झारखंडः शराब ने बना दिया विधवाओं का गांव

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, ब्राम्बे (रांची) से, बीबीसी हिंदी के लिए
27 साल की चुमानी उरांव विधवा हैं. उनके पति बजरंग ने इसलिए खुदकुशी कर ली, क्योंकि चुमानी ने उन्हें शराब पीने से मना किया था.
अब चुमानी के हिस्से पहाड़-सी ज़िंदगी है और बजरंग की कई यादें. वे अपनी पांच साल की बेटी अल्का के साथ ब्राम्बे गांव में रहती हैं.
ये उनकी ससुराल (पति का गांव) है. चुमानी को इसका कतई अंदेशा नहीं था कि शराब को लेकर हुई मामूली-सी कहासुनी उसकी ज़िंदगी उजाड़ देगी.
उन्होंने अब सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ झारखंड (सीयूजे) में चपरासी की नौकरी शुरू कर दी है, ताकि अपनी बेटी और सास-ससुर की ज़िंदगी चला सकें.
चुमानी और बजरंग का साथ सिर्फ आठ साल रहा, लेकिन अब उनकी कमी चुमानी को सारी उम्र सालती रहेगी.
चुमानी उरांव ब्राम्बे गांव की उन विधवा महिलाओं में से एक हैं, जिनके पति की मौत शराब के कारण हो गई थी.

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और भी कई चुमानी उरांव
रांची से 25 किलोमीटर दूर रांची-लोहरदगा हाइवे पर क़रीब 900 घरों वाले ब्राम्बे गांव के कम से कम 200 घरों में ऐसी महिलाएं रहती हैं, जिनके विधवा होने की वजह शराब है.
इस गांव में हमारी मुलाकात सोहाद्रा तिग्गा, विशुन देवी, सुकरी उराइन, मही उराइन, सुकरू तिग्गा आदि से भी हुई.
इनके पतियों की मौत शराब के कारण हो चुकी है. किसी के पति नशे में दुर्घटना के शिकार हो गए, तो कोई बीमार होकर मर गया.
दरअसल, हर विधवा का अपना दर्द है और इसकी वजह बनी है शराब.

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शराब पीने के बाद...
विशुन देवी कहती हैं, "वे पीने-खाने गए थे. वहीं पर खूब शराब पीने के बाद घर के लिए निकले लेकिन रास्ते में ही गिरने की वजह से उनकी मौत हो गई."
"कई घंटे बाद किसी ने उन्हें सड़क किनारे पड़ा देखा, तो लाश घर पर आई. अब मैं अपनी तीन बेटियों और दो बेटों के लालन-पालन के लिए मज़दूरी करती हूं."
वहीं, सुकरू कहती हैं कि उनके पति ने खाना-पीना छोड़ दिया था. शराब के कारण उन्हें दवा निगलने में भी परेशानी होती थी. उनकी मौत पीते-पीते हो गई.
इस तरह मही उराइन के पति सुगना उरांव को अत्यधिक उल्टियां हुईं. उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन नहीं बचाया जा सका. उनकी मौत हो गई.
मही उराइन अब अपने बच्चों के साथ अकेले रहती हैं.

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शराब से 200 लोगों की मौत
मांडर के बीडीओ विष्णु देव कच्छप ने बीबीसी को बताया कि ब्राम्बे में कम उम्र में लोगों के देहांत की मुख्य वजह शराब है.
वे कहते हैं, "हमने जागरुकता के कई कार्यक्रम चलाए हैं और वहाँ के लोगों को स्वरोज़गार से जोड़ने की योजना है."
ब्राम्बे के मुखिया जयंत तिग्गा भी अपनी चिंता जताते हैं.
बीबीसी से उन्होंने कहा, "गांव में 200 से भी अधिक लोगों की मौत शराब के कारण होने के बावजूद लोगों में शराब पीने की चाहत घटने की जगह बढ़ रही है. ये चिंतित करता है."

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महुआ से बनी शराब
बीडीओ विष्णु देव कच्छप ने बताया, "ब्राम्बे पंचायत में क़रीब 200 महिलाओं को विधवा पेंशन दिया जा रहा है और कुछ आवेदन अभी पेंडिंग पड़े हैं."
"वह बड़ा गाँव है और वहाँ की आबादी 5000 से अधिक है. वहाँ आदिवासियों की संख्या अधिक है और शराब का चलन महिला और पुरुष दोनों में है. इस कारण भी स्थिति ख़राब हुई है."

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जयंत तिग्गा कहते हैं, "मेरे गांव के अधिकतर लोग महुआ से बनी शराब पीते हैं. इसके निर्माण में यूरिया का प्रयोग होता है. ये हानिकारक है. इससे शरीर प्रभावित होता है."
"गरीबी के कारण लोगों को पौष्टिक आहार भी नहीं मिल पाता. शराब शरीर को पहले से खोखला कर चुकी होती है."
"ऐसे में 40-45 साल की उम्र में ही लोगों की मौत शराब की वजह से होने वाली बीमारियों से हो जाती है."

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क्यों नहीं छूटती है शराब की लत
ब्राम्बे से कुछ किलोमीटर दूर मांडर में स्थित नशा विमुक्ति एवं परामर्श केंद्र की निदेशक सिस्टर अन्ना बार्के बताती हैं कि ब्राम्बे में जागरूकता के कई कार्यक्रम चलाए गए हैं.
"लोग शराब छोड़ भी देते हैं लेकिन वे फिर से पीने लगते हैं. क्योंकि, महुआ की शराब उनके लिए आमदनी का तत्काल जरिया (कैश बिजनेस) है."
"वहां के आदिवासी महुआ की शराब बनाते और बेचते हैं. इससे उनकी अच्छी आमदनी हो जाती है."

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पिछले 19 साल से नशा विमुक्ति के लिए काम कर रहीं सिस्टर अन्ना बार्के की राय में वैसे तो इलाज से शराब की लत छुड़ाई जा सकती है लेकिन अंदेशा इस बात का रहता है कि ठीक होने के बाद लोग फिर से शराब न पीने लगें.
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