'बिरसा मुंडा और फ़ादर हाफ़मैन दोनों साथ नहीं चल सकते', बीजेपी सांसद राकेश सिन्हा ने क्यों कही ये बात

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिन्दी के लिए
"झारखंड के मुख्यमंत्री भले ही आदिवासी पहचान की राजनीति कर रहे हों, लेकिन उन्हें आदिवासियों की समस्या से कोई सरोकार नहीं है. उन्हें पहचान की राजनीति की सीमाओं से ऊपर उठना होगा. धरती आबा बिरसा मुंडा जी ने जिसको तीर के निशाने पर लिया, उसकी स्टैच्यु (प्रतिमा) बनाकर उन्होंने खूंटी में खड़ा कर दिया. हाफ़मैन की."
"इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात और क्या होगी. या तो आप धरती आबा को स्वीकार कीजिए या फिर हाफ़मैन के साथ खड़े हो जाइए. बिरसा मुंडा ने उस हाफमैन को तीर मारा था. वो बच तो निकला, लेकिन बिरसा मुंडा जी ने घोषणा कर दी कि ये शत्रुओं का संकेत या प्रतीक है. उस प्रतीक को झारखंड मे स्थापित कर, स्टैच्यु बनाकर वो क्या संदेश देना चाहते हैं? आप दो नावों पर पैर नहीं रख सकते."
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े चिंतक और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राज्यसभा सांसद प्रोफ़ेसर राकेश सिन्हा ने यह बात बीते 11 दिसंबर को रांची में कही. वे तब यहां के एक निजी विश्वविद्यालय में बीजेपी द्वारा आयोजित प्रबुद्धजन सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे.
अब वे रांची से वापस जा चुके हैं लेकिन फादर हाफ़मैन और बिरसा मुंडा को लेकर उनके द्वारा कही गई बातों पर यहां विवाद खड़ा हो गया है.
उनके इस भाषण पर आदिवासी बुद्धिजीवियों ने कड़ी प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं और कहा है कि प्रोफ़ेसर राकेश सिन्हा इतिहास की आधी-अधूरी जानकारी लेकर बात न करें.

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आदिवासी मामलों के चर्चित लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने बीबीसी से कहा, "आरएसएस और बीजेपी के लोग गोडसे की मूर्तियां लगाएं तो ठीक और हम उस फ़ादर हाफ़मैन की प्रतिमा स्थापित करें, जिन्होंने आदिवासियों की जमीनों के संरक्षण के लिए छोटानागपुर काश्तकारी क़ानून (सीएनटी) का ड्राफ़्ट तैयार किया, तो ग़लत. ये कैसे जस्टिफ़ाई कर सकते हैं."
ग्लैडसन ने कहा, "उन्हें पता होना चाहिए कि ब्रिटिश हुक़ूमत में बना सीएनटी क़ानून आज भी लागू है. बीजेपी की पूर्ववर्ती रघुवर दास सरकार ने जब उसमें संशोधन की कोशिश की, तो आदिवासियों ने बड़ा विरोध किया और तत्कालीन सरकार को अपना संशोधन प्रस्ताव वापस लेना पड़ा. विरोध करने वालों में सभी आदिवासी समुदाय शामिल थे. कौन ईसाई और कौन सरना, इसका भेद नहीं रखा गया था. अब बीजेपी हमें बांटने की कोशिश न करे. आदिवासी अपने मुद्दों, पहचान, संस्कृति और अधिकारों को लेकर एक हैं."
उन्होंने आगे कहा, "राकेश सिन्हा जिस स्टैच्यु की बात कर रहे हैं, उसकी स्थापना के मौके पर मैं भी सरवदा चर्च में मौजूद था. मुझे वहां मुख्य वक्ता के तौर पर बुलाया गया था. तब फ़ादर हाफ़मैन की प्रतिमा की स्थापना के लिए सबने चंदा दिया था. उनमें ईसाई और सरना दोनों धर्मों के लोग थे. सरना धर्मावलंबियों ने तो प्रतिमा अनावरण समारोह में अपना वक्तव्य भी दिया था."
"राकेश सिन्हा जी को वहां जाकर उन्हीं आदिवासियों से पूछना चाहिए कि उन लोगों ने चंदा क्यों दिया. बची बात चर्च की तो फ़ादर कामिल बुल्के यदि रामायण की पैरोकारी करें, तो वे ठीक और फ़ादर हाफ़मैन सीएनटी एक्ट का ड्राफ़्ट बनाएं, तो वे ग़लत. ये थोथलेबाज़ी नहीं चलेगी."

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कौन थे फ़ादर हाफ़मैन, कहां लगी उनकी प्रतिमा?
जून 1857 में जन्मे जोहान्स बैप्टिसेट हाफ़मैन (फ़ादर हाफ़मैन) दरअसल एक जर्मन नागरिक थे. वो महज़ 20 साल की उम्र में भारत आ गए. यहां आने के बाद उन्होंने आसनसोल और कलकत्ता (अब कोलकाता) में धर्मगुरु बनने की ट्रेनिंग ली.
फ़ादर हाफ़मैन को 1891 में पादरी की उपाधि मिली. 1892 में वे बंदगांव आए. मुंडा आदिवासियों की भाषा मुंडारी सीखी. उनकी संस्कृति, समाज और इतिहास के बारे में जाना और फिर मुरहू के पास के गांव सरवदा आ गए. वहां एक विशाल कैथोलिक चर्च की स्थापना कराई. यह दक्षिणी छोटानागपुर के सबसे पुराने चर्चों में शामिल है.
सरवदा अब झारखंड के खूंटी ज़िले के मुरहू प्रखंड का हिस्सा है. बहुत कम घरों वाले सरवदा गांव के इसी चर्च परिसर में दिसंबर 2018 में फ़ादर हाफ़मैन की प्रतिमा स्थापित की गई थी. आदिवासी उन पर फूल चढ़ाते हैं और वहां मोमबत्तियां जलायी जाती हैं. उन्हें इसलिए याद किया जाता है, क्योंकि उन्होंने सीएनटी एक्ट लागू करवाने में अहम भूमिका निभायी थी.
उपलब्ध गजेटियर के मुताबिक़, उनके कहने पर ही उस समय की ब्रिटिश हुक़ूमत ने 1902 में आदिवासियों की ज़मीनों का सर्वे कराया. इस सर्वे में फ़ादर हाफ़मैन भी शामिल थे. उन्होंने एक 'ड्राफ़्ट बी' तैयार किया, जिसे सीएनटी एक्ट का प्राथमिक ड्राफ़्ट कहा जाता है. इसके बाद साल 1908 में सीएनटी एक्ट लागू किया गया. इसके कारण आदिवासियों की ज़मीनों के संरक्षण के कई पारंपरिक नियमों (जो कहीं दस्तावेज़ों में दर्ज़ नहीं थे) को क़ानूनी मान्यता मिल गई.
उससे पहले वे ग्राम सभाओं के मौखिक क़ानून थे. सीएनटी क़ानून आज तक इस इलाक़े में लागू है. इससे आदिवासी ज़मीनों (ट्राइबल लैंड) को क़ानूनी संरक्षण मिलता है.

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फ़ादर हाफ़मैन की किताबें और सामाजिक कार्य
फ़ादर हाफ़मैन ने न केवल सीएनटी एक्ट का प्राथमिक ड्राफ़्ट लिखा और इसे लागू कराया बल्कि उन्होंने 'मुंडारी ग्रामर', 'मुंडारी ग्रामर विद एक्सरसाइज़', 'मुंडारी पोएट्री एंड डांसेज़', 'सोशल वर्क इन छोटानागपुर' और 15 खंडों का 'इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका' जैसी कई अहम किताबें भी लिखीं.
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1915 में उन्हें भारत से निकाल दिया गया. तब ब्रिटिश हुक़ूमत वाले देशों से जर्मन नागरिकों को निकाला जा रहा था. वे वापस जर्मनी चले गए और इनसाइक्लोपेडिया मुंडारिका को पूरा किया. यह किताब उनकी मौत के बाद प्रकाशित कराई जा सकी.
मुंडा समाज को समझने के लिए ये किताबें सबसे भरोसेमंद किताबें मानी जाती हैं.

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फ़ादर हाफ़मैन ने मुंडा आदिवासियों को महाजनों के सूद के चंगुल से बचाने के लिए 1909 में छोटानागपुर कैथोलिक कोआपरेटिव क्रेडिट सोसायटी का गठन कराया. इसमें लोग अपनी पूंजी जमा कराते और यहीं से क़र्ज़ भी लेते. यह ग्रामीणों द्वारा चलाए जाने वाला एक बैंकनुमा संगठन था.
साल 1913 में उन्होंने यहां कोऑपरेटिव स्टोर भी खुलवाया, जहां गांव के लोगों को उचित मूल्य पर ज़रूरी सामान बेचे जाते थे.

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तो फ़ादर हाफ़मैन का विरोध क्यों?
बीजेपी सांसद प्रो राकेश सिन्हा कहते हैं कि फ़ादर हाफ़मैन की पैरोकारी करने वालों को सिर्फ़ एक सवाल का जवाब देना चाहिए कि भगवान बिरसा मुंडा ने उन पर तीर क्यों चलाया था.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "ब्रिटिश साम्राज्य के कई लोगों ने कई अच्छे काम किए, तो क्या हम उनका गुणगान करें. सवाल यह है कि बिरसा मुंडा ने किस पर तीर चलाया. मैं दरअसल बिरसा मुंडा या हाफ़मैन को कैटोगराइज़ नहीं कर रहा. मैं तो सिर्फ़ यह जानना चाहता हूं कि बिरसा मुंडा के तीर चलाने का उद्देश्य क्या था. क्या उनकी कोई निजी दुश्मनी थी हाफ़मैन से? ऐसा बिल्कुल नहीं था."
राकेश सिन्हा आगे कहते हैं, "बिरसा मुंडा की लड़ाई शोषण और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ थी और हाफ़मैन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के प्रतीक थे. इसलिए उन पर हमला किया गया. अब आप उसी व्यक्ति की प्रतिमा स्थापित करेंगे, तो इसका विरोध होना स्वभाविक है."
"मैं ख़ुद सामंतवाद और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ रहता हूं. यदि हाफ़मैन की प्रतिमा उस चर्च से नहीं हटायी गई, तो मैं बड़ी लड़ाई लड़ूंगा. उनकी मूर्ति तोड़ देनी चाहिए. झारखंड की जमीन पर या तो बिरसा मुंडा को स्वीकार कीजिए या हाफ़मैन को. श्रद्धा कभी दोहरी और छद्म नहीं हो सकती. दुर्भाग्य से झारखंड के मुख्यमंत्री ऐसा ही कर रहे हैं."
बीजेपी शासन में लगायी गई प्रतिमा
जब मैंने उनसे पूछा कि फ़ादर हाफ़मैन की प्रतिमा तो बीजेपी के मुख्यमंत्री रघुवर दास के शासन में स्थापित की गई थी, तो इसके लिए मौजूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कैसे दोषी कहे जा सकते हैं.
प्रो. राकेश सिन्हा ने कहा, "मैं इसे बीजेपी या कांग्रेस की लड़ाई के रूप में नहीं देख रहा. यह ऐतिहासिक तथ्यों की लड़ाई है. बीजेपी ने हाफ़मैन के महिमामंडन का तब भी विरोध किया था और आज भी कर रही है."

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क्या सच में हुआ था विरोध?
सरवदा चर्च परिसर में फ़ादर हाफ़मैन की प्रतिमा लगाए जाने के दो महीने बाद फ़रवरी 2019 में बीजेपी के अनुसूचित जनजाति (एसटी) मोर्चा ने इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था.
एसटी मोर्चा के तत्कालीन अध्यक्ष और बीजेपी विधायक रामकुमार पाहन ने तब खूंटी जिले के अधिकारियों को ज्ञापन भी दिया. लेकिन बीजेपी की सरकार होने के बावजूद उनके ज्ञापन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.
कुछ सरना संगठनों ने भी बीजेपी के आंदोलन का समर्थन किया था. हालांकि इस मुद्दे पर सरना संगठनों में कभी एक मत नहीं रहा. ऐसे ही कुछ प्रभावी संगठन प्रतिमा स्थापना के समर्थन में भी खड़े रहे.
तब सरवदा चर्च के फ़ादर जान क्रूस तिग्गा ने मीडिया से कहा था कि चर्च परिसर में फ़ादर हाफ़मैन की प्रतिमा लगाने का निर्णय चर्च का नहीं बल्कि उनके अनुयायियों का था. वो इसलिए कि लोगों की उनमें श्रद्धा है.

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आदिवासियों की धार्मिक आस्था
झारखंड के आदिवासियों का बहुमत सरना धर्मावलंबियों का है, लेकिन कुछ आबादी ईसाई धर्म को भी मानती है. बिरसा मुंडा ने अपना 'बिरसाइयत धर्म' चलाया. हालांकि, अब इस धर्म को मानने वाले गिनती के ही लोग बचे हैं.
बीजेपी एसटी मोर्चा ने तब दावा किया था कि सरना आदिवासी फ़ादर हाफ़मैन की प्रतिमा के ख़िलाफ़ हैं.

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क्या कहते हैं सरना धर्मगुरु?
सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. उन्होंने सवाल किया कि किसने कहा कि सरना लोग फ़ादर हाफ़मैन की प्रतिमा के ख़िलाफ़ हैं.
बंधन तिग्गा ने बीबीसी से कहा, "राकेश सिन्हा जब बिरसा मुंडा और फ़ादर हाफ़मैन की तुलना करते हैं, तो उन्हें ये बताना चाहिए कि शहीदों का अपमान करने वाले लोग कौन हैं. जब कंगना रनौत कहती हैं कि सन 47 की आजादी हमें भीख में मिली, तो क्या वे आजादी के सेनानियों का अपमान नहीं कर रहीं. बीजेपी पहले उन्हें जेल में क्यों नहीं डालते. क्या कंगना रनौत के बयान बिरसा मुंडा का अपमान नहीं हैं. अब आप एक ओर बिरसा मुंडा का अपमान करने वाली कंगना को सुरक्षा देते हैं और दूसरी तरफ़ हाफ़मैन को उनका दुश्मन करार देकर विरोध करवाते हैं. यह नहीं चल सकता."
वो कहते हैं, "मेरा सवाल तो यह है कि जिस सावरकर को बीजेपी वीर कहती है, उन्होंने अंग्रेजों से माफ़ी मांगी और पेंशन लिया. इसका लिखित दस्तावेज़ है. फिर भी वे उनके पूज्य बने हुए हैं. जबकि बिरसा मुंडा ने फ़ादर हाफ़मैन पर तीर चलाया, इसका कोई प्रामाणिक दस्तावेज़ है ही नहीं. फिर सुनी-सुनाई बातों के आधार पर फ़ादर हाफ़मैन का विरोध कहां तक उचित है. उन्होंने आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए काम किया था. बीजेपी को इन तथ्यों पर विचार करना चाहिए."
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