झारखंडः क्यों भा गई इंजीनियरों को दारोगा की नौकरी ?

झारखंड पुलिस, झारखंड पुलिस सब-इंस्पेक्टर

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    • Author, नीरज सिन्हा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

"पिताजी और भाई किसान हैं. वो लोग घर-गृहस्थी संभालने में ही जुटे होते हैं. तब क्या पढ़ना है, कहां नौकरी करनी है, ये फ़ैसला हमें लेना है. कई दफ़ा मन में आता रहा कि अपने ही राज्य में स्थायी नौकरी कर ली जाए. दारोगा की परीक्षा सामने थी. फॉर्म भरा, परीक्षा दी और चयन भी हो गया. लेकिन संघ लोक सेवा आयोग ( यूपीएससी) की मेरी असली आजमाइश बाकी है."

गढ़वा के रहने वाले गौतम कुमार सिंह आईआईटी से पढ़े हैं और हाल में झारखंड सरकार के नियुक्त किए गए दारोगाओं में उनका नाम शुमार है. गौतम ने आईआईटी गुवाहाटी से साल 2014 में केमिकल साइंस और टेक्नोलॉजी में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है.

इससे पहले उन्होंने नवोदय विद्यालय गढ़वा से बारहवीं की पढ़ाई पूरी की थी. वो बताते हैं कि पहली ही कोशिश में वो इंजीनियरिंग की परीक्षा में सफल हो गए थे.

अपर पुलिस महानिदेशक आरके मल्लिक

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हाल ही में झारखंड सरकार ने 2645 सब इंस्पेक्टरों की नियुक्तियां की है. नवनियुक्त दारोगाओं को राज्य के तीन पुलिस प्रशिक्षण केंद्रों में एक साल के प्रशिक्षण पर भेजा गया है.

अपर पुलिस महानिदेशक आरके मल्लिक ने बीबीसी को बताया है, 'नियुक्त हुए दारोगाओं में 535 युवा, इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के हैं'.

वीडियो कैप्शन, धंधा-पानी

पुलिस महकमा ऐसे दरोगाओं का इस्तेमाल भी नई तैयारियों के साथ करना चाहता है.

आईआईटी से दारोगा, इस सवाल के जवाब में गौतम कहते हैं, ''मुझे पता है, ये सवाल आगे भी पूछे जा सकते हैं. कभी-कभार खुद से ये सवाल पूछता हूं. पर उतनी ही ज़ल्दी मैं इससे बाहर निकलता हूं. क्योंकि इंजीनियिरिंग की डिग्री के साथ मेरे पढ़ने और ऊंचे ओहदे पर जाने के ऑप्शन खुले हैं. अभी सब इंस्पेक्टर की ट्रेनिंग मेरी प्राथमिकता है.''

उनका कहना था कि आईआईटी से पढ़ाई के बाद उन्होंने तीन साल के लिए प्रधानमंत्री ग्राम विकास (पीएमआरडी) फेलोशिप मिली. इस फेलोशिप में उन्हें महीने में 75 हज़ार रुपये मिलते थे. इस दौरान वो छत्तीसगढ़ में थे. अपने ही राज्य में स्थायी नौकरी का मौका सामने था, तो इसका चयन कर लिया. हालांकि गौतम ये कहते हुए अपनी तस्वीर देने से मना करते हैं कि रहने दीजिए इसकी भी क्या ज़रूरत है.

पदमा (हजराबीगा) स्थित पुलिस ट्रेनिंग कैंप के प्राचार्य एसपी अजय लिंडा बताते हैं कि प्रशिक्षण हासिल करने के लिए 1,189 नवनियुक्त दारोगा ने यहां योगदान किया है.

इनमें लगभग छह सौ लोगों की उम्र 22 से 25 साल की है. 285 इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से आए लोग हैं. इनमें 13 लड़कियां भी हैं.

इन युवाओं को तेज़-तर्रार दारोगा के तौर पर तैयार करने के लिए प्रशिक्षण के नए आयाम के साथ कक्षाएं तथ्यपरक हों, इसकी कोशिशें की जा रही हैं. वैसे इन युवाओं में सीखने की क्षमता भी है.

बिकेश दूबे

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एएसआई के तीन बेटे एसआई

कोडरमा ज़िले के डोमचांच थाना में बतौर असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर तैनात अगस्त दूबे डालटनगंज के बारालोटा के रहने वाले हैं. उनके तीनों बेटे एक साथ दारोगा बनने में सफल हुए हैं.

इनमें बड़े पुत्र नीतेश दूबे ने पश्चिम बंगाल तथा मंझले पुत्र विकास दूबे ने बिनोवा भावे विश्वविद्यालय हज़ारीबाग से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. जबकि छोटे पुत्र ऋषिकेश दूबे ने डाल्टनगंज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की है.

बिकेश दूबे बताते हैं कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही वैकेंसी का टोटा और कैंपस सेलेक्शन का हाल देख महसूस होने लगा था कि आगे परेशानी हो सकती है. जबकि कई दोस्त भी अक्सर आशंकाओं पर चर्चा करते थे.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद सरकारी नौकरियों की तैयारी में जुटे थे. इस बीच दारोगा की बंपर वैकेंसी निकली. तब वे 24 साल के थे. और सामान्य कोटा से दारोगा में नियुक्ति के लिए 26 साल की उम्र तय थी. तभी तय कर लिया कि इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना है. क्योंकि आगे उम्र का तकाजा हो सकता है.

पिता पुलिस की नौकरी में हैं, क्या उनका भी दारोगा बनने पर जोर था, इस सवाल पर बिकेश कहते हैं, "नहीं, वे सिर्फ यही कहते थे कि प्रशासनिक सेवा के लिए विशेष ध्यान देते रहो."

बिकेश और नीतेश ने झारखंड लोकसेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा भी पास की है, लेकिन मुख्य परीक्षा में विलंब होने से वे निराश भी होते रहे.

हमने बिकेश से ये पूछा था कि क्या पुलिस की नौकरियों में कथित ऊपरी कमाई पर भी नजरें लगी होती हैं, इस सवाल पर वो दो टूक कहते हैं इस बारे में कभी कोई ख्याल नहीं आया.

नीतेश दूबे

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प्राथमिकता थी सरकारी नौकरी

उन्हें पुलिस महकमे और सरकार की उम्मीदों के अनुरूप बढ़िया दारोगा ज़रूर बनना है. फिर सब इंस्पेक्टर की तनख्वाह भी कम नहीं है. और ज़िम्मेदारी भी मामूली नहीं.

बिकेश के बड़े भाई नीतेश दूबे बताते हैं कि 2014 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कोलकाता की एक स्टार्टअप कंपनी मे बीस हज़ार की तनख्वाह पर काम मिला था. मन नहीं लगा तो छह महीने काम करके वापस घर आया. सरकारी नौकरी प्राथमिकता थी क्योंकि घर-गांव में इसकी चर्चा तो होती ही रही है कि अपने ही राज्य में स्थायी नौकरी ज़्यादा बेहतर है. वैसे तीनों भाईयों का झारखंड लोकसेवा आयोग की परीक्षा पास करने का भी इरादा कायम है. नीतेश को इसकी खुशी ज़्यादा है कि छोटा भाई ऋषिकेश 22 साल की उम्र में दारोगा बन गया है.

अगस्त दूबे अपने बेटों की सफलता पर कहते हैं कि बड़े अरमान से दो बेटों को इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई थी. वो यह भी चाहते थे कि बेटे प्रशासनिक अफसर बनें. अब उन लोगों ने पुलिस सेवा का चयन किया है, तो इसी में आगे बढ़ें.

नवनियुक्त सब इंस्पेक्टर को सर्टिफिकेट देते हुए मुख्यमंत्री

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रिसर्च और साइबर क्राइम

अपर पुलिस महानिदेशक आरके मल्लिक बताते हैं कि झारखंड पुलिस स्मार्ट पुलिसिंग की ओर बढ़े इसी मकसद से इस बार दारोगा की नियुक्ति में उम्र सीमा 26 से 30 साल निर्धारित थी.

इनके अलावा तैयारी ये भी है कि राज्य के चार बड़े शहरों- रांची, जमशेदपुर, बोकारो तथा धनबाद में सब इंस्पेक्टर की ज़िम्मेदारी लॉ एंड ऑर्डर तथा अनुसंधान दोनों को अलग किया जाए. सभी तरह के केस की रिसर्च में गुणात्मक सुधार हो इसके लिए नवनियुक्त दारोगा लगाए जाएंगे. इनके अलावा 450 दारोगा स्पेशल ब्रांच में तैनात किए जाएंगे.

आरके मल्लिक बताते हैं कि साइबर क्राइम झारखंड के लिए चुनौतियां हैं. लिहाजा तकनीकी बैकग्राउंड के दारोगा की काबलियत इन मामलों में भी परखी जाएगी.

बड़ी संख्या में इंजीनियरों के पुलिस सेवा में आने के सवाल पर वे कहते हैं कि उन्हें लगता है कि युवाओं ने अपने ही राज्य में मिले इस अवसर को सफलता में बदलने की कोशिश की है.

अब सब इंस्पेक्टर की सैलेरी भी अच्छी हो गई है. ट्रेनिंग पीरियड में ही उन्हें 40-45 हज़ार मिल सकते हैं.

फिर पुलिस सेवा में ईमानदार, सजग, कर्तव्यनिष्ठ होकर काम करने से समाज में प्रतिष्ठा तो मिलती ही रही है.

26 साल के जीतेंद्र कुमार हज़ारीबाग के रहने वाले हैं और साल 2015 में उन्होंने बीआइटी सिंदरी से इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. जीतेंद्र इन्हीं बातों से इत्तेफ़ाक रखते हैं.

झारखंड पुलिस मुख्यालय

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जीतेंद्र कहते हैं,'' निजी कंपनी में इंजीनियरिंग की नौकरी तो तुरंत मिली, पर काम वही पंप चालू कराओ, बंद कराओ और तकनीकी फ़ॉल्ट को दुरूस्त करो. अक्सर ख़ुद से पूछता कि ये कहां आ गए हम. फिर पब्लिक के बीच कुछ काम करने की इसमें गुंजाइश कहां है. तभी तय कर दिया कि ट्रैक चेंज करना है.''

दारोगा की नौकरी में आने के सवाल पर वे साफ़गोई से कहते हैं, "मेरे मन में झारखंड के लिए और ख़ासकर आदिवासियों के बीच काम करने की इच्छा है."

"बीआईटी सिंदरी सरकारी कॉलेज होने की वजह से मेरी पढ़ाई में घर वालों पर कोई बड़ा आर्थिक बोझ नहीं पड़ा. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद एक निजी कंपनी में मैंने नौकरी भी की थी, लेकिन मन नहीं लगा. लिहाजा काम छोड़कर घर चला आया और सरकारी नौकरी की तैयारी में जुट गया. इस बीच दारोगा की वैकेंसी आई, तो लगा ये काम मेरे लिए पक्का रहेगा."

जीतेंद्र कहते हैं कि पढ़ाई का मौका मिलता रहा, तो झारखंड लोकसेवा आयोग की परीक्षा में शामिल हो सकता हूं. लेकिन सब इंस्पेक्टर की ज़िम्मेदारी से किसी किस्म का समझौता नहीं करना चाहूंगा. ट्रेनिंग टफ है, लेकिन इन चुनौतियों को पार करना है.

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