिंह को छोड़ दिया जाए तो सभी ब्राह्मण हैं. रज्जू भैया भी ठाकुर थे यानी सभी आरएसएस प्रमुख सवर्ण ही हुए हैं.
आरएसएस के भीतर भी सवर्णों के दबदबे को लेकर सवाल उठता रहा है.
संघ में सवर्णों के दबदबे के सवाल पर इसी साल मई महीने में आरएसएस में राजस्थान धर्म प्रसार विंग के एक पदाधिकारी ने बीबीसी से कहा था, ''संघ पिछले दस सालों में बहुत बदला है. देश भर में संघ के क़रीब दो हज़ार प्रचारक होंगे और इनमें से क़रीब 20 फ़ीसदी से ज़्यादा दलित हैं. पहले ऐसा बिल्कुल नहीं था. वो दिन दूर नहीं है जब संघ का कोई दलित या आदिवासी स्वयंसेवक सरसंघचालक होगा. यह हमारे एजेंडे का हिस्सा है कि संघ की विचारधारा से बहुजनों को जोड़ना है और हम जोड़ रहे हैं.''
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