मोदी सरकार वाक़ई मुस्लिम और ईसाई दलितों को आरक्षण देना चाहती है?

मुसलमान

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

क्या धर्म परिवर्तन कर इस्लाम और ईसाइयत अपनाने वाले दलितों के लिए आरक्षण का रास्ता साफ़ करने की तैयारी शुरू हो चुकी है?

सिख और बौद्ध धर्म अपना चुके दलितों को आरक्षण का लाभ मिलता है तो इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को इससे क्यों महरूम रखा गया है?

केंद्र सरकार की ओर से इस्लाम और ईसाई धर्म अपना चुके दलितों की सामाजिक स्थिति का पता लगाने के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित करने की अधिसूचना जारी करने के बाद यह बहस और गर्म हो गई है.

आयोग सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस के.जी. बालकृष्णन की अगुआई में काम करेगा. आयोग के दो अन्य सदस्य हैं यूजीसी मेंबर प्रोफ़ेसर सुषमा यादव और रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रविंदर कुमार.

आयोग इस बात की पड़ताल करेगा कि क्या धर्म परिवर्तन कर ईसाई और मुसलमान बनने वाले दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जा सकता है.

चूंकि भारत में अनुसूचित जाति में शामिल लोगों को नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण मिलता है.

इसलिए माना जा रहा है कि सरकार ईसाई और मुस्लिम दलितों को आरक्षण देकर राजनीतिक लाभ लेना चाहती है.

आयोग बनाने की अधिसूचना ऐसे वक़्त जारी की गई है, जब केंद्र सरकार 11 अक्टूबर को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना रुख़ साफ़ कर सकती है.

मुस्लिम और ईसाई दलित अनुसूचित जाति में क्यों नहीं?

11 अक्टूबर को सरकार ईसाई या मुसलमान बन चुके दलितों को आरक्षण से वंचित रखने के फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान अपना रुख़ जाहिर करेगी. ये मामला साल 2004 से सुप्रीम कोर्ट में है.

सेंटर फ़ॉर पब्लिक इन्ट्रेस्ट लिटिगेशन ने अपनी पीआईएल में इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जातियों का लाभ न दिए जाने को चुनौती दी है.

संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति, जातियों, नस्लों, जनजातियों या जनजातियों के समूहों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का निर्देश जारी कर सकते हैं. 1950 में इस अनुच्छेद के प्रावधानों का इस्तेमाल कर सिर्फ "अस्पृश्य और बहिष्कृत" हिंदुओं को ही अनुसूचित जातियों में शामिल किया गया था, जिन्हें आज दलित कहा जाता है.

लेकिन सिख समुदाय की मांगों के बाद, 1956 में इस आदेश को संशोधित करते हुए इसमें "अस्पृश्य और बहिष्कृत" यानि दलित सिखों को शामिल किया गया. 1990 में, जब केंद्र में वीपी सिंह की सरकार आई तो उसने 'अस्पृश्य और बहिष्कृत' नव-बौद्धों को भी शामिल कर लिया.

उस समय केंद्र सरकार ने संशोधित आदेश में स्पष्ट किया था कि "कोई भी व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़ अन्य किसी धर्म को मानता है, वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा.''

यही वो आदेश था, जिसकी वजह से मुस्लिम और ईसाई धर्म अपनाने वालों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जा रहा है और वे हिंदू, सिख और बौद्ध दलितों को मिल रहे आरक्षण के लाभ से महरूम हैं.

ईसाई

इस्लाम और ईसाई धर्म में दलितों से भेदभाव का सवाल

माना गया था चूंकि इस्लाम और ईसाइयों में जाति भेद नहीं है इसलिए इन धर्मों के दलितों के साथ भेदभाव नहीं होगा और वे सामाजिक और आर्थिक दर्जे में दूसरे मुस्लिमों और ईसाइयों के बराबर होंगे.

लेकिन हक़ीक़त कुछ और है. सतीश देशपांडे और गीतिका बापना की ओर से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के लिए तैयार की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी क्षेत्रों में 47 फ़ीसद दलित मुस्लिम ग़रीबी रेखा से नीचे हैं. रिपोर्ट में 2004-05 के आंकड़ों का हवाला दिया गया है. ग्रामीण इलाक़ों में 40 फ़ीसद दलित मुस्लिम और 30 फ़ीसद दलित ईसाई ग़रीबी रेखा से नीचे हैं.

आर्थिक स्तर पर तो पिछड़ापन है ही लेकिन ईसाई और मुसलमान बन जाने के बावजूद उनके साथ सामाजिक भेदभाव जारी है. उन्हें अलग चर्च, मस्जिद और क़ब्रगाहों में जाने के लिए बाध्य किया जाता है. लंबे समय से इस तथ्य से इनकार करने के बाद कैथोलिक चर्च ने स्वीकार किया है कि दलित ईसाइयों के साथ भेदभाव होता है.

इस्लाम और ईसाई धर्म में भी दलितों को बराबरी का हक़ दिलाने के लिए कई संगठन लंबे वक़्त से इस मुद्दे पर आंदोलन करते रहे हैं. उन्हीं में से एक नेशनल काउंसिल ऑफ़ दलित क्रिश्चियन ने रिज़र्वेशन को 'रिलिजन न्यूट्रल' बनाने की माँग करते हुए एक याचिका दायर की थी, जिसे जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया था.

दलित

इमेज स्रोत, AFP

सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका का मक़सद दलित और मुस्लिम दलितों को रिज़र्वेशन का हक़ दिलाना है. इसी तरह की कई याचिकाएं दायर की गई हैं और अब इस पर 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अपना रुख़ साफ करने को कहा है.

हालांकि इससे पहले ही केंद्र सरकार ने इन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा देने की संभावना की पड़ताल के लिए आयोग गठित करने की अधिसूचना जारी कर मामले को नया मोड़ दे दिया है.

ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के अध्यक्ष और पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ''सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि मुस्लिमों में भी जाति भेद है. वहां भी दलितों के साथ भेदभाव होता है. लिहाज़ा अनुसूचित जातियों को मिलने वाले लाभ उन्हें भी मिलना चाहिए. बाद में अन्य धर्मों में दलितों की पहचान और उनके हालात में सुधार के उपाय सुझाने के लिए बने रंगनाथ मिश्र आयोग ने भी लगभग यही बात कही. ''

अली अनवर ने कहा, '' रंगनाथ मिश्र आयोग ने कहा था कि1950 में राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 341 के तहत जारी किए गए अध्यादेश में पैरा 3 को जोड़ कर जिस तरह दलित मुस्लिमों और ईसाइयों को अनसूचित जाति के दायरे से बाहर किया था, वह असंवैधानिक था. वो ख़त्म होना चाहिए. इसके लिए किसी संविधान संशोधन की ज़रूरत नहीं है. ये काम एक्ज़ीक्यूटिव ऑर्डर से भी हो सकता है''.

दलित

इमेज स्रोत, Getty Images

मुस्लिम और ईसाई दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के लिए अदालत का दरवाज़ा 2004 में ही खटखटाया गया था, जब कुछ ईसाई संगठनों ने इसकी माँग करते हुए याचिका दायर की थी.

बाद में कुछ मुस्लिम संगठनों ने भी याचिकाएं दायर कीं. अब इतने दिनों के बाद ये मामला सुनवाई के लिए सामने आया है और केंद्र सरकार को इस पर अपना जवाब पेश करने को कहा गया है. ऐसे में सरकार का इस मामले पर आयोग बनाने का आदेश देने का क्या तुक बनता है?

कोरोना वायरस

क़ानूनी पहलू

  • 1950 का राष्ट्रपति अध्यादेश के मुताबिक सिर्फ़ हिंदू, सिख और बौद्ध दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा
  • सिख दलितों को 1956 और बौद्ध दलितों को 1990 में अनुसूचित जाति का दर्जा मिला
  • सिख दलितों को काका कालेलकर कमेटी और बौद्ध दलितों को 1983 में बनी कमेटी की रिपोर्ट पर ये दर्जा मिला
  • केंद्र का कहना है कि मुस्लिम और ईसाई धर्म अपनाने वाले लोगों को अनुसूचित जाति में नहीं रखा जा सकता है
  • केंद्र का तर्क है कि इस्लाम और ईसाई धर्म जाति भेद नहीं मानता इसलिए उन्हें ये दर्जा नहीं मिल सकता
कोरोना वायरस

आयोग बनाने के मक़सद पर सवाल

नेशनल काउंसिल ऑफ़ दलित काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष वी.जी. जॉर्ज ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''सरकार इस मुद्दे पर कोर्ट में जवाब देने के बजाय इससे बचना चाहती है. सरकार की ये कायराना हरकत है. इस मामले में अब आयोग बनाने का क्या तुक है."

जॉर्ज आगे कहते हैं, "सालों पहले रंगनाथ मिश्र आयोग ईसाई धर्म और इस्लाम में दलितों के ख़राब हालात और उनसे भेदभाव का ज़िक्र कर चुका है. अब सरकार और क्या जानना चाहती है. सरकार प्रोफ़ेसर सतीश देशपांडे की अगुआई में इस पहलू का अध्ययन करा चुकी है. इसे सरकार ने ही फ़ंड किया था.

जॉर्ज के मुताबिक '' रंगनाथ मिश्र आयोग के अलावा भी कई कमीशनों ने माना है कि दलित मुस्लिमों और ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा मिलना चाहिए. अब सरकार एक और कमीशन बना कर सिर्फ़ इस मुद्दे को टालना चाहती है. हालांकि हम इस कमीशन के गठन को भी अदालत में चैलेंज करेंगे.''

मोदी सरकार के इस फ़ैसले पर अली अनवर भी सवाल उठाते हैं.

वह कहते हैं, ''2019 में जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में आया और इसने मोदी सरकार को रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफ़ारिशों पर अपना रुख़ साफ़ करने को कहा. लेकिन इस सरकार ने कहा कि ईसाइयों और मुस्लिमों में कोई जाति नहीं है इसलिए उन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा देने का सवाल नहीं उठता है.''

अली अनवर आगे कहते हैं, ''अब जब मामला सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में पहुँच चुका है और लग रहा है कुछ निर्णायक फ़ैसला हो सकता है तो मोदी सरकार ने एक आयोग बना कर शिगूफ़ा छोड़ दिया. आयोग की रिपोर्ट के लिए दो साल की डेडलाइन है.''

अली अनवर के मुताबिक, '' ये मामला टालने की क़वायद है. ये मोदी सरकार का कोई पब्लिक कमिटमेंट तो है नहीं. लिहाज़ा मामला टलता रहेगा और सरकार मुस्लिम और ईसाई दलितों को यह दर्जा देने से बच जाएगी''

आरक्षण

इमेज स्रोत, EPA

वोट बैंक की राजनीति?

कुछ हलक़ों में इस बात पर भी चर्चा चल रही है कि मोदी सरकार चुनावी फ़ायदा लेने के लिए ये क़दम उठा रही है.

इस मामले में अली अनवर कहते हैं, ''मोदी जी की पसमांदा स्नेह यात्रा और मुस्लिम-ईसाई दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का इरादा सिर्फ़ भ्रम है. बीजेपी का पितृ संगठन आरएसएस पहले ही मुसलमानों को ईसाइयों को दूसरे ग्रह का प्राणी समझता रहा है. इसकी जन्म भूमि और पुण्य भूमि की अवधारणा जगज़ाहिर है."

अली अनवर आगे कहते हैं, "जो लोग ये समझते हैं कि मोदी इसका चुनावी फ़ायदा लेना चाहते हैं वो भी ग़लत हैं क्योंकि मुस्लिमों में दर्जन भर जातियां दलितों में आती हैं. और ये एक फ़ीसद वोटरों के बराबर भी नहीं होंगी. अगर चुनावी फ़ायदा लेना होता तो इसे लागू कर देते और फिर इसका अध्ययन कराते कि इसका फ़ायदा किसे मिले और किसे नहीं. ये भी नहीं किया. यानी साफ़ है कि यह सिर्फ़ मोदी सरकार की भ्रम फैलाने की क़वायद है. ''

मुसलमान

इमेज स्रोत, Getty Images

क्या हिंदू दलित इससे नाराज़ होंगे?

हिंदू दलितों का मानना है कि अगर ईसाई और मुस्लिम दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाता है तो यह उनके अधिकारों को हड़पने जैसा होगा.

नेशल कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ दलित एंड आदिवासी ऑर्गेनाइज़ेशन के अध्यक्ष अशोक भारती कहते हैं, ''इस्लाम और ईसाई धर्म कहता है कि उसके यहां भेदभाव नहीं है. उनकी नज़र में सब बराबर हैं. अब वे कह रहे हैं कि हमारे यहां भेदभाव है. ईसाई और इस्लाम दोनों ही ख़ुद को अस्पृश्यता-मुक्त बताते हुए इसे नकारते रहे हैं.''

भारती आगे कहते हैं, '' सर्वोच्च न्यायालय में पेश ग़ाज़ी सादुद्दीन बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र एवं अन्य की दीवानी अपील और पब्लिक इन्ट्रेस्ट लिटिगेशन और दूसरी याचिकाओं के ज़रिये ईसाई और मुस्लिम दलितों को अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति में शामिल कर आरक्षण की मांग मौजूदा अनुसूचित जातियों के अधिकारों को हड़पने की कोशिश है."

मुस्लिम

इमेज स्रोत, AFP/GETTY IMAGES

सतीश देशपांडे के मुताबिक़ उनकी 2008 की रिपोर्ट में यह साफ़ बताया गया था कि दलित और ईसाई मुस्लिमों के साथ भेदभाव के पुख़्ता सुबूत हैं. उनकी आर्थिक स्थिति दूसरे धर्मों के दलितों से भी ख़राब है. लेकिन हिंदू दलित ये मानने को तैयार नहीं हैं.

अशोक भारती कहते हैं, ''दलित मूल के ईसाई और मुस्लिमों को पहले से ही सरकारी सेवा और शिक्षा में ओबीसी के तहत आरक्षण मिला हुआ है. लिहाज़ा पीआईएल के ज़रिये मुस्लिम और ईसाई दलितों को अनुसूचित जाति में रख कर उन्हें आरक्षण देने की माँग के कुछ और भी निहितार्थ हो सकते हैं. आने वाले दिनों में ये साफ़ हो जाएगा.''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)