आरक्षण को लेकर क्या मोहन भागवत और आरएसएस का रुख़ बदल रहा है?

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम के दौरान एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण जारी रखने का समर्थन किया.
उन्होंने कहा, "जब तक समाज में भेदभाव है आरक्षण भी बरकरार रहना चाहिए.संविधान सम्मत जितना आरक्षण है उसका संघ के लोग समर्थन करते हैं."
भागवत के इस बयान ने लोगों को थोड़ा चौंकाया क्योंकि सितंबर 2015 में आरएसएस के मुखपत्रों ‘पाञ्चजन्य’ और ‘ऑर्गेनाइज़र’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने आरक्षण की ‘समीक्षा’ किए जाने की ज़रूरत बताई थी.
उन्होंने एक ‘अराजनीतिक समिति’ बनाने का प्रस्ताव रखा था जिसका काम ये देखना था कि आरक्षण का फायदा किन लोगों को और कितने समय तक मिलना चाहिए.
उनके इस बयान के ठीक बाद बिहार विधानसभा के चुनाव हुए थे, लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी ने इसे बड़ा मुद्दा बना लिया था और कहा था कि 'संघ आरक्षण को ख़त्म कराना चाहता है'.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ उस चुनाव में बीजेपी की हार में इस बयान की भी कुछ भूमिका थी और वे ये भी कहते हैं कि इस ग़लती से बीजेपी ने सबक़ सीखा है.
अपने इस तर्क के समर्थन में वो 2019 चुनाव से पहले एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान की याद दिलाते हैं, जब उन्होंने कहा था कि जब तक वो हैं, तब तक 'समाज के पिछड़े वर्गों को बाबा साहेब आंबेडकर से मिले आरक्षण को कोई छू भी नहीं सकता'.
जबकि तथ्य ये भी है कि इसके ठीक पहले मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों के लिए दस फीसदी आरक्षण लागू करने का एलान किया था.
कई लोगों ने इसे ‘सवर्ण’ आरक्षण कहा और ये आरोप भी लगाया कि 'बीजेपी और आरएसएस जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था की जड़ें काटने में लगी है.'
आरक्षण को लेकर संघ नेताओं के विरोधाभासी बयान

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एससी-एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण जारी रखने वाला भागवत का मौजूदा बयान ‘चुनावी राजनीति का तकाज़ा है' क्योंकि इस साल राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के विधानसभा चुनाव हैं और उसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव.
कई लोग इस मामले में भागवत के 'आरक्षण की समीक्षा' वाले बयान के अलावा, 2017 में आरएसएस के तत्कालीन प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य के उस बयान की भी याद दिलाते हैं जिसमें उन्होंने आरक्षण को जारी रखने का विरोध किया था.
उस वक्त वैद्य ने कहा था,''आरक्षण समानता के सिद्धांत के ख़िलाफ़ है. उन्हें मौके दीजिए, आरक्षण नहीं.''

लालू प्रसाद यादव की जीवनी लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नलिन वर्मा कहते हैं, '' संघ के लगभग 100 साल के इतिहास में ये पहली बार है जब इसके किसी सर्वोच्च नेता ने कहा है कि आरक्षण बरकरार रहना चाहिए. भागवत तो आरक्षण के समर्थन में थे ही नहीं. इनके पूर्ववर्तियों ने भी कभी इसकी हिमायत नहीं की."
आरक्षण की धार कुंद करने के लिए शुरू हुई थी रथ यात्रा?

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पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की सिफारिश करने वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट पर संघ का क्या रवैया रहा है इसकी एक झलक विनय सीतापति की किताब ‘जुगलबंदी’ में मिलती है.
किताब में वीपी सिंह सरकार की ओर से मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के एलान का जिक्र करते हुए लिखा गया है," संघ ने ऑर्गेनाइज़र के पृष्ठों पर तर्क दिया कि वीपी सिंह समाज के मंडलकरण के माध्यम से हिंदुओं को अगड़ी, पिछड़ी और हरिजन जातियों के आधार पर बाँटना चाहते हैं, अधिकांश उच्च जातियों वाला भाजपा नेतृत्व निजी तौर पर आरएसएस की इस बात से सहमत था."
उन्होंने अपनी किताब में लिखा है, "मंडल की घोषणा के 19 दिन बाद 26 अगस्त 1990 को आरएसएस ने दो महीने बाद अयोध्या में मंदिर निर्माण का काम शुरू करने के मकसद से विहिप के अनुष्ठान के लिए समर्थन जुटाने को एक बैठक बुलाई. वहाँ ओबीसी आरक्षण का कोई उल्लेख नहीं किया गया था, लेकिन मंडल की घोषणा न होती तो वो बैठक भी शायद नहीं होती."
किताब में ओबीसी आरक्षण की काट के लिए आडवाणी और प्रमोद महाजन की रणनीति का जिक्र है. इसके मुताबिक, एक मिनी बस या मिनी ट्रक को रथ की तरह तैयार किया जाना था. आडवाणी को उसमें सोमनाथ से अयोध्या तक 10 हजार किलोमीटर की यात्रा करनी थी.
क्या संघ हमेशा से आरक्षण का समर्थक रहा है?

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संघ और इसके सहयोगी संगठनों से जुड़े नेता कहते हैं कि संघ परिवार ने कभी भी आरक्षण का विरोध नहीं किया.
बीबीसी हिंदी ने विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रवेश चौधरी से जब संघ के कथित आरक्षण विरोधी रुख के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ये मीडिया में फैलाई गई धारणा है. संघ कभी भी आरक्षण के विरोध में नहीं रहा.
चौधरी ने कहा, ''पूर्व सर संघचालक बाला साहेब देवरस ने 1970 के दशक में वसंत व्याख्यानमाला के दौरान आरक्षण का समर्थन किया था. उनका कहना था कि समाज में समता के बगैर देश की तरक्की नहीं हो सकती.''

चौधरी कहते हैं, ''2014 में मौजूदा सर संघचालक मोहन भागवत ने दिल्ली में बीजेपी नेता विजय सोनकर शास्त्री की किताब के विमोचन के मौके पर कहा था कि आरक्षण तब तक मिलना चाहिए जब तक इसका लाभ ले रहा समाज इसकी जरूरत बताता रहे. समाज के जिस वर्ग का हजारों वर्षों से उत्पीड़न होता रहा है, वो ही तय करेगा उसे आरक्षण कब तक मिलना चाहिए."
वो कहते हैं, "संघ के विचारक और राष्ट्रीय समरसता मंच के संस्थापक सदस्य रमेश पतंगे ने भी अपनी किताब में आरक्षण का समर्थन किया है. मीडिया का एक वर्ग हमेशा ये धारणा फैलाता रहा है कि संघ आरक्षण के ख़िलाफ़ है लेकिन ऐसा कतई नहीं है.''
‘विराट हिंदू समाज’ समाज बनाम आरक्षण

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संघ आरक्षण का समर्थक रहा है या नहीं, ये जानने के लिए बीबीसी हिंदी ने आरएसएस और नरेंद्र मोदी पर किताबें लिख चुके लेखक और चर्चित पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय से बात की. एक पत्रकार के तौर पर नीलांजन वर्षों तक संघ और बीजेपी को कवर कर चुके हैं.
वो कहते हैं,''संघ के अंदर आरक्षण को लेकर अलग-अलग सोच रही है. भागवत ने 2015 में ‘समीक्षा’ की बात की थी लेकिन माना गया कि ये आरक्षण के विरोध में संघ का आधिकारिक रुख है. इस बार भागवत ने आरक्षण को जारी रखने की बात कही है. लेकिन ये कोई औपचारिक वादा तो है नहीं. आज की तारीख में कह रहे हैं कि वो रिजर्वेशन के पक्ष में हैं. कल कह सकते हैं इस व्यवस्था में गड़बड़ी है. इसे बदलना चाहिए.''
नीलांजन ने हाल में एक लेख में लिखा,''अब भागवत भी आरक्षण के समर्थन में आ गए हैं, लेकिन आरक्षण नीति को लेकर संघ परिवार के समर्थन के बारे में संदेह बने हुए हैं क्योंकि इस सिस्टम को ‘एंटी मेरिट’ मानने की सोच भी बनी हुई है. अगर ऐसा नहीं है तो बीजेपी ने पूरे देश में जाति आधारित जनगणना और खास तौर से बिहार में जाति आधारित सर्वे का विरोध क्यों किया?''
उन्होंने बीबीसी से कहा," 2014 से आरएसएस के भीतर इसे लेकर असमंजस बना हुआ है. हालांकि बीजेपी ने विभिन्न समुदायों की मांग पर उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की है लेकिन इस वक्त मोदी मंत्रिमंडल में पिछड़ों, दलितों और ओबीसी मंत्रियों को मिला दिया जाए तो उनकी संख्या सवर्ण जातियों से आने वाले मंत्रियों से ज्यादा होगी."
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आरक्षण को लेकर आरएसएस का रुख भले साफ न हो लेकिन वो एक ऐसे ‘विराट हिंदू समाज’ की बात करता है, जिसमें सामाजिक भेदभाव की वजह से बिखराव न हो. आरक्षण का विरोध उनके इस विचार पर चोट करता है.
साथ ही, ये बीजेपी के पक्ष में गैर-सवर्ण मतदाताओं की गोलबंदी को भी रोकता है लिहाजा आरक्षण का समर्थन संघ की रणनीति के अनुरूप है.
भागवत के आरक्षण समर्थक बयान से संघ को कितना फायदा?

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नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, "संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण के समर्थन में इसीलिए बयान दिया कि बीजेपी को 2024 के चुनाव में किसी मुश्किल स्थिति का सामना न करना पड़े. इसमें संघ का भी फायदा है."
नीलांजन कहते हैं,''भारतीय जनता पार्टी के लिए कोई परेशानी न हो जाए इसे लेकर भागवत काफी सचेत हैं. 2025 में संघ की स्थापना के सौ साल पूरे हो जाएँगे. उसके पहले वो ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे बीजेपी को चुनाव में मुश्किल हो.''
नीलांजन आगे कहते हैं, '' भागवत चाहते हैं कि बीजेपी और संघ में समन्वय बना रहे. भारतीय जनता पार्टी जब सत्ता में रहती है तो संघ को काफी फायदा होता है. पिछले नौ साल में संघ के तमाम स्कूल-कॉलेजों, संगठनों को आर्थिक सहायता मिली है. सरकार के कहने से कॉरपोरेट हाउस भी उनकी आर्थिक मदद करते हैं. वाजपेयी जी के समय जो शिकायत होती थी कि संघ को नजरअंदाज़ किया जा रहा है, वैसा इस समय नहीं है.''
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